नाटो (NATO), पाकिस्तान और भारत एक निश्चिन्त उदारवादी पडोसी.

Posted: November 30, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

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पडोसी की मुश्किलें  क्षणिक इर्ष्या की एक अस्थायी  संतुष्टि तो हो सकती है लेकिन चिरस्थायी समाधान तो सहयोग और शिद्दत से ही संभव है..

बंगलादेश, पाकिस्तान और  अफगानिस्तान के साथ जुड़े हुए सीमांत प्रदेशों के सन्दर्भ में मीडिया का रुख देखें तो समझ आता है कि देश के अन्दर मौजूद विदेशी मीडिया सत्य से संभवतः कोसो दूर बैठ के मुद्दे के साथ छेड़-छड करके सिर्फ युद्ध सामग्री और हथियारों के सौदागरों के लिए दलाल का काम करता है. सीमा पर मौजूद संकट के समाधान स्वरुप हथियारों के आयात को बढ़ावा देकर न कि स्वदेशी तकनिकी कौशल और सामरिक दक्षता पर ध्यान केन्द्रित करके.  नतीजा भारत की “आयात निर्भर सामरिक शक्ति” कितने गहरे पानी में है यह तो युद्ध के समय ही पता चलेगा लेकिन उधार लेकर  (  आयात करके) अपनी पीठ ठोंकना हमे विदेशी मीडिया या विदेशी मीडिया के नव-उदारवादी मीडिया महानुभावों ने. विश्व राजनैतिक सन्दर्भों में पाकिस्तान या अफगानिस्तान में उत्पन्न हुए शक्ति असंतुलन से भारत में आतंकवाद और युद्ध सामग्री के आयात की परिपाटी विकसित हुई. यक़ीनन इसका प्रत्यक्ष हितसाधक न तो भारत है न ही पाकिस्तान.
पाकिस्तान के साथ परंपरागत इर्ष्या का एक दूसरा पहलू तथाकथित हिन्दू उदारवादी राजनीतिक लाबी है. जिनका काम सामाजिक मतभेदों के बढ़ने या गहराने से निकलता है. ये छद्मवेशी भारत माता की जय बुलवाते और वन्दे मातरम के नारे लगवाते समय  भारतवर्ष की समग्रता को बहुधा  भूले हुए लगते है. शायद ये  बयानबाजियां करते हुए उसके नतीजों से देश को होने वाले नुकसान और उसकी भरपाई से निहायत अनजान नज़र आते हैं. नतीजा सीमा पर धार्मिक कट्टरता जनित हिंसा और उसके मीडिया महिमा-मंडन  से पाकिस्तान और भारत दोनों के ही जन सामान्य को चूरन चटा के “फासीवादी” देशी और विदेशी “अपनी-अपनी  रोटियां” सेंक रहे हैं. देसी संस्करण में मै इनको कांग्रेस पार्ट-2 मानता हूँ.  देश के नेतृत्व की सतही अभिदृष्टि दोनों देशों को कहाँ लेकर जाएगी इसका फैसला आवाम यानि आम जनता तो करने की स्थिति में नहीं है. विदेश नीति के निर्माता यानि नौकरशाह और राजनेता अपनी कुर्सी की उम्र और  देश की उम्र निर्धारित करने में देश के साथ अन्याय करने लगते हैं.
तथाकथित राष्ट्रवादी  और विदेश नीति निर्माता पडोसी देशों के साथ सम्बन्ध में पश्चिमी देशों के साथ मोहभंग नहीं कर पाए. विदेशी नीति निर्माताओं की  अमेरिका का 54वाँ  राज्य या ब्रिटेन का 8वाँ  उपनिवेश बनने की अभिलाषा छोड़ न पाने की वजह ये रही की इरान या अफगानिस्तान के साथ एक संप्रभु पडोसी की हैसियत से नहीं एक अमेरिकी या पश्चिमी दूत के नज़रिए से मिलते हैं. शायद इतिहास का भी यही नजरिया है. इसीलिए राष्ट्रवादियों का एक बड़ा वर्ग  गाँधी या गोडसे के साथ भी पक्षपातपूर्ण रवैया रखता है.
अब सोचने का दायरा थोडा और बढ़ाते हुए हम स्वतंत्र अध्ययन करें तो पाएंगे कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और उसके साथ लगी हुई कश्मीर की सीमा पर हो रही विश्व राजनैतिक गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय नीति निर्माताओं  के पूर्वाग्रह का नुकसान भारत को युद्ध विभीषिका के रूप में उठाना पड़ सकता है. सीमा विवाद हल न हो पाने और विश्व राजनैतिक गतिविधियों से निपटने के लिए पाकिस्तान को चीन के रूप में नया आश्रय तलाशना पड़ा. यह भारत की कुटनीतिक पराजय जैसा ही देखा जाना चाहिए था. अब परिस्थितयां ये हैं कि दक्षिण एशिया में भारत के लिए चुनौतियों का लगातार इजाफा हो रहा है. चाहे वह पाकिस्तान में शक्ति असंतुलन के रूप में हो या बंगलादेश के साथ सीमा विवाद या श्रीलंका के तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा से जुड़ा हो.
पाकिस्तान में हुए शक्ति असंतुलन के सन्दर्भ में यह ज़ाहिर है कि नाटो (NATO) और अमेरिका  की अजेय सैन्य शक्ति आतंकवाद के नाम पर सीमान्त भारतीय क्षेत्रों (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर ) में अपना सैन्य अभियान कभी भी शुरू कर सकता है. वजह है पाकिस्तान के पश्चिम परस्त हुक्मरानों का एक बड़ा तबका.. ऐसे में  भारतीय सेना और विदेश विभाग क्या शुतुरमुर्ग वाला रवैया अपनाएगा या फिर पडोसी के   पडोसी की मुश्किलों   में क्षणिक इर्ष्या की एक अस्थायी  संतुष्टि खोजेगा.
कुछ भी हो लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में भारत का नुकसान होना तय है  उस समय परिस्थितियां और विकट हो सकती हैं जब नाटो (NATO) अपने मालिकों के व्यापारिक हितों के सन्दर्भ में भारत का रुख करे. जहाँ पर उदारवादी व्यवस्था के नाम पर पहले ही आर्थिक आधिपत्य स्वीकार किया जा चूका हो वहां इस प्रकार के सैन्य गतिविधियों का क्या नतीजा निकलेगा आशा करता हूँ इस प्रश्न के साथ ईमानदारी हमारे पाठक जन करेंगे.
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Comments
  1. praveen says:

    प्रिय,
    बहुत अच्छा और सच्चा विश्लेषण किया है आपने ..
    भारत की डांवाडोल विदेश नीति से हम असुरक्षित होते जा रहे है ..
    शानदार लेखन के लिए पुनः बधाई

    प्रवीण शुक्ल

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