मरती गंगा नदी

Posted: July 8, 2012 in Children and Child Rights, Education, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

Author:

 निराला
Source:

तहलका, 13 जून 2012

लगभग 40 करोड़ लोगों को अपने पानी से सिंचने वाली गंगा विलुप्त होना तय माना जा रहा है। जैसे राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय पशु शेर धीरे-धीरे खत्म हो चुके हैं वैसे ही गंगा भी खत्म होने के कगार पर है। गंगा का राष्ट्रीय नदी होना ही उसके लिए खतरा है। क्योंकि जबसे गंगा को राष्ट्रीय नदी का सम्मान मिला है तब से कुछ ज्यादा ही गंगा को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। अब गंगा शहरों का सीवर तथा कचरा ढोने वाली मालगाड़ी हो गई है। बांध, बैराज, खनन तथा शहरों से निकला कचरा गंगा के प्रवाह में ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। गंगा पर हो रहे अतिक्रमण के बारे में बताती निराला की रिपोर्ट।

गंगा, दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस पर बनते बांधों, इससे निकलती नहरों, इसमें घुलती जहरीली गंदगी और इसमें होते खनन को देखते हुए यह सुनकर हैरानी नहीं होती। गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 40 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस पर निर्भर हैं। गंगा के पूरी तरह से खत्म होने में भले ही अभी कुछ समय हो लेकिन उस पर आश्रित करोड़ों जिंदगियां खत्म होती दिखने लगी हैं।

‘25 साल पहले गंगा की सफाई के नाम पर हमारे इलाके में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा। शहर के गंदे नालों का पानी आया तो पहले-पहल तो खेतों में क्रांति हो गई। फसल चार से दस गुना तक बढ़ी। लेकिन अब तो हम अपनी फसल खुद इस्तेमाल करने से बचते हैं। लोग भी अब हमारे खेत की सब्जियां नहीं लेते, क्योंकि वे देखने में तो बड़ी और सुंदर लगती हैं मगर उनमें कोई स्वाद नहीं होता। दो घंटे में कीड़े पड़ जाते हैं उनमें। वही हाल गेहूं-चावल का भी है। चावल या रोटी बनाकर अगर फौरन नहीं खाई तो थोड़ी देर बाद ही उसमें बास आने लगती है। अब तो हम लोगों ने फूलों की खेती पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। फूल भगवान पर चढ़ेंगे। उनको तो कोई शिकायत नहीं होगी।’ वाराणसी के पास सारनाथ से सटे कोटवा गांव के किसान अरुण पांडेय की यह बात उस महात्रासदी का सिर्फ एक सिरा दिखाती है जो गंगा की घाटी में घट रही है। करीब दो दशक पहले पास ही दीनापुर में गंगा की सफाई के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा था। इससे निकलने वाला पानी गांववालों के खेत में दिया जाने लगा।

पहले तो खेती बढ़ गई। लोगों को लगा कि खेत सोना उगल रहे हैं। लेकिन बाद में पता लगा कि यह सोने की शक्ल में जहर था। आज इन लोगों के खेतों में कोई फसल ऐसी नहीं होती जिसका इस्तेमाल ये खुद के लिए कर सकें। ये लोग गेहूं-चावल उपजाते हैं तो गाजीपुर आदि के बाजार में मोटे आसामियों के यहां बेच आते हैं और सब्जियों को किसी तरह बाजार में खपा पाते हैं। कुछ समय पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया एक अध्ययन भी बताता है कि इस इलाके में उगने वाली साग-सब्जियों में कैडमियम, निकिल, क्रोमियम आदि जैसी भारी धातुओं की इतनी ज्यादा मात्रा होती है कि इन्हें खाने वाले लोगों की सेहत को कई गंभीर खतरे हैं। इलाके के लोगों की मानें तो चर्मरोग और सांस की बीमारियां यहां इतनी आम हो गई हैं कि लोग यहां रिश्ते करने से परहेज करने लगे हैं। काफी हो-हंगामे के बाद एक माह पहले से इस पानी की सप्लाई खेतों में बंद हो गई है लेकिन जानकार बताते हैं कि इतने वर्षों में इलाके का भूजल पूरी तरह दूषित हो चुका है। मिट्टी का ऊसरपन बढ़ चुका है। गांव बंट चुका है। कुछ लोग कहते हैं कि जहर वाला पानी ही खेतों को दो ताकि कम से कम उस गंदे पानी से मंदिरों में सप्लाई करने के लिए फूल की खेती करके दाल-रोटी का इंतजाम तो हो जाए। उधर, कुछ लोग कह रहे हैं कि नहीं, यह पानी अब एक बूंद भी नहीं चाहिए नहीं तो आगे की पूरी पीढ़ी ही बीमार पैदा होगी।

