अन्ना ये आपने/हमने क्या किया?

Posted: April 9, 2011 in Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation
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मुझे अन्ना या उनके सहयोगियों पर कोई संदेह नहीं है… क्षेत्रीय स्तर पर मैंने स्वयं उनके इस आन्दोलन का प्रतिनिधित्व  या कोई भी योगदान करके मैंने गौरव महसूस किया है… लेकिन  यदि सारा फायदा कांग्रेस को होता दिखाई दे रहा है… तो कुछ बेवकूफ यह कहने लगें कि यह कांग्रेस ने कैश  करवा लिया तो क्या अतिशयोक्ति हो जाएगी? दूसरा कोई यह भी कह सकता है कि यह सारा काम पूर्व में सुनियोजित किया गया हो… अन्ना, बेदी, अरविन्द जी जैसे लोगों  को इसका अंदाज़ा है या नहीं.. ये अलग बात है..
 

एक स्वतंत्र विचारक होने के नाते इस पूरी घटना का पोस्ट मार्टम करना जरुरी हो जाता है.ताकि वे बहुत से सवालिया कीड़े मर सकें जो  कि अन्ना और आम जनता का यह आन्दोलन   छोड़ गया…
मेरे सवाल:
१. कार्पोरेट के चापलूस और  कमिशनखोर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इस पुरे प्रकरण को इतना अतिशय बढ़ावा क्यों दिया क्या इसमें शासन का कोई हाथ नहीं..?
2. मीडिया, सोशल  नेटवर्किंग  और दुसरे माध्यमों पर सरकार क्षणिक विराम लगा सकती थी.. आन्दोलन को इस कदर फैलने से रोक सकती थी. ज्यादातर मीडिया विदेशी समूहों के अधिकार क्षेत्र में है इसलिए उनसे देश-प्रेम या देश के लिए जज़्ब-ओ-जूनून मृग मरीचिका  जैसा है. और यदि उन्होंने इतने मुक्त रूप से दिखाया है तो क्या यह और ज्यादा खतरनाक नहीं हो जाता है… ?? इसके पीछे  उनके आर्थिक-सामरिक क्या मनसूबे  हो सकते हैं.?

२. मीडिया में बाबा रामदेव के चैनल पर सीधे प्रसारण पर रोक लगाई लेकिन इस पुरे कार्यक्रम को ९० घंटे लगातार सजीव प्रसारण किया… अब यह ऊपर से निकल रही है  की इतने सारे मीडिया समूहों का समयांतराल में ह्रदय परिवर्तन हो गया होगा.. और वे नीरा रादिया और कार्पोरेट की बजाये जनता से ज्यादा हमदर्दी रखने लगे होंगे…. और अगर हाँ  है तो क्यों?

