इस आंदोलनकारी लोकपाल (proposed by India Against Corruption) में क्यों हैं कुछ खास तंत्रों को छूट?

Posted: August 21, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

अन्ना हजारे अपने लोकपाल को देश में उसी रूप से लागू करवाने के लिए अनशन कर रहें हैं जिस रूप या मसौदे के साथ उनके साथियों की टीम ने इसे बनाया है. इस लोकपाल बिल में जहां पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक और दफ्तरों से लेकर न्यायपालिका तक सबको इस दायरे में लाने की बात कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है. वहीं इस पर एक प्रश्न उठता है कि इन सबके बीच अन्ना के लोकपाल में एनजीओ, कारपोरेट निजी क्षेत्र और मीडिया को क्यों बाहर रखा गया है? लोकतंत्र में सबसे बड़ी अवधारणा विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की होती है. यानी जब लोकतंत्र के यह सारे तंत्र अन्ना के“जनलोकपाल” के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे, उस समय यह तीन यानी एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया ही किस हैसियत से हाथ खोलकर अछूती रहेगी?

अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद जब सिविल सोसाइटी यानी जनसाधारण के प्रतिनिधि चुनने की बात आई तो अन्ना के पांच साथियों ने स्वयं को ही चुना. यानी एक तरह से लोग जबरदस्ती भारत की जनता के मनमाने प्रतिनिधि हो गए. इन लोगो ने सरकार के साथ बैठके की और लोकपाल को अंतिम रूप देने की तैयारी की खबरे आम हो गई. जब सब कुछ चल रहा था, तभी अचानक प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाये जाने के लिए सरकार और तथाकथित सिविल सोसाइटी के सदस्यों के बीच खींच तान शुरू हो गई. बहस तो न्यायपालिका के लोकपाल के दायरे में लाए जाने की बात को भी लेकर उठी थी लेकिन फिर सारा मामला प्रधानमंत्री को लोकपाल यानी टीम अन्ना वाले “जनलोकपाल” के दायरे में लाये जाने पर आकर रुक गई. टीम अन्ना के लोग इस बात पर हल्ला मचाने लगे की हम प्रधानमन्त्री को लोकपाल के दायरे में जरूर लायेंगे. वह लोग बताने लगे की अगर प्रधानमन्त्री इस दायरे में नहीं आये तो भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता. यानी सारा बवाल पूरे लोकतंत्र के हर हिस्से को लोकपाल के सामने झुकाने के मुद्दे पर फ़ैल गया.

अब सवाल यह उठता है कि जब जनतंत्र में विधाईका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी मूल व्यवस्था टीम अन्ना के लोकपाल के सामने झुक सकती है. तब इस लोकपाल के दायरे से इन तीन तत्वों एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को दूर क्यों रखा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि जब देश के सारे न्यूज़ चैनल इस टीम अन्ना के आंदोलन के भोंपू बनकर हर बात की कवरेज कर रहें हैं. तब उन लोगो ने इस प्रश्न को क्यों नहीं चर्चा या परिचर्चा में उठाया है. या इस बात को जानबूझ बाहर नहीं आने देने के पीछे क्या कुछ निहित स्वार्थ हो सकते हैं?

अगर अन्ना के इस अनशन को शुरू से देखा जाए तो यह पूरा आंदोलन ही अपनी-अपनी एनजीओ चलाने वाले लोगों ने प्रस्तावित किया है. साथ ही इसके जो भी मुख्य चेहरे हैं वह एनजीओ के ही कर्ता-धर्ता हैं. यानी इस सारे हल्ले के जन्म दाता. इस अनशन या आंदोलन जो भी कहा जाए उसको जितने भव्य और आधुनिक रूप से चलाया जा रहा है उसके लिए पैसे दान के रूप में विभिन्न कंपनियों के द्वारा मिल रहें हैं. जिंदल और जे.के. जैसे बड़े व्यापारिक घराने और सीआईआई तथा फिक्की जैसे बड़े व्यापारिक संगठन खुले हाथ से पैसे दान के रूप में इस पूरे कार्यक्रम को दे रहे हैं. इन पैसों से अन्ना के कार्यक्रम स्थल पर पंडाल, डीजे म्यूजिक और साथं ही अन्ना और उनके साथियों के पीने के लिए हाई क्लास ग्लूकोज और सेलाइन वाटर का इंतज़ाम हो रहा है. कारपोरेट सेक्टर जो अधिकतर स्वयं भ्रष्टाचार का पोषक है और पुराने मामलों को छोडकर केवल अभी हाल में ही हुए टू जी घोटाले को देखें तो पता चलेगा इसमें फंसने वाले अधिकतर लोग और कंपनियां कारपोरेट सेक्टर के ही थे. यानी भ्रष्ट तंत्र के लोग भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान को चलाने के लिए पैसे दे रहे हैं, बात कुछ समझ में नहीं बैठती है कि ऐसा वह क्यों करेंगे. अब अगर मीडिया को देखा जाए तो वह भी आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह समाचार भ्रष्टाचार से पीड़ित दिखती है. किसी भी दर्शक को अन्ना-अन्ना के जाप के अलावा मीडिया ना तो कुछ भी दिखाना चाहती है और ना ही मनवाना. मीडिया के हर रिपोर्टर और प्रस्तुतिकर्ता की कोशिश यही है की हर दर्शक के मन में केवल अन्ना भर दिया जाए. आज हर चैनल और रिपोर्टर खबर की जगह अन्ना के कार्यकर्ता बनकर प्रचार प्रसार कर रहा है. इस तरह मीडिया केवल इस टीम अन्ना के आंदोलन के प्रचार प्रसार में जी जान से जुटी है.