गंगा के साथ उत्तराखंड से लेकर फरक्का बैराज तक की 15 दिवसीय यात्रा में करीब 300 अलग-अलग लोगों से हुई बात-मुलाकात में महाविनाश की इस कहानी के कई सिरे हमारे सामने खुलते हैं। सभी लोग अपने-अपने तरीके से गंगा पर बात करते हैं। अथाह पीड़ा के साथ भविष्य की चिंता और दांव पर लगे अस्तित्व की बात सुनाने वाले कई बार रो भी पड़ते हैं। जो भावना के स्तर से उठकर बात करते हैं, वे राज-समाज-नदी आदि का कॉकटेल बनाकर बताते हैं और जो अपनी-अपनी गंगा बहाने वाले हैं, वे बहुत कायदे से गंगा को आंकड़ों में समेटकर बच्चों द्वारा सुनाई जाने वाली गिनती के अंदाज में मुंहजबानी सब कुछ सुना देते हैं। यानी अलग-अलग व्यथाएं और कथाएं हैं। हां, इन सबमें समानता का एक बिंदु जरूर दिखता है। वह यह कि कोई भी ऐसा नहीं जो गंगा के भविष्य को आशा भरी निगाहों से देखता हो। सभी कहते हैं कि बस! गंगा चलाचली की बेला में है। कई बार इतनी सहजता से, जैसे मिट जाना ही अब गंगा की नियति है और इसके मिट जाने से भी सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।
फरक्का बैराज की वजह से टापू बनता गंगा का क्षेत्र

लेकिन क्या वाकई सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? जादवपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक व पर्यावरणविद रुद्र कल्याण कहते हैं, ‘जैसी स्थिति है उससे तो कुछ सालों बाद गंगा में किसी भी किस्म के उपयोग के लायक पानी बचेगा ही नहीं। गंगा मिटेगी तो ग्राउंड वाटर खत्म होगा। फिर तबाही की नई कहानी शुरू होगी। फिर पता नहीं क्या होगा देश के 40 करोड़ लोगों का जो गंगा बेसिन के दायरे में रहते हैं। ‘वे आगे कहते हैं कि बांधों और प्रदूषण के चलते पहले ही गंगा का दम घुटा जा रहा है, ऊपर से हाइड्रोडिप्लोमेसी के इस दौर में नेपाल का व्यवहार जिस तरह बदल रहा है,उसमें यदि उसने यह कहना शुरू किया कि हम अपनी नदियों का पानी अब खुद ही इस्तेमाल करेंगे तो क्या होगा। गंगा तो नेपाली नदियों से ही अस्तित्व में है।’

जानी-मानी संस्था वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इस पर बनते बांधों, इससे निकलती नहरों, इसमें घुलती जहरीली गंदगी और इसमें होते खनन को देखते हुए यह सुनकर हैरानी नहीं होती। गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 40 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस पर निर्भर हैं। गंगा के पूरी तरह से खत्म होने में भले ही अभी कुछ समय हो लेकिन उस पर आश्रित करोड़ों जिंदगियां खत्म होती दिखने लगी हैं। जहां से गंगा शुरू होती है उस उत्तराखंड से लेकर इसके आखिरी हिस्से में पड़ने वाले फरक्का बैराज तक हमें जो छोटी-छोटी कहानियां मिलती हैं उन्हें जोड़कर देखें तो एक भयावह तस्वीर बनती है।

