इनफोसिस के मूर्ति दुखी हैं अंग्रेजी को दबाने से

Posted: December 4, 2011 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

भारतीय ग्लोबलिस्ट नारायणमूर्ति का एक संक्षिप्त परिचय जो हमे http://www.rhodeshouse.ox.ac.uk/page/trustees से मिलता है वह कुछ इस प्रकार का है…

Mr Narayana Murthy

Founder-Chairman, Infosys, and former Chairman of the Indian Rhodes Scholarships selection committee. Education: National Institute of Engineering, University of Mysore. Founded and CEO, Infosys, 1981-2002; Chairman of the Board and Chief Mentor, Infosys, since 2002. Board member, Unilever, HSBC, Ford Foundation, UN Foundation, Cornell University, Wharton School, Singapore Management University, Indian School of Business, Hyderabad, Indian Institute of Management Technology, Bangalore, and INSEAD. Chairman, Rhodes Scholarships Selection Committee for India, 2005-2009. Padma Vibhushan, India; Légion d’honneur, France; and other honours. Served since June 2010. 
श्रीमान नारायणमूर्ति शायद किसी विशेष हीन भावना से ग्रस्त हैं जिसकी परिणति उनका अंग्रेजी प्रेम ही भारत उद्धार का  एकमात्र रास्ता नज़र आता है.

आज के जमाने में सारा खेल धंधे और स्वार्थों का है। किसी को देव मानकर चलना खतरे से खाली नहीं। नहीं तो क्या तुक है कि इनफोसिस के जिस संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति को आम भारतीय दंद-फंद से मुक्त और प्रोफेशनल दक्षता के दम पर खड़े नए कॉरपोरेट नेता के रूप में देखता है, वही मूर्ति देश में अंग्रेजी को दबाए जाने से दुखी हैं। उनका कहना है कि राजनेता लोग अंग्रेजी के पीछे पड़ गए हैं।

उन्होंने न्यूयॉर्क में आईआईटी से निकले पुराने छात्रों के एक जमावड़े को संबोधित करते हुए कहा कि आईआईटी के छात्रों में अंग्रेजी बोलने की काबिलियत और सामाजिकता का कौशल घटता जा रहा है, जबकि उनके शब्दों में, “आईआईटी के छात्र को ग्लोबल नागरिक होना चाहिए और उसे समझना चाहिए कि दुनिया किधर जा रही है।”

बात एकदम सही है। आज के जमाने में ग्लोबल नागरिक होना जरूरी है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या अपनी जमीन को पकड़ने से कोई ग्लोबल होने से रुक जाता है? क्या कोई अपनी भाषा जानने से अंग्रेजी में कमजोर हो जाता है? वैज्ञानिक अध्ययन तो यही बताते कि पराई भाषा में वही दक्ष होता है जो पहले अपनी मातृभाषा में दक्ष होता है। किसी भी इंसान की सृजनात्मकता उसकी अपनी भाषा के माध्यम से ही सबसे बेहतर तरीके से उद्घाटित की जा सकती है।

ऐसा नहीं हो सकता कि नारायण मूर्ति इस बात से वाकिफ न हों। लेकिन उनके धंधे का स्वार्थ यही कहता है कि विदेशी ग्राहकों की सेवा के लिए ज्यादातर आईआईटी वाले फन्नेखां अंग्रेजी बोलें। मूर्ति ने न्यूयॉर्क में इस बात भी दुख व्यक्त किया कि 80 फीसदी आईआईटी छात्र अब स्तरीय नहीं रह गए हैं। इसकी तोहमत उन्होंने बढ़ते कोचिंग क्लासों पर मढ़ दी। उन्होंने कहा कि 80 फीसदी बच्चे कोचिंग क्लासों के दम पर आईआईटी में घुस लेते हैं। बाकी खुद अपनी मेहनत से आईआईटी में घुसनेवाले 20 फीसदी छात्र ही दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होते हैं।

तथ्य यह है कि औसत परिवारों के बच्चे कोचिंग क्लासों के सहयोग से ही संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) पास कर पाते हैं। अगर ये न रहें तो उनके पास न तो वैसा परिवेश होता है और न ही वैसी सुविधा। लेकिन मूर्ति का कहना है कि ऐसे बच्चे जैसे-तैसे आईआईटी में घुस तो जाते हैं, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई से लेकर नौकरियों तक में उनका कामकाज उतना अच्छा नहीं होता। शायद यह सच हो। लेकिन इसकी वजह छात्रों के बजाय आईआईटी की फैकल्टी यानी वहां के अध्यापकों के स्तर में ढूढी जानी चाहिए जिसकी तरफ हाल ही में हमारे मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल भी इशारा कर चुके हैं।

एक  हिन्दुस्तानी  की  डायरी  से  साभार

http://diaryofanindian.blogspot.com/2011/10/blog-post.html

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s