आर्थिक महाषडयंत्र : अब तक के सभी घोटालों का बाप.. !!

Posted: April 8, 2011 in Uncategorized


देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से छुपा लिया. या शायद सीबीआई ने भारत सरकार को इस घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं. देश अंधेरे में और देश को तबाह करने वाले रोशनी में हैं. आइए, आपको

आज़ाद भारत के सबसे बड़े आपराधिक षड्‌यंत्र के बारे में बताते हैं, जिसे हमने पांच महीने की तलाश के बाद आपके सामने रखने का फ़ैसला किया है. कहानी है रिज़र्व बैंक के माध्यम से देश के अपराधियों द्वारा नक़ली नोटों का कारोबार करने की.
नक़ली नोटों के कारोबार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपने जाल में जकड़ लिया है. आम जनता के हाथों में नक़ली नोट हैं, पर उसे ख़बर तक नहीं है. बैंक में नक़ली नोट मिल रहे हैं, एटीएम नक़ली नोट उगल रहे हैं. असली-नक़ली नोट पहचानने वाली मशीन नक़ली नोट को असली बता रही है. इस देश में क्या हो रहा है, यह समझ के बाहर है. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से यह पता चला है कि जो कंपनी भारत के लिए करेंसी छापती रही, वही 500 और 1000 के नक़ली नोट भी छाप रही है. हमारी तहक़ीक़ात से यह अंदेशा होता है कि देश की सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जाने-अनजाने में नोट छापने वाली विदेशी कंपनी के पार्टनर बन चुके हैं. अब सवाल यही है कि इस ख़तरनाक साज़िश पर देश की सरकार और एजेंसियां क्यों चुप हैं?

एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई, अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है?

अब सवाल यह है कि सीबीआई को मुंबई के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में छापा मारने की ज़रूरत क्यों पड़ी? रिजर्व बैंक से पहले नेपाल बॉर्डर से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के क़रीब 70-80 बैंकों में छापा पड़ा. इन बैंकों में इसलिए छापा पड़ा, क्योंकि जांच एजेंसियों को ख़बर मिली है कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में नक़ली नोट भेज रही है. बॉर्डर के इलाक़े के बैंकों में नक़ली नोटों का लेन-देन हो रहा है. आईएसआई के रैकेट के ज़रिए 500 रुपये के नोट 250 रुपये में बेचे जा रहे हैं. छापे के दौरान इन बैंकों में असली नोट भी मिले और नक़ली नोट भी. जांच एजेंसियों को लगा कि नक़ली नोट नेपाल के ज़रिए बैंक तक पहुंचे हैं, लेकिन जब पूछताछ हुई तो सीबीआई के होश उड़ गए. कुछ बैंक अधिकारियों की पकड़-धकड़ हुई. ये बैंक अधिकारी रोने लगे, अपने बच्चों की कसमें खाने लगे. उन लोगों ने बताया कि उन्हें नक़ली नोटों के बारे में कोई जानकारी नहीं, क्योंकि ये नोट रिजर्व बैंक से आए हैं. यह किसी एक बैंक की कहानी होती तो इसे नकारा भी जा सकता था, लेकिन हर जगह यही पैटर्न मिला. यहां से मिली जानकारी के बाद ही सीबीआई ने फ़ैसला लिया कि अगर नक़ली नोट रिजर्व बैंक से आ रहे हैं तो वहीं जाकर देखा जाए कि मामला क्या है. सीबीआई ऱिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पहुंची, यहां उसे नक़ली नोट मिले. हैरानी की बात यह है कि रिज़र्व बैंक में मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिन्हें आईएसआई नेपाल के ज़रिए भारत भेजती है.

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में नक़ली नोट कहां से आए, इस गुत्थी को समझने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में नक़ली नोटों के मामले को समझना ज़रूरी है. दरअसल हुआ यह कि आईएसआई की गतिविधियों की वजह से यहां आएदिन नक़ली नोट पकड़े जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है. बहुत सारे केसों में वकीलों ने अनजाने में जज के सामने यह दलील दी कि पहले यह तो तय हो जाए कि ये नोट नक़ली हैं. इन वकीलों को शायद जाली नोट के कारोबार के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था, स़िर्फ कोर्ट से व़क्त लेने के लिए उन्होंने यह दलील दी थी. कोर्ट ने जब्त हुए नोटों को जांच के लिए सरकारी लैब भेज दिया, ताकि यह तय हो सके कि ज़ब्त किए गए नोट नक़ली हैं. रिपोर्ट आती है कि नोट असली हैं. मतलब यह कि असली और नक़ली नोटों के कागज, इंक, छपाई और सुरक्षा चिन्ह सब एक जैसे हैं. जांच एजेंसियों के होश उड़ गए कि अगर ये नोट असली हैं तो फिर 500 का नोट 250 में क्यों बिक रहा है. उन्हें तसल्ली नहीं हुई. फिर इन्हीं नोटों को टोक्यो और हांगकांग की लैब में भेजा गया. वहां से भी रिपोर्ट आई कि ये नोट असली हैं. फिर इन्हें अमेरिका भेजा गया. नक़ली नोट कितने असली हैं, इसका पता तब चला, जब अमेरिका की एक लैब ने यह कहा कि ये नोट नक़ली हैं. लैब ने यह भी कहा कि दोनों में इतनी समानताएं हैं कि जिन्हें पकड़ना मुश्किल है और जो विषमताएं हैं, वे भी जानबूझ कर डाली गई हैं और नोट बनाने वाली कोई बेहतरीन कंपनी ही ऐसे नोट बना सकती है. अमेरिका की लैब ने जांच एजेंसियों को पूरा प्रूव दे दिया और तरीक़ा बताया कि कैसे नक़ली नोटों को पहचाना जा सकता है. इस लैब ने बताया कि इन नक़ली नोटों में एक छोटी सी जगह है, जहां छेड़छाड़ हुई है. इसके बाद ही नेपाल बॉर्डर से सटे बैंकों में छापेमारी का सिलसिला शुरू हुआ. नक़ली नोटों की पहचान हो गई, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि नेपाल से आने वाले 500 एवं 1000 के नोट और रिज़र्व बैंक में मिलने वाले नक़ली नोट एक ही तरह के कैसे हैं. जिस नक़ली नोट को आईएसआई भेज रही है, वही नोट रिजर्व बैंक में कैसे आया. दोनों जगह पकड़े गए नक़ली नोटों के काग़ज़, इंक और छपाई एक जैसी क्यों है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत के 500 और 1000 के जो नोट हैं, उनकी क्वालिटी ऐसी है, जिसे आसानी से नहीं बनाया जा सकता है और पाकिस्तान के पास वह टेक्नोलॉजी है ही नहीं. इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जहां से ये नक़ली नोट आईएसआई को मिल रहे हैं, वहीं से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को भी सप्लाई हो रहे हैं. अब दो ही बातें हो सकती हैं. यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से नक़ली नोट आया या फिर हमारी अर्थव्यवस्था ही अंतरराष्ट्रीय मा़फ़िया गैंग की साज़िश का शिकार हो गई है. अब सवाल उठता है कि ये नक़ली नोट छापता कौन है.

हमारी तहक़ीक़ात डे ला रू नाम की कंपनी तक पहुंच गई. जो जानकारी हासिल हुई, उससे यह साबित होता है कि नक़ली नोटों के कारोबार की जड़ में यही कंपनी है. डे ला रू कंपनी का सबसे बड़ा करार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ था, जिसे यह स्पेशल वॉटरमार्क वाला बैंक नोट पेपर सप्लाई करती रही है. पिछले कुछ समय से इस कंपनी में भूचाल आया हुआ है. जब रिजर्व बैंक में छापा पड़ा तो डे ला रू के शेयर लुढ़क गए. यूरोप में ख़राब करेंसी नोटों की सप्लाई का मामला छा गया. इस कंपनी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को कुछ ऐसे नोट दे दिए, जो असली नहीं थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की टीम इंग्लैंड गई, उसने डे ला रू कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने हम्प्शायर की अपनी यूनिट में उत्पादन और आगे की शिपमेंट बंद कर दी. डे ला रू कंपनी के अधिकारियों ने भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह कहा कि कंपनी से जुड़ी कई गंभीर चिंताएं हैं. अंग्रेजी में कहें तो सीरियस कंसर्नस. टीम वापस भारत आ गई.

डे ला रू कंपनी की 25 फीसदी कमाई भारत से होती है. इस ख़बर के आते ही डे ला रू कंपनी के शेयर धराशायी हो गए. यूरोप में हंगामा मच गया, लेकिन हिंदुस्तान में न वित्त मंत्री ने कुछ कहा, न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई बयान दिया. रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधियों ने जो चिंताएं बताईं, वे चिंताएं कैसी हैं. इन चिंताओं की गंभीरता कितनी है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ डील बचाने के लिए कंपनी ने माना कि भारत के रिज़र्व बैंक को दिए जा रहे करेंसी पेपर के उत्पादन में जो ग़लतियां हुईं, वे गंभीर हैं. बाद में कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव जेम्स हसी को 13 अगस्त, 2010 को इस्ती़फा देना पड़ा. ये ग़लतियां क्या हैं, सरकार चुप क्यों है, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया क्यों ख़ामोश है. मज़ेदार बात यह है कि कंपनी के अंदर इस बात को लेकर जांच चल रही थी और एक हमारी संसद है, जिसे कुछ पता नहीं है.

5 जनवरी, 2011 को यह ख़बर आई कि भारत सरकार ने डे ला रू के साथ अपने संबंध ख़त्म कर लिए. पता यह चला कि 16,000 टन करेंसी पेपर के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू की चार प्रतियोगी कंपनियों को ठेका दे दिया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू को इस टेंडर में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी नहीं किया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने इतना बड़ा फै़सला क्यों लिया. इस फै़सले के पीछे तर्क क्या है. सरकार ने संसद को भरोसे में क्यों नहीं लिया. 28 जनवरी को डे ला रू कंपनी के टिम कोबोल्ड ने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि डे ला रू का अब आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ कोई समझौता होगा या नहीं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी डे ला रू से कौन बात कर रहा है और क्यों बात कर रहा है. मज़ेदार बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ख़ामोश रहा.

इस तहक़ीक़ात के दौरान एक सनसनीखेज सच सामने आया. डे ला रू कैश सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 2005 में सरकार ने दफ्तर खोलने की अनुमति दी. यह कंपनी करेंसी पेपर के अलावा पासपोर्ट, हाई सिक्योरिटी पेपर, सिक्योरिटी प्रिंट, होलोग्राम और कैश प्रोसेसिंग सोल्यूशन में डील करती है. यह भारत में असली और नक़ली नोटों की पहचान करने वाली मशीन भी बेचती है. मतलब यह है कि यही कंपनी नक़ली नोट भारत भेजती है और यही कंपनी नक़ली नोटों की जांच करने वाली मशीन भी लगाती है. शायद यही वजह है कि देश में नक़ली नोट भी मशीन में असली नज़र आते हैं. इस मशीन के सॉफ्टवेयर की अभी तक जांच नहीं की गई है, किसके इशारे पर और क्यों? जांच एजेंसियों को अविलंब ऐसी मशीनों को जब्त करना चाहिए, जो नक़ली नोटों को असली बताती हैं. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि डे ला रू कंपनी के रिश्ते किन-किन आर्थिक संस्थानों से हैं. नोटों की जांच करने वाली मशीन की सप्लाई कहां-कहां हुई है.

हमारी जांच टीम को एक सूत्र ने बताया कि डे ला रू कंपनी का मालिक इटालियन मा़िफया के साथ मिलकर भारत के नक़ली नोटों का रैकेट चला रहा है. पाकिस्तान में आईएसआई या आतंकवादियों के पास जो नक़ली नोट आते हैं, वे सीधे यूरोप से आते हैं. भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और देश की जांच एजेंसियां अब तक नक़ली नोटों पर नकेल इसलिए नहीं कस पाई हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब तक इस मामले में पाकिस्तान, हांगकांग, नेपाल और मलेशिया से आगे नहीं देख पा रही हैं. जो कुछ यूरोप में हो रहा है, उस पर हिंदुस्तान की सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है.

अब सवाल उठता है कि जब देश की सबसे अहम एजेंसी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब सरकार ने क्या किया. जब डे ला रू ने नक़ली नोट सप्लाई किए तो संसद को क्यों नहीं बताया गया. डे ला रू के साथ जब क़रार ़खत्म कर चार नई कंपनियों के साथ क़रार हुए तो विपक्ष को क्यों पता नहीं चला. क्या संसद में उन्हीं मामलों पर चर्चा होगी, जिनकी रिपोर्ट मीडिया में आती है. अगर जांच एजेंसियां ही कह रही हैं कि नक़ली नोट का काग़ज़ असली नोट के जैसा है तो फिर सप्लाई करने वाली कंपनी डे ला रू पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. सरकार को किसके आदेश का इंतजार है. समझने वाली बात यह है कि एक हज़ार नोटों में से दस नोट अगर जाली हैं तो यह स्थिति देश की वित्तीय व्यवस्था को तबाह कर सकती है. हमारे देश में एक हज़ार नोटों में से कितने नोट जाली हैं, यह पता कर पाना भी मुश्किल है, क्योंकि जाली नोट अब हमारे बैंकों और एटीएम मशीनों से निकल रहे हैं.

डे ला रू (De La Ru) का इतिहास:

http://www.delarue.com/

De La Rue plc

Address:
De La Rue House
Jays Close
Viables
Basingstoke, Hampshire RG22 4BS
United Kingdom

Telephone: (01256) 329122
Fax: (01256) 351323
http://www.delarue.com

Statistics:
Public Company
Incorporated: 1896 as Thomas De La Rue
Employees: 9,753
Sales: £737.9 million (US$1.2 billion) (1999)
Stock Exchanges: London
NAIC: 323119 Other Commercial Printing; 322121 Paper (Except Newsprint) Mills; 333311 Automatic Vending Machine Manufacturing; 333313 Office Machinery Manufacturing; 334119 Other Computer Peripheral Equipment Manufacturing; 334514 Totalizing Fluid Meter and Counting Device Manufacturing; 541430 Graphic Design Services

Company Perspectives:

To innovate and provide secure, cost effective, accessible money and identity products, systems and services that keep our customers, worldwide, two steps ahead of the fraudster.