जिस दीनापुर प्लांट का जिक्र शुरुआत में आया है, उससे बहुत सारी बातें साफ होती हैं। एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के पानी से दीनापुर समेत आस-पास के कई गांव तबाही के मुहाने पर पहुंच गए हैं। ऐसे कई प्लांटों से निकलने वाला पानी कई साल से गंगा में मिल रहा है। खुद प्रधानमंत्री ने हाल ही में कहा है कि गंगा में रोज 290 करोड़ लीटर नालों का गंदा पानी जाता है। इसमें से दो तिहाई तो बिना किसी ट्रीटमेंट के यूं ही गंगा में मिल रहा है। गंगा जल और उसे इस्तेमाल करने वालों पर इसका क्या असर पड़ रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। 1985 में जब गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई थी तो अकेले बनारस में ही तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शुरू किए गए थे। आंकड़े बताते हैं कि शहर में रोज दो करोड़ लीटर सीवर का पानी निकलता है जिसका एक बड़ा हिस्सा यूं ही गंगा में मिल जाता है। जिस पानी का ट्रीटमेंट हो रहा है उसके नतीजे भी हम शुरुआत में देख ही चुके हैं। पूरे उत्तर प्रदेश को देखें तो ऐसे ही उपक्रमों की स्थापना के लिए 102.25 करोड़ रुपये खर्च किए गए। 31 मार्च, 2000 को गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण खत्म हुआ तो यह निष्कर्ष निकला कि उत्तर प्रदेश में 35 प्रतिशत सीवर की गंदगी ही साफ हो सकी। अंदाजा लगाइए, अकेले उत्तर प्रदेश में ही कितने दीनापुर बने होंगे। कितनी जिंदगियां तबाह हुई होंगी।

गंगा की वजह से करीब दो करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं। गाजीपुर, बलिया आदि के इलाके में आर्सेनिक पट्टी बननी शुरू हो चुकी है। इन क्षेत्रों में बसे लोग आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इनमें दांतों का पीला होना, दृष्टि कमजोर पड़ना, बाल जल्दी पकने लगना, कमर टेढ़ी होना और त्वचा संबंधी बीमारियां प्रमुख हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय खुद मानता है कि कानपुर से आगे बढ़ने पर बनारस, आरा, पटना, मुंगेर से लेकर फरक्का तक आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से औसतन 10 से 15 गुना ज्यादा तक पाई गई है।

जिस तरह दीनापुर के लोग जीविका के मोह में अभिशप्त जिंदगी गुजारने को तैयार हैं, वैसे ही कानपुर में भी करीब 400 चमड़ा उद्योगों से जुड़े 50 हजार लोग गंगा में क्रोमियम समेत तमाम किस्म के खतरनाक कैमिकल प्रवाहित करके अपनी जिंदगी को नरक बनाने को विवश हैं। बात को बनारस-कानपुर या उत्तर प्रदेश के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो गंगा एक्शन प्लान में ऐसे खतरनाक नालों के ट्रीटमेंट के लिए करीब 960 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जिसके नतीजे के बारे में 2006 में संसद की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में बताया जा चुका है कि खर्च तीन गुना बढ़ाने के बावजूद सफलता 20 प्रतिशत ही मिल सकी। नदी वैज्ञानिक डॉ. यूके चौधरी कहते हैं, ‘गंगा बेसिन का दायरा देश के 11 राज्यों में फैला हुआ है। देश की आबादी का 40 प्रतिशत हिस्सा इसी दायरे में रहता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा रिवर बेसिन है। 100 से ज्यादा शहर इसके किनारे हैं। याद रखिए कि गंगा किनारे जो दिख रहा है, उसका प्रभाव गंगा बेसिन में भी फैल रहा है। खेती खत्म होगी और तमाम किस्म की बीमारियों का दौर शुरू होगा क्योंकि ट्रीटमेंट आदि का स्वांग पूरी तरह से अवैज्ञानिक नजरिये के साथ चल रहा है।’

