गांधीजी की सेक्स लाइफ: विरोधाभासी ऐतिहासिक विवेचन और विश्व राजनितिक परिदृश्य

Posted: April 17, 2011 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation
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जेड एडम्स और जोसेफ की विरोधाभासी कृतियों के विषय में चिंतन करने के पूर्व इस विवेचन की आवश्यकता है की जेड एडम्स और जोसेफ का अपना चरित्र, इतिहास और विश्वसनीयता का आधार क्या है…और जब हम इन तथ्यों के सत्य को जान लेते हैं तो फिर सत्य  का स्रोत चाहे जो भी हो लेकिन गांधीजी के सेक्स मेनियक होने और देश के बंटवारे में कोई सम्बन्ध हो सकता है या नहीं.. यह विचारणीय है.. सरदार पटेल और  नेहरु ने इन तथ्यों का सहारा लेकर गाँधी को ब्लेकमेल करके देश के विभाजन और अपने प्रधानमंत्री होने का दबाव बनाया हो क्या यह आशंका  विचारणीय नहीं है? यदि हम यह माने की भारत की स्वतंत्रता गाँधी के जीवन का उद्देश्य रही हो तो  गाँधी अपने जीवन उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए नेहरु की ब्लेकमेलिंग के सामने झुक गए हों क्या यह विचारणीय नहीं है? क्या अपने व्यक्तिगत पद लोभ में नेहरु ने गाँधी से यह सौदा किया था? यदि हम दोनों लोगों के कामुक चरित्र   को सामान रूप से देखें और भारतीय जनमानस पर उसके प्रभाव और प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में इसका अवलोकन करें तो क्या आश्चर्य कि  इस विवेचन में हमे गाँधी, नेहरु, गोडसे, हिन्दू महासभा और कांग्रेस के  चरित्र  की सत्यता   भी उजागर हो सके….शायद हमे अतीत से वर्तमान तक   एक निरपेक्ष चिंतन और विवेचन की आवश्यकता है…
विरोधाभासी पुस्तकें  और विश्व राजनितिक परिदृश्य  ..
भारत के राष्ट्रपिता गांधीजी के जीवन पर हो रहे विवेचनो का आधार क्या है? यह किसके उद्देश्यों के प्रभाव में हो रहे हैं.? यदि इन विवेचनो से पुरे देश के मनोभावों पर प्रभाव पड़ता है तो यह निहायत जरुरी हो जाता है की हम इसका सम्पूर्ण विवेचन करें कि जेड एडम्स या जोसेफ लेलिवेल्ड या कोई और किसकी सहमती या संस्तुति या किसके प्रभाव में इस प्रकार के विवेचनों से देश कि राजनैतिक आर्थिक और सामरिक अस्थिरता हो हवा दे रहे हैं. क्या इसके परोक्ष में ब्रिटेन या अमेरिका के हित हैं या लेखक कि स्वतंत्र मानसिक चेतना.? क्या यह अनिवासी भारतीयों के स्वदेश-प्रेम के मनोभावों  को विचलित करने का प्रयास है या विश्व राजनैतिक परिदृश्य में भारतीय प्रतिनिधित्व कि गरिमा को ठेस पहुँचाने अथवा नीचा दिखने का प्रयास?
या यह भारतीय समग्रता को कमजोर करके आर्थिक, राजनैतिक और सामरिक  फायदे उठाने या फिर से गुलामी की जंजीरों में जकड़ने की कूटनीतिक साजिश का एक हिस्सा है?
अंग्रेजों और अंग्रेजी मानसिकता के भारतीय नेतृत्व द्वारा क्रमिक रूप से किये गए इस प्रकार के कुकृत्यों का एक विवरण शायद इस प्रकार के ऐतिहासिक विवेचनो का आधार प्रदान कर सके..
स्वतंत्रता से पूर्व…