Key Dates:

1830: Thomas de la Rue begins printing playing cards.
1855: De la Rue’s company begins producing its first British postage stamp and starts supplying stamps to the East India Company. (साफ़ जाहिर है कि ये कंपनी हमारे पूर्ववर्ती शासकों (ईस्ट इंडिया कम्पनी ) की सहयोगी ही है.)
1860: Company gains its first banknote printing contract, for Mauritius.
1896: Thomas De La Rue is incorporated as a private company.
1921: Company goes public.
1940: Company’s London factories at Bunhill Row are destroyed in the Blitz.
1958: Thomas De La Rue changes its name to De La Rue Company Limited.
1961: De La Rue acquires a longtime printing rival, Waterlow and Sons.
1965: Company enters into a Switzerland-based joint venture called De La Rue Giori, which specializes in the manufacture of banknote printing machinery.
1968: The Rank Organisation Plc makes a takeover bid for De La Rue.
1969: The Monopolies Commission rejects the Rank bid as being against the public interest; De La Rue sells its playing card business to John Waddington.
1974: Crosfield Electronics, maker of banknote handling systems, is acquired.
1989: Crosfield, now a supplier of prepress equipment for the printing and publishing industries, is sold; Norton Opax attempts takeover of De La Rue, but the bid fails when Norton is itself acquired by Bowater; Jeremy Marshall becomes the first outsider named chief executive and launches a restructuring.
1991: Company changes its name to De La Rue plc.
1992: Inter Innovation, a Swedish maker of automated currency handling machines, is acquired.
1993: De La Rue joins Camelot Group plc consortium, taking an initial 22.5 percent stake.
1994: Camelot is awarded the license to operate the U.K. national lottery.
1995: De La Rue acquires Portals Group, a maker of banknote paper.
1998: Marshall is forced into early retirement. Reorganization of banknote business begins. Ian Much is appointed the new chief executive.
1999: De La Rue sells its card-reading terminals business and most of the remainder of its card systems division, in two separate transactions. The cash systems division undergoes a major overhaul.
2000: Services and solutions division is formed.

Company History:

The world’s largest commercial banknote printer and banknote paper manufacturer, De La Rue plc has a presence in literally the four corners of the earth. With 90 percent of its sales outside the United Kingdom, the company’s security paper and print division is active in about 150 countries worldwide. Its customers include commercial banks, central banks, and other financial institutions. In security printing, De La Rue provides total solutions–including products and services&mdashø governments and retailers needing secure printed products, such as checks, traveler’s checks, passports, vouchers, tickets, and revenue, postage, and other types of stamps. At the forefront of the move to automate retail banking processes, De La Rue’s cash systems division is a leader in payment systems, producing cash handling equipment, cash dispensing machines (including ATMs), banknote sorting machines, counting products, and cash processing software systems. De La Rue also holds a 26.7 percent stake in the Camelot Group, operator of the national lottery in the United Kingdom, and a half interest in De La Rue Giori, a maker of banknote printing machinery. A company founded on and fueled by innovation, De La Rue has had a colorful and eventful history.

19th-Century Origins

Thomas de la Rue was born in a small village in Guernsey, the Channel Islands, in 1793. A boy of little formal education but much ingenuity, he was apprenticed at the age of nine to a newspaper printer in Guernsey’s capital, St. Peter Port. Immediately after his term of service ended in 1811, de la Rue entered into a partnership with Englishman Tom Greenslade to produce their own weekly ‘journal politique et littéraire,’ the Publiciste. After only 13 editions, however, de la Rue, whose burning ambition was matched by an equally fiery temper, fell out with his partner and independently set up Le Miroir Politique, a forum from which he energetically attacked Greenslade and the other publishers in town.

From the beginning, however, de la Rue was more interested in publishing processes than in editorial content, and by the time he was 25 he had determined that provincial Guernsey offered too restricted a scope and moved to London. In order to support his family, de la Rue began his London career as a manufacturer of straw hats, but all the while he was experimenting with paper surfaces and printing processes. In 1829 he produced a deluxe edition of the New Testament, 25 copies of which were printed with pure gold powder. The result was universally admired, and book lovers judged it a marvel, but unfortunately, with a price tag of £15, only one copy was sold.

The foundation of the De La Rue company, which was initially named Thomas De La Rue, came in 1830, when de la Rue first went into the playing card business. Two years later de la Rue patented his ‘Improvements to Playing Cards’ and produced the first modern cards. His printing technique, electrotyping on enameled paper, represented a notable achievement not only in playing cards but in the history of color printing. Within a few years De La Rue was acknowledged as the premier maker of playing cards in Britain. Although cards remained the backbone of the business until the 1850s, during the 1830s and 1840s De La Rue branched out into all aspects of the stationery business, establishing a brisk trade in elaborately designed Victorian stationery, visiting cards, wedding cards, fancy menus, and railway tickets (a handy way of using up odd pieces of pasteboard). In 1843 De La Rue established its first overseas trade, as de la Rue’s brother Paul traveled to Russia to advise on the making of playing cards.

Meanwhile the burgeoning postal system was to supply De La Rue with its next major business avenue. In 1840 the system of prepaid postage was first introduced, and with it the idea of the envelope. The earliest envelopes were sold flat and unfolded; later they were cut and folded, but the whole laborious process was done by hand. In 1846 de la Rue’s son Warren, an inventor like his father and in his later years a well-respected amateur scientist and astronomer, designed the first envelope-making machine, able to produce 2,700 envelopes in an hour. This proved to be a tremendous boost to De La Rue, particularly after 1851 when it caught international attention and acclaim at the Great Exhibition at the Crystal Palace in Hyde Park.

Two years later De La Rue scored another coup when it won a four-year contract from the Inland Revenue to produce adhesive fiscal stamps on drafts and receipts. The company’s main competitor in this area, Perkins Bacon & Co., might have seemed the logical choice for this contract as it was already making Britain’s first postage stamps, but De La Rue was pioneering a new method; instead of the old line engraved system, whereby each sheet was printed from a transferred plate, De La Rue’s new process was typographical, or surface printed. The system was more economical and practical, and De La Rue promised, in addition, that they could provide a special ‘fugitive’ ink which would disappear if anyone attempted to clean the stamps to reuse them.

De La Rue’s first foray into security printing was thus a tremendous success. By 1855 the company was producing its first British postage stamp, the Fourpenny Carmine, and had begun supplying stamps to the East India Company. This was the start of a hugely lucrative contract; within a few years the company was supplying the entire colony with all its postal requirements.

A rival’s bad luck and the uncertain temperament of a government official provided De La Rue’s next big break. In 1858 Perkins Bacon inadvertently offended the Agent General in charge of the British colonies’ stamps to such a degree that the Agent General relieved that company of the contracts for the Cape of Good Hope, Mauritius, Trinidad, Western Australia, Ceylon, Saint Helena, the Bahamas, Natal, and St. Lucia and awarded them all to De La Rue. This in turn led to another profitable avenue for De La Rue, as the same official contracted the firm to print the paper currency for Mauritius, giving De La Rue its first banknote printing contract, in 1860. Success in the British colonies bred success at home, and by 1880 De La Rue had completely cornered the domestic postal market.

During the middle decades of the 19th century, De La Rue became an international force in security printing. As new countries emerged or different governments came to power, De La Rue was there to offer its expertise in postal and currency printing. During the U.S. Civil War, De La Rue was hired by the Confederacy to produce the only American stamp ever printed abroad: the Five Cents Blue, adorned with the head of Jefferson Davis. The business expanded into Italy, Portugal, Uruguay, and Ecuador, and as it expanded Thomas de la Rue and his sons Warren and William continued to make improvements in paper and processes.

Early 20th-Century Difficulties

In 1896 Thomas De La Rue converted from a family partnership to a private company. Now under third-generation leadership, the firm seemed to lose those qualities of ambition and innovation that had caused it to flourish under Thomas and his sons, and entered a long period of stagnation and decline. The company did enjoy a brief success with its Onoto pen, the first practical fountain pen. As its eccentric inventor George Sweetser enthused of his creation: ‘It can not only be filled in a flash and written with, but could be used to syringe your ears, spray the geraniums with insecticide, and it is ideal for ‘ink-splashers’ as it will carry across the road.’ Fueled by a £50,000 advertising campaign (an enormous sum at the time), the Onoto was a big success in the early years of the 20th century, though not big enough to save the faltering fortunes of De La Rue.

As early as 1888 there had been some concerns expressed in Parliament about De La Rue’s monopoly of the British postage stamp market. That incipient storm had blown over largely because De La Rue was able to convince the government that it was, simply, the best company for the job. By 1910, however, suspicions were rekindled, not least because, although production costs had gone down, De La Rue’s prices remained as high as ever. The company was, in fact, making colossal profits and had grown complacent. The Inland Revenue proposed to split the contract between De La Rue and another firm, Harrisons. Reportedly, Thomas de la Rue’s grandson, Thomas Andros de la Rue, was so incensed by this proposal that he stormed out of a meeting with the secretary of the Post Office after shouting that De La Rue would have the entire contract or it would have none of it. Thus De La Rue lost a contract it had held for 30 years. The consequences for the company were grave, with idle factories and redundant workers the result. Loss of face was added to loss of profits only months later when Thomas Andros de la Rue died and the rumor went around that De La Rue’s workers were each to benefit by his will. The widely publicized rumor proved to be untrue, and De La Rue sank even further in the public’s estimation.

With the outbreak of World War I, the company’s fortunes were briefly revived with an important government commission to print one and ten shilling notes, but on the whole fourth-generation management fared no better than had third-generation. Indeed, the company started the war with £90,000 to its credit, and ended it £90,000 in debt. Part of the problem stemmed from Stuart de la Rue’s too-eager embrace of the wartime government’s suggestions that manufacturing firms should diversify. De La Rue diversified into everything from cricket bats to motor cars with mostly disastrous results. On one occasion, in a bid to prove De La Rue’s security printing superiority, Stuart de la Rue forged one of the company’s competitor’s banknotes, successfully presented it to his bank, and triumphantly informed the government, only to be nearly imprisoned for counterfeiting.

By 1921, when the company went public, it was nearly ruined. Once at the forefront of new technologies and developing research, De La Rue’s factories were degenerating into a jumble of antiquated machinery and outdated processes. Stuart de la Rue, as chairman, was the only family member left in the firm. When the government proposed that the company fulfill India’s printing requirements on location rather than in London, Stuart refused to do so, with the result that within a few years the entire Indian contract–a mainstay of the business–was lost.

In 1923, Stuart de la Rue unwisely revealed that De La Rue had a secret private agreement with its competitor Waterlows over stamp interests. De La Rue held a monopoly on domestic and colonial stamps, Waterlows on foreign stamps. If the ‘wrong’ tender were accepted, one company paid compensation to the other. There was a great public outcry at this revelation, and although Stuart received only a public admonishment in the inquiry that followed, the company’s reputation was further discredited. Stuart de la Rue’s own reputation was in tatters. It is said that, in desperation, he asked his employees what had gone wrong with the company, and one of them, Bernard Westall, a junior clerk who later became managing director, responded, ‘You.’ Stuart de la Rue left the company soon thereafter.

It took some time for De La Rue to recover from its troubles, but recover it did. Instrumental in the company’s revival was its 1930 entry into the vast and lucrative Chinese market, which was to be for nearly 20 years a mainstay for De La Rue. Operations were frequently fraught with cloak-and-dagger style intrigue as international hostilities heightened and World War II drew near. A factory was secretly built in the French settlement of Shanghai with a backup plant constructed in Rangoon, Burma, as a precaution against Japanese aggression. When France fell, De La Rue succeeded in moving its operations to Rangoon, and when Rangoon fell, to Bombay, India.

De La Rue’s London factories at Bunhill Row were destroyed in the Blitz in December 1940, and the old ways of commercial printing were finished forever. De La Rue, however, quickly made arrangements to resume printing elsewhere by offset lithography and was able to honor all commitments.

Postwar Acquisitions, Expansions, and Divestments

Following the war, De La Rue embarked on a half century of acquisitions, developments, and expansions. In a strong postwar position, the company grew, establishing interests in Pakistan, Ireland, and Brazil. In 1958 the company set up Formica Ltd. (with 40 percent participation by American Cyanamid) and within a few years its factories were established in France, Germany, Australia, New Zealand, and India. Security Express, a carrier of valuables, was created the following year. In 1958 the parent company changed its named to De La Rue Company Limited, reflecting its status as a classic conglomerate.

In 1960 De La Rue’s growing involvement in bank automation was signaled by its creation of a subsidiary, De La Rue Instruments. The following year the company acquired the de la Rue family’s old printing rivals, Waterlow and Sons. The 150th anniversary of Thomas de la Rue’s first edition of his own newspaper Le Miroir Politique coincided with the company’s registration in New York as a security and financial printer to the New York Stock Exchange. The company entered into a Switzerland-based joint venture in 1965 called De La Rue Giori, which specialized in the manufacture of banknote printing machinery. In 1968 the Rank Organisation Plc made a bid for De La Rue but this was rejected the following year by the Monopolies Commission as being against the public interest. In 1969 the early foundation of De La Rue, the playing card business, was finally sold, to John Waddington.

The 1970s and 1980s were busy years of acquisitions and sales, with De La Rue divesting itself of interests that were not part of its core businesses (such as the sale of Formica to American Cyanamid in 1977, which brought the company’s conglomerate phase to a close) and consolidating its position in its chosen ventures. Among the acquisitions of the period was the 1974 purchase of Crosfield Electronics, maker of banknote handling systems. In 1975 De La Rue Instruments and Crosfield were merged to form De La Rue Crosfield, the forerunner to the cash systems division of De La Rue. Another key acquisition came in 1982, that of the U.S. payment card firm Faraday National Corporation. Also during the 1980s some of De La Rue’s banknote export factories were opened, including those in Singapore and Hong Kong. Most significantly, however, the company moved increasingly into the area of payment systems, among other ventures, forming De La Rue Garny in Germany in 1983 and acquiring the Scottish-based Fortronic in 1987. The German joint venture was transformed in 1989, when De La Rue acquired a 95 percent stake in Garny AG.

The late 1980s brought additional challenges for De La Rue. In late 1987 publishing magnate Robert Maxwell purchased a 15 percent holding in the company, later increased to almost 22 percent. Although Maxwell never gained a seat on the company board, he cast a long shadow over the company’s operations. This was most noticeable in 1989 when De La Rue decided to sell the troubled Crosfield manufacturing operation, which by this time specialized in prepress equipment for the printing and publishing industries. Maxwell opposed a proposed sale of Crosfield to a joint venture of Du Pont and Fuji, backing a rival bid by Israel-based Scitex, which was 27 percent owned by a Maxwell-controlled firm. Shareholders sided with management, voting in favor of the sale to Du Pont/Fuji, and Maxwell sold his De La Rue shares in late 1990. Just two weeks after the approval of the sale of Crosfield, De La Rue faced another takeover bid, this time by security printing and publishing rival Norton Opax PLC. De La Rue’s independence was saved only after Norton itself was swallowed by Bowater PLC.

Strong Upturn in the Early 1990s

In November 1989, soon after the Norton Opax takeover was narrowly avoided, Jeremy Marshall was named chief executive, becoming the first outsider so appointed. Marshall managed the company through a very successful period in the early 1990s, shaking up what had been a rather insular organization. Finding the structure overly decentralized, Marshall reorganized the company into three main divisions: payment systems, currency, and security printing. Marshall also continued and strengthened the trend toward concentration on these strong core areas, selling off loss-making subsidiaries and concerns not directly related to the firm’s principal ventures. He also initiated a program of strategic acquisitions to bolster these areas.

De La Rue profited as well from political events. The breakup of the Communist bloc resulted in some 26 countries requiring new currency. De La Rue got the lion’s share of the business. Boosted by these new markets, the company’s currency division remained strong in the early 1990s. Of the world’s countries whose governments did not print their own currency, De La Rue had 60 percent of the market share. The company regained its traditional lead in technological innovation: specialized presses were continually being developed and marketed by its associated company, De La Rue Giori. Its patented computer-aided design system, Durer, was able to produce banknote designs in half the time formerly required.

