वॉल स्ट्रीट पर सड़क छापों का कब्जा

Posted: November 11, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

वॉल स्ट्रीट पर सड़क छापों का कब्जा

 आर अरुण कुमार 

हम यूनियनें हैं, छात्र हैं, शिक्षक हैं, वयोवृद्घ नागरिक हैं, परिवार हैं, बेरोजगार और अर्धबेरोजगार हैं। हम सभी नस्लों से हैं, सभी लिंगों से हैं और सभी धर्मों तथा मतों के लोग हैं। हम बहुमत हैं। हम 99 फीसद हैं। अब हम और चुप नहीं रहेंगे। 99 फीसद आबादी के सदस्य के रूप में, मौजूदा आर्थिक तथा राजनीतिक माहौल के प्रति अपने असंतोष की एक सांकेतिक कार्रवाई के रूप में और भविष्य की एक बेहतर दुनिया के एक उदाहरण के रूप में, हमने वाल स्ट्रीट पर कब्जा कर लिया है। इसलिए हम आम जनता को, 99 फीसद आबादी के अपने साथियों को आमंत्रित करते हैं कि आकर हमारे साथ शामिल हों…।

सिर्फ स्वत:स्फूर्त विरोध कार्रवाई नहीं

17 सितंबर से शुरू होकर अब पिछले करीब एक महीने से अमरीका के न्यूयार्क में साधारण लोग, वॉल स्ट्रीट पर कब्जा किए हुए हैं। ”अरब क्रांतियों से प्रेरित होकर और खुद अपने देश के हालात से तंग आकर उन्होंने वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करने के जरिए अपने रोष का इजहार करने का फैसला लिया है।

यह कोई स्वत:स्फूर्त विरोध प्रदर्शन नहीं है बल्कि एक योजनाबद्घ विरोध प्रदर्शन है। इसकी तैयारियां जुलाई महीने से ही शुरू हो गयी थीं। ”हर शिक्षक, होम हैल्थ एड, अभिभावक, छात्र, किराएदार, लाइब्रेरियन, शहर/राज्य कर्मचारी, चाइल्ड-केयर प्रोवाइडर, नर्स, मरीज, रोजगारशुदा या बेरोजगार मजदूर या सामाजिक सुरक्षा या किसी भी तरह की सरकारी मदद पानेवाले के लिए एक अपील जारी की गयी थी कि वह आए और इस कब्जे की योजना बनाने के लिए 2 अगस्त को आयोजित आम सभा में शामिल हो। यह अपील हरेक के लिए खुला निमंत्रण थी, जिसमें कहा गया था कि ”मौजूदा मंदी का संकट राजस्व की कमी की वजह से नहीं है। यह चोरी की वजह से है। आज बैंक जिन खरबों डालरों पर बैठे हुए हैं, वह हमारा पैसा है। फिर चाहे वह करों के जरिए आया हो, पेंशनों की व सामाजिक सुरक्षा अंशदानों लूट के जरिए आया हो या फिर अपनी मेहनत के जरिए हमने जो दौलत पैदा की है, उसका हिस्सा हो; यह सब हमारा है। आप सब 2 अगस्त को वॉल स्ट्रीट आइए और यह रणनीति बनाइए कि इसे हम कैसे वापस लें!

