खूब लड़ी मर्दानी झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई: स्वराज्य, आज़ादी, महिला सशक्तिकरण

Posted: November 20, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

इन्द्र विक्रम सिंह 

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी लक्ष्मी बाई (19 November 1835 – 17 June 1858)

 स्वराज्य शब्द हमारे राष्ट्रीय संग्राम की धडकन है। असंख्य वीरों ने १८५७ के स्वातंत्र्य आन्दोलन में अपने आपको समर्पित कर दिया। यह युद्ध केवल इसलिये ही नहीं लडा गया कि भारत की भूमि से विदेशियों को निकाल बाहर करना था। बल्कि हमारे कुछ मूल्य थे जिन पर खतरा देखकर अनेक नेता, बुद्धिजीवी और दार्शनिक अपना दायित्व समझ कर उन ताकतों के विरुद्ध उठ खडे हुए जो भारतीय मूल्यों को भस्मीभूत कर देना चाहते थे। इन मूल्यों में न केवल देश की पहचान छुपी हुई थी बल्कि मानवीय संवेदनाएँ भी धूल धूसरित होती हुई नजर आ रही थीं। भारत सदियों से ‘स्व’ के दर्शन में विश्वास रखता है। इसलिये स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वशासन, स्वाधीन और स्वदेशी जैसे शब्द उसकी दिनचर्या में शामिल थे, अपने इसी दर्शन को उन्होंने आधार बनाया. इस आन्दोलन में सबसे अधिक करिश्मा दो शब्दों ने दिखलाया। एक शब्द है ‘स्वराज्य’ और दूसरा है ‘स्वदेशी’।

स्वराज्य की कल्पना को १५० वर्ष हो गए पहली बार इस का उपयोग विख्यात हिन्दी के उपन्यासकार स्वर्गीय वृन्दावन लाल जी वर्मा की खोज के अनुसार ‘रानी लक्ष्मीबाई’ ने किया। जिसको राजनीतिक शब्दावली बनाने का श्रेय ‘लोकमान्य तिलक’ को जाता है। स्वदेशी शब्द का चलन १९०५ से हुआ। स्वराज्य हो या स्वदेशी दोनों को जनता के हृदय में उतार कर पूर्णता की ओर किसी ने अग्रसर किया तो वे केवल और केवल ‘महात्मा गाँधी’ थे।

रानी ने बानपूर के राजा मर्दन सिंह को जो चिट्ठी युद्ध में सहायता करने के लिये लिखी थी उसमें सुराज शब्द का उपयोग किया है। रानी के बारे में एक सवाल बहुधा उठता है कि वह अपनी झाँसी बचाने के लिये लडी या फिर स्वराज्य की प्राप्ति के लिए लडी। रानी लक्ष्मी बाई ने उक्त पत्र बानपूर के राजा मर्दन सिंह को संवत् १९१४ में लिखा था। जिसमें उनके यह शब्द अंकित हैं कि ‘के सुराज भऔ चाहिजै’. रानी ने अपने पत्र में सुराज और स्वशासन शब्द का स्पष्ट उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि रानी के अंग्रेजों से संघर्ष करने का उद्देश्य सुराज और स्वशासन से था। वे इसी भावना से लडीं और माँ भारती पर न्यौछावर हो गईं।

लक्ष्मीबाई द्वारा लिखित एक दुर्लभ पत्र (रानी ने बानपूर के राजा मर्दन सिंह को)
 
64 वर्ष बीत चुके हैं हमें आजाद हुए. मगर क्या हम सचमुच आज़ाद हैं? क्या हम वैसा भारत बना पाए जिसका सपना ‘आजादी की दीवानों’ ने देखा था. अभी बहुत काम बाकी है…जंग अभी भी जारी है…..आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, जाने कितने अन्दुरुनी दुश्मन हैं जो हमारे इस देश की जड़ों को अंदर से खोखला कर रहे हैं…. हम स्मरण करें उन देशभ…क्तों की कुर्बानियों का जिनके बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. हमें एक बार फिर उसी जज्बे, उसी देशभक्ति को अपने अन्दर जगाना है जैसा आज़ादी के नायकों के पास था…जिसके अभाव में हम ईमानदारी, इंसानियत और इन्साफ के कायदों को भूल ही चुके हैं. हमें जरूरत है उस राष्ट्रप्रेम में सराबोर हो जाने का जो त्याग और कुर्बानी मांगती है….जो एक होकर चलने की रवानी मांगती है.
 
 
 
 
 
 
 
इन्द्र जी एक प्रखर गाँधीवादी हैं जो राष्ट्र-निर्माण को जीवन के पवित्र उद्देश्य के रूप में ध्येय मानते हैं. यह लेख उनके फेसबुक एकाउंट से साभार लिया गया है.
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