Research and development were also keystones of De La Rue’s security printing division in the early 1990s: it supplied the Bank of Scotland with debit cards incorporating laser-engraved photographs, and in partnership with a Dutch electronics company, Philips, developed microchip ‘smart cards.’ Plastic payment cards, checks, passports, traveler’s checks, and bonds all played a part in De La Rue’s security printing business, and the company was expanding into related ventures, moving increasingly into printed materials for elections and for national registration and identity card schemes.

De La Rue’s payment services division was the company’s fastest growing area of business in the early 1990s. As banking became increasingly automated, De La Rue was at the forefront of technological development and sought out acquisitions to gain a larger portion of this rapidly expanding market. In 1992 the company paid £94.7 million for Inter Innovation, a Swedish maker of automated currency handling machines, including automated cash dispensers, and physical security products, such as safes and vaults. Meanwhile, the company changed its name to De La Rue plc in 1991.

By 1993 Marshall had succeeded in increasing revenues 60 percent, to £559.6 million, and in turning a 1990 pretax loss of £50.6 million into profits of £104.7 million. During 1993 De La Rue joined a consortium called Camelot Group plc, which was formed to make a bid for the license to run the new U.K. national lottery. De La Rue took an initial 22.5 percent stake in Camelot (later raised to 26.7 percent), contributing its security printing expertise to the venture. In 1994 Camelot was awarded the license.

During much of 1994, De La Rue was occupied pursuing a bid for Portals Group PLC, a producer of paper used in making currencies and one of De La Rue’s main suppliers. Portals had a history even longer than that of De La Rue. The company traced its origins to 1712 when Henry Portal, a French Huguenot who had fled to England to escape religious persecution, began making stationery paper at a mill in Whitchurch, Hampshire. The quality of his paper became so renowned that he was asked to make paper for the Bank of England. Deals with other banks followed, including the Bank of Ireland and the General Bank of India. After banknote forgery emerged as a major problem in the early 19th century, the company began making paper with elaborate watermarks. In 1855 Portals made the paper for the first Bank of England note containing a shaded watermark. In 1880 Portals supplied paper for the first U.K. Postal Orders, and five years later began making paper for the Bank of Scotland. The early 20th century saw the company rapidly expand its base of international customers. During World War I, Portals began making paper for the Indian rupee, then in 1921 began making banknote paper for Chile. Quickly following the latter were orders from Australia, South Africa, Persia, Danzig, Portugal, Greece, and Argentina. By 1929 Portals was making paper for 41 banknote issues around the world. Building security features into its paper became a specialty of Portals. In 1940 the company pioneered in weaving a fine security thread of special composition into its paper, a procedure that became standard industry practice. Throughout this entire history a member of the Portal family had headed the company, but that tradition ceased shortly after the company went public in 1947.

De La Rue’s acquisition of Portals was completed in early 1995 for £682 million (US$1.1 billion). De La Rue was not just interested in gaining control of one of its suppliers. Portals also brought to De La Rue a host of new customers or potential customers–state-owned printers that produced their own banknotes. About 88 percent of the world’s banknotes were produced by state-owned printers, and Portals held about half of that market. De La Rue was also interested in gaining Portals’ expertise in anticounterfeiting. Concern about forgeries was on the rise in the 1990s as cheaper and higher-quality copiers, scanners, and printers provided counterfeiters with increasingly sophisticated tools of the trade. By controlling both the paper-making and printing stages, De La Rue hoped to offer integrated security features in its banknotes and other products, including watermarks, special inks, and holograms.

Declining Fortunes in the Later 1990s

De La Rue made a number of other acquisitions in 1995 and 1997. During the latter year, the company acquired the French-based smart card business of Philips for £54.2 million. By that time, however, the glory days of the early 1990s had given way to a serious downturn. Profit growth flattened out in the 1996 fiscal year, then profits began to decline. As the company kept issuing profit warnings, its stock tumbled, from a high of more than £10.50 in early 1995 to less than 200p in late 1998. Its market value declined by 80 percent during the same period, from about £2 billion to little more than £400 million. De La Rue was afflicted by a host of difficulties. Its security printing division was hurt by a slowdown in demand and by decreased margins due to the maturing of the market. The cash systems division suffered first from a spate of bank mergers in the United States, then from decreased sales of its newest cash-handling machinery stemming from the Asian financial crisis that erupted in 1997; Asia had been seen as one of the main markets for these new machines. De La Rue’s fastest growing unit, the card systems division, was busy developing new smart cards and other technologies, but the payback for these large investments was still in the future. A strong British pound did not help matters. Moreover, analysts also blamed management for responding slowly and inadequately to the growing crisis.

In February 1998, with a turnaround nowhere in sight, Marshall was forced to take an early retirement. While a search for a replacement was conducted, De La Rue began restructuring its operations with a reorganization of its banknote business, including a 25 percent reduction in printing capacity. Noncore activities began to be jettisoned, starting with the exit from the physical security business (vaults and safes) through the sale of Garny and other units, the last of which was sold in October 1998. During the prior month, Ian Much, a former chief executive of T & N plc, was appointed the new chief executive. Much immediately began shaking things up by forcing out the head of the cash systems division, which he then assumed direct control of. In February 1999 De La Rue sold its card-reading terminals business to Ingenico SA. Next came a major overhaul of the cash systems division, which was restructured in March 1999 into three business streams: desktop products, branch cash solutions, and cash processing. De La Rue also announced that an expensive and complex information technology system then under development was being scrapped and that 500 jobs would be cut from the division (representing one-sixth of the division’s workforce).

For the fiscal year ending in March 1999, De La Rue reported a net loss of £7.4 million, stemming from its cash systems division, which was in red for the year, and from £64.5 million in exceptional charges, including £48.5 million in restructuring costs. The company’s revamp then continued, with the sale in October 1999 of the bulk of its card systems division, including its smart cards operations, to François-Charles Oberthur Fiduciaire of France for £200 million (US$317.9 million). De La Rue sold the business, its fastest growing sector, after having concluded that it lacked sufficient scale and would require too much additional investment. The company’s plan for the early 21st century, then, was to focus on its two core divisions–cash systems and security paper and print–and to develop a third division called services and solutions. Created in April 2000, this division focused on brand protection, electronic security, and other services related to its core customers; several existing businesses in holographics, identity systems, transaction services, and other areas formed the initial core of the new division. De La Rue thus appeared to have returned to its history of innovation; it seemed that Thomas de la Rue, that shrewd businessman and inventor, would surely applaud the latest strategies of the company he founded so long ago.

Principal Subsidiaries: De La Rue Holdings; De La Rue International; Portals Group; Portals Property; The Burnhill Insurance Company; Camelot Group plc (26.7%); De La Rue Giori (Switzerland; 50%); De La Rue Smurfit Limited (Ireland; 50%); De La Rue Cash Systems GmbH (Germany); IMW Immobilien AG (Germany; 95.7%); De La Rue Security Print Inc. (U.S.A.).

Principal Divisions: Cash Systems; Security Paper and Print; Services and Solutions.

Principal Competitors: Ambient Corporation; American Banknote Corporation; Bowne & Co., Inc.; Crane & Co., Inc.; Cummins-American Corporation; Dai Nippon Printing Co., Ltd.; Deluxe Corporation; Diebold, Incorporated; Drexler Technology Corporation; Frisco Bay Industries Ltd.; John H. Harland Company; MDC Corporation Inc.; Merrill Corporation; NCR Corporation; Oki Electric Industry Company, Limited; Quebecor Inc.; Toppan Printing Co., Ltd.; Transaction Systems Architects, Inc.; Triton Systems, Inc.; VeriFone, Inc.; Visage Technology, Inc.

डे ला रू (De La Ru)  का नेपाल और आई एस आई कनेक्शन
कंधार हाईजैक की कहानी बहुत पुरानी हो गई है, लेकिन इस अध्याय का एक ऐसा पहलू है, जो अब तक दुनिया की नज़र से छुपा हुआ है. इस खउ-814 में एक ऐसा शख्स बैठा था, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे. इस आदमी को दुनिया भर में करेंसी किंग के नाम से जाना जाता है. इसका असली नाम है रोबेर्टो ग्योरी. यह इस जहाज में दो महिलाओं के साथ स़फर कर रहा था. दोनों महिलाएं स्विट्जरलैंड की नागरिक थीं. रोबेर्टो़ खुद दो देशों की नागरिकता रखता है, जिसमें पहला है इटली और दूसरा स्विट्जरलैंड. रोबेर्टो को करेंसी किंग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह डे ला रू नाम की कंपनी का मालिक है. रोबेर्टो ग्योरी को अपने पिता से यह कंपनी मिली. दुनिया की करेंसी छापने का 90 फी़सदी बिजनेस इस कंपनी के पास है. यह कंपनी दुनिया के कई देशों कें नोट छापती है. यही कंपनी पाकिस्तान की आईएसआई के लिए भी काम करती है. जैसे ही यह जहाज हाईजैक हुआ, स्विट्जरलैंड ने एक विशिष्ट दल को हाईजैकर्स से बातचीत करने कंधार भेजा. साथ ही उसने भारत सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह किसी भी क़ीमत पर करेंसी किंग रोबेर्टो ग्योरी और उनके मित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. ग्योरी बिजनेस क्लास में स़फर कर रहा था. आतंकियों ने उसे प्लेन के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. लोग परेशान हो रहे थे, लेकिन ग्योरी आराम से अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. उसके पास सैटेलाइट पेन ड्राइव और फोन थे.यह आदमी कंधार के हाईजैक जहाज में क्या कर रहा था, यह बात किसी की समझ में नहीं आई है. नेपाल में ऐसी क्या बात है, जिससे स्विट्जरलैंड के सबसे अमीर व्यक्ति और दुनिया भर के नोटों को छापने वाली कंपनी के मालिक को वहां आना पड़ा. क्या वह नेपाल जाने से पहले भारत आया था. ये स़िर्फ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार के पास होना चाहिए. संसद के सदस्यों को पता होना चाहिए, इसकी जांच होनी चाहिए थी. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी. शायद हिंदुस्तान में फैले जाली नोटों का भेद खुल जाता.

http://www.time.com/time/world/article/0,8599,2053713,00.html

Original Story:

At one point during the eight-day hijacking of Indian Airlines Flight 814, the abductors demanded $200 million from the Indian government. Little did they know that one of the hostages sitting in economy class could have effortlessly written them a check for that amount. Roberto Giori, owner of the Lausanne-based company De La Rue Giori, boarded Flight 814 after a holiday in Katmandu with his companion Cristina Calabresi. De La Rue Giori, which Giori inherited from his father, happens to control 90% of the world’s currency-printing business. The 50-year-old Giori, who holds dual Swiss and Italian nationality, is one of Switzerland’s richest men.When the plane was hijacked over northern India, Giori and other business-class passengers were herded into economy. The scariest moment came three hours later when the pilot tried to land at the airport in Lahore, Pakistan. I thought it was the end, Giori later recalled. The runway was not visible because the lights were off, the plane had no fuel and the pilot even tried to land on a brightly lit road next to the airport.
After the plane landed in Kandahar, southern Afghanistan, where it would remain for seven days, Switzerland sent a special envoy to the airport to deal with the abduction of its currency king, his companion and two other Swiss nationals. It also put pressure on New Delhi to come to a solution that ensured their safe release. Meanwhile, Giori experienced harassment and deprivation along with the rest of the passengers, including irregular rice-and-mutton-curry meals, inadequate drinking water, no tea or coffee, stinking toilets and sudden bursts of temper from the hijackers. On top of that came constant lectures from the hostage-takers on Islam and the Kashmir separatist struggle, piped through the passenger address system. According to Giori, the hijackers told the hostages: As you suffer, think of how our brothers suffer in Indian jails.

After being freed and flown to New Delhi, Giori said: I realized suddenly that these men had no problem killing or getting killed. I am one hundred thousand percent certain they would have fought until the end. They were extremely well-trained and highly motivated. Giori said he was convinced that if India hadn’t released militant leader Maulana Masood Azhar, the hijackers would have forced the aircraft to take off and then deliberately crashed it into the hills around Kandahar.

The week-long ordeal had an unexpected impact on the currency tycoon. What I experienced on the plane has changed me forever, said Giori. I don’t know what it is: Hinduism, the so-called fatalism of Indians. But the way the passengers stayed so calm throughout, even the children, was exemplary. I told myself, if the plane had been full of Italians or French, it would have been very different.

नकली नोंटों का मायाजाल

सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2009 के बीच 7.34 लाख सौ रुपये के नोट, 5.76 लाख पांच सौ रुपये के नोट और 1.09 लाख एक हज़ार रुपये के नोट बरामद किए गए. नायक कमेटी के मुताबिक़, देश में लगभग 1,69,000 करोड़ जाली नोट बाज़ार में हैं. नक़ली नोटों का कारोबार कितना ख़तरनाक रूप ले चुका है, यह जानने के लिए पिछले कुछ सालों में हुईं कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बारे में जानते हैं. इन बैठकों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की एजेंसियां सब कुछ जानते हुए भी बेबस और लाचार हैं. इस धंधे की जड़ में क्या है, यह हमारे ख़ुफिया विभाग को पता है. नक़ली नोटों के लिए बनी ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत नक़ली नोट प्रिंट करने वालों के स्रोत तक नहीं पहुंच सका है. नोट छापने वाले प्रेस विदेशों में लगे हैं. इसलिए इस मुहिम में विदेश मंत्रालय की मदद लेनी होगी, ताकि उन देशों पर दबाव डाला जा सके. 13 अगस्त, 2009 को सीबीआई ने एक बयान दिया कि नक़ली नोट छापने वालों के पास भारतीय नोट बनाने वाला गुप्त सांचा है, नोट बनाने वाली स्पेशल इंक और पेपर की पूरी जानकारी है. इसी वजह से देश में असली दिखने वाले नक़ली नोट भेजे जा रहे हैं. सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा कि नक़ली नोटों के मामलों की तहक़ीक़ात के लिए देश की कई एजेंसियों के सहयोग से एक स्पेशल टीम बनाई गई है. 13 सितंबर, 2009 को नॉर्थ ब्लॉक में स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेड क्वार्टर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें इकोनोमिक इंटेलिजेंस की सारी अहम एजेंसियों ने हिस्सा लिया. इसमें डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और सेंट्रल इकोनोमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि जाली नोटों का कारोबार अब अपराध से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है. इससे पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी, जिसमें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, आईबी, डीआरआई, ईडी, सीबीआई, सीईआईबी, कस्टम और अर्धसैनिक बलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस बैठक में यह तय हुआ कि ब्रिटेन के साथ यूरोप के दूसरे देशों से इस मामले में बातचीत होगी, जहां से नोट बनाने वाले पेपर और इंक की सप्लाई होती है. तो अब सवाल उठता है कि इतने दिनों बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, जांच एजेंसियों को किसके आदेश का इंतजार है

