प्रश्न-प्रदेश: उत्तर प्रदेश

Posted: March 6, 2012 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

उत्तर प्रदेश की आबादी दुनिया के १०० से अधिक देशों से अधिक है. फ़्रांस, जर्मनी और जापान की आबादी को एक साथ जोड़ा जाये तो भी यह उत्तर प्रदेश की आबादी से कमतर ही बैठती है. गंगा के कचहरी क्षेत्र में स्थित इस प्रदेश में इतने प्रचुर प्राकृतिक और मानवीय संसाधन होने के बावजूद इस प्रदेश का जहाँ राष्ट्रीय जनसंख्याँ में योगदान १७.३% का है वहीँ अर्थव्यवस्था यानी सकल घरेलु उत्पाद में योगदान सिर्फ ८.५%. अब इसे प्रदेश का दुर्भाग्य कहा जाये या जनमानस और नेतृत्व की अक्षमता?
आबादी और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर तुलना करें तो हम पाते हैं की यूपी से भी कमतर  आबादी वाले देश फ़्रांस को यूरोपीय देशों में “खाद्यान्न  का कटोरा” कहा जाता  है. इसी देश की सामरिक दक्षता  और तकनीकी  प्रगति  का आकलन   करने  के लिए  सिर्फ इतना  समझना   काफी  होगा  की  यूपी के सकल घरेलु उत्पाद से कहीं  ज्यादा  फ़्रांस की आय सिर्फ  सामरिक उपकरणों  के निर्यात  से होती  है.
जापान  जिसकी  आबादी सिर्फ 4 करोड़  है, उत्तर प्रदेश के सकल घरेलु उत्पाद से कहीं  ज्यादा  वैश्विक  दान  दाता  संस्थाओं  को दान  देता  है.
जर्मनी के सिर्फ रासायनिक  उद्योगों  की कुल  आय  उत्तर प्रदेश के सकल घरेलु उत्पाद से कहीं  ज्यादा  है.
जापान से तुलना करने  का यहाँ  औचित्य  इसलिए  बनता   है क्योंकि  विश्वयुद्ध  का समापन  और भारत  की आज़ादी  लगभग  समकालीन  घटनाएं  घटनाएं  थीं . जापान ने  विश्वयुद्ध  में हार  के बाद  दो  बड़े  परमाणु  विस्फोटों  के दंश  को भी झेला  था . इस  हताशा  में दस  लाख  से ज्यादा  जापानियों  ने  समर्पण  के बजाये  आत्म  हत्या  को स्वीकार  किया .
तुलनात्मक  अध्ययन  यह बताता  है की जापान अति  दयनीय  दशा  से निकल  कर  आज  विश्व  के सबसे  ज्यादा  विक्सित  राष्ट्रों  में पुरे  शान  से खड़ा  है.
यह मिसाल  है हमारे  बहुत  से राजनेताओं , नौकरशाह , अधिकारी  वर्ग, बुद्धिजीवियों   और जनमानस के लिए.
यद्यपि  समय -समय  पर हमारे  नेता , और नौकरशाह  इस प्रकार  के तुलनात्मक  अध्ययन  के लिए  विदेश  यात्रायें  भी करते  रहे  है लेकिन  उनकी  विदेश  यात्रतों  से जनमानस की जेब  पर बोझ  बढ़ने  से ज्यादा  कहीं  कुछ  हासिल  होता  नहीं  दीखता  है. हाँ बहुत से सम्मानित महानुभावों ने उन देशों की कंपनियों की दलाली में जरुर  अपने हाथ काले किये हैं. शैक्षिक संस्थानों में दानदाता संगठनों के हस्तक्षेप से  “नक़ल और विकास” की परंपरा पैदा हुई.

सबसे प्रमुख बात यह नज़र आती है कि उपरोक्त देशों में से किसी ने भी देश की प्रगति का पैमाना अंग्रेजी को नहीं बनाया,

