एक करुण कहानी,एक आईआईटीयन की जुबानी.

Posted: March 11, 2012 in Children and Child Rights, Education, Uncategorized, Youths and Nation

बहुत समय से भारत के प्रसिद्द आई आई टी के किसी छात्र से बातचीत करने की इच्छा थी.मन था कि जानू जिस नाम का दबाब बेचारे भारतीय बच्चे पूरा छात्र जीवन झेलते हैं उस संस्था में पढने वाले बच्चे क्या सोचते हैं.कई बार कोशिश की पर जब मैं फ्री होती तो उसके इम्तिहान चल रहे होते (गोया वहां पढाई से ज्यादा परीक्षाएं होती हैं).और जब वो थोडा फ्री (मूड ) होता तो मैं व्यस्त होती. फिर कल अचानक उसने हैलो कहा. हम दोनों ही कुछ फ्री थे तो मैंने मौके का फायदा उठाया और एक हल्का फुल्का सा साक्षात्कार उसका ले डाला. संदीप सौरभ एक आई आई टी इंस्टिट्यूट का पांचवे (फ़ाइनल ) वर्ष का छात्र है.लीजिये आप भी पढ़िए ये मजेदार सा  साक्षात्कार.(निर्मल हास्य के लिए.)
हैलो  मैम !
हैलो  संदीप .कैसे हैं आप ?
ठीक .सुबह के ३ बज रहे हैं पढने का मन नहीं कर रहा .कैसी चल रही है पढाई .?
पढाई बस चल रही है ..कोई खास फर्क नहीं है .बस अब बोर होने लगा हूँ.समय निकलता जा रहा है .नौकरी चाहिए भी .और करने का मन भी नहीं करता.

अरे तो नौकरी क्या जरुरी है? अपनी कोई कम्पनी खोल लो या ऍफ़ बी जैसी कोई साईट बस वारे  न्यारे.
बात तो आपने बहुत सही कही है .मेरे बहुत से दोस्तों ने यही किया है ..पर वो जमाना जरा मुश्किल है  .कुछ साल नौकरी कर लूं फिर यही करूँगा.

हाँ सारे आई आई टी अन्स को यह कीड़ा होता है पहले नौकरी चाहिए फिर उससे छुटकारा. फिर कुछ और करना है.
हाँ असल में फाइनल ईयर तक आते आते सारे वो झूठ समझ में आ जाते हैं ना जो हमारे बड़ों ने हमसे बोले थे जैसे – बेटा ! आई आई टी निकाल लो बस ..फिर सब मस्त है.

अरे ये कैसी निराशा जनक बातें कर रहे हो ? उन बेचारे बच्चों का क्या जो तुम लोगों ( आई आई टी अन्स  ) के नाम पर ताने झेलते हैं ?
अरे ताने नहीं देने चाहिए ना …अब देखिये कुछ टोपर्स की जॉब ५० लाख की लगती है .और एवरेज की २५ लाख की और कुछ की नहीं भी लगती . पर माँ बाप के पास खबर उन ५० लाख वालों की ही पहुँचती है ..बड़े बड़े अखबारों में बड़ी बड़ी हैडिंग में जो छपती है.
अब घर वाले तो – बेटा ! ५० नहीं तो २५ तो फिक्स मानों एकदम ..और बेचारे हम जी जी करते ..हँसते हैं ..खैर अब तो आदत सी हो गई है.

ओह …पर आई आई टी से निकलने वाले भी तो इसी जूनून में रहते हैं. और अपने बच्चे को आई आई टी ही भेजना चाहते हैं. फिर ऐसा क्यों?
वो इसलिए कि आई आई टी में टॉपर रहिये तो यह फूलों की सेज है . तो वहां से निकलने के बाद सभी यही चाहते होंगे कि मैं ना सही मेरा बेटा टॉप करेगा ही ही ही.