साभार : चौथी दुनिया,  टाइम,

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Comments
  1. Shambhu Goel says:
    आपसे मेरी आरजू और कर बद्ध प्रार्थना है की मेरे इस भेजे जा रहे पोस्ट को पढ़ें और नीतीशजी की सच्चाइयों के बारे में जाने |इनके एक मंत्री महाचोर ही नहीं चरित्रहीन भी हैं |यहाँ का गुड गवर्नेंस एक मिथ्या है और मिडिया मैनेज्ड है न की हकीकत | मैं कम से कम दस बार माननीय मुख्य मंत्री जी के grievance cell में अपनी व्यथा के बारे में लिख चूका हूँ | हमारी एक औद्योगिक इकाई जिसका नाम हिमालय एग्रो केमिकल्स प्राइवेट लिमिटेड है विगत ३० सालों से कार्यरत थी |दिनांक १८.१२.२०१० से यह कारखाना कृषि विभाग ,बिहार द्वारा बंद करवाया जा चूका है | कृषि विभाग में कार्यरत एक पदाधिकारी जिसका नाम संजय सिंह है जिसकी मूल पदस्थापना कृषि विभाग के सांख्यिकी विभाग में है लेकिन इनको कतिपय कारणों से कृषि विभाग के राज्यस्तरीय उर्वरक कोषांग , का प्रभारी २००७ से ही बना दिया गया था जब श्री बी. राजेंद्र कृषि निदेशक थे | इनके अत्याचारों की कहानी इस प्रकार है :- १.इस कहानी की पहली कड़ी तो इसने २००७ में ही शुरू कर दी थी| २.कम शब्दों में कहना यह है की ९.०३.२०१० को ही हमलोगों ने (within specified time) अपने उर्वरक विनिर्माण और विपणन की अलग अलग अनुज्ञप्तियां के नवीनीकरण के लिए आवेदन कृषि विभाग को समर्पित कर दिया था| ३. २० मई २०१० को (करीब ७० दिनों पश्चात )कृषि निदेशक महोदय ने हमारे प्रतिष्ठान में स्थापित उर्वरक गुण विश्लेषण प्रयोगशाला की जांच करवाई |इस जांच दल में श्री बैद्यनाथ यादव ,तत्कालीन उप कृषि निदेशक (मीठापुर गुण नियंत्रण प्रयोगशाला ),श्री अशोक प्रसाद ,उप कृषि निदेशक (मुख्यालय ) थे | ४. इन लोगों ने अपने जांचोपरांत प्रतिवेदन में निम्नलिखित बातों को दर्शाया :- (क)प्रतिष्ठान में संचालित प्रयोगशाला में यन्त्र एवं उपकरण कार्यशील पाए गए |प्रयोगशाला में अपर्याप्त संख्या में यन्त्र और उपकरण पाया गया |प्रयोगशाला सीमित जांच सुविधा के साथ कार्यशील पाया गया | (ख)रसायनज्ञ कार्यरत है एवं उसे विश्लेषण कार्य की जानकारी है | (ग)विनिर्माण हेतु आधारभूत संरचना -उपलब्ध है तथा चालू हालत में है | ५.इसके अलावा यह भी कहा गया की प्रतिष्ठान में विनिर्माण इकाई में उत्पादित उर्वरक के प्रयोगशाला में गुणात्मक जांच सम्बन्धी अभिलेख आंकड़ा आदि संधारित नहीं पाया गया (ख)उर्वरक सम्बन्धी कच्चा माल स्थानीय थोक विक्रेता शिवनारायण चिरंजीलाल से मुख्य रूप से प्राप्त किये जाते हैं एवं उत्पादित उर्वरक का अधिक से अधिक हिस्सा इसी प्रतिष्ठान के माध्यम से बेचे जाते हैं | (ग)एन. पी. के.मिक्सचर विनिर्माण इकाइयों को कच्चा माल के रूप में उर्वरक आपूर्ति हेतु भारत सरकार से समय समय पर निर्गत निदेश और इससे सम्बंधित अद्यतन निदेश (२३०११ /१/२०१० -एम्.पी.आर. दिनांक ०४.०३.२०१० )जिससे वे अवगत हैं का अनुपालन नहीं किया जा रहा है | ६.इसी बीच दिनांक २०.०७.२०१० को कृषि निदेशक महोदय ने हमारा विनिर्माण / विपणन प्रमाण पत्र हेतु समर्पित आवेदनों को अस्वीकृत कर दिया और इस आदेश में यह भी दर्शाया की इस उनके आदेश के विरूद्ध ३० दिनों के अंदर हमलोग कृषि उत्पादन आयुक्त ,बिहार पटना के यहाँ अपील दायर कर सकते हैं |आदेश संख्या ८९८/२३.०७.२०१० . ७. हमलोगों ने विधिवत अपनी अपील कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के यहाँ समर्पित ३०.०७.२०१० को ही कर दी| ८.कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के यहाँ से ६० दिनों बाद अपील का आदेश प्राप्त हुआ जिसमे प्रमुख बातें इस प्रकार है :- “रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ,भारत सरकार के पत्र संख्या २३०११ दिनांक ४.०३.२०१० में यह स्पष्ट है की ‘manufacturers of custimsed fertilizers and mixture fertilizers will be eligible to source subsidised fertilizers from the manufacturers/importers after their receipt in the districts as input for manufacturing customised fertilisers and mixture fertilizers for agriculture purpose .’ इस पत्र से यह स्पष्ट होता है की मिश्रित उर्वरक विनिर्माताओं को अनुदानित उर्वरक उपयोग करना की अनुमति है |राज्य के लिए आवंटित अनुदानित उर्वरक की आपूर्ति manufacturers /importers द्वारा की जाती है ,जिसका वितरण थोक विक्रेता के माध्यम से किया जाता है |राज्य को आवंटित अनुदानित उर्वरक के कोटा में से ही मिश्रित उर्वरक विनिर्माताओं को उर्वरक उपलब्ध कराया जाना है |मिश्रित उर्वरक विनिर्माताओं की आवश्यकता की पूर्ति के लिए अगर अतिरिक्त अनुदानित उर्वरक की आवश्यकता हो तो उसकी मांग निदेशक ,कृषि रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ,भारत सरकार से कर सकते हैं |सभी पहलू पर विचार करते हुए यह आदेश दिया जाता है की तत्काल जिले के लिए आवंटित उर्वरक के कुछ प्रतिशत जिला कृषि पदाधिकारी मिश्रित उर्वरक विनिर्माताओं को उपलब्ध करायेंगे ,इस हेतु निदेशक ,कृषि सम्बंधित जिला कृषि पदाधिकारी को आवश्यक निदेश देंगे | ‘कृषि मंत्रालय की अधिसूचना दिनांक १६.०४.१९९१ में यह स्पष्ट किया गया है की सभी एन.पी.के. मिश्रण विनिर्माताओं को अधिसूचना में उल्लेख किये गए न्यूनतम उपकरण को प्रयोगशाला में रखना ही होगा | ‘सभी तथ्यों पर गंभीरता से विचार करते हुए यह आदेश दिया जाता है की अपीलकर्ता प्रयोगशाला में सभी न्यूनतम उपकरणों की व्यवस्था कर निदेशक ,कृषि को सूचित करेंगे |निदेशक,कृषि आवश्यक जांच कर संतुष्ट होने पर अपीलकर्ता के विनिर्माण प्रमाणपत्र को नवीकृत करेंगे |निदेशक,कृषि विनिर्माण प्रमाण पत्र निर्गत करते समय विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकृत करने पर भी विचार करेंगे |’ (N.B. :- this is verbatim replication of the order of APC,Bihar dated 30.09.2010 bearing no.4964.This order bears the signature of Sri K.C. Saha while he held the charge of APC when Sri A.K.sinha had gone on a long leave. ) ९. ३०.०९.२०१० को ही हमलोगों ने अपने प्रयोगशाला में सभी अनावश्यक(जिस उपकरण का आज के परिवेश में कोई मान्यता नहीं रह जाती है जैसे chemical Balance in place of electronic digital balance) /आवश्यक उपकरणों की खरीद कर instal कर देने सम्बन्धी पत्र निदेशक कृषि को पत्र द्वारा सूचित कर दिया और इसकी एक प्रति कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय को भी दे दी | १०.कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के इस आदेश को कतिपय कारणों से कृषि निदेशक महोदय को प्राप्त होने में काफी विलम्ब हुआ ,इसी कारण दिनांक २२.१०.२०१० को कृषि निदेशक महोदय के यहाँ से एक पत्र द्वारा त्रिसदस्सीय दल की गठन का आदेश निकला जिसको यह कहा गया की प्रतिष्ठान के प्रयोगशाला को पुनः जांच की जाये.|स्पष्ट है की कुछ सीढियों के अंतर पर ही ये दोनों कार्यालय नया सचिवालय ,पटना में है लेकिन” २२ “दिनों के बाद ही कृषि निदेशक महोदय प्रतिष्ठान के प्रयोगशाला सम्बन्धी जांच के आदेश दे पाए | ११. लेकिन यहाँ मात्र एक जांच सम्बन्धी आदेश को निकालने में २२ दिन लगे ,फिर २३.११.२०१०(याने इस जांच दल के गतःन होने के बाद ) को ही इस त्रिसदस्सीय जांच दल ने हमारे प्रतिष्ठान के प्रयोगशाळा की जांच की ,यानी एक महीने १ दिन बाद ही यह संभव हो पाया |स्पष्ट है की कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के आदेश के ५३ वे दिन बाद हमारी प्रयोगशाला की जांच हो पायी| १२.इस जांच प्रतिवेदन में जांच दल ने निष्कर्ष में प्रतिवेदित किया की :- “उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ की धारा २१ (ए) के तहत उक्त प्रतिष्ठान के पास न्यूनतम प्रयोगशाला की सुविधा एवं उपरोक्त वर्णित उपकरण उपलब्ध हैं तथा उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ की धारा २१ (ए) का पूर्ण रूपेण पालन किया गया है |अतः उक्त प्रतिष्ठान के विनिर्माण पंजीकरण प्रमाण पत्र को नवीकरण करने हेतु विचार किया जा सकता है|”(this is again an exact replication of the report of findings of the three member inspecting team which is dated 23.11.2010). १३.हमलोगों ने २.११.२०१० से अपने इकाई का उत्पादन शुरू कर दिया था|इस आशय की सूचना विधिवत कृषि निदेशक महोदय को दे दी गयी थी | उत्पादन शुरू करने के मुख्य तीन कारण थे जो इस प्रकार हैं:- (क) कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के आदेश के उपरांत कृषि निदेशालय द्वारा अनावश्यक विलम्ब हो रहा था ,फिर भी इस आदेश के १ महीने दो दिन बाद (यानी ३२ दिनों बाद )काफी इंतज़ार करने के बाद रबी सीजन के चालू हो जाने के आलोक में ,कृषकों के भी व्यापक हित में तथा मजदूर जो बहुत दिनों से बैठे हुए थे के कारण उत्पादन प्रारम्भ कृषि निदेशक को सूचित करते हुए कर दिया गया | (ख)कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के आदेश में यह दर्शाया गया है की “तत्काल जिले के लिए आवंटित उर्वरक के कुछ प्रतिशत जिला कृषि पदाधिकारी मिश्रित उर्वरक विनिर्माताओं को उपलब्ध कराएँगे “इससे यह स्पष्ट हो जाता है की उत्पादन चालु रखने के लिए ही ऐसे आदेश को पारित किया गया है | (ग)विनिर्माण और विपणन प्राधिकार पत्रों की नवीकरण का कृषि निदेशक महोदय द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के उपरान्त कृषि उत्पादन आयुक्त के आदेश से अस्वीकृति का आदेश स्वतः विलोपित हो जाता है और उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ की धारा १८(४) जो इस प्रकार है :- “where the application for renewal is made within the time specified in sub-clause (1)or sub-clause (3),the applicant shall be deemed to have held a vaid {certificate of manufacture}until such date as the registering authority passes order on application for renewal .”इसी तरह विपणन प्राधिकार पत्र के बारे में धारा ११(४) है .इन धाराओं के तहत हमलोगों ने उत्पादन शुरू किया जो हमारी महीनों से बंद पड़े प्लांट जो उर्वरक के कारण जंग खा रहा था ,कृषकों को रबी सीजन में संतुलित दानेदार की उपलब्धता को बनाये रखने के लिए तथा भूखमरी की समस्या से ग्रसित मजदूरों को त्राण दिलवाने की मंशा से ऐसा कदम उठा कर कोई पाप नहीं किया गया था |यह उद्योग विगत ३० वर्षों से स्थापित है और हमारी अनुज्ञप्तियों की नवीनीकरण की प्रक्रिया कम से कम दस बार विभाग द्वारा पूर्व में भी अपनाई गयी है | १४.दिनांक १८.१२.२०१० को कृषि निदेशक महोदय ने एक आदेश निकाला की (जो जिला कृषि पदाधिकारी,अररिया के नाम से प्रेषित था )”आपको आदेश दिया जाता है की में.हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. की फारविसगंज एवं पूर्णिया इकाई को पत्र प्राप्ति के साथ ही जांच कर लें एवं यदि विनिर्माण कार्य चालू रहने एवं उर्वरक विपणन का साक्षय पाया जाता है तो प्रतिष्ठान के प्रोपराइटर एवं प्रबंधन के विरूद्ध उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड ७ एवं १२ का उल्लंघन करने के आरोप में आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा ७ के अंतर्गत साक्षय जुटाते हुए स्थानीय थाना में प्राथमिकी दर्ज कर दोनों संयंत्र को सील करने की त्वरित कार्रवाई करें|कृत कार्रवाईका प्रतिवेदन लौटती डाक से उपलब्ध कराया जाये|” इस सन्दर्भ में कृषि निदेशक का पत्र संख्या १४२७ दिनांक १५.१२.२०१० निर्गत हुआ है | १५.इसके उपरान्त दिनांक १८.१२ २०१० को जिला कृषि पदाधिकारी श्री बैद्यनाथ यादव ने परियोजना कार्यपालक पदाधिकारी ,फारविसगंज श्री मक्केश्वर पासवान को आदेश देकर १८.१२.२०१० को ही सील करवा दिया और दिनांक १९.१२.२०१० को फारविसगंज थाने में प्राथमिकी दर्ज करवा दी गयी |दर्ज प्राथमिकी की भाषा इस प्रकार है :-“उपरोक्त विषय के सम्बन्ध में जिला कृषि पदाधिकारी ,अररिया के पत्रांक १०६५ दिनांक १८.१२ २०१० एवं कृषि निदेशक ,बिहार ,पटना के पत्र संख्या १४२७ दिनांक १५.१२.२०१० के द्वारा दिए गए निदेश के अनुपालन में में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. ,रानीगंज रोड ,फारविसगंज की जांच की गयी |जांच के समय फेक्ट्री बंद पायी गयी किन्तु भण्डार पंजी एवं वितरण पंजी के अवलोकन से ज्ञात होता है की फेक्ट्री में विनिर्माण कार्य कराया जाता रहा है |दिनांक १.१२.२०१० को मेरे द्वारा भण्डार पंजी एवं विक्री पंजी की जांच की गयी थी जिसमे विनिर्मित NPK धनवर्षा हरासोना १८:१८:१० भण्डार में कुल 105 of 50 kgs पाया गया था किन्तु दिनांक १८.१२.२०१० तक विनिर्मित NPK हरासोना १८:१८:१० ७४१५ बोरा ५०के.जी. विक्री दिखाया गया है इस प्रकार दिसंबर माह में कुल ७३१० बोरा ५० के.जी. का विनिर्माण में. हिमालय एग्रो केमिकल्स ,फारविसगंज द्वारा किया गया है जो उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड (७)एवं (१२) का उल्लंघन किया गया है जो की गैर कानूनी और अवैध है | अतः में. हिमालय एग्रो केमिकल्स ,रानीगंज रोड ,फारविसगंज के द्वारा वगैर लाइसेंस नवीकरण कराये विनिर्माण इकाई में विनिर्माण एवं बिक्री करने के आरोप में प्रतिष्ठान के प्रबंधक सह प्रबंध निदेशक श्री शम्भू गोयल पिता ओंकार मल अग्रवाल छुआ पट्टी रोड वार्ड न. १७ नगर परिषद ,फारविसगंज के विरूद्ध प्रथ्मिनकी दर्ज की जाती है”|यह कार्य दिनांक १९.१२.२०१० को करवाया जाता है | १६.इसी तरह हमारे पूर्णिया इकाई को भी बंद करवा दिया जाता है और १९.१२.२०१० को ही प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी | १७ कृषि निदेशालय में अनावश्यक विलम्ब हो रहा था इसका प्रमाण ऊपर अंकित विभिन्न तिथियों से स्वतः ज्ञात हो सकता है |संजय सिंह द्वारा इनकी बदनीयती से सृजित कथा का अंत यहीं नहीं होता है |हमलोगों ने इनलोगों के द्वारा अपनाई गयी प्रताड़ित करने की प्रक्रिया को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय में एक writ petition भी दिया था ,संजोग से जिसकी सुनवाई २०.१२.२०१० को हो गयी और उच्च न्यायलय द्वारा आदेश जो दिया गया वो इस प्रकार है : CWJC NO.20251 of 2010 :- “From the facts and circustances of this case , is quite apprent that the matter for renewal of Certificate of Registration for manufacturing and sale of Mixture of Fertilizers is pending before the Director,Agriculture ,Government of Bihar since 30.09.2010 when order passed by the Agriculture Production Commissioner ,Bihar in Appeal no. 7 of 2010 was communicated. 3.Let the said matter be considered and disposed of by the Director,Agriculture within aperiod of three weeks from the date of receipt/production of a copy of this order.It may be noted that violation of this order shall entail serious consequences and will be deemed as contempt of court and this court shall be constrained to take actions against the contemnor . 4.A copyof this order be handed over to Government Advocate IV for proper compliance of this order.” १८.हाई कोर्ट के इस आदेश के विभाग में पहुँचने के बाद महज एक खानापूर्ति करने के लिए दिनांक २७.१२.२०१० को एक पत्र जिसका पत्रांक १४७० दिनांक २७.१२.२०१० कृषि निदेशालय से हमारे नाम से स्पष्टीकरण मांगने के लिए प्रेषित किया जाता है जो इस प्रकार है :- “उपर्युक्त विषयक कहना है की कृषि उत्पादन आयुक्त के आदेश ज्ञापांक ४९६४ दिनांक ३०.०९.२०१० के आलोक में आपके प्रतिष्ठान के NPK मिश्रण विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकरण की कार्रवाई प्रक्रियाधीन थी|इस बीच आपने अपने पत्र संख्या HAC –OUTLET CMD/10/235/01 दिनांक 22.11.2010 के द्वारा सूचित किया है की आपके द्वारा NPK मिश्रण का विनिर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया है |आप अवगत हैं की बिना विनिर्माण प्रमाण पत्र विनिर्माण कार्य करना उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १२ का उल्लंघन है|आपके द्वारा बिना विनिर्माण प्रमाण पत्र प्राप्त किया ही विनिर्माण कार्य प्रारम्भ कर दिया गया है जो उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १२ का उल्लंघन है और आपका कृत उर्वरक नियंत्रण आदेश के विरूद्ध है तथा गैर कानूनी है | अतः आप स्पष्ट करें की उपरोक्त आरोप के आलोक में क्यों नहीं आपके प्रतिष्ठान का विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकरण हेतु आपसे प्राप्त आवेदन को उर्वरक नियंत्रण आदेश के खाद १८(२) के अंतर्गत अस्वीकृत कर दिया जाए |आप अपना स्पष्टीकरण दिनांक ०३.०१.