इस आंदोलन की कार्यनीति भी सुविचारित रही है। उसकी वैबसाइट की एक पोस्ट में ऐसी कार्यनीति की जरूरत के बारे में बताया गया है। उसमें लिखा है कि ”रणनीतिक रूप से कहा जाए तो इस बात का वास्तविक खतरा है कि अगर हमने भोलेपन से अपने पत्ते उजागर कर दिए और ‘पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने या फिर ऐसे किसी यूटोपियन नारे के गिर्द लामबंद हुए, तो हमारा तहरीर आंदोलन जल्द ही एक और असंगत धुरवामपंथी तमाशे की तरह खत्म हो जाएगा और जल्द ही भुला दिया जाएगा। लेकिन अगर हम ट्रॉजन होर्स जैसी जरा सी चालाकी से काम लें…कुछ गहरी, लेकिन बिल्कुल ठोस तथा ऐसी करने योग्य मांग करें, जिसको अनदेखा करना राष्ट्रपति ओबामा के लिए असंभव हो जाए… कुछ ऐसा जो अमरीका की राजनीतिक प्रणाली पर वॉल स्ट्रीट के वित्तीय कब्जे की बात साफतौर पर उजागर करे तथा उसके सामने व्यवहारिक कदम पेश करे…जैसे ग्लास-स्टीगल कानून को बहाल करने की मांग…या फिर वित्तीय लेन-देन पर एक फीसद कर लगाने की मांग…या फिर वाशिंगटन में बैठे हमारे प्रतिनिधियों के कारपोरेट भ्रष्टाचार की अमरीकी न्याय विभाग द्वारा स्वतंत्र जांच कराए जाने की मांग… या फिर इतनी ही रचनात्मक, लेकिन पूरी तरह व्यवहारिक ऐसी मांगें जो कब्जे के दौरान जनसभाओं से उभरकर आएंगी… और वहां तब तक रोजाना, हफ्ते-दर-हफ्ते डटे रहें, जब तक कि बड़ी संख्या में अमरीकी हमारा साथ देना शुरू न कर दें और राष्ट्रपति ओबामा इसके प्रत्युत्तर में कदम उठाने पर मजबूर न हो जाए…तब शायद हम अमरीका के लिए सत्य का एक निर्णायक क्षण रच पाएं, ऐसा पहला ठोस कदम हासिल कर पाएं, जो उन मूलगामी बदलावों को हासिल करने की दिशा में पहला ठोस कदम होगा, जिनका सपना, सत्ता के मौजूदा ढ़ांचों के प्रति प्रतिबद्घताओं से मुक्त होकर हम सभी देखते हैं।इस सिलसिले में आयोजित खुली सभाओं में ऐसी अनेक कार्यनीतियों तथा सांगठनिक सिद्घांतों पर विचार हुआ। ये आम सभाएं सभी के लिए खुली थीं और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जा रहा था।

सुचिंतित सुविचारित

इस तरह कार्रवाई का निर्णय लिए जाने के कारणों के बारे में बताते हुए उन्होंने लिखा है कि ”समकालीन समाज एक उपभोक्ता समाज है, जहां आर्थिक लेन-देन ही संबंधों का प्रमुख आधार बन गया है” और कि ”मात्र जिंदा रहने की भी एक कीमत चुकानी पड़ती है। वे आगे कहते हैं कि ”कुछ लोग आसानी से इसकी कीमत अदा कर लेते हैं। कुछ गुलाम बनकर इसकी कीमत अदा करते हैं। जबकि कुछ लोग किसी भी तरह इसकी कीमत नहीं अदा कर सकते हैं…यह एक ऐसे समाज की स्वाभाविक परिणति है, जिसका निर्माण ऐसी सत्ताओं के गिर्द हुआ है, जिनका उद्देश्य हमेशा लागत कम से कम करना और मुनाफा अधिक से अधिक बढ़ाना रहा है। यह मात्र विकास के लिए विकास का दर्शन है। यह वही सिद्घांत है जिससे एक कैंसर कोशिका संचालित होती है। उनका कहना है कि दुनिया ऐसी नहीं होनी चाहिए। ”निमर्मता तथा अलगाव के समाज का विरोध होना चाहिए और उसकी जगह सहयोग तथा समुदायिकता का समाज बनाया जाना चाहिए…17 सितंबर को वाल स्ट्रीट आ रहे लोगों के आने के अलग-अलग कारण हैं। लेकिन जो चीज उन सबको एकजुट करती है वह है उस सिद्घांत का विरोध, जो न सिर्फ हमारी आर्थिक जिंदगियों पर अपना प्रभुत्व कायम किए हुए है बल्कि हमारी संपूर्ण जिंदगियों पर प्रभुत्व कायम किए हुए है और वह सिद्घांत है- मुनाफा सबसे ऊपर है।

इन अपीलों के प्रति अनेक लोगों की अनुकूल प्रतिक्रियाएं रहीं और वे ”वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो आंदोलन में शामिल हुए। हालांकि 20,000 लोगों को लामबंद करने का शुरूआती लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। लेकिन जो कुछ सौ लोग वहां पंहुचे, वे निराश नहीं हुए। उन्होंने कब्जा जारी रखने के शानदार संकल्प का प्रदर्शन किया और धीरे-धीरे उन्होंने और सैकड़ों लोगों को आकर्षित किया। अब तक यह आंदोलन अमरीका के पचासों शहरों में फैल चुका है।