हिल्सा और झींगा जैसी मछलियों की आवाजाही खत्म करके फरक्का बैराज ने हजारों मछुआरों की आजीविका छीन ली। अब ये दूसरे शहरों में रिक्शा चलाते हैं या मजदूरी करते हैं कई बातें उनकी भविष्यवाणी को वजन देती लगती हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता के वैज्ञानिक दीपंकर चक्रवती ने हाल ही में यह कहा था कि गंगा की वजह से करीब दो करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं। गाजीपुर, बलिया आदि के इलाके में आर्सेनिक पट्टी बननी शुरू हो चुकी है। इन क्षेत्रों में बसे लोग आर्सेनिक से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इनमें दांतों का पीला होना, दृष्टि कमजोर पड़ना, बाल जल्दी पकने लगना, कमर टेढ़ी होना और त्वचा संबंधी बीमारियां प्रमुख हैं। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय खुद मानता है कि कानपुर से आगे बढ़ने पर बनारस, आरा, पटना, मुंगेर से लेकर फरक्का तक आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से औसतन 10 से 15 गुना ज्यादा तक पाई गई है। यह इसलिए है कि गंगा में करीब तीन सौ करोड़ लीटर प्रदूषित कचरा रोज गिर रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है।

गंगा के कारण खत्म होते सामुदायिक जीवन की कहानी का दायरा वहीं तक नहीं है, जिस पर अक्सर बात होती है। टिहरी, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना से आगे भी गंगा बहती है और उस इलाके में रहने वाले लोगों की भी अपनी पीड़ा है जिसका जिक्र गंगा को लेकर होने वाली बहस में अक्सर न के बराबर होता है। बिहार के कहलगांव से लेकर सुलतानपुर तक फैले इलाके को ही लीजिए। 80 किलोमीटर लंबे इस इलाके को डॉ.ल्फिन सेंचुरी घोषित किया गया है। बताया जाता है कि इस सेंचुरी में फिलहाल 170-190 डॉ.ल्फिनें बची हैं। डॉ.ल्फिन सिन्हा के नाम से मशहूर वैज्ञानिक व गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी के सदस्य डॉ. आरके सिन्हा कहते हैं, ‘पूरे देश में करीब 2,500 डॉ.ल्फिनें बची हैं। इनमें 1,000 के करीब गंगा में हैं और उनमें भी 60 प्रतिशत बिहार वाले इलाके में। डॉ.ल्फिन को गंगा के स्वास्थ्य का सूचक बताया जाता है। इसको देखकर यह पता किया जा सकता है कि गंगा जल की क्या स्थिति है।’

यहां एक दूसरी कहानी सामने आती है। डॉ.ल्फिन सेंचुरी घोषित होने के बाद कहलगांव से लेकर सुलतानगंज तक फ्री फिशिंग पर प्रतिबंध है। यह मछुआरों का इलाका है। यहां के मछुआरों ने गंगा मुक्ति आंदोलन नाम से दो दशक तक लड़ाई लड़कर महाशय घोष और मुशर्रफ हुसैन प्रामाणिक नामक जल के जमींदारों से आजादी पाई थी। पहले मछलियां मारने पर इन दोनों जमींदारों के लठैत मछुआरों से टैक्स ले लेते थे। जमींदारों से मुक्ति मिली तो अब सेंचुरी का घेरा उनके रोजगार को मार रहा है। गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रणेता रहे अनिल प्रकाश कहते हैं, ‘बिहार के मछुआरे गंगा से 47 किस्म की मछलियां पकड़ते थे और उनका कारोबार पूरे देश में करते थे। गंगा के प्रदूषण ने कई डेड जोन बनाए हैं जिनके चलते नदी की 75 प्रतिशत मछलियां खत्म हो चुकी हैं। अब जो मछलियां बची हैं वे मछुआरों के लिए नहीं हैं।’