३. इस आन्दोलन का समय पांच राज्यों में चुनावों के मद्देनज़र तो उचित रणनीति कहा  जा सकता है… लेकिन इस आन्दोलन के लम्बा खिंचने की स्थिति में क्या आई पी एल (IPL) से यह बाधित न होता?  शायद जनमानस सीधे तौर पर क्रिकेट को ज्यादा प्राथमिकता देता (हो सकता है मई गलत साबित होता ). यदि यह इंडिया अगेंस्ट करप्शन के रणनीतिकारों को पता थी तो उसके बाद भी यही समय क्यों ?
-क्या इसलिए कि जनभावनाओं के ज्वार को नियंत्रित     करने  के सभी साधन सरकार के पास उपलब्ध हों. या आन्दोलन उग्र न हो सके.
४. कांग्रेस को प्रत्यक्ष फायदे..
-मुझे तो कांग्रेस का कोई नुकसान समझ नहीं आता… यदि आप यह माने कि इतने राज्यों में कांग्रेस कि हार या कोई खास गणित बिगड़ेगी तो शायद इन राज्यों में कांग्रेस का कोई इतना मजबूत जनाधार है ही नहीं… और है भी तो सहयोगी दलों का… अगर वे कमजोर भी होते हैं तो फायदा किसको … स्पष्ट है कि सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस को.
-ज्यादातर घपले-घोटाले जो की सुप्रीम कोर्ट खुद देख रही थी या तो शिथिल हुए या लगभग बंद  हो गए.. (शायद इससे सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को हुआ.)
-शरद पंवार जैसे दबंग को बैक फुट पर आना  पड़ा …कांग्रेस मजबूत..
-ममता बनर्जी जैसे कद्दावर नेत्री के घर में सेंध…स्वामी अग्निवेश नक्सलवादी जनमानस में बहुत अच्छी पकड़ रखते हैं… नतीजा कांग्रेस मजबूत.
-जब तक यह विधेयक  सिविल सोसाइटी और सरकारी प्रयासों से फलीभूत होगा, इस बिल की ड्राफ्टिंग में २ साल कर्च करके  एक पाक साफ़ छवि के साथ सोनिया जी. राहुल को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर सकती है.. और जनता की सबसे बड़ी उम्मीद यही कानून होगा जो की उस समय उनके चुनावी घोषणा पत्र के सबसे बड़े मुद्दे के रूप में जनाधार बाधा रहा होगा… यदि एक दलीय व्यवस्था में कांग्रेस फिर से इंदिरा जैसी ताकत से शासन में लौट पाए तो क्या हरोसा की इमेर्गेंच्य जैसे हालत क्यों नहीं दोहराए जा सकते?
-स्वामी रामदेव का सबसे बड़ा हथियार मुद्दा (कालाधन और  भ्रष्टाचार ) अब  कांग्रेस के कब्जे में… भाजपा और दुसरे दलों को प्रत्यक्ष कोई फायदा मिलता नहीं दिखाई देता है.
-इस प्रकार के एक प्रदर्शन से अगर सरकार इस स्तर के समझौते कर सकती है तो इस बात का क्या भरोसा कि कोई (व्यक्ति या समूह ) दूसरा मुद्दा पकड़ के  अपना फायदा करवाने कि कोशिश नहीं कर सकेगा, यह तो लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों पर दबाव बना के काम लेना हुआ… लोकतंत्र कि मूल भावना के निहायत ही खिलाफ. अब बताइए कि बराक ओबामा यही काम ५०० करोड़ रुपये खर्च करके करें और आप इस प्रकार के आन्दोलन करके… नतीजा तो उन्ही ५०० प्रतिनिधियों को दबाव में लेकर या खरीद कर अपना काम करवाना ही निकला…. सही या गलत जैसे भी हों वे जनता से ही चुन के आते हैं. और उनके ऊपर दबाव दाल के काम करवाने का मतलब जनादेश का अपमान…
यदि जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों का प्रभाव कम से कमतर करेंगे तो कौन मजबूत होगा… शायद कार्पोरेट लॉबी या ब्यूरोक्रेसी  कार्पोरेट लॉबी  में राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सबसे मजबूत सम्बन्ध या नियंत्रण किसका?… कांग्रेस का.
… (क्या इसीलिए कार्पोरेट का चापलूस मीडिया और चंद रुपयों में बिकने वाले अभिनेता-अभिनेत्री इसी मनसूबे के तहत तो नहीं प्रेरित किये गए. ) (यहाँ पर ध्यान दिया जाए कि ब्यूरोक्रेसी का कोई संगठित स्वरुप न है और न ही हो सकता है.)

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Comments
  1. ankit says:

    क्या वाकई मै हम भ्रष्टाचार को भगाना चाहते हैं ? क्या वाकई में हम अन्ना के साथ है ? क्या हम यह कसम खाने को तैयार है कि हम भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा नहीं बनेंगे ? …….. अगर हां तो शुरूआत सरकार को नहीं हमें करनी होगी….युद्ध अन्ना तो नहीं हमें लड़ना हो…गा…….हमें आज यह कसम खानी होगी की हम अपने किसी भी गलत काम के लिए, किसी भी काम को जल्दी कराने के लिए किसी भी सरकारी व प्राइवेट कर्मचारी को घूस नहीं देगें। कसम खानी होगी की हमारा काम चाहे न हो लेकिन हम किसी को पैसा नहीं देंगे। यदि हम यह नहीं कर पाते हैं तो यकीन मानिए दुनिया का कोई कानून भ्रष्टाचार को दूर नहीं कर सकता। हमारा हर वो कार्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है जिससे हम प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से अपनी सरकार को व अपने मालिक को आर्थिक चोट पहुंचाते हैं।………महान समाज सेवी अन्ना हजारे के साथ मीडिया में आने के लिए आज मैं उन लोगों को भी देख रहा हूं जिनका कार्य कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की नींव पर ही शुरू होता है या खड़ा है। फिर चाहे वह फिल्म स्टार हो, कोई बाबा हो या समाज के किसी भी वर्ग का आदमी हो…….अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं सिर्फ इतना कहने मात्र हम अन्ना के साथी नहीं बन जाते हैं…………………भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जंग तब तक अधूरी रहेगी………जब तक हम अपने अंदर के भ्रष्ट इंसान को खत्म नहीं कर देते………जय हिंद ……..भारत

  2. ये तो तीसरा छल हुआ है देश की जनता के साथ

  3. Sudershan Shukla says:

    Ek safalta se ham pichle 2G, CWG ko nqa bhool jayen. Us me bhi aag jalaye rakhna hai.