ओह ..मतलब कहीं भी जाओ . मानसिकता सबकी वही है कि बेटा अलादीन का चिराग है .
यप्प  … मैम !बिलकुल .वैसे अच्छा इंस्टिट्यूट है पर हायप कुछ ज्यादा ही है 

अच्छा क्या वाकई अब आई आई टी की इतनी वैल्यू नहीं रही जितनी पहले हुआ करती थी?
नहीं नहीं अब ऐसा भी नहीं है. हाँ दुसरे कॉलेज वाले भी एंटर हुए हैं तो अब बजाय यह पूछने के, कि क्या आप आई आई टी से हैं? लोगों को अब पूछना चाहिए -आप किस आई आई टी से हैं ?और किस रेंक के हैं .
वैसे आजकल भारत में एक चीज़ और मजेदार चल रही है
वो क्या?
ढेर सारे इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए हैं ..पर प्रोफ़ेसर हैं नहीं .तो वो क्या करते हैं .कि ताज़ा ताज़ा आई आई टी से पास हुए स्टुडेंट्स को प्रोफ़ेसर बना देते हैं .
अब जैसे मुझे ही कई ऑफर आये हैं .उनमें से एक तो मस्त लड़कियों के इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर का है.
अच्छा ?
हाँ वो भी खासकर आई आई टी अन्स के लिए, जहाँ प्रसिद्ध होता है कि उन्हें लड़कियों का कोई अता पता नहीं होता.क्योंकि आई आई टी में लडकियां ना के बराबर ही होती हैं.
कैसे पढ़ायेगा भला कोई?.मेरा दोस्त बोलता है .यार कहीं नहीं तो यहीं चले जायेंगे .लड़कियों को नंबर देते रहो वो भी खुश और हम भी खुश.
हा हा हा …वैसे क्या यह सच है कि आई आई टी अन्स को लड़कियों का अता पता नहीं रहता?
हाँ पहले तो ऐसा ही था ..अब नहीं है .वो इसलिए कि लड़कियां बहुत ही कम होती हैं यहाँ .अब तो सुधर रही है हालत. फिर भी दिल्ली यूनिवर्सिटी के सामने किसी आई आई टी अन की नहीं चलने वाली लड़की पटाने में .
वैसे जिससे अभी आप बात कर रही हैं. ऐसे अपवाद तो होते ही हैं.
हाँ हाँ वो तो मुझे पता है कि आप मास्टर हो ..फिर तो ऐसी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की नौकरी बुरी नहीं .
अरे नहीं मैम! बहुत रिस्की है .१००-२०० लडकियां वो भी एकदम ऑ सम   टाइप ..पढाई किसे याद रहेगी ?

अरे पढाई करनी किसे है ? देश का बंटाधार वैसे ही हो रहा है तो मस्ती से ही किया जाये.
हाँ ..ये कॉलेज वालों तो बस यह दिखाने को चाहिए कि हमारे पास आई आई टी अन प्रोफ़ेसर हैं.मेरी समझ से तो परे हैं .
तो यहाँ से अगर किसी को नौकरी नहीं मिलती ,तो वो वहां जाते हैं,

और वो बैक बेंचर वहां मस्त गुल खिलाते हैं.अच्छा ये बताओ .इन कॉलेज से निकल कर इन छात्रों का होता क्या है ?
कुछ खास तो नहीं पता. सुना है कि ये कॉलेज वाले पैसे देकर कम्पनियों को कैम्पस के लिए बुलाते हैं.फिर १०० प्लेसमेंट दिखा दिए बस .उसके बाद कम्पनी कोई एक्जाम सा लेकर एक महीने बाद इन्हें निकाल देती है .

हे राम ! फिर ?
फिर क्या ..फिर भगवान् जाने .