मछलियों की यह समस्या प्रदूषण की वजह से तो हुई ही, फरक्का बैराज ने इस पर ताबूत में आखिरी कील वाला काम किया। यह बैराज उस जगह से कुछ किलोमीटर पीछे बना है जहां से गंगा बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इसका उद्देश्य यह था कि गंगा की ही एक धारा (जिसे आगे हुगली कहा जाता है) में गर्मियों के मौसम में भी पर्याप्त पानी सुनिश्चित किया जा सके। डॉ. आरके सिन्हा कहते हैं, ‘फरक्का ने हिल्सा और झींगा जैसी मछलियों को तो खत्म ही कर दिया। झींगा मछली मीठे पानी में रहती है और अंडे देने के लिए खारे पानी में जाती है। उधर, हिल्सा खारे पानी में रहती है लेकिन अंडे देने के लिए मीठे पानी की ओर आती है। फरक्का बैराज मीठे और खारे पानी के बीच खड़ा हुआ। मछलियों की आवाजाही के लिए जो रास्ते छोड़े गए, वे बेकार पड़ गए।’

गंगा की बात चलती है तो टिहरी पर अक्सर बात होती है लेकिन फरक्का पर कभी उस तरह से बात नहीं होती। हालांकि वीरभद्र मिश्र से लेकर यूके चौधरी जैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि फरक्का का आकलन जरूरी है, वरना आज अविरल धार-निर्मल धार की मांग हो रही है, कुछ सालों बाद जलमग्न इलाकों को बचाने में पूरी ऊर्जा लगानी होगी। दरअसल फरक्का नदी के साथ प्राकृतिक रूप से बहने वाले बालू और मिट्टी को रोकते जा रहा है। इसकी वजह से गंगा में रेत के टापू बन रहे हैं। इन टापुओं की वजह से गंगा बाढ़ के दिनों में आस-पास के इलाके का कटाव करती है और गांव के गांव साफ हो जाते हैं। प. बंगाल में मालदा का पंचाननपुर जैसा विशाल गांव तो इसका एक उदाहरण रहा है, जिसका अस्तित्व ही खत्म हो गया। बैराज से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव सिमलतल्ला का भी अब कोई अस्तित्व नहीं है, जो हजार घरों वाला आबाद गांव हुआ करता था। रेत के टापू बनने का सिलसिला झारखंड के राजमहल तक पहुंच चुका है। बिहार के कई हिस्सों में गंगा की वजह से दूसरी नदियों में गाद के ढेरों टापू बनने लगे हैं जिससे जलजमाव के इलाके भी बढ़ने लगे हैं।

फरक्का के आंकड़े कहते हैं कि 1975 में जब यह बैराज बना था तो मार्च के महीने में भी वहां 72 फुट तक पानी रहता था, अब नदी के बालू-मिट्टी से भरते जाने की वजह से नदी की गहराई 12-13 फीट तक रह गई है। बैराज के कारण पांच लाख से अधिक लोग अब तक अपनी जमीन से उखड़ चुके हैं और बंगाल के मालदा तथा मुर्शिदाबाद जिले की 600 वर्ग किलोमीटर से अधिक उपजाऊ जमीन गंगा में विलीन हो चुकी है। यूके चौधरी कहते हैं, ‘बेवकूफाना अंदाज में एक ऐसा बैराज बना दिया गया है जो सिर्फ और सिर्फ तबाही और विनाश का ही कारण बनता जा रहा है। फरक्का के आस-पास साल भर बाढ़ का खतरा बना रहता है। वहां 110 फुट से ऊंचाई तक बालू जमा हो गया है। 100 से अधिक गांव गंगा में समाने की राह पर हैं। लेकिन अपने देश में तो बस सारा जोर किसी तरह निर्माण करने पर ही रहता है। बाद में कोई एसेसमेंट तो होता ही नहीं। न आज तक टिहरी का एसेसमेंट हुआ, न फरक्का का।’

