पुनर्नव स्वदेश …उद्देश्य: बच्चे और हमारे भविष्य का भारत.

Posted: April 3, 2011 in Uncategorized

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए 🙂
देश के २ से ५  करोड़ से ज्यादा बच्चे बल-मजदूरी करते हैं जीवन यापन के लिए. “बच्चे मन के सच्चे” “सारे जग की आँख के तारे” फिर बच्चों का शोषण लोग क्यों करते हैं? देश में बच्चों से सम्बंधित अनेक समस्याएं बिखरी पड़ी हैं.
जिनको हमने देश के भविष्य (बच्चों) का फैसला लेने के लिए मनोनीत किया है उनकी तृष्णा , उत्कंठा और पूर्वाग्रह को बांधने का कोई उपाय नहीं बना पाए हैं.. हमारा  सामाजिक तंत्र (हम और आप ) और संवैधानिक तंत्र चार मूल बाल अधिकारों उत्तरजीविता (survival), विकास (development), सुरक्षा (protection)  समान भागीदारी (participation) की रक्षा करने में सक्षम नहीं है .
शिक्षा के अधिकार (right to education) को सबने स्वीकार किया. एक बड़े तबके (आम भाषा में गरीब ) के स्कूलों की हालात को किसी ने क्यों नहीं देखा. … उन्ही स्कूलों में मिड डे मील और सर्व शिक्षा अभियान चलता है . ये निम्न माध्यम आय वर्ग और इस वर्ग के बच्चों के साथ मजाक नहीं है तो और क्या है ? बच्चों  के  लिए  चलाये जा रहे   कार्यक्रम  कितने  कारगर  हैं  आप  सभी  से  छुपा  नहीं  है .. इन  कार्यक्रमों  के  लिए  जो  “ईमानदारी  से  तर्क  और  निर्णय  करने  वाले  लोग  हमे   अपने  अभी  तक  के  अनुभव  में  कभी  नहीं  दिखे .”
जब  तक हम किसी निर्बल के जूते में  पैर डाल के देखना नहीं चाहेंगे तब तक हम  सिर्फ उससे हमदर्दी रख पाएंगे उसके दर्द का एहसास नहीं. हमने बाल श्रमिकों और विद्यालयों के   बच्चों  से बात की तो पता चला की वे अपनी सृजनशीलता से समस्याओं  का समाधान निकाल सकते हैं.
हम सभी लोग टीवी पर जो बच्चों  के शो और प्रोग्राम आते हैं उनको देख के कह सकते हैं कि  बच्चों में  कल्पना है सृजनशीलता है, नव-प्रवर्तन है, उनमे निर्णय लेने की क्षमता है. आज हमारे लोग उन रियलिटी शो के लिए कोचिंग दिलवा रहे हैं,  उनकी खुले मंच पर सहभागिता क्यों नहीं प्रेरित कर रहे हैं?
लोग अपने बच्चे को ज़िन्दगी के शुरुआती दौर से ही भागना सिखाने लगते हैं, मेरा बेटा ये करेगा, वो करेगा. स्कूल भी आपकी इसी विचारधारा का मौन समर्थन करते हुए एक छद्म मानसिक दबाव बनाये जा रहे हैं. नतीजा एक शावक (शेर के बच्चे) का बचपन में ही अंत हो जाता है . आप लोग बच्चों को क्या दे रहे हैं… मानसिक दबाव या स्वतंत्र अभिव्यक्ति?
क्या हम राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा की तरह राष्ट्रीय नेतृत्व प्रतिभा खोज परीक्षा नहीं कर सकते….?
कुछ लोग कहते हैं कि वे सिर्फ अमीरों के बच्चे होते हैं… अब  तो  हमने   बच्चों  को  भी  दो  तबकों  में  बाँट  दिया . 1.अमीर  बच्चे  2. गरीब  बच्चे . आश्चर्य  करता  हूँ  लोगों  के  तार्किक  प्रतिरोधों  पर .
हमे गर्व है कि यह देश  लव-कुश, श्रवण, ध्रुव और, अंकित फाडिया जैसे बाल-विद्वानों और विलक्षण प्रतिभाओं का रहा है. अगर आप कहेंगे कि ऐसे कितने होंगे तो मै सिर्फ कहना चाहूँगा कि “शिक्षा का अर्थ उस पूर्णता को अभिव्यक्त करना है जो सब मनुष्यों में पहले से ही विद्यमान है.” अब अगर आप इसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहेंगे कि बच्चे अपना फैसला नहीं ले सकते तो फिर ये कहना बेमानी होगा कि ऐसे में उनकी सहभागिता से सुगमतापूर्वक परिणामो (निर्धारित सामाजिक लक्ष्यों ) को प्राप्त किया जा सकता है.
हमारे सहयोगी एवं स्वयंसेवक समीर तिवारी, प्रनोति  गुप्ता, आवेद सोनकर,  जो कि पेशे से इंजिनीयर, शाश्वत रतन जो कि युवा वैज्ञानिक भी हैं, ने सामाजिक जुडाव और सरोकारों को एक मूर्त रूप देने का संकल्प लिया है. हमने  कानपुर शहर के बच्चों और उनकी समस्याओं को प्रायोगिक तौर पर लिया है. हमारे उद्देश्य हैं. ..बाल अधिकारों और बाल श्रमिकों के लिए काउंसिलिंग एवं रोजगारपरक क्रियाशील शिक्षण व्यवस्था, सभी विद्यालयों में बाल क्लब के माध्यम से बच्चों को मुख्यधारा के नजदीक लाना और उनकी सक्रिय सहभागिता बढ़ाना , सृजनशीलता एवं नव-प्रवर्तन के लिए प्रेरित करना.  बच्चों और वृद्धों के लिए सुलभ और नि:शुल्क चिकित्सकीय सुविधाएँ प्राप्त करने में सहयोग करना.
समाज के सभी वर्गों से अपील है की वे सामाजिक पुनर्गठन एवं पुनर्नव स्वदेश में सक्रिय योगदान दें. ,
भवदीय
राकेश मिश्र
दिनांक: सितम्बर २७, २०१०.
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