इस प्रकार अगर देखा जाए तो टीम अन्ना के आंदोलन को इतना बड़ा करने में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया का ही सबसे अहम रोल है. सिविल सोसाइटी के सदस्य और अन्ना के अन्य साथी एनजीओ के कर्ता धर्ता हैं और अब कारपोरेट और मीडिया के सहारे यह लोग देश में इतने बड़े कद के हो गए हैं की यह लोग प्रधानमंत्री और देश की चुनी सरकार के साथ संसद को भी किनारा करते हुए गैर संवैधानिक तरीके अपने कानून को लादना चाहते हैं. तो ऐसे में यह सवाल उठाना आवश्यक है कि क्या अन्ना के इस लोकपाल अनशन में एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया के योगदान के मुआवजे में उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है?

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में कानून बनाने की संसदीय और संवैधनिक प्रक्रिया को एक तथाकथित जन उन्माद के सामने ध्वस्त कर देना क्या उचित होगा. वह भी तब जब इन लोगो की मंशा केवल लोकतंत्र को बंधक बनाने की हो. अगर इन लोगो की मंशा साफ़ होती तो इन लोगो ने केवल अपने समर्थन के नाते एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया जैसे तत्वों को बाहर नहीं किया होता.

आज यह अनशन वाले लोग अपने को इतना बड़ा मान चुके हैं की चुनी हुई सरकारों के औचित्य पर ही प्रश्न उठा देते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के भाषण के मंच से एक एनजीओ वाले आंदोलन के कार्यकर्ता कहते हैं “पटना के गलियों से आवाज़ आती है भैंस, बकरी चराने वाले सरकार चला रहे हैं”, और इसी तरह अन्य लोग जगह-जगह कहते हैं की यहाँ तो चुनाव पैसे से जीते जाते हैं. इस तरह के शब्द क्या लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? क्या आज कमजोर वर्ग के लोगों को सरकार में बैठने का हक नहीं है? क्या इनकी नज़र में हर आम भारतीय वोटर घूसखोर है?

अन्ना के इस आंदोलन में मिल रहे जनतंत्र को पंगु बनाने के समर्थन पर सिर्फ एक सवाल उठता है. जब लोकतंत्र के सारे अंग लोकपाल के सामने झुक सकते हैं, तो क्यों केवल एनजीओ, कारपोरेट और मीडिया को ही इन आदोलन वालों ने दूर रखा है? क्या कुछ छुपा हुआ मुद्दा भी है क्या इसके पीछे??

 

साभार : हरिशंकर शाही, बहराइच

हरिशंकर शाही उन  जाने माने पत्रकारों में से हैं जो कलम को सच के सिपाही के तौर पर ही प्रयोग करने में ही विश्वास रखते हैं.
Advertisements
Comments
  1. Well i am not against anna but i dont support him as he had not made clear to people what he wants in bill. he is just saying about anti corruption bill and prime minister should come under this bill. i dont say anna is fighting for wrong thing but anna should make all the demands in front of Indian public clear what he is demanding OFFICIALY, each and every point what he is demanding and what is the responce of government.

    Second thing as in blog said media should also come in the limits of this bill as these days (I FEEL So) media is creating WRONG PERCEPTION of people in many recent news whether it is arushi hatya kand, or car without driver and many more…
    I cant comment on the role of NGOs and corporates involvent in this bill without any good debate on this topic in their involvement

    Third and last i want prime minister and president to be out of yhe limits of this bill although case can be run on them when they leave their post.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s