अन्ना, मीडिया और कॉरपोरेट्स की दुरभिसंधि

Posted: November 3, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation
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अमलेन्दु उपाध्याय

Courtesy : http://hastakshep.com/?p=321

प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया के अध्यक्ष एवं सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर न्यूज चैनल्स- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी काउंसिल के दायरे में लाने तथा उसे मीडिया का लाइसेंस रद्द करने और सरकारी विज्ञापन बंद करने का अधिकार देने की मांग की है। एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में न्यायमूर्ति काटजू ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रेस काउंसिल के दायरे में लाना चाहिए। उन्होंने प्रेस काउंसिल का नाम बदलकर मीडिया काउंसिल करने की सलाह देते हुए कहा है कि उसे ज्यादा अधिकार देने चाहिए। मीडिया के चरित्र और उसकी बदलती भूमिका को लेकर राजनैतिक हलकों और आम जनमानस में भी कुछ इसी तरह के विचार पनप रहे हैं कि मीडिया पर लगाम कसे जाने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति काटजू का यह बयान ठीक ऐसे समय आया है जब देश में एक सुहाना संयोग बन रहा है। अगस्त माह के दूसरे पखवारे में भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे तथाकथित जनांदोलन की जबर्दस्त रिपोर्टिंग कर रहा हमारा महान मीडिया अब टीम अन्ना के (कु) कर्मों के बचाव में भी उसी तरह गंभीरता के साथ मोर्चा ले रहा है जिस गंभीरता के साथ उसने तथाकथित दूसरी अगस्त क्रंाति के समय लिया था। इस बीच एक बड़े पत्रकार का दर्द है कि अधिकांश विपक्षी दल भी कम से कम इस एक मुद्दे पर तो सरकार के साथ हैं कि मीडिया पर लगाम लगाने की जरूरत है।

ऐसा नाहक नहीं है। मीडिया के नायकों की असल चिंताएं समझी जा सकती हैं। दरअसल मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर अन्ना आंदोलन और टीम अन्ना के लोगों के बचाव में उतरे मीडियाकर्मी आमजन के पक्षधर नहीं हैं। ये वही मीडिया घराने मीडिया की स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे हैं जिन्हें मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करके अपने पत्रकारों को उनकी मेहनत का वाजिब मूल्य देने में भी पेट में दर्द हो रहा है। दरअसल ये मीडियाकर्मी फार्मूला वन रेस के समर्थक हैं जिसका विश्वास और पहुंच ‘इंडिया’ तक है और जिसे ‘भारत’ से चिढ़ है। यही कारण है कि जब दिल्ली की सड़कों पर पांच लाख मजदूर अपनी मांगों के समर्थन में उतरता है तो यही मीडियाकर्मी चिल्लाते हैं कि रास्ते जाम हो गए दिल्लीवासियों का जीना मुहाल हो गया लेकिन जब रामलीला मैदान में 12 दिनों तक कुछ हजार सफेदपोश ऊधम मचाते हैं तो उन्हें यह जनांदोलन दिखाई देता है और नौएडा में किसानों की जमीनें हड़प कर आयोजित कराई जाने वाली फार्मूला वन रेस इन्हें राष्ट्र का गौरव प्रतीत होती है। क्या टीम अन्ना के साथ इस मीडिया के खड़े होने का यह एक बड़ा कारण नहीं है कि ”इंडिया अगेंस्ट करप्शन“ के साथ में भारत नहीं है? जी हां क्योंकि भारत, नंगों भूखों का भारत है, 20 रूपए रोज़ पर गुजारा करने वालों का भारत है उसके पास भ्रष्टाचार को चढ़ावा देने के लिए पैसा नहीं है। आखिर वही मीडिया बिरादरी अन्ना टीम के साथ क्यों खड़ी है जो परमाणु करार पर मनमोहन सिंह के साथ खड़ी थी? या महंगाई के विरोध में समूचे विपक्ष के भारत बंद पर उसे तकलीफ होती है? दरअसल यह भारत बनाम इंडिया की लड़ाई है। इस लड़ाई में एक करोड़ सालाना का पैकेज पाने वाले हमारे तथाकथित बड़े पत्रकार बीस रूपए रोज़ पर गुजारा करने आम भारतीय का दर्द कैसे समझ सकते हैं?