अंग्रेजी को माई-बाप मान के खड़ी  हुई भारत कि संघीय   शिक्षा व्यवस्था आज भी नगरीय आबादी के बेरोजगारों का एक बड़ा वर्ग तैयार करती नज़र आती है. वस्तुतः देखा जाये तो संघीय शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्रीय भौगोलिक, प्राकृतिक और सामाजिक (मानवीय और सांस्कृतिक ) संसाधनों से कोई  सरोकार नज़र नहीं आता. नतीजा उत्तर प्रदेश से प्रति वर्ष लगभग तीन लाख तथाकथित  तकनीकी दक्ष स्नातक  तो निकल रहे हैं लेकिन कृषि और रोजगार के दुसरे संसाधन खस्ताहाल हैं. ऐसे में तकनीकी दक्ष युवा स्थानापन्न होने को विवश हैं… उस पर भी तुर्रा यह है कि नौकरी कि सबसे बड़ी ठेकेदार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनुसार तकनीकी दक्ष कुल संख्या में सिर्फ १२-१५% लोग ही रोजगार योग्य दक्षता रखते हैं. मतलब हमारे ८५% इंजिनियर स्नातक युवा भी विस्थापितों कि तरह दर-दर भटकने को विवश हैं. और अल्प बेरोजगारी जैसे हालातों  को ही सफलता मान लेना उनकी मजबूरी है. यानी हम सिर्फ स्वदेशी रिफुजियों कि एक फ़ौज खड़ी कर रहे हैं, जिनके क्षेत्रीय अलगाव, प्रशासनिक स्तर के निर्मोह और राजनैतिक अस्पृश्यता     जैसी भावना बढ़ रही है. उस पर भी संसाधनों पर नज़र डालें तो स्थिति “अँधा बांटे कुत्ते खाएं” वाली नज़र आती है.

कानपुर शहर में ही कुछ ६००० औद्योगिक संस्थान मृत अथवा  मृतप्राय हैं, जिनमे आकर के अनुसार लगभग 5-६ लाख लोगों के रोजगार के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं. कमोबेश यही स्थिति इलाहाबाद, लखनऊ, वाराणसी, मेरठ , गोरखपुर और दुसरे महानगरों की है. शिक्षा का संघीय स्वरुप क्या इन संसाधनों और उनसे जुड़े जनहित को उपेक्षित करने को बाध्य है?

नेतृत्व को जागना होगा:

राज्ञिः धर्मिणी  धर्माणाम    , पापे पापाः समे समाः

राजनाम-अनुवर्तन्ते सर्वं, यथा राजा तथा प्रजा.

नेतृत्व के दृष्टिबंध से हालत हद से ज्यादा बुरे हो चले हैं. आर्थिक विषमता  की खाई और नफरत की सियासत ने कुछ ऐसे हालत पैदा कर रखे हैं कि जन असंतोष के इन हालातों को दीर्घावधि में हिंसा में परिवर्तित होने कि सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. प्रदेश नेतृत्व से आशा है कि वह स्वतंत्रता, विकास और  नागरिक जीवन की राजनैतिक अभिदृष्टि तय करे ताकि  समता सिर्फ किताबों में ही नज़र न आये. यह नेतृत्व की ही जिम्मेदारी  है की वह शैक्षिक गतिविधियों   को सजीव    करे ताकि उस अभिदृष्टि से सामाजिक ऊद्देश्य   और नागरिक जीवन मूल्यों के मानक बन सकें.

जनहित परक शैक्षिक गुणवत्ता की जरुरत :

किसी भी देश की शिक्षा देश की सामाजिक सुरक्षा की पूरक होती है. ऐसे में शैक्षिक नेतृत्व का दायित्व यह बनता है की स्थानीय सुशासन को लक्ष्य  रूप  में प्रतिष्ठित  करें, राष्ट्र निर्माण में यह एक विशिष्ट योगदान समय की जरुरत है.. अनुसन्धान और विकास में स्थानीय संसाधनों के बेहतर  उपभोग  को सुनिश्चित  करने का समावेश करें.

“अनभ्यासे विषम शास्त्रं” को अनदेखा करके मानविकी विषयों की उपेक्षा से बचें. इस उपेक्षा के चलते इतिहास भूगोल, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, राजनीती विज्ञानं इत्यादि विषय दोयम दर्जे के हो चले हैं. मानवीय सन्दर्भों में इन विषयों के ज्ञान और अभ्यास से नेतृत्व क्षमता का विकास होता हो उनकी उपेक्षा से दोयम दर्जे का  नेतृत्व जनमानस पर बोझ जैसा नज़र आता है. दोयम दर्जे के राजनेता और नौकरशाह  देश और प्रदेश का कैसा विकास दे पा रहे हैं यह जगजाहिर है. लेकिन यह शिक्षा के लिए दृढ निश्चय का विषय है कि आत्मावलोकन या  स्वसमीक्षा  के लिए कैसे तैयार हो सकेगी?

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