  4. HP SINGH Jadoun says:

    अन्ना जी के आमरण अनशन के बाद जो देश भर में उनके समर्थन में जान सैलाब उमड़ा है वह जनता के आक्रोश एवं असन्तोष का प्रतीक है.देश का प्रत्येक नागरिक नेताओं के नित् नय खुलते घोटालों से खुद को ठगा स अनुभव कर रहा है,परन्तु उसे अवश्यकता थी एक ऐसे प्रतिनिधित्व की जो जनता को साथ लेकर चल सके,आन्दोलन की दिशा तय कर सके. सत्ता पर कबिज नेताओं की फौज इस प्रकार कुण्डली मारे बैठी है , उनके विरोध खडे होने वाले व्यक्ति की जुबान को येन केन प्रकारेण दबाते आए हैं परन्तु अन्ना हजारे एक एसी शक्सियत हैं जिनकी अवाज को नजर अन्दाज कर पाना आसान नही है.आपने पहले भी अपने गांव के विकास से लेकर सुचना अधिकार कानून लागू करने तक लम्बा संघर्ष किया है,और सफलता पूर्वक अपना उद्देश्य पूरा किया है.जनता को दिशा दी है संघर्ष करने की. लोकतन्त्र में जनता ही देश की मालिक होती है अतः यदि मालिक ही निष्क्रिय रहेगा तो पहरेदार तो मलाई चाट्ते रहेंगे. आम आदमी यही सोचता रहेगा की मेरे करने से क्या हों जयगा, मेरे आगे बढ्ने से मेरा क्या भला होगा, सिर्फ संकीर्ण सोच की निशानी है.जब देश उन्नति करेगा तो लाभ सभी को मिलेगा. जीवन स्तर सभी का उठेगाअब प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनता है की हजारे साहेब द्वारा शुरु की विचार क्रान्ति एवं आन्दोलन की ज्वाला को बुझने न दें.जब तक की भ्रष्ट नेता जेलों में नहीं पहुँच जाते और देश को साफ सुथरी व्यवस्था नही मिल जाती. यह लडाई हम सबकी लडाई है,यह लडाई हम सबके भले की लडाई है. आशावादी बनिए और देखिये आगे आगे होता है क्या ?

  5. HP SINGH Jadoun says:

    यह अन्ना हजारे के समर्थन में उमड़े जन सैलाब का असर है केंद्र सरकार अब मानने लगी है कि आर्थिक विकास का फायदा सभी वर्गो को नहीं मिल रहा है और इस वजह से ही समाज में उथल-पुथल का माहौल बन रहा है. देश में 81 फीसदी अपराध 16 वर्ष से 21 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं द्वारा किया जाता है। यदि युवा आबादी का सही उपयोग नहीं किया जाए तो यह देश के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली साबित हो सकती है।विकास का फायदा सभी वर्गो को नहीं मिलने की वजह से वहां इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। जब तक समाज से असमानता नहीं खत्म होगी और सभी को समान अवसर नहीं मिलेंगे तब तक यह समस्या यूं ही बरकरार रहेगी।

  6. @Jadoun sir…आशावादी होने का यह मतलब नहीं है कि किसी भी धारा में बहना शुरू कर दिया जाए. यदि हमारा वैचारिक उथलापन बना रहेगा तो हम परम सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकते हैं. इस प्रकार के वैचारिक उथलेपन से हम जनाक्रोश तो उत्पन्न कर सकते हैं परन्तु गंतव्य के रूप में परम सत्य या जन कल्याण को प्राप्त करेंगे या नहीं यह मेरा प्रमुख संशय है.. आक्रोश उत्पन्न कर देना अलग बात है और वैकल्पिक और स्थायी विकल्प तक पहुँचाना अलग बात है. दोनों के तारतम्यता के बिना ऐसी ही परिस्थितियां हो सकती हैं की आप जन कल्याण के लिए काम करिए और दुसरे उसका फायदा अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उठाने लगें. सावधानी में ही सुरक्षा है.

  7. Bhrstachar ponjiwad ki aur sabhi warg samaj ki swabhavik aniwaryata hai. vastava me sosan ka yaha ek aur roop hai. Bhrastachar kisi bhi sosak samaj vyavastha me kabhi khatam nahi kiya ja sakta. Bharstachar ko khatma kewal sosan ki samajik arthik vyavastha ko khatam karke hi kiya ja sakta hai.

  8. Rajat Pandey says:

    कौन सा नेता खुद को राष्ट्र के सामने अन्वेषण करना चाहते हैं कि वह भ्रष्ट हैI कौन सा नेता खुद को राष्ट्र के सामने अन्वेषण करना चाहते हैं कि वह भ्रष्ट है
    अब मैं महसूस कर रहा हूँ कि यह सब राजनेताओं का अपने व्यक्तिगत हितों के लिए पूर्व नियोजित काम था

  9. Kumar Vimal says:

    The whole system in India is based on British Exploitative policy. The Democrarcy has miserably failed in India. A complete overhaul of the system is necesssary. This is a contracted democracy and that is exactly why our representatives enter into contracts of supporting or opposing the Govt.

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