२०११ तक अवश्य समर्पित करें अन्यथा एकतरफा निर्णय ले लिया जाएगा “ | (N.B. विभाग द्वारा स्वयं ही यह स्वीकार किया जा रहा है की हमारे मिश्रण विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के “नवीकरण “की कार्रवाई प्रक्रियाधीन थी |तब हमपर क्या नवीकरण की धाराओं के उल्लंघन में आरोप लगाना उचित होगा या की नए अनुज्ञप्ति पंजीकरण की धाराओं के उल्लंघन का आरोप लगाना कहाँ तक उचित होता है |ऐसे भी यह एक गहन चिंता का विषय है की प्राथमिकी दर्ज करवाने के निमित्त पत्र में खंड १२ और ७ के उल्लंघन का उल्लेख है जबकि स्पष्टीकरण में खंड १८(२) के उल्लंघन का आरोप भी लगाया जा रहा है | एक सोची समझी हुई बदनीयती की तहत एक साजिश कर के प्राथमिकी के उपरान्त स्पष्टीकरण पूछने का एक ही तात्पर्य है की जिससे उच्च न्यायालय को पुख्ता जवाब दिया जा सके |ऐसे प्राथमिकी हो जाने के बाद ऐसे स्पष्टीकरण को कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है | संजय सिंह की मंशा तो शुरू से ही थी की रु. १० लाख मिलने के बाद ही नवीकरण किया जाएगा |यह गैर कानूनी उगाही न होते देख इस व्यक्ति ने अपनी सारी ताकत झोंक कर और एक खास बेईमानी की नियत से न सिर्फ विभाग का समय बर्बाद करवाया है ,इसके साथ सैकड़ों मजदूरों को भी बेरोजगार कर दिया है ,लाखों रुपैये की खाद को पानी में परिवर्तित होकर बह जाने की खास कोशिश की है |हमारी बर्बादी करना तो इसके जेहन में २००७ से समा गयी थी जब यह व्यक्ति उल्टा सीधा आदेश डा. बी. राजेंद्र जी से करवाना शुरू कर दिया था |पर बिहार में भारतीय प्रशासनिक सेवा के ऐसे पदाधिकारी उल्टा सीधा आदेश देते ही रहते हैं जिससे इनका प्रभुत्व कायम रहे ,भले ही जनता का नुकसान होते रहे ,कम से कम कोर्ट कचहरी के चक्कर में समय तो बर्बाद ये पदाधिकारी करवा ही देते हैं और इसी में इनको दीखता है अपना बांकपन ,अपनी शक्ति |इन लोगों को यह भी शर्म नही है की कोर्ट के आदेश किस कदर इनके मुहं पर तमाचा लगाते है |कोर्ट ने इनके और एक खास कृषि उत्पादन आयुक्त के ऐसे ही आदेश के विरूद्ध एक अन्य मामले में जो हमारे मामले से हूबहू मिलता जुलता है में टिप्पणी की थी वो इस प्रकार है :- CWJC 16645 of 2010 order dated 1.10.2010 – “It is evident from the impugned order that they suffer from non-application of mind to the requirements of the Fertilizer Control Order not only with respect to the facts of the case but also the requirement of law . “Once the petitioner had taken the stand that shortage of equipments in the laboratory was rectified,either the respondent authorities ought have accepted the same or they could have made inspection of the Laboratory to verify the statements made and thereafter appropriate orders should have been passed keeping in view the valuable rights of the petitioner involved in the matter . “On consideration of the entire facts and circumstances the order dated 4.06.2010 of the Director,Agriculture and 13.09.2010 of the Agriculture Production Commissioner are set aside and the matter is remanded to the Director ,Agriculture to consider the question of renewal of the registration certificate of the petitioner in accordance with law after considering the documents submitted by the petitioner and,if necessary by getting the inspection of the petitioner’s laboratory done by a team of competent Officers . “Let the application for renewal of the petioner be considered and disposed of within a period of three weeks from the date of receipt /production of a copy of this order. The writ petition is disposed of with the afore said observations and directions .” Sd/- Ramesh Kumar Dutta ,J. लेकिन शर्म तो इन प्रशासनिक पदाधिकारियों ने एक दानवी हैवान के पहलू में गिरवी रख दी है |इसका एक खास कारण यह भी है की ऐसे पदाधिकारिओं का मान बढ़ता है चोर और सिरफिरे राजनीतिज्ञों का प्रश्रय मिलने पर |और कम से कम आज के कृषि विभाग में ऐसा ही हो रहा है | १९.दिनांक २०.१२.२०१० के उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार हमारे अनुज्ञप्ति नवीकरण को नहीं करके कृषि निदेशक ने आदेश संख्या २५ दिनांक ७.०१.२०११ को हमारे आवेदन को पुनः अस्वीकृत कर दिया वह भी जब उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था की “matter for renewal of certificate of Registration for manufacture and sale of Mixture of fertilizers is pending before the Director,Agriculture ,Government of Bihar since 30.09.2010 when order passed by Agriculture Production Commissioner,Bihar in appeal no. 7 of 2010 was communicated “. कृषि निदेशक ने इस मद में एक आदेश निकाला जो दिनांक ६.०१.२०११ को दस्तखत किया गया और वह इस प्रकार है :- प्वाइंट नो. ६ .”प्रतिष्ठान से प्राप्त स्पस्टीकरण संतोषप्रद एवं स्वीकार्य नहीं है |प्रतिष्ठान की ओर से प्राप्त स्पस्टीकरण से स्पस्ट होता है की उनके द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १८(४)एवं ११(४)के अंतर्गत प्रतिष्ठान के विनिर्माण एवं विपणन प्राधिकार पत्र को वैध माना गया है |इस सम्बन्ध में उक्त दोनों खण्डों का उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है |खंड १८(४) निम्नवत है :- “where the application for renewal is made within the time specified in sub-clause (1)or sub-clause (3),the applicant shall be deemed to have held a valid certificate of manufacture until such date as the registering authority passes order on application for renewal “ तथा ११(४) निम्नवत है :- “where the application for renewal of certificate of registration is made within the time specified in sub-clause (1)or sub-clause (3),the applicant shall be deemed to have held a valid certificate of registration until such date as the controller passes order on application for renewal” उपरोक्त दोनों खण्डों के अवलोकन से स्पष्ट है की नवीकरण हेतु लंबित विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र उस अवधि तक वैध है जब तक की पंजीकरण पदाधिकारी के द्वारा आदेश पारित नहीं कर दिया जाय |में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के मामले में प्रतिष्ठान का नवीकरण हेतु प्राप्त आवेदन अद्योहसताक्षरी के आदेश दिनांक २३.०७.१० के द्वारा अस्वीकृत किया जा चूका है |अतः उर्वरक नियत्रण आदेश १९८५ के खंड १८(४) एवं ११(४) के अनुसार दिनांक २३.०७.२०१० को प्रतिष्ठान के विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र की वैधता समाप्त हो चुकी है | प्वाइंट न..७ :-कृषि उत्पादन आयुक्त के द्वारा अपील -७/२०१० में पारित आदेश में कृषि निदेशक को निदेश दिया गया था की अपीलकर्ता के प्रयोगशाला में सभी न्यूनतम उपकरणों की जांच कर संतुष्ट होने पर अपीलकर्ता के विनिर्माण प्रमाण पत्र को नवीकृत करेंगे एवं इसे निर्गत करते समत विपणन प्राधिकार पत्र को नवीकृत करने पर विचार करेंगे |अपिलवाद के दिए गये आदेश के आलोक में प्रयोगशाला की सुविधा की जांच कर अग्रेतर कार्रवाही की जा रही थी |परन्तु इसी बीच में हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा अनाधिकृत रूप से विनिर्माण एवं विपणन कार्य प्रारम्भ कर दिया गया जबकि अध्योहस्ताक्षरी के द्वारा कृषि निदेशालय के ज्ञापांक ८९८ दिनांक २३.०७.२०१० को संशोधन करने सम्बन्धी कोई भी आदेश निर्गत नहीं किया गया |इस परिस्थति में में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा.ली. के द्वारा किया गया विनिर्माण एवं विपणन कार्य बिना विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र प्राप्त किये किया गया है जो उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ क्र खंड १२ एवं ७ का उल्लंघन है एवं जिसके लिए प्रतिष्ठान के विरूद्ध के. हाट थाना, पूर्णिया एवं फारविसगंज थाना ,अररिया में प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है | प्वाइंट न. ८ :-उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है की में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के बिना उर्वरक मिश्रण का विनिर्माण एवं विपणन कार्य कर उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १२ एवं ७ का उल्लंघन किया गया है |प्रतिष्ठान के द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश के उपरोक्त खंड को उल्लंघन करने के आरोप में दिनांक ३०.०९.२०१० को में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा समर्पित विनिर्माण एवं विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकरण हेतु आवेदन को अस्वीकृत किया जाता है |” N.B. कृषि निदेशक के इस आदेश से निम्न बातें साफ़-साफ़ स्पष्ट हो जाती हैं:- (क)हिमालय एग्रो केमिकल्स के इस मामले में उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के तहत खंड १२ एवं खंड ७ ही लागू होगा न की खंड १८(४) एवं ११(४) (ख)कृषि निदेशालय के उपर्वर्नित पत्राचार से यह भी साफ़ हो जाता है की यह मामला नवीकरण का न होकर नए अनुज्ञप्ति पंजीकरण का ही होगा | जबकि यह भी सत्य है की यह फेक्ट्री विगत ३० वर्षों से कार्यरत है और १० बार इसकी अनुज्ञप्तियों का नवीकरण हो चूका है |इसका मतलब सीधा है की कृषि निदेशालय के अनुसार इन अनुज्ञप्तियों का स्वतः deregistration हो चुका है |भविष्य में हमारा पंजीकरण नए रूप में हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है |होगा तभी जब इन लोगों को हम विधाता माने और इनकी पूजा अर्चना करें| (ग) यह भी साफ़ हो जाता है की कृषि निदेशालय में कृषि निदेशक श्री अरविंदर सिंह और संजय सिंह के मन में जो आएगा वो ये करेंगे और न उच्च न्यायालय का कोई आदेश इन लोगों पर लागू होता और न ही कृषि उत्पादन आयुक्त का, क्योंकि कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के आदेश के बाद हमारी प्रयोगशाला में निर्धारित उपकरणों की व्यवस्था कर ली गयी है जिसकी सूचना हमलोगों ने ३०.०९.२०१० को ही दे दी थी,इनलोगों ने इस आदेश के ५३ वे दिन बाद ही हमारे प्रयोगशाला को जांच करवाया | (घ)इतना ही नहीं प्रयोगशाला के जांचोपरांत दिनांक २३.११,२०१० को जोविभाग द्वारा सम्भव हो पाया ,इस जांच प्रतिवेदन में साफ़ –साफ़ यह प्रतिवेदित है की उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ की धारा २१(ए) का प्रतिष्ठान द्वारा पूर्णरूपेण पालन कर लिया गया है ,के बाद भी २३ दिन बीत जाने के बाद याने १८.१२.२०१० तक भी नवीकरण करने की कोई प्रक्रिया सिर्फ विचाराधीन थी या यह कहा जाए की हमलोगों पर प्राथमिकी दर्ज और संयंत्र को सील करवाने की प्रक्रिया करने की जुगत में इन २३ दिनों में ये दोनों महानुभाव लगे हुए थे और अंततःइनलोगों ने एक हैवानियत का उदहारण देते हुए हमलोगों पर प्राथमिकी और संयंत्र को सील करवाने की प्रक्रिया को अंजाम दे ही दिया |यह है सुशासन | (ङ)यह भी स्पष्ट हो जाता है की इनलोगों पर कोई अंकुश नहीं है ,ये लोग अपने आप में एक सरकार है ,क्योंकि हमारी तरफ से दसियों बार कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय को इनके इतने असाधारण विलम्ब की सारी कारगुजारियों से अवगत करवाया जा चूका था तथा कृषि मंत्री महोदय को भी मैं स्वयं मिल कर इन कारनामों के बारे में कहा था|यह बतला देना यहाँ आवश्यक है की कृषि मंत्री महोदय से जब हमलोग मिलने गए तो कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह जी द्वारा यह कहा गया की “ये लोग(हमलोगों के बारे में) दो नंबर के आदमी हैं “ और विभाग ने कोई गलती नहीं की है |यह तो समय बताएगा की दो नंबर के लोग कौन हैं ,सिर्फ अपने NUISANCE VALUE के कारण कोई मंत्री पद प्राप्त कर लेता है तो वह आदमी स्वत एक नंबर का सदाचारी इंसान नहीं हो जाता , न ही ऐसे व्यक्ति को मंत्री पद प्राप्त होने के बाद यह कहने का हक मिल जाता है की वह किसी भी उद्यमी को दो नंबर का आदमी कहे |यह भी अत्यावश्यक है की अभी तक माननीय स्वर्गीय श्री अभय सिंह ,दिवंगत सदस्य ,बिहार विधान सभा ,के रहस्मयी मौत के बारे में अभी पर्दा उठाना बांकी है ,और सुशासन की पुरजोर कोशिश भी यही है की इस रहस्य को रहस्य बने रहने देना और जनता की स्मृति से जब यह बात विलुप्त हो जायेगी तब इस रहस्य को दफना देना है ,खास बात तो यह है की मंत्री महोदय के अपने चरित्र से ही नहीं अपनी सारी सांसारिक काया से दो नंबर की बू आती है और श्री अभय सिंह इन्ही के ज्येष्ठ पुत्र भी हैं|चना ,मसूर और खास कर ढैंचा बीज के खरीद में घोटाले का रहस्योदघाटन होना बांकी है |इन बीजों की खरीद में करोड़ों रूपैयों का घोटाला हुआ है जिसमे शीर्ष स्तर के राजनीतिग्य और पदाधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है | (च)कृषि निदेशालय के संजय सिंह के हैवानियत,निरंकुशता और बेशर्मियत का एक खास कारण यह भी है की कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के पद पर जिन्होनें रह कर हमारी सुनवाई की थी उनका नाम श्री के. सी. साहा है जो मात्र १५ से २० दिनों के लिए कृषि उत्पादन आयुक्त के रूप में इस कार्यभार को देख रहे थे |लेकिन श्री ए. के. सिन्हा जी के १५ से २० दिनों के अवकाश के बाद पुनः इन्होनें कृषि उत्पादन आयुक्त का प्रभार ग्रहण कर लिया |यह भी यहाँ बतला देना आवश्यक है की श्री ए.के.सिन्हा जी ने हमारे अपील को दो महीने तक टाला और कम से कम इन दो महीनों में ४ बार सुनवाई की तारीख को adjournment for next date करते रहे|इन्होनेंस्वयं अवकाश पर जाने के पहले अंतिम तारीख २९.०९.२०१० दी थी लेकिन ये २३.०९.२०१० से ही अवकाश पर चले गए थे |चूँकि श्री के.सी. साहा साहब कृषि उत्पाफ्दन आयुक्त के पदभार से मुक्त हो गए, तब संजय सिंह को congenial atmosphere मिल गया अपनी हैवानियत को मूर्त रूप देने में|इस बारे में की congenial atmosphere कैसे और क्यों बन गया , मेरे से ज्यादा आप समझ सकते हैं ,मुझे बतलाने की आवश्यकता नहीं है | हमारे विरूद्ध यह चक्व्यूह की संरचना में संजय सिंह जो अत्यंत दम्भी व्यक्ति है का हाथ है और सब से ज्यादा हैरानी की बात तो यह है की कुछ भा.प्र.से. के पदाधिकारी अपने आप में जब अपने आप को एक सरकार मान लेते हैं तो उनके आचरण और कार्यशैली से आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ,वो जान बुझ कर अनभिग्य बने रहते हैं ऐसे निरंकुश कारनामों से वही आम जन दर दर की ठोकर,कोर्ट से विभाग,विभाग से कोर्ट फिरता रहता है ,और इसी से जन्म लेता है माओवाद, नक्सलवाद , और फिर सुशासन के तहत इस आम जन को सुशासित करने के लिए सुशासन के बाबुओं को एक सुसज्जित सेना का सहारा लेना पड़ता है | वाह रे !आपका सुशासन नितीश बाबु | २०. हैवानियत और निरंकुशता के साथ साथ उच्च न्यायालय के आदेश की अवमाननना का डर की एक कहानी जिसका रचयिता यही संजय सिंह है वो भी सुन लीजिए | कृषि निदेशालय से निर्गत कृषि निदेशक ,बिहार ने बिहार एग्रो इंडस्टीज,फारविसगंज (यह प्रतिष्ठान भी विगत ३५ वर्षों से कार्यरत है और दानेदार मिश्रित उर्वरक का उत्पादन करता है )को एक पत्र लिखा जो इस प्रकार है :- प्रेषक , पत्र संख्या १३२१ /२२.११.२०१० अरविंदर सिंह ,भा.व्.से., कृषि निदेशक,बिहार | सेवामें , जिला कृषि पदाधिकारी , अररिया | विषय :- में. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज,फारविसगंज के द्वारा पुनः उत्पादन कार्य शुरू किये जाने के सम्बन्ध में | महाशय , उपर्युक्त विषयक प्रसंग में कहना है की में.बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज ,फारविसगंज ने CWJC16645/10 में पारित न्यायादेश के आलोक में पुनः उत्पादन कार्य शुरू करने की सूचना दी है |न्यायादेश के आलोक में प्रयोगशाला सुविधा की जांच की प्रक्रिया की जा रही है |कृषि निदेशालय से तदोपरांत समुचित आदेश पारित किया जाएगा |कृषि निदेशक के द्वारा जब तक विनिर्माण प्रमाण पत्र का नवीकरण नहीं किया जाता है तब तक विनिर्माण कार प्रारम्भ करना उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १८ का उल्लंघन है और गैरकानूनी है| आप अपने स्तर से जांच कर न्यायसंगत कार्रवाई करना सुनिश्चित करें | ह. अरविंदर सिंह दिनांक २२.११.२०१० (मो. न. ९४३१८१८७०४) २१. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज ,फारविसगंज के मामले में जिला कृषि पदाधिकारी ,अररिया श्री बैद्यनाथ यादव ने दिनांक १०.१२.२०१० को पत्र संख्या १०३८ से परियोजना कार्यपालक पदाधिकारी अररिया को संबोधित करते हुए लिखा जो इस प्रकार है :- विषय :-मेसर्स बिहार एग्रो एजेंसीज ,फारविसगंज द्वारा कृषि निदेशक,बिहार,पटना के पत्र संख्या १३२१ दिनांक २२.११.२०१० में निहित निदेश का उल्लंघन कर पुनः उत्पादन कार्य प्रारंभ करने के सम्बन्ध में | प्रसंग:कृषि निदेशक, बिहार ,पटना का पत्र संख्या १३२१ दिनांक २२.११.२०१० | महाशय , उपर्युक्त विषय के सम्बन्ध में कहना है की इस कार्यालय के पत्र संख्या १००२ दिनांक ३०.११.२०१० द्वारा आपको उपरोक्त निर्माता कंपनी को जांच करने का निदेश दिया गया था | कृषि निदेशक,बिहार पटना के विषय अंकित पत्र जिसकी प्रति विनिर्माता इकाई को भी दी गयी है में निहित निदेश की उन्हें विनिर्माण प्रमाण पत्र का नवीकरण होने तक ,विनिर्माण कार्य पुनः आरम्भ नहीं करना है ,ऐसा करने से उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ का खंड (१८) का उल्लंघन होगा एवं गैरकानूनी भी है | कृषि निदेशक,बिहार पटना के इस निदेश के बाउजूद भी सम्बंधित विनिर्माता कंपनी के द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश का उल्लंघन कर विनिर्माण कार्य किया जा रहा है | अतः आपको निदेश दिया जाता है की अविलम्ब निम्नांकित कार्रवाई करना सुनिश्चित करें:- (i)विनिर्माण इकाई में विनिर्माण कार्य में रोक लगा दें | (ii)विनिर्मित सामग्री एवं कच्चा माल का जब्ती सूची तैयार कर निर्मित सामग्री का नमूना संग्रह कर प्रयोगशाला में भेजें | (iii)कच्चा माल कहाँ से प्राप्त किया गया है उसका स्त्रोत्र प्राप्त कर साक्षय तैयार कर कार्रवाई करें | (iv)कृषि निदेशक ,बिहार,पटना के प्रासंगिक पत्र के आलोक में अवैध निर्माण कार्य करने के कारण उर्वरक नियंत्रण आदेश १८९५ खंड (१८) का उल्लंघन करने के आरोप में स्थानीय थाना में प्राथमिकी दर्ज करें |आवश्यकतानुसार स्थानीय थाना एवं अनुमंडल पदाधिकारी फारविसगंज का सहयोग प्राप्त कर कृत कार्रवाई से अध्योहस्ताक्षरी एव
  2. Shambhu Goel says:

    १९.दिनांक २०.१२.२०१० के उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार हमारे अनुज्ञप्ति नवीकरण को नहीं करके कृषि निदेशक ने आदेश संख्या २५ दिनांक ७.०१.२०११ को हमारे आवेदन को पुनः अस्वीकृत कर दिया वह भी जब उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था की “matter for renewal of certificate of Registration for manufacture and sale of Mixture of fertilizers is pending before the Director,Agriculture ,Government of Bihar since 30.09.2010 when order passed by Agriculture Production Commissioner,Bihar in appeal no. 7 of 2010 was communicated “.

    कृषि निदेशक ने इस मद में एक आदेश निकाला जो दिनांक ६.०१.२०११ को दस्तखत किया गया और वह इस प्रकार है :-
    प्वाइंट नो. ६ .”प्रतिष्ठान से प्राप्त स्पस्टीकरण संतोषप्रद एवं स्वीकार्य नहीं है |प्रतिष्ठान की ओर से प्राप्त स्पस्टीकरण से स्पस्ट होता है की उनके द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १८(४)एवं ११(४)के अंतर्गत प्रतिष्ठान के विनिर्माण एवं विपणन प्राधिकार पत्र को वैध माना गया है |इस सम्बन्ध में उक्त दोनों खण्डों का उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है |खंड १८(४) निम्नवत है :-
    “where the application for renewal is made within the time specified in sub-clause (1)or sub-clause (3),the applicant shall be deemed to have held a valid certificate of manufacture until such date as the registering authority passes order on application for renewal “
    तथा ११(४) निम्नवत है :-
    “where the application for renewal of certificate of registration is made within the time specified in sub-clause (1)or sub-clause (3),the applicant shall be deemed to have held a valid certificate of registration until such date as the controller passes order on application for renewal”

    उपरोक्त दोनों खण्डों के अवलोकन से स्पष्ट है की नवीकरण हेतु लंबित विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र उस अवधि तक वैध है जब तक की पंजीकरण पदाधिकारी के द्वारा आदेश पारित नहीं कर दिया जाय |में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के मामले में प्रतिष्ठान का नवीकरण हेतु प्राप्त आवेदन अद्योहसताक्षरी के आदेश दिनांक २३.०७.१० के द्वारा अस्वीकृत किया जा चूका है |अतः उर्वरक नियत्रण आदेश १९८५ के खंड १८(४) एवं ११(४) के अनुसार दिनांक २३.०७.२०१० को प्रतिष्ठान के विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र की वैधता समाप्त हो चुकी है |
    प्वाइंट न..७ :-कृषि उत्पादन आयुक्त के द्वारा अपील -७/२०१० में पारित आदेश में कृषि निदेशक को निदेश दिया गया था की अपीलकर्ता के प्रयोगशाला में सभी न्यूनतम उपकरणों की जांच कर संतुष्ट होने पर अपीलकर्ता के विनिर्माण प्रमाण पत्र को नवीकृत करेंगे एवं इसे निर्गत करते समत विपणन प्राधिकार पत्र को नवीकृत करने पर विचार करेंगे |अपिलवाद के दिए गये आदेश के आलोक में प्रयोगशाला की सुविधा की जांच कर अग्रेतर कार्रवाही की जा रही थी |परन्तु इसी बीच में हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा अनाधिकृत रूप से विनिर्माण एवं विपणन कार्य प्रारम्भ कर दिया गया जबकि अध्योहस्ताक्षरी के द्वारा कृषि निदेशालय के ज्ञापांक ८९८ दिनांक २३.०७.२०१० को संशोधन करने सम्बन्धी कोई भी आदेश निर्गत नहीं किया गया |इस परिस्थति में में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा.ली. के द्वारा किया गया विनिर्माण एवं विपणन कार्य बिना विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र प्राप्त किये किया गया है जो उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ क्र खंड १२ एवं ७ का उल्लंघन है एवं जिसके लिए प्रतिष्ठान के विरूद्ध के. हाट थाना, पूर्णिया एवं फारविसगंज थाना ,अररिया में प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है |

    प्वाइंट न. ८ :-उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है की में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के बिना उर्वरक मिश्रण का विनिर्माण एवं विपणन कार्य कर उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १२ एवं ७ का उल्लंघन किया गया है |प्रतिष्ठान के द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश के उपरोक्त खंड को उल्लंघन करने के आरोप में दिनांक ३०.०९.२०१० को में. हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली. के द्वारा समर्पित विनिर्माण एवं विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकरण हेतु आवेदन को अस्वीकृत किया जाता है |”

