चीन और भारत :मारपीट हुई और मारपीट नहीं..

Posted: January 3, 2012 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

कल बहुधा हर एक समाचार पत्र के प्रमुख पृष्ठ पर चीन में भारतीय राजनयिक के साथ मार-पीट हुई और आज एक प्रमुख वेब पोर्टल ने लिखा कि मारपीट नहीं हुई. अब यह भी अजीब ही संयोग ही  है कि भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री दोनों ही विश्व बैंक के पूर्व प्रतिनिधि रहे हैं. इन दोनों प्रधान मंत्रियों की कुटनीतिक नीतियों के सन्दर्भ में यह तयशुदा है की चीन और पाकिस्तान   के साथ भारत के संबंधों की स्थिति दो सामान्य पड़ोसियों जैसी बहाल नहीं हो सकी है. स्पष्ट है कि दो प्रमुख विश्व-राजनैतिक शक्तियों के बीच कलह कि स्थिति में इसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फायदा किसको हो रहा  है इसका विवेचन भी भारतीय मीडिया और देश के प्रतिनिधियों, सुरक्षा एजेंसियों  द्वारा किया जाना चाहिए. पर वस्तु स्थिति इससे अलग नज़र आती है… अधिकांशतः सम्मानित मीडिया जन विदेशी मीडिया की “खाता न बही जो कही वो सही” की तर्ज वाली  विदेशी समाचार एजेंसियों की कहानियां ज्यों की त्यों छाप रहे हैं. नतीजा जनसामान्य और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग पर ऐसी खबरों से  पड़ने वाले प्रभाव के जनित जनमत और उसका दोहन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भीमकाय रणनीतिक और सामरिक सौदों के रूप में नज़र आता है. नतीजा हथियारों के आयात और बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके हस्तक्षेप के चलते  भारतीय प्रतिरक्षा संस्थानों  की असमर्थता, अयोग्यता जन-सामान्य के मनोविज्ञान का एक स्थापित नजरिया बन चुका है. इस पर आर्थिक विशेषज्ञों के आंकड़े बताते हैं की प्रति बिलियन डालर सौदे में हम कुछ बीस हजार (20000) नौकरियों के मौके खोते जा रहे हैं. और तो और हथियार के  सौदागरों की कारस्तानी को कैसे नज़र अंदाज़ कर के नए सामाजिक मनोविज्ञान स्थापित किये जा रहे हैं देख के अचरज होता है. कहने का एक पहलु यह भी है की जो पाकिस्तान में हथियारों की आपूर्ति करे यदि वही भारत के लिए भी हथियार ही बेच रहा हो तो इसे क्या कहा जाना चाहिए? जो  आयात आधारित सामरिक रक्षा प्रणाली को खेलने में माहिर हैं वो शायद जानते हैं कि भारत में तथाकथित इस्लामिक आतंकवाद से रक्षा और जन-सुरक्षा उपकरणों का कितना बड़ा बाज़ार बनाया जा सकता है और सीमा पर हो रही सामान्य गतिविधियों के मीडियाई महिमामंडन से क्या-क्या बेचा जा सकता है.

उस पर भी मनमोहन ने एक तुर्रा यह भी छोड़ा है कि मीडिया को उनके मालिकों के हाथ में ही छोड़ दो. ताकि मीडिया और मीडिया से देश- हित या जन-हित  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश द्वारा ही हो सके.

प्रधानमंत्री के मनमोहनी वक्तव्य में पत्रकारों और स्वतंत्र पत्रकारिता का हित तो साधता नज़र नहीं आता. एक स्वस्थ लोकतंत्र में प्रेस कौंसिल और प्रेस क्लब जैसे स्वतंत्र नीति  निर्देशक मंचों की अवधारणा माननीय प्रधानमंत्री किसकी शह पर नकार रहे हैं यह तो आप लोग ही तय करें.

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