करों द्वारा प्राप्त सरकारी आय

Posted: December 3, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

बाज़ार से ली गई खाद्यादि सामग्रियों के सिवाय आप बहुत सा और दैनिक ख़र्च भी करते हैं. टेलीफोन का किराया, बिजली का चार्ज, पानी का चार्ज इत्यादि आप देते हैं. मकान भाड़े में नगरपालिका के कर आपको देने पड़ते हैं. बहुत से नागरिक इन करों को अनावश्यक और व्यर्थ समझते हैं और देने में बड़ी आनाकानी करते हैं अथवा दु:खी होते हैं. पर ग़ौर करने पर ज्ञात होगा कि नगरपालिका द्वारा लगाए गए टैक्स कितने उपयोगी हैं और आपको उसका कितना ज़्यादा मुआवज़ा मिलता है. सड़कें, उनके दोनों तऱफ फुटपाथ, सड़क की बिजलियां, पानी के नल, गटर इत्यादि कितनी ही सुविधाएं नगरपालिका द्वारा संचालित हैं. यह सब आपके, हमारे द्वारा दिए गए हाउस टैक्स से ही संभव हो सकता है. ये सुविधाएं देखते ही टैक्स देने वालों को ज़रूर संतोष का अनुभव होता है. नगरपालिकाएं ये तमाम काम लागत क़ीमत पर ही करती हैं. कोई मुना़फा अपने लिए नहीं रखतीं. इसी तरह आयकर इत्यादि जो कर दिए जाते हैं, उनके संबंध में भी कहा जा सकता है कि उनसे भी जनता को उसके मूल्य जितनी सुविधाएं मिल जाती हैं. ये सब देख-जानकर ज़रूर ही आपके मन में जाएगा कि अगले साल जब इनकम टैक्स ऑफिसर टैक्स का निर्धारण आदेश भेजेंगे तो आपको फौरन टैक्स देने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. दु:ख है, आपको इस स्थिति का संपूर्ण ज्ञान कराते हुए कि इन हाउस टैक्स या इनकम टैक्स इत्यादि टैक्सों में से भी, नगरपालिकाओं या सरकार से भी पूंजीवादी हमेशा अपना हिस्सा हड़प ही लेते हैं. आपको आश्चर्य होता होगा कि यह कैसे होता है? उसी तरह, जब ज़मीन और पूंजी निजी संपत्ति है तो सब नगर पालिकाओं को और सरकार को कुछ न कुछ ख़रीदना ही पड़ता है, जिसमें इन पूंजीपतियों के मुना़फे का भाग सम्मिलित होता ही है. नगरपालिकाएं सड़कों पर रोशनी के लिए बिजली के बल्ब ख़रीदेंगी ही. वे उन्हीं निजी संपत्ति वालों से तो ख़रीदने पड़ेंगे. इसी तरह सैकड़ों हज़ारों चीजें नित्य नगरपालिकाओं और सरकार को ख़रीद भी करनी होती हैं और हर एक में उन पूंजीपतियों का साझा निश्चित है. इस तरह से हाउस टैक्स या अन्य टैक्सों में से भी बहुत बड़ा भाग इन पूंजीपतियों की जेब में चला ही जाता है.

करोड़ों या अरबों रुपये भारत सरकार इस तरह के टैक्सों से वसूल कर लेती है. आप आश्चर्य करेंगे कि क्या होता है इतनी बड़ी रकम का? सरकार इन्हीं के द्वारा आपकी, हमारी रक्षा के लिए सेना का ख़र्च चलाती है. फौज, पलटन, नौसेना, वायुसेना, न्यायालय-कचहरियां इत्यादि जो-जो सुविधाएं आपको, हमको प्राप्त हैं, वे सब इन्हीं की तो बदौलत हैं. इस तरह इन क़ानूनों से सरकार स़िर्फ वित्त का पुनर्वितरण करती है.