शिकागो, बोस्टन, सान-फ्रांसिस्को और लॉस एंजेल्स जैसे सभी महत्वपूर्ण शहर अब इस आंदोलन के कब्जे में हैं। कितने ही लोग खुलेआम प्रदर्शनकारियों के प्रति अपनी सहानुभूति अभिव्यक्त कर रहे हैं और उनके उद्देश्य के लिए चंदा दे रहे हैं और कब्जा करनेवाले संगठनों में वालंटियरों के रूप में काम कर रहे हैं। अमरीका की प्रमुख ट्रेड यूनियन ए एफ एल-सी आइ ओ समेत कम से कम 37 ट्रेड यूनियनों ने प्रदर्शनकारियों के साथ अपनी एकजुटता का इजहार किया है। नॉम चोमस्की तथा फिल्म निर्देशक माइकल मूर जैसे बुद्घिजीवियों ने उनका समर्थन करने की शपथ ली है। अपने इस कब्जे के दौरान उन्होंने समय-समय पर जो मार्च आयोजित किए हैं, उनमें हजारों लोगों ने भाग लिया है।

शुरू में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को डराने की कोशिश की। पुलिस ने उनमें से कुछ को गिरफ्तार करने की कोशिश की। इनमें से कुछ पीटा भी। उम्मीद रही होगी कि शायद वे डर जाएंगे और उनका संकल्प कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन पुलिस की यह चाल उस पर उल्टी पड़ गयी और वास्तव में तो इन प्रदर्शनकारियों के व्यापक तबकों को आकर्षित ही किया। पुलिस की कार्रवाई से उकसावे में आने की बजाय प्रदर्शनकारियों ने भारी परिपक्वता तथा संयम का ही परिचय दिया। पुलिस के उकसावे की बजाय प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की वकालत की है।

बढ़ता समर्थन बढ़ता असर

पुलिस की जोर-जबर्दस्ती पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आंदोलनकारियों ने एक और अपील जारी की जिसमें कहा गया था कि ”हम पुलिस की गैर-पेशेवराना करतूतों की निंदा करते हैं, जिसने एक शांतिपूर्ण मार्च को कुचलने के लिए अत्यधिक बल का प्रयोग किया। हम शासक वर्ग की बढ़ती ताकत का विरोध करने के लिए यहां पर हैं। आइए यह स्पष्ट कर दें कि जब एन वाइ डी पी के सदस्य व्यक्तिगत रूप से हमसे संपर्क करते हैं, हमारे उद्देश्य के साथ एकजुटता का इजहार करते हैं…इन तेरह दिनों में हमने यही सीखा है कि कोई भी राजनीतिक क्षेत्र में कारपोरेशनों के अत्यधिक प्रभाव का समर्थन नहीं करता है। हमने यह पाया है कि कारपोरेशनों तथा बैंकों को छोड़कर कोई भी संघर्षरत परिवारों को स्ट्रीट से खदेडऩे के पक्ष में नहीं है। हम एन वाइ डी पी के सदस्यों से अपील करते हैं कि हमारे उद्देश्य के प्रति एकजुटता बनाए रखें। बजट कटौतियों के अगले चक्र में ये स्त्री-पुरुष भी अपनी पेंशनें तथा दूसरे लाभ गंवा सकते हैं। हम एन वाई डी पी के सदस्यों से मांग करते हैं कि सभी शांतिप्रिय मनुष्यों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें। मेहनतकश अवाम के हक में सत्ता पर फिर से दावेदारी की दिशा में यह एक बहुत बड़ा कदम होगा। जो लोग दूसरों की तकलीफों से मुनाफा कमाते हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा। हम 99 फीसद हैं और हमारे विफल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।

इन विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में है, अमरीका में बिगड़ती आर्थिक स्थिति। ऐसे लोगों की तादाद निरंतर बढ़ रही है जो ओबामा को विफल मानते हैं। वे यह मानते हैं कि ओबामा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान जो वादे किए थे, उन्हें वे पूरा नहीं कर पाए हैं। एक नए जनगणना आंकड़े के अनुसार, जिसका विश्लेषण प्यू रिसर्च सेंटर ने किया है, श्वेतों तथा अल्पसंख्यकों के बीच संपदा का अंतर ऐतिहासिक रूप से अपने शिखर पर पहुंच गया है। उदाहरण के लिए वर्ष 2008 में–ये आंकड़े वर्ष 2008 तक के लिए ही उपलब्ध हैं–सबसे ज्यादा कमानेवाले 0.1 फीसद लोग, अमरीका में व्यक्तिगत आय का 10 फीसद से ज्यादा हड़प गए, जिसमें पूंजी लाभ भी शामिल है। इसी तरह सर्वोच्च 1 फीसद ने व्यक्तिगत आय का 20 फीसद कब्जा लिया। आधिकारिक रूप से बेरोजगारी की दर 10 फीसद के आसपास चल रही बतायी जाती है, जबकि गैर-सरकारी अनुमानों के अनुसार यह 15-20 फीसद के आसपास है।

