चौराहे पर खड़ी भारतीय इंजीनियरिंग : Engineering in India on crossroads

Posted: November 8, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

भारतीय क्षेत्रों पर कब्जे के बाद जब अंग्रेजी हुकूमत को प्रशासनिक तंत्र विकसित करने की जरुरत लगी तो उन्होंने भारतियों के बीच से ही आरामतलब या उच्च वर्ग के लोगों को ही वरीयता दी. नौकरियों के साथ दिए नौकरों और शाही रहन सहन के लुभावने पॅकेज, जो आज भी कायम है. एक प्रशासनिक अधिकारी के लिए औसत से अधिक बड़ी जमीं पर रिहायश और औसतन ६-१२ नौकरों के अमले की परंपरा आज भी कायम है. अंग्रेजी हुकूमत ने तो आरामतलब और अंग्रेज बना के लोगों को अपने ही लोगों का शोषक बनाने के लिए यह चल चली थी. लेकिन क्या यह आज के सन्दर्भों में भी जायज है? बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी इसी रणनीति से सामाजिक विभेद पैदा करने में कामयाब हो रही हैं. नीतियां तो कहीं विदेश में बनती हैं और हिंदुस्तान में अदूरदर्शी राजनीतिज्ञ लालचवश यहाँ की आम जनता के ऊपर थोप देते हैं. आम जनता तो आम ही खा सकती है, गुठलियाँ गिन सकती है, या आम बेचने वाले को गाली दे सकती है. नया आम का पेड़ नहीं लगा सकती. यह विकल्प-हीनता देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है.

उदहारण के तौर पर मै आपको एक बहुत बड़ी और महत्वकांक्षी परियोजना के बारे में बता सकता हूँ जिसको भाजपा ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के नाम से देश में लागु किया और खुद अपनी ही पीठ ठोंकी. जबकि इसकी वास्तविकता यह है की यह संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रस्ताव में १९५९ से एशियन हाइवे प्रोजेक्ट के नाम से चल रही है. अब शायद आप अंदाज़ा लगा सकते हैं की इसके लिए विश्व बैंक पानी की तरह पैसा क्यों लगा रहा है? और इसमें सरकार को १००% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव क्यों पारित करना पड़ा. आज के हालत यह हैं की इस परियोजना का कुल बजट वार्षिक भारतीय रक्षा बजट से दोगुना है. शहरी सडकों के हालत आप लोगों ने खुद ही देखे होंगे. इसकी प्रत्यक्ष लाभार्थी कम्पनियाँ (189) यद्यपि इसमें ५००० से इंजिनीयर्स को रोजगार दे रही हैं लेकिन इसमें मिलने ३००% का शुद्ध लाभ क्या ये इंजिनीयर या आम जनता ले पायेगी?
और गौर कीजियेगा कि विश्व बैंक के कर्ज का भुगतान भारतीय सरकार किस प्रकार करती है? क्या आपको लगता है कि यह महंगाई बेसिर-पैर बढ़ी जा रही है. पेट्रोल कि कीमतें क्या सडकों के अन्ध-विकास से कोई सम्बन्ध नहीं रखती? लेकिन मुझे बताएं कि इस प्रकार का समग्र अध्ययन कौन सा विश्वविद्यालय या सरकारी विभाग करता है? शायद कहीं नहीं. ऐसे में इंजीनियरिंग और इंजिनियर का क्या राष्ट्र के सन्दर्भ योगदान क्या कहा जाना चाहिए.. आप ही बताएं?
यदि इस प्रकार के तथाकथित विकास से जन सामान्य का जीवन दुष्कर हो जाये तो क्या इसको विकास कहियेगा?
इंजीनियरिंग यानी सृजन यदि इस प्रकार के तथाकथित विकास कि सहयोगी बन के चल रही है तो शायद इंजीनियरिंग और विकास को राष्ट्रीय सन्दर्भों में अपने लक्ष्य और अस्तित्व का फिर से आकलन करना होगा.
इस प्रकार के विवेचन को बहुत से लोग मार्क्सवादी या कम्मुनिस्ट होने जैसा मान लें यह उचित नहीं. मै मार्क्स और लेनिन को भारतीय सन्दर्भों में शामिल न करना ही बेहतर मानता हूँ. क्योंकि देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप ही राजनीती और राष्ट्रनीति बेहतर बनती है. किसी विचार को थोप कर सिर्फ लीपापोती की जा सकती है. स्थायी समाधान का सबसे बड़ा स्वरुप है शिक्षा यानि वैचारिक स्थिरता. लेकिन क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कोई अभिदृष्टि (VISION) नहीं है. मतलब देश एक ऐसे ऐसे अंधे की तरह चौराहे पर खड़ा है जिसे रास्ता दिखने वाले तो बहुत हैं लेकिन रस्ते कहाँ पहुंचेंगे यह किसी को नहीं पता.
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