गंगा का मायका कहे जाने वाले उत्तराखंड में भी हालात अच्छे नहीं है। हरिद्वार जिले में नियम-कायदों का मखौल उड़ाकर नदी के तल में होते खनन की खबरें पिछले कुछ समय से आम रही हैं। तहलका ने कुछ समय पहले यहां कई किसानों से मुलाकात की थी जिन्होंने बताया था कि इस खनन का उनकी जिंदगी पर कितना बुरा असर पड़ रहा है। मिस्सरपुर के किसान जीतेंद्र सैनी का कहना था, ‘बरसात के दौरान पहाड़ों से पोषक तत्वों से युक्त मिट्टी बहकर आती है। पहले यह मिट्टी मैदानी इलाके में आते ही बढ़ते जल स्तर के साथ खेतों में भर जाती थी। इसे हम किसान ‘पांगी चढ़ना’ कहते हैं। खनन से नदी का पाट गहरा हुआ है जिससे नदियों का पानी सीधे आगे बढ़ जाता है और इस मिट्टी का फायदा किसानों को नहीं मिल पाता। ऊपर से क्रेशरों की धूल। इस सबसे हमारी खेती चौपट हो रही है।’

फरक्का बैराज गंगा के साथ प्राकृतिक रूप से बहने वाले बालू और मिट्टी को रोकते जा रहा है। इसकी वजह से गंगा में रेत के टापू बन रहे हैं। इन टापुओं की वजह से गंगा बाढ़ के दिनों में आस-पास के इलाके का कटाव करती है और गांव के गांव साफ हो जाते हैं। प. बंगाल में मालदा का पंचाननपुर जैसा विशाल गांव तो इसका एक उदाहरण रहा है, जिसका अस्तित्व ही खत्म हो गया। बैराज से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव सिमलतल्ला का भी अब कोई अस्तित्व नहीं है।

हरिद्वार वह इलाका है जहां गंगा मैदान में आती है। थोड़ा और ऊपर जाकर पहाड़ों में देखें तो वहां भी गंगा को बांधने की कोशिशों ने तबाही की कई कहानियां लिखी हैं। टिहरी बांध को ही लीजिए। दुनिया में आठवें सबसे ऊंचे इस बांध ने साढ़े तीन दशक पहले विस्थापन की जो कहानी शुरू की थी वह आज तक खत्म नहीं हुई है। टिहरी बांध परियोजना के कारण टिहरी शहर के अलावा 125 गांव प्रभावित हुए। शुरुआत में यह आकलन किया गया था कि इस परियोजना से टिहरी शहर के अलावा 39 गांव पूर्णतया और 86 गांव आंशिक रूप से प्रभावित होंगे। लेकिन यह संख्या बढ़ती जा रही है। दो साल पहले इस बांध के करीब 44 किलोमीटर लंबे जलाशय का स्तर 832 मीटर क्या पहुंचा इसके ऊपर स्थित पहाड़ों पर बसे दर्जनों गांव धंसने लगे। दरअसल झील का पानी लगातार उन ढलानों को कमजोर कर रहा है जिन पर ये गांव बसे हैं। यह इन गांवों में जाकर भी देखा जा सकता है जहां खेतों और मकानों के धंसने की घटनाएं आम हो चली हैं।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि ये ढलानें अस्थिर हो रही हैं जिसके नतीजे में ये गांव कभी भी गंगा के पानी से बनी विशाल झील में समा सकते हैं। यह तो एक बांध की बात है। उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बन चुके या फिर बन रहे ऐसे बांधों का आंकड़ा 600 के करीब है। चिंता की बात इसलिए भी है कि इनमें ज्यादातर ऐसे हैं जिनमें काम मनमानी की तर्ज पर हो रहा है। कैग की रिपोर्ट ही बता रही है कि उत्तराखंड में बन चुके या बन रहे 85 फीसदी बांधों की क्षमता में मूल प्रस्ताव से 22 से 329 फीसदी तक बदलाव किया गया है। श्रीनगर के पास धारी नाम के एक गांव में रहने वाले बीबी चमोली कहते हैं कि ये बांध शक्ति का नहीं बल्कि छल और विनाश का प्रतीक हैं। अपने घर के पास बन रही एक परियोजना का हवाला देते हुए वे कहते हैं, ‘मंजूरी मिलते वक्त इसे आवंटित की गई क्षमता 200 मेगावॉट और ऊंचाई 63 मीटर थी। अचानक ऊंचाई और क्षमता बढ़ाकर 93 मीटर और 330 मेगावॉट कर दी गई। बड़ी अजीब बात है। कौन देता है इसकी मंजूरी।’ कैग की रिपोर्ट आगाह भी करती है कि इतनी सारी परियोजनाएं उस क्षेत्र में बनाई जा रही हैं जो भूगर्भीय रूप से बहुत अस्थिर है और भूकंप के लिहाज से जोन पांच में स्थित है। बांध निर्माण का एक पक्ष यह भी है कि जब भी इससे पानी छोड़ा जाता है तो नदी का स्तर एकदम से बढ़ जाता है। अचानक आए पानी के साथ लोगों के बहने के किस्सों की इस इलाके में कमी नहीं।

