Posted: March 26, 2012 in Uncategorized

गंगा का दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
-भरत झुनझुनवाला
गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्ति स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जब गंगा पर बनाए जा रहे बांधों को रोकने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे तो सरकार उनकी मांग को पूरा न सही आंशिक रूप से मानने पर सहमत हुई, जिस पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया, लेकिन बाद में इस पर कोई अमल न होते देख वह पुन: अनशन के लिए विवश हुए। एक बार फिर सरकार ने देर से उनके अनशन की सुधि ली और उनकी मांगों पर विचार का आश्वासन दिया। इसके फलस्वरूप उन्होंने अपना अनशन वापस ले लिया है। ऐसे में कुछ मूल प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक हो गया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? सरकार के सामने जनता को बिजली उपलब्ध कराने की समस्या है। इस लिहाज से गंगा पर बनाए जा रहे बांधों के निर्माण को रोकना उचित नहीं प्रतीत होता। मैदानी क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ाने और जनता का पेट भरने के लिए गंगा के पानी को नहरों में डालना जरूरी है। गंगा के किनारे बसे तमाम शहरों के गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने में हजारों करोड़ रुपये लगेंगे, जिसके लिए अतिरिक्त टैक्स लगाना होगा। दोनों ही पक्ष जनहित के नाम पर अपना-अपना तर्क दे रहे हैं इसलिए दोनों के जनहित के अंतर को समझना होगा। मनोविझान में मनुष्य की चेतना के दो प्रमुख स्तर हैं-चेतन व अचेतन। सामान्य भाषा में चेतन को बुद्धि तथा अचेतन को मन बताया जाता है। सुखी व्यक्ति की बुद्धि तथा मन में सामंजस्य होता है। सुख का सीधा फॉर्मूला है कि बुद्धि को मन के अनुरूप दिशा दी जाए, लेकिन मन को पहचानना काफी कठिन काम है। बुद्धि और मन का यह विभाजन ही तमाम रोगों और सांसारिक समस्याओं की जड़ भी है। जैसे युवा का मन टैक्सी ड्राइवर बनने का है, परंतु दोस्तों की बात मानकर वह दुकान में बैठ जाए तो वह व्यापार में घाटा खाता है। इसका कारण यही है कि दुकान में बैठा उसका मन वास्तव में वहां नहीं होता। उसकी कुल मानसिक शक्ति का आधा चेतन हिस्सा ही क्रियाशील रहता है। मन को जगाने का कठिन कार्य गंगाजी करती हैं, ऐसा माना जाता है। करोड़ों लोग अपने जीवन भर की कमाई को गंगा में एक डुबकी लगाने के लिए खर्च कर देते हैं। देव प्रयाग, ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए हर वर्ष आने वाले तीर्थयात्रियों के सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत यात्रियों ने बताया या कि गंगा स्नान करने से उन्हें मानसिक शांति मिलती है। इसका कारण यही है कि स्नान से मन जागृत हो जाता है और बुद्धि मन के अनुसार दिशा पकड़ लेती है। इस बारे में पूछे जाने पर 26 प्रतिशत तीर्थयात्रियों ने बताया कि उन्हें केवल स्वास्थ्य लाभ हुआ। इसका भी कारण यही है कि मन की ऊर्जा जागृत होने से फेफड़े, हृदय आदि अंग सही-सही काम करने लगते, जिससे व्यक्ति का शरीर खुश होता है। 14 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें व्यापार में और 12 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें नौकरी में लाभ हुआ। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मन की ऊर्जा जाग्रत होने पर इनके मन ने सही दिशा पकड़ी, जिससे अच्छे परिणाम मिले। गंगा की मन को जागृत करने की यह अदृश्य शक्ति बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के पवित्र तीर्थ स्थलों से होकर बहने, पहाड़ी बहाव में गंगाजल में तांबा, क्रोमियम तथा थोरियम आदि के घुलने और कालीफाज नामक विशेष लाभकारी बैक्टीरिया के कारण आती है। जापान के वैज्ञानिक मसारू इमोटो ने अपने अध्ययन में पाया कि बहती नदी में पानी के अणु षट्कोणीय आकर्षक झुंड बना लेते हैं। संभवत: इन्हीं आणविक झुंडों के कारण गंगा के जल में मन को प्रभावित करने की शक्ति आती है। इमोटो ने पाया कि बहते पानी को बांध में रोक देने से इन झुंडों का सौंदर्य नष्ट हो जाता है। जलविद्युत टर्बाइन के पंखों से टकराने के बाद जल के षट्कोणीय झुंड बिखर जाएंगे और इससे वह लाभ नहीं मिलेगा जो गंगा के अबाध बहाव से मिलता है। उत्तरकाशी स्थित संस्था द्वारा टिहरी बांध के ऊपर एवं नीचे के पानी के नमूनों का स्विट्जरलैंड स्थित संस्था में परीक्षण कराया गया, जिसमें पाया गया कि टिहरी के ऊपर षट्कोणीय झुंडों में ऊर्जा के केंद्र दिखते हैं, जो बांध के नीचे बहाव वाले पानी में लुप्त हो जाते हैं। गंगा के बहाव को सुरंग तथा झील में बहाने से पत्थरों का घर्षण समाप्त हो जाएगा और तांबा आदि जल में नहीं घुलेंगे। पानी को टर्बाइन में डालने के पहले सभी वनस्पतियां निकाल दी जाती हैं। इससे लाभकारी बैक्टीरिया को भोजन नहीं मिल पाता और वे कालकवलित हो जाते हैं। मूल प्रश्न है कि गंगा की मनोवैज्ञानिक शक्तियों से अधिक जनहित हासिल होगा या बिजली से? बिजली के अन्य विकल्प भी हैं, जैसे कोयला एवं सौर ऊर्जा। सिंचाई के भी अन्य विकल्प हैं, जैसे गेहूं के स्थान पर जौ और चने की खेती करना, परंतु गंगा का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ज्ञान स्वरूप सानंद की मांग जायज है और गंगा पर बन रहे सभी बांधों को रोकने के साथ-साथ पूर्व में बने टिहरी बांध को भी हटाने की पहल होनी चाहिए। इन बातों को न समझने के कारण ही भारत की जनता बांधों का समर्थन कर रही है। सरकार और जल विद्युत कंपनियां अपने लाभों के लिए गंगा को नष्ट करने पर आमादा हैं। कहा जा रहा है कि आमरण अनशन लोकतांत्रिक राजनीति के विपरीत है, लेकिन जब सरकार पर जलविद्युत कंपनियों का वर्चस्व हो तो गंाधीजी के इस अस्त्र का उपयोग करना सही प्रतीत होता है। यह सही है कि अनशन से बुद्धि को कुछ समझ नहीं आता है, परंतु अनशन से जनता केमन का भाव बदलता है, जो कि संवाद का एक तरीका है। यहां यह कहना सही नहीं होगा कि ज्ञानस्वरूप सानंद किसी तरह की राजनीति कर रहे हैं। श्री अरविंद तथा विवेकानंद जैसे मनीषियों की मानें तो विश्व में भारत की भूमिका आध्यात्मिक है और इस भूमिका का निर्वाह हम गंगा की मानसिक शक्ति का Oास करके नहीं कर सकेंगे। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
दैनिक जागरण  २५ मार्च २०१२ से साभार
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