युवा स्वामी निगमानंद जी की हत्या : साधु समाज, सरकार, सामाजिक कार्यकर्ता वर्ग और हमारे युवा वर्ग की किंकर्तव्यविमूढ़ता ?

Posted: June 15, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation


 
 गंगा शुद्धिकरण के लिए 115 दिनों से अनशन पर मातृसदन के संत स्वामी निगमानंद सरस्वती का निधन हो गया.
संत निगमानंद के संघर्षों के बारे में जानकारी देते हुए जल बिरादरी के प्रदेश अध्यक्ष श्री अरविन्द कुशवाहा ने बताया की गंगा शुद्धि, अवैध खनन व कुंभ क्षेत्र को पूरी तरह खनन मुक्त करने …की मांग को लेकर मातृ सदन के संत निगमानंद सरस्वती ने अपना अनशन रूपी तप इसी वर्ष 19 फरवरी से आश्रम में ही शुरू कर दिया था. 27 अप्रैल तक उनका अनशन आश्रम में ही जारी रहा. इस दौरान मातृ सदन के आंदोलन को देशभर से भी जनसमर्थन भी मिलता रहा. हालत बिगडऩे पर 27 अप्रैल को निगमानंद को जांच के बाद जिला प्रशासन ने हरमिलाप राजमीय जिला चिकित्सालय में भर्ती करा दिया.इसी बीच 30 अप्रैल को चिकित्सालय में ही निगमानंद को 30 अप्रैल को ही किसी नर्स द्वारा जहर दिए जाने का मामला खूब गरमाया. जिसकी पुष्टि बाद में जौलीग्रांट हिमालयन इंस्टीट्यूट से भी हो गई थी. निगमानंद के दो मई को कोमा में चले जाने पर जौलीग्रांट स्थित हिमालयन चिकित्सालय मे लिए रेफर कर दिया गया. तभी से वह कोमा में चल रहे थे. सोमवार दोपहर करीब दो बजे स्वामी निगमानन्द ने चिकित्सालय में ही अंतिम सांस ली. बताया गया कि निगमानंद खनन मामले में शासनादेश के विपरीत न्यायालय से हुए स्थगनादेश को लेकर भी खफा थे.उत्तरांचल की प्रदेश सरकार की उनके प्रति यह संवेदनहीनता अत्यंत निंदनीय है.
बैठक में अरविन्द त्रिपाठी संयोजक, जल बिरादरी, कानपुर ने कहा की एक तरफ उत्तरांचल की भाजपा सरकार और देश भर का मीडिया बाबा रामदेव के अनशन को हाथो हाथ लेती है.दूसरी तरफ संत निगमानन्द का अनशन किसी प्रकार तवज्जो नहीं पाता है. एक तरफ तो भाजपा स्पर्श गंगा जैसे कार्यक्रम करती है और दूसरी तरफ गंगा की भूमि पर अवैध खनन और निर्माण के कामों में लिप्त है.भारतीय सभ्यता और संस्कृति की हितरक्षक बनी भारतीय जनता पार्टी की ये दोरंगी चाल अब संत समाज को भी समझ आ गया है. ये पूर्व में भी कई बार इसी तरह से उजागर हुआ है. हिन्दू हितों ही नहीं सम्पूर्ण समाज और देश की अस्मिता गंगा के वजूद पर ही कायम है. इसे अब ठीक से जान-समझ लेना चाहिए.हाल में मनाये गए गंगा संरक्षण सप्ताह के बाद हुयी इस घटना ने देश भर में गंगा प्रेमी समाज को क्षुब्ध किया है.
जब यह पता लगता है कि मात्र 31 वर्ष के युवा स्वामीजी के मृत्यु अनशन कि वजह से नहीं बल्कि ज़हर दिए जाने से हुई है तो निश्चय ही यह सामाजिक सुरक्षा  कि ठेकेदार सरकार और सरकारी ठेकेदारों का किया हुआ जघन्य अपराध जान पड़ता है.
क्या इस घटना को  जीवनदायिनी गंगा के पुजारी जल सरंक्षण कार्यकर्ता, साधु समाज, सामाजिक कार्यकर्त्ता और हमारा युवा वर्ग  महज एक खबर मानता है या इस शहादत को सम्मान देने के लिए जमीन पर भी उतरने के लिए तैयार है?
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Comments
  1. Vikas Rana says:

    Its a loss of humanity…

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