किरन बेदी और केजरीवाल के भ्रष्टाचार के मामले जब सामने आए तो यही मीडिया उनके बचाव में सामने आया और कहा गया कि क्या टीम अन्ना के सदस्यों पर हमले से इस जनांदोलन को दबाया जा सकेगा ? पहली बात तो यह कि ये तथाकथित जनांदोलन दिल्ली के इंडिया गेट और गाजियाबाद के वैशाली, कौशाम्बी में था और बुद्धू बक्से पर था, लेकिन खेत खलिहान में कहाँ था? जबकि असली हिन्दुस्तान खेत खलिहान में ही बस्ता है।

किरन बेदी का भ्रष्टाचार पकड़े जाने पर उन्होंने सफाई दी थी कि यह उनका बचत का तरीका है और मीडिया ने उसे खूब प्रचारित किया। अगर ऐसा ही है तो कलमाडी, येदियुरूप्पा और राजा पर भी जो गलत करने का इल्जाम है वह भी तो उनका बचत करने का तरीका हो सकता है। जो कृत्य किरण बेदी के लिए ‘बचत’ का नैतिक तरीका है वही कृत्य किसी राजनेता के लिए भ्रष्टाचार कैसे हो गया? मान लीजिए अगर किसी अन्य सरकारी कर्मचारी ने भी नौकरी में रहते हुए ऐसा ही बचत का तरीका अपनाया होता तो या तो वह सलाखों के पीछे होता या फिर कम से कम जांच और निलंबन तो झेल ही रहा होता लेकिन ये टीम अन्ना का विशेषाधिकार है कि वह इस तरह ‘बचत’ करे और भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ लड़े और मीडिया का परम कत्र्तव्य है कि वह टीम अन्ना और तथाकथित दूसरे महात्मा गांधी की रक्षा करे! यह याद रखा जाना चाहिए कि जिस चारा घोटाले के आरोप में लालू प्रसाद यादव जेल गए और उनकी सत्ता गई वह भी इसी तरह फर्जी बिलों के सहारे ‘बचत’ का ही मामला था। लेकिन मीडिया की मेहरबानी से अभी तक आरोप तय न हो पाने के बावजूद लालू प्रसाद यादव खलनायक हैं और किरन बेदी राष्ट्रभक्त समाजसेवी!

महत्वपूर्ण बात यह है कि भ्रष्टाचार केवल आर्थिक लेन देन का ही मामला नहीं होता है बल्कि किसी भी गलत तरीके से भाई भतीजावाद, सांप्रदायिकता के सहारे या किसी भी अवसर का गलत लाभ उठाकर अपने या निकट संबंधियों को लाभ पहुंचाना भी भ्रष्टाचार है जिसके खिलाफ अन्ना टीम एक शब्द भी नहीं बोलती।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने बयान दिया था कि अन्ना का आंदोलन सफल रहा। यह नासमझी या भलमनसाहत में दिया गया बयान नहीं है। इसके गहरे निहितार्थ हैं। इस आंदोलन से मनमोहन सिंह को निजी तौर पर फायदा हुआ है। उन्हें 7 रेसकोर्स में आराम करने के लिए थोड़ा और वक्त मिल गया है। क्योंकि जिस तरह उनकी सरकार के दौरान हुए घोटालों की परतें खुल रही थीं उस माहौल में कांग्रेस के अंदर उन पर त्यागपत्र देने का दबाव बढ़ता जा रहा था। जबकि अन्ना के तथाकथित आंदोलन के बाद अब कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आकर मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पा रही है। इसी तरह अन्ना टीम ने जिस तरह से माडिया के सहयोग से लोगों की भावनाओं के साथ छल किया है उससे निकट भविष्य में किसी बड़े जनांदोलन के खड़े होने की संभावनाएं फिलहाल धूमिल हो गई हैं।

हमारे इंडियन पत्रकारों द्वारा टीम अन्ना के समर्थन में यह कहकर मोर्चा लिया जा रहा है कि प्रश्न अन्ना या टीम अन्ना का नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार का है जिसकी वजह से एक बड़ा वर्ग अभाव का जीवन जी रहा है। लेकिन, अगर सवाल टीम अन्ना का नहीं है फिर तो सवाल ए. राजा, कलमाडी, का भी नहीं है और अगर मुद्दा भ्रष्टाचार है तो क्या जन लोकपाल भ्रष्टाचार पर रोक लगा देगा?