इस व्यवस्था को ठीक करने के लिए सरकार धनिकों पर ज़्यादा दर पर टैक्स लगाती है, ग़रीबों पर कम दर पर या बिल्कुल नहीं. इन्हीं टैक्सों की वजह से अपनी कमाई का आधा या दो तिहाई हिस्सा धनिकों को हर साल सरकार के सुपुर्द कर देना पड़ता है. इसके बदले में इन धनिकों को कोई विशेष सुविधा सरकार या राष्ट्र नहीं देता तो भी स़िर्फ उन धनिकों की आय का आधा या दो तिहाई भाग का एक प्रकार से राष्ट्रीयकरण ही है. शुरू-शुरू में इस तरह संपत्ति हड़प लेना इनको बहुत बुरा लगा था, पर अब तो यह व्यवस्था आदतन इतनी स्वाभाविक बन गई है कि कोई भी इसकी चर्चा नहीं करता. हर साल फरवरी के आख़िरी दिन वित्त मंत्री संसद में नया क़ानून बना देते हैं. उसके अनुसार, आयकर, सुपर कर या अन्य कई तरह के कर जनता से लिए जाते हैं. इस सालाना क़ानून का नाम है वित्तीय क़ानून. पर असल में है यह निर्धनीय क़ानून, क्योंकि इस क़ानून द्वारा हर साल जनता का वित्त उससे लिया जाता है. भारत के संविधान में या और किसी क़ानून अथवा किसी रिवाज में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है. यह आधा या दो तिहाई तक है. उसे 90 प्रतिशत, 99 प्रतिशत या पूरा का पूरा टैक्स कर दिया जाए तो भी कोई रोकने वाला नहीं है. सरकार की इच्छा पर निर्भर है कि कौन-कौन से व्यक्तियों पर कितना-कितना कर लगना चाहिए. सब लोगों पर समान दर से ही टैक्स लगाया जाए, यह कतई ज़रूरी नहीं है. यही एक तरीक़ा, जो राष्ट्र ने अपनाया है, समान वित्त वितरण की दिशा में पहला क़दम है. इन प्रत्यक्ष करों के अलावा परोक्ष कर भी हैं, जैसे बिक्री कर, ख़रीदी कर, उत्पाद शुल्क आदि. ये कर ग़रीब-अमीर सब पर समान रूप से लागू हैं. ये टैक्स विशेष सेवा के लिए नहीं होते, ये तो राष्ट्र की आय बनाने के साधन मात्र हैं. या यों कहें, सबसे सबके लिए कुछ ले लिया जाता है. यही साम्यवाद है.

करोड़ों या अरबों रुपये भारत सरकार इस तरह के टैक्सों से वसूल कर लेती है. आप आश्चर्य करेंगे कि क्या होता है इतनी बड़ी रकम का? सरकार इन्हीं के द्वारा आपकी, हमारी रक्षा के लिए सेना का ख़र्च चलाती है. फौज, पलटन, नौसेना, वायुसेना, न्यायालय-कचहरियां इत्यादि जो-जो सुविधाएं आपको, हमको प्राप्त हैं, वे सब इन्हीं की तो बदौलत हैं. इस तरह इन क़ानूनों से सरकार स़िर्फ वित्त का पुनर्वितरण करती है. धनिकों से कुछ अधिक लेती है, ग़रीबों से कम, बिल्कुल ग़रीबों से नहीं के बराबर लेती है और सबको समान रूप से बांट देती है. पाने वाले के गुण-दोष कुछ भी नहीं देखे जाते. सबको उचित रूप से प्राप्त हो जाता है. इस कार्य में भी कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है. सरकार को अधिकार है कि वह किसी भी हद तक इस वितरण को या इसी तरह वित्त संग्रह को अमल में ला सकती है. आप वे दिन भूले नहीं होंगे, जब आयकर की दर भारत में ज़्यादा से ज़्यादा रुपये में एक आना थी. ज़्यादा से ज़्यादा आय वाला व्यक्ति भी अपनी कमाई के सोलहवें हिस्से से ज़्यादा देने के लिए उत्तरदायी नहीं था. उस वक्त कभी स्वप्न में भी यह नहीं सोचा गया था कि टैक्स का उद्देश्य किसी जमाने में समान वित्त वितरण का क़दम हो जाएगा. इसके अलावा हर वर्ष राष्ट्र को बहुत बड़ी रकम ब्याज के रूप में देनी पड़ती है. 10-20 या 50 वर्ष पहले जब-जब राष्ट्र पर महायुद्ध या ऐसी ही कोई विपत्ति आई होगी, तब-तब राष्ट्र ने जनता से उधार रुपया लिया था. आप जानते हैं उधार देने वाले वे ही पूंजीपति लोग होते हैं, जिनके पास अपनी ज़रूरत के अलावा कुछ बचा हुआ होता है. जब राष्ट्र ने रुपये उधार लिए थे, तब 3 या 4 प्रतिशत ब्याज देने का क़रार किया गया था. आज हर वर्ष सरकार जो टैक्स का संग्रह करती है, उसमें से एक बहुत बड़ा भाग इस ब्याज को चुकाने में लगता है. यह ब्याज इन्हीं धनिकों की जेबों या कोषों में जाता है. जब यह रकम उधार ली गई थी, तब वे तमाम वस्तुएं भी इन पूंजीवादियों ने ही बेची थीं, जिनमें प्रत्येक का मुना़फा सम्मिलित था. बाद में हर वर्ष ब्याज भी यही लोग लेते रहते हैं. कहने का तात्पर्य यही है कि निजी संपत्ति होने की वजह से आज भी टैक्स का अच्छा-खासा भाग घूम-फिरकर फिर इन्हीं पूंजीपतियों के यहां चला जाता है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/state-income-received-by-taxes.html

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