हाँ अब गली गली पान की दूकान की तरह इंजीनियरिंग कॉलेज खुलेंगे तो यही होगा .
पर मैम इन्हीं की वजह से कम से कम कुछ लडकियां तो आ जाती हैं इंजीनियरिंग में ..वर्ना स्कूल में सबका एक ही मोटो रहता था.मेडिकल की तैयारी करो और गणित एक्स्ट्रा में रखो.मेडिकल में आ गए तो ठीक नहीं तो इंजीनियरिंग है.

पर फिर भी वो दिल्ली यूनिवर्सिटी की आर्ट साइड जैसी तो नहीं होती हैं ना ?
हाँ हाँ वो तो है ही …अब दिल्ली आई आई टी तो फिर भी भाग्यशाली है इस मामले में. कानपूर, खड़गपुर , गौहाटी का तो ना जाने क्या हाल होता होगा.

अब यह क्या बात हुई ? आजकल छोटे शहरों की लड़कियां ज्यादा एडवांस होती हैं.
हाँ मैम सच कह रहा हूँ ..बस दिल्ली और मुंबई आई आई टी, शहर के अन्दर हैं. बाकी के शहर से काफी अलग हैं. एकदम कट ऑफ.

ओह अच्छा …फिर तो वाकई बेचारे हैं ..ये तो वही बात हो गई ..ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम.
हाँ हाँ एकदम वही.
वैसे किसी को भी अपने बच्चे पर प्रेशर नहीं डालना चाहिए यहाँ के लिए ..एकदम प्रेशर कुकर बन जाता है.
असल में क्या है कि ग्यारहवीं- बारहवीं के बाद ही समझ आ जाता है कि बच्चा आई आई टी जाने लायक है या नहीं.

यानी उस बैल में कोल्हू में जुतने की कूवत है या नहीं ?
हाँ मैम ..

और वो भी बिना लड़कियों के …नो फन ..
हाँ ..

अच्छा कपिल सिब्बल कहते हैं कि आई आई टी अन का खर्चा भारत सरकार करती है .और ये लोग जाकर काम विदेशों में करते हैं .इसपर तुम्हारा क्या कहना है?
अरे मैम बिलकुल सिंपल है ना .
आप मेवे तो खीर में ही डालोगे ना ,दाल में तो नहीं.अब जैसा कि वो खुद कहते हैं कि आई आई टी वाले टॉप क्वालिटी के होते हैं. तो उन्हें ऐसा माहौल भी तो देना चाहिए ना काम करने के लिए. पर ये नेता तो ..जो ऐसा माहौल बनाने की कोशिश भी करता है उनकी ही जान ले लेते हैं.अब देखिये सत्येन्द्र दुबे – बेचारे ने पी एम् को चिट्ठी लिखी थी भ्रष्टाचार के विरुद्ध , बेचारा अब स्वर्ग में ऐश कर रहा है.
अभी कपिल सिब्बल एक नए रूल की बात कर रहे थे .

कौन सा रूल ?
यह कि जब आई आई टी अन को नौकरी लग जाएगी तो उनकी तनख्वाह से पैसे कटेंगे .क्योंकि सरकार उनके लिए पैसे भरती है.
तो इस पर आई आई टी अन का यही कहना था .

क्या??/
ठीक है ..पर उन्हें वादा करना होगा कि हम जो चार साल बिना लड़कियों के रहते हैं. तो पास होते समय सबको एक एक गर्ल फ्रेंड मिलनी चहिये.

हम्म good point .


और इसी गुड पॉइंट के साथ संदीप पढने चला गया .और हमारी यह मजेदार सी बातचीत ख़तम हो गई .पर पीछे बेक  ग्राउंड में रह गया  चचा ग़ालिब का यह शेर.

हजारों ख्वाईशें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दम निकले 
बहुत निकले मेरे अरमां,लेकिन फिर भी कम निकले.
शिखा वार्ष्णेय के ब्लॉग स्पंदन से साभार इसकी मूल प्रति इस लिंक पर भी देखी जा सकती है.
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