क्या भ्रष्ट टीम (India Against Corruption) के सहारे भ्रष्टाचार से जीत पाएंगे अन्ना!

Posted: August 22, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

अन्ना हजारे द्वारा चलाये जा रहे इस तथाकथित राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में उनकी टीम में जो लोग हैं उन्हें इस देश के कितने लोग जानते हैं? मेरा मानना है कि वे सभी उतना ही जानते हैं जितना समाचारपत्र या टीवी पर दिखाए जाते हैं या दिखाए गए हैं। दुर्भाग्य यह है कि आज समाचार पत्र या टीवी में जो भी संवाददाता इस ‘पुनीत’ कार्य में अपना सहयोग देकर देश के चप्पे-चप्पे में अन्ना और उनकी टीम की आवाज को बुलंद करने का ‘अथक प्रयास’ कर रहे है वे स्वयं इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इन टीम मेम्बरानों की असली पहचान क्या है और वह कौन सी ताक़त है जो इनके पीछे खड़ी है?
एक पत्रकार होने के नाते मैं अपने इन पत्रकारों बधुओं की ‘विवशता’ को भी महसूस कर सकता हूँ लेकिन जहाँ लोकमत का सवाल है इस बात को कोई भी नहीं नकार सकता है कि संवाद बनाने और प्रस्तुत करने के बीच कोई भी अपना वक्त उस समाचार से संबंधित ‘गृह कार्य’ में नहीं लगाते। यह उनकी मज़बूरी भी है, आखिर ‘दौड़ का जमाना है’, जो पहले लोगों तक पहुंचा वही ‘सिकंदर’। इस दौड़ में भले ही समाज में विद्रोह हों जाए।
अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने दो दिनों पहले साफ़ और स्पष्ट जबाब देते हुए लोकपाल बिल के दायरे में गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) को  भी शामिल  किए  जाने  की मांग को  एक  झटके  में  ख़ारिज  कर  दिया था। साथ  ही, अन्ना  की इस टीम के मेम्बरान  ने  विशेषकर जो NGO सरकार से पैसा नहीं लेते हैं उनको किसी भी कीमत में शामिल नहीं करने का एलान भी किया। क्यों भाई?
ग्राम प्रधान से लेकर देश के प्रधान तक सभी को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की जबरदस्ती और जिद्द पर अड़ी अन्ना टीम NGO को इस दायरे में लाने के खिलाफ शायद इसीलिए है,क्योंकि अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरण बेदी, संदीप पाण्डे और अखिल गोगोई द्वारा चलाये जाने वाले NGO पूर्णरूप से दुधारू गायें है, वह भी ऊँची नस्ल की.. जिन्हें जितना दुहो, उतना ही दूध देती हैं और ‘देसी’ चारे की भी परवाह नहीं क्योकि ‘चारा’ सीधा ‘विदेशों’ से आता है।
कुछ साल पूर्व जब लोगों को लोकपाल का नामों निशान तक याद नहीं था और सूचना अधिकार अधिनियम भी लोगों के बीच उतना ‘उत्तेजक’ नहीं बना था, अरविन्द केजरीवाल ने अपने एक संबंधी (जो उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो में शीर्षस्थ पदाधिकारी थे और बाद में नेहरु संग्रहालय के अधिकारी बने) के पद का भरपूर लाभ उठाकर ‘प्राप्त सूचनाओं’ से खुद को और अपनी संस्था की नींव को मजबूत किया. उन दिनों अन्ना हजारे भी इतने ‘सक्रिय’ नहीं थे।
सूचना अधिकार विभाग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इस अधिकार के तहत प्राप्त सूचनाओं का दुरूपयोग ज्यादा हुआ है और इस दिशा में कार्रर्वाई भी चल रही है ताकि यह आश्वस्त किया जाये कि किन प्राप्त सूचनाओं को किन-किन माध्यमों से इस्तेमाल किया गया है.
अग्निवेश, जो जंतर मंतर स्थित अपने कार्यालय सह आवास से 3-4 NGO चलाये हैं, देशी और विदेशी संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं, भारत को विदेशी बाज़ार में ‘सबसे गरीब देश” और यहाँ के आवाम  को सबसे “निरीह प्राणी” बता कर इन सब मेम्बरान को करोड़ों रुपये का चंदा विदेशों से ही मिलता है। एन्फोर्समेंट एजेंसियां भी इस बारे में जांच की दिशा में कार्यरत हैं।
प्रशांत भूषण के बारे में सभी लोग जानते हैं. दिल्ली की अदालतों में इन्हें पीआईएल बेबी के नाम से जाना जाता है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दिल्ली उच्च न्यायलय द्वारा बहुत सारे मामलों में इनके पीआईएल की बदौलत और जस्टिस राजेंद्र सच्चर के सहयोग के कारण अपराधी को सजा मिली है, लेकिन न्यायालय ने यह भी फटकारा था कि ‘फिल्म्सी ग्राउंड’ पर पीआईएल दाखिल करना और कोर्ट का समय बर्बाद करने से दंड भी मिल सकता है।