    N.B. कृषि निदेशक के इस आदेश से निम्न बातें साफ़-साफ़ स्पष्ट हो जाती हैं:-
    (क)हिमालय एग्रो केमिकल्स के इस मामले में उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के तहत खंड १२ एवं खंड ७ ही लागू होगा न की खंड १८(४) एवं ११(४)
    (ख)कृषि निदेशालय के उपर्वर्नित पत्राचार से यह भी साफ़ हो जाता है की यह मामला नवीकरण का न होकर नए अनुज्ञप्ति पंजीकरण का ही होगा | जबकि यह भी सत्य है की यह फेक्ट्री विगत ३० वर्षों से कार्यरत है और १० बार इसकी अनुज्ञप्तियों का नवीकरण हो चूका है |इसका मतलब सीधा है की कृषि निदेशालय के अनुसार इन अनुज्ञप्तियों का स्वतः deregistration हो चुका है |भविष्य में हमारा पंजीकरण नए रूप में हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है |होगा तभी जब इन लोगों को हम विधाता माने और इनकी पूजा अर्चना करें|
    (ग) यह भी साफ़ हो जाता है की कृषि निदेशालय में कृषि निदेशक श्री अरविंदर सिंह और संजय सिंह के मन में जो आएगा वो ये करेंगे और न उच्च न्यायालय का कोई आदेश इन लोगों पर लागू होता और न ही कृषि उत्पादन आयुक्त का, क्योंकि कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के आदेश के बाद हमारी प्रयोगशाला में निर्धारित उपकरणों की व्यवस्था कर ली गयी है जिसकी सूचना हमलोगों ने ३०.०९.२०१० को ही दे दी थी,इनलोगों ने इस आदेश के ५३ वे दिन बाद ही हमारे प्रयोगशाला को जांच करवाया |
    (घ)इतना ही नहीं प्रयोगशाला के जांचोपरांत दिनांक २३.११,२०१० को जोविभाग द्वारा सम्भव हो पाया ,इस जांच प्रतिवेदन में साफ़ –साफ़ यह प्रतिवेदित है की उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ की धारा २१(ए) का प्रतिष्ठान द्वारा पूर्णरूपेण पालन कर लिया गया है ,के बाद भी २३ दिन बीत जाने के बाद याने १८.१२.२०१० तक भी नवीकरण करने की कोई प्रक्रिया सिर्फ विचाराधीन थी या यह कहा जाए की हमलोगों पर प्राथमिकी दर्ज और संयंत्र को सील करवाने की प्रक्रिया करने की जुगत में इन २३ दिनों में ये दोनों महानुभाव लगे हुए थे और अंततःइनलोगों ने एक हैवानियत का उदहारण देते हुए हमलोगों पर प्राथमिकी और संयंत्र को सील करवाने की प्रक्रिया को अंजाम दे ही दिया |यह है सुशासन |
    (ङ)यह भी स्पष्ट हो जाता है की इनलोगों पर कोई अंकुश नहीं है ,ये लोग अपने आप में एक सरकार है ,क्योंकि हमारी तरफ से दसियों बार कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय को इनके इतने असाधारण विलम्ब की सारी कारगुजारियों से अवगत करवाया जा चूका था तथा कृषि मंत्री महोदय को भी मैं स्वयं मिल कर इन कारनामों के बारे में कहा था|यह बतला देना यहाँ आवश्यक है की कृषि मंत्री महोदय से जब हमलोग मिलने गए तो कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह जी द्वारा यह कहा गया की “ये लोग(हमलोगों के बारे में) दो नंबर के आदमी हैं “ और विभाग ने कोई गलती नहीं की है |यह तो समय बताएगा की दो नंबर के लोग कौन हैं ,सिर्फ अपने NUISANCE VALUE के कारण कोई मंत्री पद प्राप्त कर लेता है तो वह आदमी स्वत एक नंबर का सदाचारी इंसान नहीं हो जाता , न ही ऐसे व्यक्ति को मंत्री पद प्राप्त होने के बाद यह कहने का हक मिल जाता है की वह किसी भी उद्यमी को दो नंबर का आदमी कहे |यह भी अत्यावश्यक है की अभी तक माननीय स्वर्गीय श्री अभय सिंह ,दिवंगत सदस्य ,बिहार विधान सभा ,के रहस्मयी मौत के बारे में अभी पर्दा उठाना बांकी है ,और सुशासन की पुरजोर कोशिश भी यही है की इस रहस्य को रहस्य बने रहने देना और जनता की स्मृति से जब यह बात विलुप्त हो जायेगी तब इस रहस्य को दफना देना है ,खास बात तो यह है की मंत्री महोदय के अपने चरित्र से ही नहीं अपनी सारी सांसारिक काया से दो नंबर की बू आती है और श्री अभय सिंह इन्ही के ज्येष्ठ पुत्र भी हैं|चना ,मसूर और खास कर ढैंचा बीज के खरीद में घोटाले का रहस्योदघाटन होना बांकी है |इन बीजों की खरीद में करोड़ों रूपैयों का घोटाला हुआ है जिसमे शीर्ष स्तर के राजनीतिग्य और पदाधिकारियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है |
    (च)कृषि निदेशालय के संजय सिंह के हैवानियत,निरंकुशता और बेशर्मियत का एक खास कारण यह भी है की कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के पद पर जिन्होनें रह कर हमारी सुनवाई की थी उनका नाम श्री के. सी. साहा है जो मात्र १५ से २० दिनों के लिए कृषि उत्पादन आयुक्त के रूप में इस कार्यभार को देख रहे थे |लेकिन श्री ए. के. सिन्हा जी के १५ से २० दिनों के अवकाश के बाद पुनः इन्होनें कृषि उत्पादन आयुक्त का प्रभार ग्रहण कर लिया |यह भी यहाँ बतला देना आवश्यक है की श्री ए.के.सिन्हा जी ने हमारे अपील को दो महीने तक टाला और कम से कम इन दो महीनों में ४ बार सुनवाई की तारीख को adjournment for next date करते रहे|इन्होनेंस्वयं अवकाश पर जाने के पहले अंतिम तारीख २९.०९.२०१० दी थी लेकिन ये २३.०९.२०१० से ही अवकाश पर चले गए थे |चूँकि श्री के.सी. साहा साहब कृषि उत्पाफ्दन आयुक्त के पदभार से मुक्त हो गए, तब संजय सिंह को congenial atmosphere मिल गया अपनी हैवानियत को मूर्त रूप देने में|इस बारे में की congenial atmosphere कैसे और क्यों बन गया , मेरे से ज्यादा आप समझ सकते हैं ,मुझे बतलाने की आवश्यकता नहीं है |
    हमारे विरूद्ध यह चक्व्यूह की संरचना में संजय सिंह जो अत्यंत दम्भी व्यक्ति है का हाथ है और सब से ज्यादा हैरानी की बात तो यह है की कुछ भा.प्र.से. के पदाधिकारी अपने आप में जब अपने आप को एक सरकार मान लेते हैं तो उनके आचरण और कार्यशैली से आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा ,वो जान बुझ कर अनभिग्य बने रहते हैं ऐसे निरंकुश कारनामों से वही आम जन दर दर की ठोकर,कोर्ट से विभाग,विभाग से कोर्ट फिरता रहता है ,और इसी से जन्म लेता है माओवाद, नक्सलवाद , और फिर सुशासन के तहत इस आम जन को सुशासित करने के लिए सुशासन के बाबुओं को एक सुसज्जित सेना का सहारा लेना पड़ता है | वाह रे !आपका सुशासन नितीश बाबु |
    २०. हैवानियत और निरंकुशता के साथ साथ उच्च न्यायालय के आदेश की अवमाननना का डर की एक कहानी जिसका रचयिता यही संजय सिंह है वो भी सुन लीजिए | कृषि निदेशालय से निर्गत कृषि निदेशक ,बिहार ने बिहार एग्रो इंडस्टीज,फारविसगंज (यह प्रतिष्ठान भी विगत ३५ वर्षों से कार्यरत है और दानेदार मिश्रित उर्वरक का उत्पादन करता है )को एक पत्र लिखा जो इस प्रकार है :-

    प्रेषक , पत्र संख्या १३२१ /२२.११.२०१०
    अरविंदर सिंह ,भा.व्.से.,
    कृषि निदेशक,बिहार |
    सेवामें ,
    जिला कृषि पदाधिकारी ,
    अररिया |

    विषय :- में. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज,फारविसगंज के द्वारा पुनः उत्पादन कार्य शुरू किये जाने के सम्बन्ध में |

    महाशय ,
    उपर्युक्त विषयक प्रसंग में कहना है की में.बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज ,फारविसगंज ने CWJC16645/10 में पारित न्यायादेश के आलोक में पुनः उत्पादन कार्य शुरू करने की सूचना दी है |न्यायादेश के आलोक में प्रयोगशाला सुविधा की जांच की प्रक्रिया की जा रही है |कृषि निदेशालय से तदोपरांत समुचित आदेश पारित किया जाएगा |कृषि निदेशक के द्वारा जब तक विनिर्माण प्रमाण पत्र का नवीकरण नहीं किया जाता है तब तक विनिर्माण कार प्रारम्भ करना उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १८ का उल्लंघन है और गैरकानूनी है|
    आप अपने स्तर से जांच कर न्यायसंगत कार्रवाई करना सुनिश्चित करें |
    ह. अरविंदर सिंह दिनांक २२.११.२०१० (मो. न. ९४३१८१८७०४)

    २१. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज ,फारविसगंज के मामले में जिला कृषि पदाधिकारी ,अररिया श्री बैद्यनाथ यादव ने दिनांक १०.१२.२०१० को पत्र संख्या १०३८ से परियोजना कार्यपालक पदाधिकारी अररिया को संबोधित करते हुए लिखा जो इस प्रकार है :-

    विषय :-मेसर्स बिहार एग्रो एजेंसीज ,फारविसगंज द्वारा कृषि निदेशक,बिहार,पटना के पत्र संख्या १३२१ दिनांक २२.११.२०१० में निहित निदेश का उल्लंघन कर पुनः उत्पादन कार्य प्रारंभ करने के सम्बन्ध में |
    प्रसंग:कृषि निदेशक, बिहार ,पटना का पत्र संख्या १३२१ दिनांक २२.११.२०१० |

    महाशय ,
    उपर्युक्त विषय के सम्बन्ध में कहना है की इस कार्यालय के पत्र संख्या १००२ दिनांक ३०.११.२०१० द्वारा आपको उपरोक्त निर्माता कंपनी को जांच करने का निदेश दिया गया था |
    कृषि निदेशक,बिहार पटना के विषय अंकित पत्र जिसकी प्रति विनिर्माता इकाई को भी दी गयी है में निहित निदेश की उन्हें विनिर्माण प्रमाण पत्र का नवीकरण होने तक ,विनिर्माण कार्य पुनः आरम्भ नहीं करना है ,ऐसा करने से उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ का खंड (१८) का उल्लंघन होगा एवं गैरकानूनी भी है |
    कृषि निदेशक,बिहार पटना के इस निदेश के बाउजूद भी सम्बंधित विनिर्माता कंपनी के द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश का उल्लंघन कर विनिर्माण कार्य किया जा रहा है |
    अतः आपको निदेश दिया जाता है की अविलम्ब निम्नांकित कार्रवाई करना सुनिश्चित करें:-
    (i)विनिर्माण इकाई में विनिर्माण कार्य में रोक लगा दें |
    (ii)विनिर्मित सामग्री एवं कच्चा माल का जब्ती सूची तैयार कर निर्मित सामग्री का नमूना संग्रह कर प्रयोगशाला में भेजें |
    (iii)कच्चा माल कहाँ से प्राप्त किया गया है उसका स्त्रोत्र प्राप्त कर साक्षय तैयार कर कार्रवाई करें |
    (iv)कृषि निदेशक ,बिहार,पटना के प्रासंगिक पत्र के आलोक में अवैध निर्माण कार्य करने के कारण उर्वरक नियंत्रण आदेश १८९५ खंड (१८) का उल्लंघन करने के आरोप में स्थानीय थाना में प्राथमिकी दर्ज करें |आवश्यकतानुसार स्थानीय थाना एवं अनुमंडल पदाधिकारी फारविसगंज का सहयोग प्राप्त कर कृत कार्रवाई से अध्योहस्ताक्षरी एवं कृषि निदेशक ,बिहार,पटना को भी अवगत करें |
    ह. बैद्यनाथ यादव ,जिला कृषि पदाधिकारी |

    २२. इसके उपरांत दिनांक १२.१२.२०१० को पत्रांक संख्या १५३ से परियोजना कार्यपालक पदाधिकारी ,फारविसगंज श्री मक्केश्वर पासवान ने स्थानीय थाना फारविसगंज में बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज पर प्राथमिकी दर्ज कराते हुए इस फेक्ट्री को भी सील कर दिया |
    २३.अचानक तारीख २३.१२. २०१० को इस फेक्ट्री मालिक श्री अभय दूगड को भी स्पष्टीकरण पूछा जाता है जिसमे कृषि निदेशक कार्यालय का पत्रांक १४६० अंकित है वो इस प्रकार है:-
    “प्वाइंट न. २ उपरोक्त से स्पष्ट है की आपके द्वारा उर्वरक नियंत्रण आदेश १९८५ के खंड १२ का उल्लंघन करते हुए विनिर्माण प्रमाण पत्र के नवीकरण के बिना विनिर्माण कार्य किया जा रहा है जो गैरकानूनी है |उल्लेखनीय है की इस क्रम में आपके विरूद्ध फारविसगंज थाना में वाद सं.४८९/१० दिनांक १२.१२.२०१० भी दर्ज किया गया है |
    प्वाइंट न.२ आप स्पष्ट करें की उपरोक्त आरोप के आलोक में क्यों नहीं आपके प्रतिष्ठान का विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र के नवीकरण हेतु प्राप्त आवेदन को उर्वरक नियंत्रण आदेश के खंड १८ (२) के अंतर्गत अस्वीकृत कर दिया जाए |आप अपना स्पष्टीकरण दिनांक २८.१२.२०१० तक अवश्य समर्पित करें अन्यथा एकतरफा निर्णय ले लिया जाएगा |”

    २४. फिर अचानक ६.०१.२०११ को कृषि निदेशक ,कार्यालय से एक आदेश निकलता है जिसकी आदेश संख्या २० दिनांक ६.०१.२०११ है वो इस प्रकार है :-
    प्वाइंट न. २ :-“ माननिय उच्च न्यायलय ,पटना के आदेश के आलोक में में. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज के प्रयोगशाला का जांच प्रतिवेदन एवं उपलब्ध अभिलेखों के आलोक में में. बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज का विनिर्माण प्रमाण पत्र एवं विपणन प्राधिकार पत्र का नवीकरण करने का निर्णय लिया जाता है एवं बिहार एगो इंडस्ट्रीज को सील मुक्त किया जाता है |”
    कृषि निदेशक ,बिहार,पटना द्वारा इस तरह से हुबहू एक ही तरह के आरोप में एक फेक्ट्री को सील मुक्त एवं उनकी अनुज्ञप्तियों को नवीकरण करने का निर्णय ले लिया जाता है और
    इसी तारीख को हमारी फेक्ट्री के अनुज्ञप्तियों के नवीकरण की प्रक्रिया को स्थगित कर दी जाती है और नवीकरण अस्वीकृत कर दिया जाता है जिसके बारे में निर्गत आदेश संख्या २५ दिनांक ७.०१.२०११ का वर्णन हमारे इस प्रतिवेदन के प्वाइंट न. १९ पर वर्णित है |

    कितना अभूतपूर्व उदहारण पेश किया गया है सुशासन का |

    २५.इसी संजय सिंह की हैवानियत का वर्णन आपने सुन ही लिया |अब देखिये की यही शख्स दिनांक ११.१.२०११ को उच्च न्यायालय से माफ़ी मांगता है जिसका वर्णन इसने अपने ही अपने शपथ-पत्र द्वारा इस प्रकार किया है :-