फरक्का बैराज की वजह से टापू बनता गंगा का क्षेत्र

‘मिशन फॉर क्लीन गंगा 2020 ब्यूरोक्रेटों की चोंचलेबाजी और चालबाजी है’

,br> गंगा की इस देश के लिए क्या कीमत है, इसे किसी आंकड़े से नहीं बताया जा सकता। एक सभ्यता को पालने-पोसने की कोई कीमत लगाई भी कैसे जा सकती है? सदियों से गंगा एक बड़ी जनसंख्या का भौतिक और आध्यात्मिक पोषण करती आई है। इसके पारिस्थितिकी तंत्र और इसके सहारे चल रही बिजली और सिंचाई परियोजनाओं को देखा जाए तो आज भी करोड़ों लोगों की जिंदगी इसके सहारे ही चल रही है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस सभ्यता को इसने जन्म दिया वही सभ्यता इसका दम घोंटने पर उतारू है। जल संरक्षण पर काम करने वाले समाजशास्त्री प्रभात शांडिल्य कहते हैं, ‘अब यही समझिए कि गंगा को मोर और बाघ की तरह देखेंगे। यह जिस दिन राष्ट्रीय प्रतीक बनी, उसी दिन यह संकेत भी मिल गया कि अब यह भी दुर्लभ-सी हो जाएगी।’ उत्तर प्रदेश के मिरजापुर-चुनार के इलाके में गंगा किनारे चरवाही करने वाले अनपढ़ सिताराम यादव दो मिनट में सहजता से गंगा का गणित समझाते हैं। कहते हैं, ‘गंगा में पानिये ना रही तो खेती कईसे होई। माल-मवेशी कईसे जिंदा रही। ज खेतिये ना होई, माल-मवेशी ना रही तो गांव के लोग कवना चीज के असरा में गांव में बईठल रही। सबलोग शहर भागी। शहर में रहे के जगह ना मिली तो मार-काट मची। डकैती-जनमरउवल रोज होई।’

इसी क्रम में इलाहाबाद में संतन पांडेय मिलते हैं। गंगा पर बात करने पर कुछ बोलने के बजाय वे पहले अपनी जेब से अखबार की एक कतरन निकालकर पकड़ा देते हैं। वह कतरन 17 अप्रैल को नई दिल्ली में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथॉरिटी की हुई तीसरी मीटिंग की खबर वाली होती है, जिसमें प्रधानमंत्री का यह बयान शीर्षक में है- ‘गंगा के पास अब समय बहुत कम बचा है, इसे शीघ्र साफ करना होगा।’ संतन कहते हैं, ‘हम लोग तो गंगा को खत्म होते हुए करीब से देख रहे हैं। लेकिन खास यही है कि अब दिल्ली में रहने वाले प्रधानमंत्री भी स्वीकारने लगे हैं कि गंगा के पास समय कम बचा है।’ संतन अखबार की कतरन वापस मांग लेते हैं और कहते हैं, ‘अब जरा आप लोग दिल्ली में पूछिए प्रधानमंत्री जी से कि वे गंगा की किस तरह की सफाई जल्दी चाहते हैं। गंदगी को साफ करने की बात कर रहे हैं या गंगा को ही सदा-सदा के लिए…!’