1. हमारे वेदों और विशिष्ट वैज्ञानिक कृतियों को पौराणिक कथा या कपोल कल्पित रूप से प्रचारित करना.. मैक्समुलर जैसे बेवकूफों ने जीवन के सर्वश्रेष्ठ अध्ययन को वेदों को निराधार बताया है .
2. भारत देश की सांस्कृतिक विरासतों को अन्धविश्वास बता के निरंतर अवमूल्यन..
3. भारत देश में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का अवस्थापन
4. भारत देश में जातीय और वर्ग विभेद के लिए जाती आधारित जनगणना
5. भारत विभाजन के लिए मुस्लिम-हिन्दू दंगे.
स्वतंत्रता के पश्चात्…
6. ग्लोबलाइजेशन, विनिवेश, और उदारीकरण की विकास के चरम के रूप में स्वीकृति.. यह दुखद है की आज़ादी के बाद भी बिना सम्यक और निरपेक्ष विवेचन के  भारतीय नेतृत्व और जनमानस ने तहे दिल से स्वीकार भी किया है.. आज स्थिति यह है की देश की संपर्क भाषा में अंग्रेजी की प्रधानता है. लोगों की स्वतंत्र  सोच कुंद होने का नतीजा … लघु और सूक्ष्म व्यापारिक उद्योगों में ५०% से अधिक गिरावट.. बेरोजगारी में बढ़ोत्तरी, हताशा.
7. ग्लोबलाइजेशन, विनिवेश, और उदारीकरण द्वारा भ्रष्टाचार का संवर्धन… आज की स्थिति यह है की देश का नेतृत्व अपने व्यक्तिगत हितलाभ के लिए देश का सौदा करने में भी  नहीं हिचकेगा.
8. ग्लोबलाइजेशन, विनिवेश, और उदारीकरण की आड़ में मीडिया द्वारा भारतीय जनमानस को कुंद करने का प्रयास…. मीडिया के बिकाऊ होने और उसमे प्रसारित होने वाले सन्दर्भों से हमारा पश्चिम की और झुकाव ज्यादा बढ़ा है.
9. भारत देश के तटीय क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों  (ध्यान रहे ये ईस्ट इंडिया कम्पनी की सहायक कम्पनियाँ ही हैं..) द्वारा  लाखों हेक्टेयर जमीनों की खरीद और धर्मान्तरण की तेज प्रक्रिया… भारत में जल माध्यम से  सामरिक ठिकाने बनाने के लिए और क्या चाहिए..
 10. देश में विदेशी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए कानून..शिक्षा का उदारीकरण.
11. देश के नागरिकों और ग्रामीण क्षेत्रों की आत्मनिर्भरता कुंद करने के लिए मनरेगा (MNREGA) जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना…(ध्यान रहे  पिछले डेढ़ दशकों में कुल डेढ़ करोड़ लोगों ने कृषि आधारित आजीविका से पलायन किया है.) सरकारों ने कृषि आधारित आयात कई गुना ज्यादा बढाया है.  ध्यान रहे पिछले एक दशक में २ लाख से अधिक स्वाभिमानी किसानो ने आत्महत्या की है.
१2. अनियंत्रित शहरीकरण जिनमे एमार एमजीएफ जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायक कम्पमियों की हिस्सेदारी बहुत चिंतनीय है.. इसी शहरीकरण से कृषि योग्य भूमि में २०% से अधिक  कमी आई है…
भगवान् करे कि मेरा अंदेशा निराधार हो… लेकिन ये संपूर्ण विवेचन तथ्यपरक है और शायद अति गंभीर चेतावनी जैसा है…
एक ही अपेक्षा है…
 तेरा वैभव अमर रहे माँ..हम दिन चार रहे न रहे..!!
कुछ सन्दर्भों का उल्लेख निचे दिया है..
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Comments
  1. Ravish Kumar says:

    Lekh ke kuch tathya sarahaniya hain.. Jaise Nehru aur gandhi ke beech ki hidden deal. Aur, dharmantaran. However, kuch aise vishay hain jispe comments karna jaroori hai. Gandhiji sex maniac they ye vivaad ka vishay hai. Lekhak ne apne thoughts likhe hain lekin unke liye kuch historical facts nahi diya honge shaayad. Waise bhi ek so-called itihash purush ke aise comments bina sahi discussion ke hamein nahi use karne chahiye.

    Second, MNCs ke dwara jameen khareed ek aam baat hai. Agar unhe industries lagaani hai to jameen ki jaroorat to padegi hi. Isme itni badi baat kya hai ?

    Third, rahi baat krishi yogya jameen me kami ki to iske liye badhti jansankhya jyada doshi hain MNCs kam. Jaroorat hai jyada unnat tarike apnaane ki …

  2. प्रिय रवीश, इस समीक्षा को अपने सादर संज्ञान में लेने के लिए आपका हार्दिक आभार…
    इस विषय पर दो पुस्तकें दो अलग-अलग लेखकों और इतिहासकारों के चिंतन और अनुसन्धान का परिणाम कही जा रही हैं.. मैंने सिर्फ उनके मीडिया रिव्यू का विश्लेषण किया है.. कुछ लिंक निचे आप लोगों के विवेचन के लिए दिए हुए हैं..
    जमीन खरीदने की बात सूचना के अधिकार में मिले लूले लंगड़े जवाबो को आधार बना के लिखी है.. जो की आंध्र प्रदेश और केरल के तटीय इलाकों के सम्बन्ध में है. और इस जमीन पर २ वर्ष पूर्व खरीदने के बाद से कोई औद्योगिक कार्य नहीं हुआ है.
    कृषि सम्बन्धी विवेचन के लिए हरित क्रांति से आज तक के कार्यों और कार्य योजनाओं का पूरा ब्यौरा आप सूचना के अधिकार के तहत ले सकते है. आपको स्थिति स्पष्ट हो जाएगी.

  3. ankit says:

    सबसे बड़ी बात यह है की हम लोग अपने को कभी भी सही ही नहीं मन जो बहार वाले कह दे वह ही सही हो जाता है हम लोग पागल टाइप वाले है जो अंग्रेजो ने कह दिया वही कर लिया तभी यह परिणाम है उन लोगो की बात को मानाने का अगर हम लोगो ने अपने विचार से सोचा होता तो आज ये दशा ही नहीं हुई होती उपनिवेशवाद , विनिवेश्वाद , जितने भी वाद है सब आये वह से है और हम लोगो को इन वादों का सिरप पिलाया गया और हम लोगो ने अपना लिया आज वही झेल रहे है और एक शब्द है विकेंद्रीकरण ये भी साला अंग्रेजो की ही उपज है ये चूरन दिए पड़ा है सब भोकाल है बाबा का भोकाल है. आप ही बचा पाओगे बाबा जी

  4. गाँधीजी सेक्सि आदमी थे ये तो उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया ह ओसो कहते ह बिना सेक्स का पूरा मजा लिए कोई संत होही नहीं सकता जन्म जन्म कि यात्रा सेक्स कि यात्रा ह ओर जब आदमी एक दिन सेक्स से उपरांत हो जाता ह सेक्स से ऊपर उत जाता ह तब वो संत होता ह येहि सेक्स से समाधि कि ओर जाना ह कग्रेसियो (खासकर नेहरु ने) भारत कि सता को अपने परिवार के लिए रिजरव कराने के लिए गाँधी का उपयोग किया ओर गाँधी कि मौत के बाद उसे वो बना दिया जिसकी उनकों जरूरत थी,,गाँधी समान्य आदमी थे कोई संत महात्मा नहीं ओर आजादी कि लड़ाई में उनका योगदान शुभास अन्य किसी से अधिक नहीं था किंतु शुभास ओर अन्य कग्रेसि नहीं थे इसलिए गुरिल्ला बनाकर राह गए ओर मोहन करमचंद रस्त्रा पिता हो गए यही इस देश कि विडंबना ह

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