बाल यौन शोषण एक साजिश ? (Child Abuse… a conspiracy?)

Posted: April 20, 2011 in Children and Child Rights, Education, Youths and Nation

“शहर के एक स्कूल में एक छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या हुई. आज भी रूह कांपती है जब अपनी छोटी बहन (स्तुति 13) के बारे में सोचता हूँ. जीविकोपार्जन के लिए शहर के बाहर बसे हुए मेरे जैसे भाई क्या इस भय से मुक्त रहते होंगे? शहर के लोगों की प्रतिरोध की मानसिकता पर तरस आया. कितने संगठनो के नेताओं से, मनोवैज्ञानिकों से, वृद्ध/वरिष्ठ नागरिकों की राय ली तो यही समझ आया की हमारी मानसिकता में गिरावट आई है. सारे संगठनो के इतनी मशक्कत धरने प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय महिला योग ने इस घटना को संज्ञान में लिया (इसे मेरे व्यक्तिगत प्रयास के सन्दर्भ में न लें.). एक वयोवृद्ध कर्मयोगी श्री गणेश शंकर मिश्र ने 1981 की एक घटना का हवाला देते हुए बताया की तब शहर में छेड़छाड़ और अभद्रता की घटनाएँ आम नहीं थी. एक थाने में कुछ पुलिसवालों एक युवती के साथ दुष्कर्म किया. इस घटना के लिए शहर के लोगों ने इस स्तर का प्रतिरोध किया की पुलिस किसी लड़की से नाम तक पूछने में घबराने लगी.

आज समाज का स्तर क्या है और क्यों हैं? क्या यह चिंतनीय नहीं है?इसके दो पहलू हैं… मनोचिकित्सकीय दृष्टिकोण से यदि हम देखें तो पता चलता है की मनुष्य के मष्तिष्क पर शिक्षा, वातावरण और प्रेरकों का प्रत्यक्ष  प्रभाव  उसके चरित्र के रूप में दिखाई देता है. कभी शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण हुआ करता था. तब देश और समाज का चिंतन शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होता था. ग्लोबलाइजेशन, विनिवेश और लिबेरलाइजेशन के इस दौर में जन धारणाएं पश्चिमी मीडिया और शिक्षा के पश्चिमीकरण से बनती हैं. इसी अन्धानुकरण का परिणाम है की हर चौराहे, मेडिकल स्टोर  और यहाँ तक की पान की दूकान पर भी कंडोम (condom) और आई – पिल्स  (i-pills)के विज्ञापन  क्या हमारे नीति निर्माताओं को प्रत्यक्ष उत्प्रेरक के रूप में नज़र नहीं आते? या ये नज़र-अंदाजी  है? या भ्रष्टाचार का चश्मे से उन्हें दिखना बंद हो गया है?

ज्यादातर   लोग मानते हैं कि विदेशी कंपनियों का मतलब तो सिर्फ व्यापारिक हितों तक है..लेकिन जब हम दुनिया के सबसे लोकतंत्रीय परिवेश पर इसके प्रभावों का अध्ययन करें तो क्या यह अंदेशा  गलत  है कि इसके  राजनैतिक या सामरिक उद्देश्य भी हो सकते हैं?

शायद ये एक साजिश है जिसे यौन स्वछंदता   की वकालत करके छुपाया जा रहा है और अल्पज्ञानी जनमानस को गुमराह किया जा रहा है. ताकि देश और समाज के नैतिक मूल्यों का पतन हो और हम पश्चिम के आज्ञाकारी अंध-भक्तों के रूप में ढाले जा सकें.?

….नतीजा व्यक्ति एकाकी होता जा रहा है.. एकाकी के रूप में या तो वह सर्वशक्तिमान दबंग या असहाय आम आदमी.. दोनों ही स्थितियों में सामाजिकता के लिए खतरनाक…

इन्ही साजिशों की वजह से आप देख सकते हैं कि आज की हालत क्या है. छेड़ने से लेकर जमानत करने का कुल खर्च 500 . बीच में अगर थाने में ही मामला निबट जाता है तो भी उतना ही खर्चा. भरे बाज़ार भी अगर वाकया हो तो भी गवाह जुटाने मुश्किल है. कानून इस समस्या में सजा तो दे सकता है ह्रदय परिवर्तन नहीं करवा सकता. मेरे यहाँ कुछ हो जाये तो मेरा पडोसी भी मुह छिपाने लगेगा. अपने बच्चों को हम कितने तहों में छिपा के रखेंगे? बाहर निकलना और समाज के अवयवों से उन्हें भी दो-चार होना ही पड़ता है. आज हमारी सामाजिक परिधियाँ अगर अपने घर तक ही सीमित हो के रह गयीं तो हम उन अवयवों से बच्चों की रक्षा कैसे करेंगे?