जबकि असल प्रतिप्रश्न यह है कि मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि ये व्यवस्था है, जिसके बाई प्रोडक्ट कॉरपोरेट घराने, एनजीओ और टीम अन्ना हैं। अन्ना मंडली और हमारी इंडियन मीडिया बिरादरी सरकारी कर्मचारियों या नेताओं के भ्रष्टाचार पर तो बात कर रही है लेकिन इस भ्रष्टाचार की मूल जड़ इस व्यवस्था के खिलाफ कुछ नहीं बोल रही।

जब से आर्थिक उदारीकरण का मनमोहनी दौर आया है तभी से देश में अरबपतियों की संख्या भी बढ़ी है और भ्रष्टाचार के मामले भी बढ़े हैं। नरसिंहाराव की शागिर्दी में मनमोहन सिंह ने जिस व्यवस्था की शुरूआत की थी उसके नतीजे पर पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का नया नुस्खा ईजाद किया गया और देश की संपदा को लूटने का खेल प्रारंभ हुआ। ऐसा वेवजह नहीं है कि तभी से इस देश में एनजीओ की बाढ़ आ गई और सरकारों को अपनी जनकल्याण की भूमिका से मुख मोड़ने का अवसर मिल गया।

यह पीपीपी भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत है जिसमें राजनेता, अफसर, एनजीओ और पूंजीपति बराबर के शरीक हैं। इसीलिए एनजीओ, काॅरपोरेट घराने और मीडिया हाउस खुद को लोकपाल के बाहर रखना चाहते हैं। यही कारण है कि इंडियन पत्रकार तथाकथित जनलोकपाल के समर्थन में मोर्चा लेकर खड़े हैं।

काॅरपोरेटी और एनजीओ भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारनामा हाल ही में रजत गुप्ता प्रकरण में सामने आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वित्तीय मामलों की कैबिनेट समिति ने दो बार में गुप्ता के एनजीओ पब्लिक हेल्थ फाउण्डेशन आॅफ इण्डिया को दो किस्तों में 65 करोड़ और 36 करोड़ रूपए जारी कर दिए। क्या यह भ्रष्टाचार का मामला नहीं है? लेकिन मीडिया में कहीं शोर नहीं मचा न टीम अन्ना ने शोर मचाया। अन्ना का तथाकथित ‘121 करोड़ लोगों का जनलोकपाल’ अगर बनता है तो वह भी इसकी जांच नहीं करेगा। यह ‘जनलोकपाल’ नीरा राडिया और पैसे लेकर खबरें छापने वाले मीडिया हाउसेस की जांच नहंी करेगा क्योंकि ये सब समाजसेवी हैं।

तर्क दिया जा रहा है कि राजनीतिक वर्ग के प्रति जनता का विश्वास नहीं है, इसका यह तात्पर्य नहीं है कि हम लोकतंत्र में या लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास नहीं रखते। उसी तरह न्यायपालिका में गड़बडि़यां हैं पर इसका नियंत्रण कार्यपालिका को नहीं दिया जा सकता। मीडिया में अतिरेक है, अनैतिकता है इसका मतलब यह नहीं कि इसे सरकारी चंगुल में सौंपा जा सके।

देखने में बात सही लग सकती है। अगर इस तर्क को वाजिब मान भी लिया जाए तो इसी तरह लोकतंत्र की अपनी विसंगतियां हो सकती हैं, कमियाँ हो सकती हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर लोकतंत्र को कुछ कॉरपोरेट एजेंटों के हवाले कर दिया जाए?

जहां तक राजनेताओं में लोगों के विश्वास का सवाल है तो इसका साधारण सा उत्तर है। ज़रा सुबह आठ बजह उठकर किसी नाकारा से नाकारा सांसद या विधायक के घर पर जाकर देखिए, वहां जो भीड़ जुटती है उतनी भीड़ किसी कलक्टर, तहसीलदार या थानेदार या संपादक जी के घर या दफ्तर पर क्यों नहीं लगती? जबकि जो फरियादी अपनी समस्याएं लेकर इन राजनेताओं के दरवाजे पर पहुंचता है वे सारी की सारी समस्याएं इन्हीं अफसरों की पैदा की हुई होती हैं। फिर इस तर्क का आधार क्या है?

अभी भी वक्त है कि अन्ना टीम के कारनामों के समर्थन में बौद्धिक लाठी लेकर उतरी इंडियन मीडियाकर्मियों की फौज सही रास्ते पर लौट आए वरना अल्लामा इकबाल की दो पंक्तियों को थोड़ा तोड़-मरोड़कर इतना ही कहा जा सकता है- न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ मीडिया वालों, तुम्हारी दासतां भी न होगी दास्तानों में!!!!

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