    Most Respectfully sheweth :-

    1.That the deponent offer unconditional and unqualified apology for any inconvenience caused to the Hon’ble High Court in the due administration of Justice.
    2.That the deponent has a great respect for law as well as the Hon’ble courtand he cannot think to go against the slightest observation made by the Hon’ble Court .
    3.That the deponent is duty bound to comply each and every words of Hon’ble High Court in the same spirit in accordance with law .
    4.That at the outset it is informed that the certificate of manufacture and letter of authorisation of M/S Bihar Agro Industries have been renewed on 7.01.2011 .An unqualified and unconditional apology is being tendered for the procedural delay in comply with the matter —-A photo copy of renewed certificate of manufacture and letter of authorisation is annexed herewith and marked as annexure 1 series to this show-cause
    And thus are point 5 ,6,7,8 and 9 .
    अब आप समझ सकते हैं आपके विभागों के पदाधिकारियों की हैवानियत की करतूतें और कोर्ट के डर से इनके भींगी बिल्ली बन जाने का तरीका.
    जो भी हो इस व्यक्ति संजय सिंह ने ८ महीने तक इस फेक्ट्री और हमारी फेक्ट्री को १० महीने तक घोर अपराधिक षड्यंत्र कर के बंद करवा दिया |सहज अनुमान लगाया जा सकता है की हमलोगों का जो नुकसान हुआ वो तो हुआ ही ,पर हमारी प्रतिष्ठा पर भी इस हैवान द्वारा कुठाराघात किया गया |आज तक सैकडो मजदूर बेरोजगार बैठे हुए हैं |लाखों की खाद पानी होकर बह चुकी है |३५ नियमित कामगार भाग चुके हैं |लाखों रुपैया जो राजस्व के रूप में राज्य सरकार और केंद्रीय सरकार को दिया जाता था ,ऐसी सभी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी है |बैंकों के कर्ज पर व्याज अनावश्यक बढ़ रहा है | लाखों की प्लांट और मशीनरी जंग खा रही है और बेकाम हो गयी है |

    कैसा सुन्दर उदहारण है सुशासन का यह अनुमान लगाया जा सकता है |

    २६. इसी संजय सिंह ने ७ लाख ३० हज़ार रुपैया बिहार एगो इंडस्ट्रीज से लेकर इनके कारखाने को इतनी प्रताडना देने के बाद भी आखिर लिया और तभी चालु या अनुज्ञप्ति नवीकरण का आदेश कृषि निदेशक से दिलवाया |हमलोगों से इसकी मंशा १० लाख रुपैया लेने की थी |इस व्यक्ति ने तारीख २६.११.२०१० से लेकर १३.१२.२०१० तक बार बार तरह तरह के लोगों से हमेशा हमारे ऊपर दबाव बनाया की १० लाख रुपैया इनको दे दें नहीं तो अनुज्ञप्तियों को कभी भी नवीकृत नहीं किया जाएगा और यह भी धमकी दिलवाते रहा की समय रहते पैसा नहीं मिलेगा तो आगे क्या क्या होगा उसका हमलोगों को भुक्तभोगी होना पड़ेगा |
    इसकी इस नाजायज़ पैसे की मंशा पूरी नहीं होते देख इस हैवान ने गैरकानूनी तरीके से आखिरकार हमारी फेक्ट्री को १८.१२.२०१० को सील करवा दिया और प्राथमिकी दर्ज करवा ही दी |

    २७.यहीं पर फिर सिलसिला खत्म नहीं होता है |हमलोगों ने इस अन्याय के खिलाफ फिर उच्च न्यायालय में एक I.A. याचिका दी और इस याचिका की सुनवाई २७.०१.२०११ को हुई और आदेश जो निकला वो इस प्रकार है:-
    Point no.11- From the facts and circumstances of this case as well as order of the authorities (annexure 3 &4),it is quite apprent that the authorities as well as the petitioner had taken steps as per clause 32 and 32 A according to which the appeal was filed by the petitioner himself which was entertained by the appellate authority .The impugned order is in continuation of the said battle and hence,the corse of appeal being available to the petitioner ,there is no occasion for this court to entertain this writ petition .Accordingly this writ petition is disposed of with a liberty to the petitioner to challenge the impugned order of the Director (Agriculture)before the Agriculture Production Commissioner under the aforesaid provisions raising all the points that he raised here and the said appellate authority will decide the same in accordance with law considering the provisions of law as well as the decision of this court in similar matters .If the petitioner files an appeal within 15 days from today ,the appellate authority shall decide the same expeditiously preferably within aperiod of 6 weeks from the date of filing of the appeal …sd/- (S.N. Hussain ,J)

    २८.हमलोगों ने फिर कृषि उत्पादन आयुक्त महोदय के यहाँ अपील कर दी |लेकिन एक बड़ा ही रोमांचकारी तथ्य सामने आया |५ सप्ताह बीत जाने के बाद इसी संजय ने फाइल पर एक नोटिंग बना कर यह लिखा की २००३ में ही एक कृषि विभाग का प्रशासनिक आदेश निकला हुआ है जिसमे निदेशक कृषि के आदेश के खिलाफ अपील सचिव (कृषि ) को ही सुनना है |इसलिए सचिव (कृषि ) ही इस मामले को सुने |सचिव(कृषि) ने भी इसकी सुनवाई हेतु इसी फाइल में अपनी हामी भर दी |और १२.३.२०११ को हमारी सुनवाई हो गयी जिसका आदेश २१.३.२०११ को प्राप्त हुआ जो स्वयं एक सुशासन का अपने आप में एक नमूना है ,वो इस प्रकार है :-

    Point no. 4 . 11 . It would not be out of place to state that the petitioner contends that this case was similar to that of Bihar Agro Industries ,Forbesganj ,whose licence has been renewed on 6 th January 2011.
    Point no.5.1 The respondents basic contention is that the appellant in wilful disobedience of the Order of the Agriculture Production Commissioner dated 30.09.2010(as written in the order it is 30.09.2011)wherein mandatory laboratory equipments were to be obtained and inspection conducted to the satisfaction of the licensing authority.The appellant thus violated the basic condition of licensing as laid down under clause 7 &12 of the Fertilizer Control order 1985 .
    Point no. 5.2.The respondents aslo state that the laboratory equipments available was insufficient thus the appellant failed to fulfill the NECESSARY AND MANDATORY ORDER OF THE AGRICULTURE PRODUCTION COMMISSIONER .

    On careful consideration of the argument of both the sides it is apprent that the bone of contention is whether the petitioner was lawful in initiating production without waiting for renewal of licence vide clause 18(4)and 11(4)or the licensing authority is competent in enforcing clause 7 and 12 of the fertilizer control order 1985 .
    In my view of the matter on a reading the bare control order I find the petitioner seriously deficient in not waiting for a renewal order to be passed by the licensing authority where he had waited since March 2010 another month or so wouldn’t have made any difference.Further more the order of the Appellate Authority was not absolute rather conditional which presupposed the satisfaction of the Licensing authority before start of production .The petitioner clearly failed to interpret the order in the spirit it was delivered rather he became impatient and controverted the order thereby contravening the provisions of clause 7 & 12 of the fertilizer control order 1985 .
    Hence in the light of the above ,I, appellate authority (vide notification dated 18.8.2003 )hereby dismiss the appeal and uphold the order of the learned licensing authority passed on 7.01.2011. sd/- C.K. Anil

    अब आप देख सकते हैं की बिहार एग्रो इंडस्ट्रीज और हमारा matter एक ही हैं यह हमने अपनी अपील में सारे कागजातों के साथ लिख कर दिया |सारे ३ पन्नों के इस आदेश में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है की हमलोगों का कथन की दोनों फेक्ट्रियों का मामला एक ही जैसा है ,यह कथन सही है या नहीं |
    शायद जिक्र इसलिए नहीं है क्योंकि मामला एक ही जैसा है और एक को लाइसेंस दिया जाता है और दुसरे को और फंसाया जाता है चूँकि इस सच्चाई के विरूद्ध विभाग पूर्णतया नंगा है |

    प्वाइंट नो.५. १. |बात समझ के बाहर है क्योंकि त्रिसदस्सीय पदाधिकारियों के दल द्वारा प्रयोगशाला की जांच बहुत पहले २३.११.२०१० को ही कर ली गयी थी और इस जांच दल का जांच प्रतिवेदन बड़ा स्पष्ट है जो ऊपर mention किया हुआ है |
    शायद मांगे गयी राशि (दस लाख रुपैया )नहीं दिया गया था इसलिए यह बात सामने आई की inspection was not conducted according to the satisfaction of the licensing authority.

    प्रयोगशाला में धारा २१ (ए) में निहित उपकरणों का type और कितनी मात्र में ये उपकरण रखे जाने है , इसके अलावा और कोई शर्त अलावा इसके की १० लाख रुपैये की मांग संजय सिंह द्वारा की गयी थी ,और कोई कानूनी प्रावधान हमल्गों के समझ के बाहर है |

    सचिव (कृषि ) द्वारा यह लिखा जाना की “if the petitioner would have waited for one month or so when he had waited since March 2010 wouldn’t have made any difference “ क्या इस बात से यह नहीं लगता है की इस मामले में कुछ भी आरोप जो विभाग ने लगा कर हमारे साथ एक क्रूर खेल खेला है ,वो कोई आरोप ही नहीं है ,सिर्फ हमलोगों को जरूरत थी की इन विधाताओं को खुश रखने की, एक महीना और बिना फेक्ट्री चलाये हमलोग रहते तो ये विधाताओं का मान बना रहता या हमलोग भी बिहार एग्रो की तरह तंग आकार इनकी जेबों को भर देते याने १० लाख रुपैया दे देते तो सब कुछ ठीक था ,तब यही कानून बदल जाता |

    आज के दिन भी हमारा उत्पादन बंद है |सैंकडो मजदूर बेरोजगार हो गए हैं ,बैंकों का लाखों रुपियों का व्याज देना पड़ रहा है और करीब १५ लाख रुपियों की खाद पानी होकर बह चुकीं है |इस संजय जनित क्रूरता के कारण मेरे पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गए हैं जो ८० वर्ष के हैं |

    अगर हो सके तो पुरे मामले की जांच करवा ली जाए और न्याय दिलवाने की व्यवस्था की जाए.

    आपका
    शम्भू गोयल
    मेनेजिंग डाइरेक्टर,
    हिमालय एग्रो केमिकल्स प्रा. ली.
    फारविसगंज (अररिया )

  3. Shambhu Goel says:

    आजकल सभी प्रमुख अख़बारों में नितीश जी के सुशासन और बिहार की ग्रोथ रेट के बारे में चर्चा हो रही है |कहीं १३.१ प्रतिशत तो कहीं १५ प्रतिशत Growth की बात हो रही है | मेरा मानना है की rate of growth 1300(एक हज़ार तीन सौ ) प्रतिशत से भी ज्यादा है |इसका कारण है की लालू के बिहार Growth परसेंटेज की बढ़ने की तो बात छोड़ दीजिए ,Negative Growth का प्रतिशत इतना बढ़ गया था की अगर नितीश जी एक इमारत ,सिर्फ, एक इमारत ,एक सड़क सिर्फ एक सड़क के लिए पहली ईंट भी लगवा देंगे/एक ट्रेक्टर मिटटी गिरवा देंगे (जिस इमारत के मिर्माण में यह समझा जाय की २५ लाख ईंट या सड़क के निर्माण में २५ लाख ट्रेक्टर /टेलर मिटटी,गिट्टी, सीमेंट ,अलकतरा लगेगा )तो बिहार का ऐसे ही एक इमारत या एक सड़क के निर्माण का सोच ही ५-१० प्रतिशत ग्रोथ रेट बढ़ जाएगा |
    हुआ यूँ की एक बार दिल्ली में भारत सरकार ने Labor Department की बैठक की जिसमें सभी प्रदेश सरकार के श्रम विभाग के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था |Chief Labor Commissioner ने बंधुआ मजदूर की मुक्ति के बारे में राज्य वार उपलब्धि के आंकड़े की मांग की |इसमें पंजाब या हरियाणा सरकार की उपलब्धि १००% थी |और बिहार सरकार की उपलब्धि मात्र ५० % ही थी| बाद में पता चला की पंजाब या हरियाणा में सिर्फ दो ही मजदूर थे जो detected बंधुआ मजदूर थे ,उनको छुडा लिया गया | पर बिहार में रिकार्डेड ५४० बंधुवा मजदूर की संख्या थी जिसमें २७२ मजदूरों को मुक्त कराया गया था | तो यहाँ गणित की महानता के कारण बिहार पिछड़ गया |लेकिन बंधुआ ज्यादा तादाद में बिहार सरकार के अथक प्रयाश से ही छुडाये गए |
    तब इसी के उलट आज हमारी राज्य का आर्थिक ग्रोव्थ परसेंटेज थोड़ा सा काम करने पर गणित के आंकड़ों के हिसाब में काफी ऊपर चला जाता है |
    बिहार के कृषि मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह साहब की भी growth percentage आजकल काफी बढ़ी हुई है |इसका कारण है सरकार का अंधाधुन्द किसान के विकास के नाम पर खर्च |खैर अभी -अभी तो जून का महीना था की विभागीय अफसरों का मंत्री जी के आवास पर तांता लगा हुवा रहता था |क्योंकि जून का मौसम मंत्री पद प्राप्त श्री मान मंत्री जी का सबसे सुनहरा लक्ष्मी प्राप्ति का महीना होता है , क्योंकि मंत्रीजी जिसको चाहे जहाँ चाहे तबादला कर दे सकते हैं ,मलाई दार जिलों में जिला कृषि पदाधिकारी बनाने के लिए १० लाख रुपैया तो मामूली बात है | खैर तकदीर लिखवा कर साहब लायें हैं तो क्या किया जा सकता है ,आप और हम उसको बाँट कैसे पा सकतें हैं |मंत्री जी पूर्व जनम में कुबेर जी भगवान के अर्दली थे न ! आज कई आई.ए. एस. आफिसर इनके अर्दली हैं , क्या कीजियेगा ,सब भाग्य की बात है |
    ढैंचा बीज किसानों को गत वर्ष बिहार कृषि विभाग ने औने -पौने दाम में खरीद कर मुफ्त में दिया |कई जगह बीज गुण नियंत्रण प्रयोगशाला में यह खरीदा गया ढैंचा बीज substandard भी साबित हुआ |खैर ये सब तो होता ही रहता है |श्री मान रंजन सिंह जी , श्री श्री १०८ श्री राम अवतार(incarnation of God) श्री रंजन सिंह जी ,जो आजकल कृषि मंत्री महोदय के पैसा वसूली कार्यक्रम में सबसे नजदीकी सलाहकार और सबसे विश्वासी धन के संग्रह कर्ता हैं ने जिस सरकारी माध्यम से यह ढैंचा बीज खरीदा गया के vendors से १०% याने दो vendors से ३०-३० लाख रुपिया फंसा हुआ ३ करोड रुपैया के payment की एवज में वसूल कर ही लिया| अब साहब देख लीजिए Growth Rate का हिसाब -किताब |
    बिहार सचमुच काफी प्रगति कर रहा है , हुज़ूर ! अभी बहुत सा रुपैया इधर से उधर हो रहा है |it is only tip of an ice-berg.

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