कुछ भी करें बच्चों में सामाजिक असुरक्षा का एहसास न होने दें. असुरक्षा की भावना मानसिक विकृतिया पैदा करती हैं. पूर्वाग्रह बनती है.

बेहतर होगा हम अपने सामाजिक दायरे बढ़ाएं. लोगों के साथ शरीक हो उनके सुख दुःख को समझें. यहीं से चेतना का निर्माण शुरू होगा.चेतना के स्तर पर ही  इस सामाजिक विकृति का स्थायी निदान संभव होगा.

भवदीय

राकेश मिश्र

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Comments
  1. शिक्षा, चरित्र और संस्कार की कहानियां गढ़ने वाले ज्यादातर महापुरुष इसका वास्तविक अर्थ और शिक्षा से इसका सम्बन्ध कैसे लगा रहे हैं.. यह विरोधाभासी एवं विचारणीय है. विरोधाभास की वजह हमारी प्राथमिक शिक्षा में जीवन की उत्पत्ति डार्विन, और ओपेरिन ने हमे “योग्यतम की उत्तरजीविता” “सुव्यवस्थित” और “तथाकथित वैज्ञानिक” ढंग से सिखाई है., और जो थोडा बहुत लंगड़ा लूला सनातनी ज्ञान हमे मिल गया वह हमारी मिथ्यभासी धार्मिक ग्रंथों से… (जी हाँ यही वास्तविक स्थिति है धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का.) इसी विरोधाभास की वजह से “यदि योग्यतम ही श्रेष्ठ है तो कोई किसी गरीब की सहायता करने की बजाये किसी शक्तिशाली की दलाली करना ही पसंद करेगा.” ये है भ्रष्टाचार की जड़. ज्यादातर चरित्र और संस्कार का ढोल पीटने वाले महापुरुष यौन क्रियाओं और मनोभावों के दमन को चरित्र की संज्ञा देते हैं.. यह विरोधाभास हमारे लूले लंगड़े सनातनी ज्ञान की शक्ति नगण्य बना देता है. उदहारण कृष्ण की 16800 रानियाँ थीं.. और किशोरावस्था में गोपिकाओं के साथ रास-लीला जैसी कल्पित कथाओं की देन है (कपोल कल्पित इसलिए क्योंकि यदि इसे सत्य मान लिया जाए तो आप अंदाजा लगा सकते हैं…) यदि विद्यार्थी जीवन की सनातनी परिकल्पना “काकचेष्टा, वकोध्यानम, स्वान-निद्रा तथैव च, अल्पहारी गृहस्त्यागी विद्यार्थिनः पञ्च लक्षणं” से विलग विदेशी प्रभावों (ज्यादातर नक़ल या अंधभक्ति ) को ही शिक्षा और विकास का आधार और परिभाषा मान लिया जाये तो मानसिक विरोधाभास उसी ओर जायेगा जिसके प्रेरण और आकर्षण अधिक होगा. ऐसे में संस्कारों की या चरित्र की कल्पना सिर्फ शाब्दिक ही रह जाती है. नतीजा सनातनी संस्कृति में जिस राजनीति का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए विदेशी शक्तिशाली पराक्रम और बाजारीक व्यभिचार से वह राजनीति आज बाजारू वेश्या बन के रह गयी है… ये सिर्फ उदहारण हैं… और इसी पश्चिमीकरण का आप, मै और सभी किसी न किसी रूप में समर्थन कर ही रहे हैं तो क्यों न हम संस्कारिक मूल्यों को भी पश्चिमी तराजू में तौल कर ही निर्धारित करें.

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