सामाजिक मूल्यों की विकृति : बाल यौन शोषण (Child Abuse)

Posted: April 3, 2011 in Uncategorized

“शहर के एक स्कूल में एक छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या हुई. आज भी रूह कांपती है जब अपनी छोटी बहन (स्तुति 13) के बारे में सोचता हूँ. शहर के लोगों की प्रतिरोध की मानसिकता पर तरस आया. कितने संगठनो के नेताओं से, मनोवैज्ञानिकों से, वृद्ध/वरिष्ठ नागरिकों की राय ली तो यही समझ आया की हमारी मानसिकता में गिरावट आई है. सारे संगठनो के इतनी मशक्कत धरने प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय महिला योग ने इस घटना को संज्ञान में लिया (इसे मेरे व्यक्तिगत प्रयास के सन्दर्भ में न लें.). एक वयोवृद्ध कर्मयोगी श्री गणेश शंकर मिश्र ने 1981 की एक घटना का हवाला देते हुए बताया की तब शहर में छेड़छाड़ और अभद्रता की घटनाएँ आम नहीं थी. एक थाने में कुछ पुलिसवालों एक युवती के साथ दुष्कर्म किया. इस घटना के लिए शहर के लोगों ने इस स्तर का प्रतिरोध किया की पुलिस किसी लड़की से नाम तक पूछने में घबराने लगी. आज की हालत क्या है. छेड़ने से लेकर जमानत करने का कुल खर्च 500 . बीच में अगर थाने में ही मामला निबट जाता है तो भी उतना ही खर्चा. भरे बाज़ार भी अगर वाकया हो तो भी गवाह जुटाने मुश्किल है. कानून इस समस्या में सजा तो दे सकता है ह्रदय परिवर्तन नहीं करवा सकता. मेरे यहाँ कुछ हो जाये तो मेरा पडोसी भी मुह छिपाने लगेगा. अपने बच्चों को हम कितने तहों में छिपा के रखेंगे? बाहर निकलना और समाज के अवयवों से उन्हें भी दो-चार होना ही पड़ता है. आज हमारी सामाजिक परिधियाँ अगर अपने घर तक ही सीमित हो के रह गयीं तो हम उन अवयवों से बच्चों की रक्षा कैसे करेंगे?
कुछ भी करें बच्चों में सामाजिक असुरक्षा का एहसास न होने दें. असुरक्षा की भावना मानसिक विकृतिया पैदा करती हैं. पूर्वाग्रह बनती है.
बेहतर होगा हम अपने सामाजिक दायरे बढ़ाएं. लोगों के साथ शरीक हो उनके सुख दुःख को समझें. यहीं से चेतना का निर्माण शुरू होगा.चेतना के स्तर पर ही  इस सामाजिक विकृति का स्थायी निदान संभव होगा.
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