अधिकांशतः अंग्रेजी अखबारों में गांव-देहात को सिर्फ एक फीसदी स्पेस मिलता है

Posted: September 14, 2011 in Children and Child Rights, Education, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

साभार: भूमिका राय भड़ास4मीडिया

मीडिया का मतलब सीधे सीधे तो यही होता है कि वह गरीब, अविकसित, आम जन की बात करे, उनके हित को ध्यान में रखते हुए काम करे. भारत के संदर्भ में कहें तो मीडिया को गांवों और वहां के निवासियों की बात को प्रमुखता से उठाना चाहिए. शासन की नीतियों का मकसद जिस आखिरी आदमी को लाभ पहुंचाना होता है, वह आखिरी आदमी गांव में ही रहता है. वो कहते भी हैं, आज भी असली भारत गांवों में ही बसता है, शहरों में नहीं.

अगर कि‍सी को भारत के विकास की वास्‍तवि‍क तस्‍वीर देखनी है तो गांवों में जाकर देखना होगा. तमाम तरह की तरक्‍की के बावजूद हम गांवों और खेती को आगे बढ़ाए बिना पूरे देश का भला नहीं कर सकते. ऐसा इसलिए क्योंकि आज भी भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का एक बहुत बड़ा हि‍स्‍सा (लगभग 60 प्रति‍शत) कृषि‍ पर ही निर्भर करता है. हर तीन में से दो भारतीय ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं. पर इन गांवों और गांववालों के दुख-सुख को मीडिया ने बेहद उपेक्षित कर रखा है. ग्रामीण क्षेत्र के प्रति मीडिया का यह रवैया निराश तो करता है पर यह भी बताता है कि किस तरह अब नीतियां भरे पाकेट और पेट वालों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है और हर चीज के पीछे पूंजी प्रमुख मकसद बनता जा रहा है. जब पूंजी प्राथमिक एजेंडे में हो तो वहां नैतिकता, गांव-देहात, आम आदमी जैसी बातें पीछे चली जाती हैं. यही मीडिया के साथ हो रहा है.

सारे बड़े मीडिया हाउसों के एजेंडे में शहरी भरेपूरे लोगों को अपने से जोड़ना होता है ताकि वह विज्ञापनदाताओं को बता सके कि देखो, हमारे पाठक के पास कितनी अच्छी क्रयशक्ति है, इसलिए विज्ञापन हमें दो. इसीलिए गांवों के जो एडिशन निकलते हैं, वे महंगे होते हैं क्योंकि मीडिया मालिकों का मानना है कि गांवों को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन कम मिलते हैं इसलिए घाटा पूरा करने के लिए उन्हें दाम ज्यादा रखना पड़ता है. सोचिए, जिन गांवों में गरीब बसते हैं, उन गांवों के लिए महंगा अखबार और जिन शहरों में भरे पूरे पेट वाले अच्छे खासे मालदार लोग रहते हैं वहां अखबार बेहद सस्ता और कई बार तो फ्री में बांटा जाता है, स्कीम के साथ. देश में सबसे अधि‍क पढ़े जाने और पहुंच रखने वाले छ: शीर्ष समाचार पत्र (तीन अंग्रेजी व तीन हि‍न्‍दी) की पड़ताल एक संस्था ने की. पाया गया कि ये अखबार भी भेदभाव में बराबर के हि‍स्‍सेदार हैं. इन समाचार पत्रों में छपने वाली कुल खबर का लगभग नगण्‍य-सा हि‍स्‍सा ही ऐसा होता है जो ग्रामीण समस्‍याओं, मुद्दों और उनकी आवश्‍यकताओं को उजागर करता है.

वर्तमान में सीएसडीएस से जुड़े पत्रकार वि‍पुल मुग्‍दल ने इसी तथ्‍य को उजागर करने के उद्देश्‍य से टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या, हि‍न्‍दुस्‍तान टाइम्‍स, द हि‍न्‍दू, दैनि‍क जागरण, दैनि‍क भाष्‍कर और अमर उजाला जैसे शीर्ष अखबारों के आधार पर अध्‍ययन के लि‍ए कुल 48 मुद्दों का चयन कि‍या. सर्वे के अनुसार देश में सबसे अधि‍क बि‍कने वाले ये छ: समाचार पत्र अपने कुल अखबार का दो प्रति‍शत भाग जहां प्रमुख संस्‍करण के सम्‍पादकीय हि‍स्‍से के लि‍ए रखते हैं वहीं दो-ति‍हाई हि‍स्‍से पर देश से जुड़े मुद्दे जगह पाते हैं. लेकि‍न आपको जानकर दुख के साथ अचंभा भी होगा कि‍ प्रति‍दि‍न सौ से दो सौ खबरें छापने वाले इन अखबारों में महज दो से तीन खबरें ही ऐसी होती हैं जो गांव-देहात से जुड़ी हों.

छपी खबरों का एक बहुत बड़ा भाग लगभग 36 प्रति‍शत अपराध, राजनीति‍क हिंसा (नक्‍सल से संबंधि‍त), दुर्घटनाओं, आपदाओं और अन्‍य मुद्दों के लि‍ए होता है लेकि‍न ग्रामीण क्षेत्र के वि‍षय दो-तीन खबरों तक ही सि‍मट कर रह जाते हैं. समाचार पत्रों के इस भेदभाव का एक कारण तो बि‍ल्‍कुल स्‍पष्‍ट है कि‍ समाचार पत्र से जुड़े तमाम लोगो का एक बहुत बड़ा भाग जैसे; पाठक, वि‍ज्ञापनदाता, रि‍पोर्टर्स शहरी बैकग्राउंड से आते हैं. साथ ही इन समाचार पत्रों के लि‍ए केन्‍द्र में शहर का

पढ़ा-लि‍खा वर्ग ही आता है जि‍सके लि‍ए ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे  बहुत सीमि‍त हैं और वो उस पर बहुत ध्‍यान नहीं देता है. और कहीं ना कहीं यही कारण हैं कि‍ ना तो ग्रामीण क्षेत्रों की समस्‍याएं सामने आ पाती है और ना तो उनका हल ही नि‍कल पाता है.

भूमिका राय

भूमिका राय का विश्लेषण. पत्रकारिता शिक्षा ले रहीं भूमिका इन दिनों आजाद पत्रकार और हिंदी ब्लागर के बतौर सक्रिय हैं. उनके ब्लाग का नाम बतकुचनी है. भूमिका से संपर्क neha.yalka@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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