आम आदमी की इन बुनियादी चिंताओं को संबोधित करने में ओबामा प्रशासन की विफलता और रिपब्लिकन पार्टी द्वारा अदा की गयी रोड़ा-अटकाऊ भूमिका के चलते, देश की इन दो बड़ी राजनीतिक ताकतों से जनता का अलगाव और ज्यादा बढ़ गया है। सी एन एन द्वारा आयोजित हाल के एक सर्वे के मुताबिक इन दोनों पार्टियों का विरोध करने वालों का संयुक्त आंकड़ा 104 फीसद है, जो कि एक रिकार्ड है। पहली बार ऐसा हुआ है कि यह आंकड़ा 100 के पार गया है। टी पार्टी मूवमेंट जैसी कट्टर दक्षिणपंथी ताकतें जनता के इस असंतोष का इस्तेमाल करने की जीतोड़ कोशिश कर रही हैं ताकि अपने विभाजनकारी एजेंडा को और आगे ले जा सकें। टी पार्टी मूवमेंट की आर्थिक नीतियां सरकार की भूमिका को और कम करने तथा अर्थव्यवस्था में वित्तीय पूंजी के दखल को और बढ़ाने की वकालत करती हैं। वॉल स्ट्रीट के कब्जे का आंदोलन ने इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में अमरीका में मौजूदा राजनीतिक विमर्श को आकार देने में और ज्यादा अहमियत अख्तियार कर ली है।

एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

वॉल स्ट्रीट पर कब्जे के आंदोलन के अनेक धनात्मक पहलू हैं, जो उसके बयानों के विस्तृत उद्घरणों से स्पष्ट है। इसके बावजूद इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। उनकी चिंता जहां एक खास मांग पर केंद्रित है। राजनीतिक पार्टियों के प्रति उनकी वितृष्णा को समझा जा सकता है, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा उनका अमरीका की सड़कों पर उतरना और साम्राज्यवाद के हृदयस्थल में इस पगलाए सांड से सीधे आमना-सामना करना निश्चय ही अपने आपमें एक प्रेरणादायी कार्रवाई है। रिपोर्टों के मुताबिक इन प्रदर्शनों से अनेक लोग प्रेरित हुए हैं और अब कनाडा तथा स्वीडन व अन्य अनेक पूंजीवादी देशों में भी लोग सड़कों पर आ रहे हैं, जो अभी तक इस तरह के व्यापक प्रदर्शनों से मुक्त रहे हैं।

आइए, उम्मीद करें कि अमरीका के इस निर्णायक चुनावी वर्ष में ये प्रदर्शन वास्तव में देश में ”एक स्थायी जनतांत्रिक जागृति” लाएंगे।

इस उम्मीद के साथ हम अपनी यह बात खत्म करते हैं कि इन प्रदर्शनों से उनका यह आशावाद सही साबित होगा कि, ”दुनिया का ऐसा ही होना जरूरी नहीं हैं। निर्ममतापूर्ण तथा अलगावपूर्ण समाज का मुकाबला किया जाना चाहिए और उसकी जगह सहयोग तथा समूहिकता का समाज कायम किया जाना चाहिए। संशयवादी कहेंगे कि ऐसी दुनिया संभव ही नहीं। हमारी विरोधी ताकतें जीतती रही हैं, हमेशा जीतेंगी और शायद उन्हें हमेशा जीतना भी चाहिए। लेकिन वे भगवान नहीं हैं। वे भी इंसान हैं, हमारी ही तरह। वे एक ऐसे समाज की पैदाइश हैं, जो एक ऐसे व्यवहार को पुरुस्कृत करता है, जिसने हमें वहां पंहुचाया है, जहां आज हम हैं। उनसे लड़ा जा सकता है। और सबसे बड़ी बात यह है कि उन तक पंहुचा जा सकता है। जरूरत सिर्फ इसकी है वे हमें देख सकें। और हमारे ऊपर लगे कीमत टैग से अलग हमें देख सकें। और अगर वे भगवान हैं भी, तो हम प्रोमेथिअस बनेंगे। और बाज की प्रतीक्षा में जब हमें चट्टान से बांधा जाएगा, हम उन पर हंसेंगे।

साभार-  लोकजतन ,  हस्तक्षेप. काम 

link http://hastakshep.com/?p=644

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