किरण बेदी की संस्था नवज्योति कम से कम दिल्ली के लोगों से छिपी नहीं है. कहा जाता है कि 1984 के दंगो के बाद दिल्ली पुलिस के दो अफसरान बढ़-चढ़ कर मानव सेवा में आये, किरण बेदी भी एक थी. नवज्योति जनकपुरी से शुरू हुई। दंगे के पश्चात दिल्ली पुलिस के इन अफसरान ने डीडीए के 12 फ्लैट्स पर जबरन कब्ज़ा किया। आठ फ्लैट आमोद कंठ के ‘प्रयास’ ने दबोचे और चार किरण बेदी की नवज्योति ने। यह सभी फ्लैट्स आज भी इनके पास हैं. यह भी कहा जाता है कि नवज्योति एक विदेशी उच्चायोग की मदद से दिल्ली के यमुना पुश्ता इलाके में काम करने के लिए नवज्योति को पांच करोड़ से भी ज्यादा रकम दी गई लेकिन काम बीच में बंद कर दिया गया और सैकड़ों कर्मियों को सड़क पर धकेल दिया गया बेरोजगार कर के।  यह भी कहा जाता है कि श्रीमती बेदी ने अपनी बेटी को नवज्योति का एक निदेशक भी बना डाला बिना किसी कागजी कार्रवाई के।
बेदी जब तिहाड़ जेल में अधिकारी थी तब दिल्ली के उप राज्यपाल विजय कपूर ने इन्हें इनके किसी ‘गलत फैसले’ के कारण  पदच्युत कर दिया था। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि बेदी बदले की भावना से ग्रसित हैं और सरकार तथा गृह मंत्रालय को अपमानित करने के लिए कोई भी कसर नहीं छोडती हैं। संभवतः, दिल्ली पुलिस का  कमिश्नर ना बनाना इसके पीछे मुख्य कारण है।
जहाँ  तक सवाल है सरकार से सहायता प्राप्त करने और नहीं प्राप्त करने वाले NGO का, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के विदेश प्रभाग की FCRA Wing के दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2008-09 तक देश में 20,088 गैर-सरकारी संस्थाएं काम करती थीं जिन्हें विदेशी सहायता प्राप्त करने की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा चुकी थी।
इन्हीं दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष2006-07, 2007-08, 2008-09 के दौरान इन NGO’s को विदेशी सहायता के रुप में 31473.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त देश में लगभग 33 लाख NGO’s कार्यरत हैं। इनमें से अधिकांश NGO भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के परिजनों, परिचितों और उनके दलालों के हैं।
तहकीकात से यह भी स्पष्ट है कि दिल्ली पुलिस से अवकाश प्राप्त लगभग सभी शीर्षस्थ अधिकारी गण, विशेषकर कमिश्नर और उनसे नीचे के आला अधिकारी (जिसमें बेदी को भी अलग नहीं किया जा सकता है) दिल्ली में बड़े पैमाने पर संस्थाएं चलाते हैं। यह भी कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस द्वारा किये जाने वाले समस्त शोध/अनुसन्धान का कार्य, यहाँ तक कि अपराधियों को पकड़ने का कार्य भी इन ‘तथाकथित’ समाज सेवियों को दिया जाता है जो दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय से मोटी रकम भी वसूलते हैं।
केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के अतिरिक्त देश के सभी राज्यों की सरकारों द्वारा जन कल्याण हेतु इन NGO’s को आर्थिक मदद दी जाती है।एक अनुमान के अनुसार इन NGO’s को प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 50,000 करोड़ रुपये देशी विदेशी सहायता के रुप में प्राप्त होते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पिछले एक दशक में इन NGO’s को 5-6 लाख करोड़ की आर्थिक मदद मिली। ताज्जुब की बात यह है कि इतनी बड़ी रकम कब..? कहां..?  कैसे..? और किस पर..? खर्च कर दी गई, इसकी कोई जानकारी उस जनता को नहीं दी जाती जिसके कल्याण के लिए, जिसके उत्थान के लिए विदेशी संस्थानों और देश की सरकारों द्वारा इन NGO’s को आर्थिक मदद दी जाती है। इसका विवरण केवल भ्रष्ट NGO संचालकों, भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और भ्रष्ट बाबुओं की जेबों तक सिमट कर रह जाता है।
साभार : मुकेश  भारतीय
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Comments
  1. Vivek says:

    Bhai tu to bada kabil hai..Tune ye sab kahan se collect kiya.kya tune bhi apne kisi relative se information collect ki hai…Saale tere ko Blame lagane se pahle sochna chahey tha. Dhandha chmkane ka tera acha idea hai.to bahenchod tu bhi apni schhai sadak pe kahde hoker 50 logon ko collect kar le…Maa kasam teri gulami karunga haramjade deshdrohi.

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