कैसे साफ होगी गंगा?

चर्चित नदी विज्ञानी डॉ. यूके चौधरी का मानना है कि गंगा के सामने आज जितनी समस्याएं या चुनौतियां हैं, उसके मूल में इसके जल की क्वांटिटी का कम होना ही प्रमुख है। वे कहते हैं, ‘गंगा में यदि प्रवाह रहे और बालू आदि की मात्रा सही रहे तो गंगा खुद ही गंदगी को साफ करने में सक्षम है। बालू में शोधक क्षमता बहुत होती है और वह ऐसी गंदगियों को खुद में मिला लेता है। इसलिए गंगा में प्रवाह रहे तो ऐसी गंदगियां बहुत हद तक खुद-ब-खुद साफ होती रहेंगी।’ गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री आचार्य जितेंद्र भी मानते हैं कि अविरलता के बिना निर्मल गंगा की कामना नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक सिर्फ निर्मलता के नाम का जाप वे लोग ज्यादा करते रहते हैं जिनकी रुचि इसके नाम पर बजट बढ़ाने-बढ़वाने का खेल करने में होती है। बनारस में चल रहे गंगा आंदोलन के संरक्षक और गंगा सेवा अभियानम के संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं कि सबसे 0बड़ी चुनौती गंगा की अविरलता को लेकर ही है।

हालांकि सब लोग ऐसा नहीं मानते। गंगा के लिए संघर्षरत और संकटमोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष वीरभद्र मिश्र का मानना है कि सिर्फ अविरलता से बात नहीं बनेगी। वे कहते हैं, ‘गंगा में 95 फीसदी प्रदूषण सीवर और औद्योगिक कचरों से है।’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘देश को बिजली की जरूरत है, उस पर विचार किया जाना चाहिए लेकिन मैं यह तर्क कतई स्वीकार नहीं करता कि टिहरी से फ्लो बढ़ा दो, गंदगी को बहा ले जाएगी गंगा। धर्माचार्य आंदोलन तो कर रहे हैं लेकिन सीवर आदि पर नहीं बोलते, क्योंकि बनारस, इलाहाबाद आदि जगहों पर वे खुद अपना सीवर गंगा में बहा रहे हैं। धर्माचार्य बस किसी तरह एक माह टिहरी से पानी छोड़ने की जिद करते हैं कि कुंभ और माघ मेला पार लग जाए। यह तो गंगा को टायलेट की तरह मान लेना है कि गंगा शौचालय है, मल-मूत्र-गंदगी डालते रहिए और ऊपर टिहरी से पानी मारकर फ्लश करते रहिए।’ जल संरक्षण पर अपने काम के लिए चर्चित राजेंद्र सिंह कहते हैं कि गंगा को सिर्फ राष्ट्रीय नदी घोषित भर किया गया है लेकिन राष्ट्रीय सम्मान जैसा तो कुछ नहीं दिया गया। वे कहते हैं, ‘जो राष्ट्रध्वज का अपमान करता है, राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान का मजाक उड़ाता है, उसके लिए दंड की व्यवस्था है लेकिन गंगा के मामले में तो ऐसा अब तक कुछ भी होता नहीं दिखता।’ उनके मुताबिक जब ऐसा होगा तभी कुछ बात बनेगी। उधर, एक वर्ग का यह भी मानना है कि बांध हों या बैराज, जब तक गंगा पर हुए निर्माणों का ठीक से आकलन नहीं होगा तब तक बात नहीं बनेगी। यूके चौधरी कहते हैं, ‘भारत में गंगा या दूसरी नदियों पर निर्माण के लिए विशेषज्ञों को रखने का चलन है। बाकी दुनिया में इंजीनियरों की सेवा ली जाती है। यहां पैथोलॉजिस्टों से ही बीमार गंगा के संपूर्ण इलाज की उम्मीद की जा रही है, कभी डॉक्टरों से भी तो रायशुमारी करते कि मर्ज कैसे दूर होगा।’

(मनोज रावत और बृजेश पांडे के योगदान के साथ)

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