पुअर इंटेलेक्चुअल मीडिया का नया आविष्कार : सन्नी लियोन का भारतीय सिनिमा में पदार्पण

Posted: August 13, 2012 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

 

  महेश भट्ट से तो फिल्मो के माध्यम से यह समाज पहल्रे ही रूबरू हों चूका हें तथा उनकी समझ भी सब जानते हैं. उन्ही भट्ट के द्वारा जिस्म -२ बनाने व पर्दे पर उतारने के साथ ही सन्नी लियोन का पदार्पण भी भारतीय सिनिमा जगत में हों चूका हैं.

महेश भट्ट व सनी लियोन कि पृष्टभूमि :- महेश भट्ट को हमेशा लोकतंत्र के पतनशील मूल्यों का अगुवा बनने की होड़ में अपने आपको आगे रखकर स्वयं बिकना ही पसन्द हैं. भट्ट सनी लियोन की नीली फिल्मों का प्रचार करने व बिक्री बढ़ाने के लिये अपने आपके जमीर को सनी लियोन व उसके मालिकों के हाथों बेच चुके हैं ! सनी लियोन भारतीय मशहूर फ़िल्मी हस्तियों की विभिन्न तरह से प्रसंशा करते हुवे अपनी रूचि व पसन्द से उन्हें जोड़ती हैं. इस तरह एक मनोवैज्ञानिक छाप छोड़कर उनके समर्थकों के भीतर भी सेंधमारी कर अपनी नीली फिल्मों के बाजार का विस्तार कर रही हैं. इस तरह लोकतान्त्रिक जीवन मूल्यो के अंतर्गत व आधार पर निरपेक्ष व्यक्तिगत स्वतंत्रता व स्व्चंद्ता से सन्नी लियोन के व्यवसाय जेसे में परिणिती होती हैं. वह भी एक व्यवसाय के रूप स्वीक्रत होकर समाज के एक विशेष तबके में अंततः आदर्श का रूप ले लेता हैं.

शायद भारतीय ‘संभ्रांत समाज’ के लोग जानते होंगे कि यह सनी कोन हैं?  यह वही सन्नी तो हैं जो रियलटी शो बिग बॉस से भारतीय छोटे पर्दे पर उतरी थी. अब फिल्म देखने के समय बच्चे व वर्द्ध पूछें रहें होंगे कि यह हिरोईन कोन हैं व फ़िल्मों में आने से पहले यह क्या करती थी ? अब हम उन्हें क्या जवाब दे? हम उन्हें यह नहीं कह सकते कि यह जिस तरह यंहा कला का रूप प्रदर्शित कर रही हैं परन्तु काम इससे भी घ्रणित करती हैं. ! अब शिकायत भी किसको करे क्योंकि इसे सेंसर बोर्ड ने तो अडल्ट फिल्म के रूप में पहले ही स्वीक्रति दे दी. अब कुच्छ नहीं ढक सकते ना ! एक सनी ने सार्वजनिक परदे पर यों कपड़े नहीं उतारे बल्कि अब समाज बेपर्दा हों रहा हैं. समाज के कपड़े उतरने में अब भी कोई कमी बची हों तो बतावें ! सवाल पैदा होता हैं कि आखिर हमारी परणिति इस व्यवस्था में यही हैं क्या ? सनी अकेली नहीं हैं जो इस तरह काम करती हों ! वस्तुतः लोकतंत्र की पतनशील अवस्था में इंसान के विचार, भावनाएं, संवेदना, जिस्म, सब कुच्छ पूंजी की प्रतिस्पर्धा में भोग व उपभोग के लिये विक्रय का उत्पाद बन जाते हैं. इन सब कारणों से सनी जेसो का धंधा व धन दुनिया में सबसे अधिक दर से बढ़ता जा रहा हैं.

१.व्यक्ति कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता, स्वच्छता व  उदार जीवन – इसे आखिर कानून तो रोक नहीं सकता क्योंकि वह व्यक्ति कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता कि रक्षा करता हैं. हम इसे परम्परा के द्रष्टिकोण से नकार सकते हैं मगर सत्ता के अनुसार कानून परम्परा से ऊपर हैं. कानून लोकतंत्र कि विचारधारा, सोच, चिंतन व व्यवहार के अनुसार बनते हैं व उसी का पालन करते हैं.  जब कानून व्यक्ति कि निरपेक्ष अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रताबन करता हैं, जिस तरह वर्तमान समय में हों रहा हैं. इसका नतीजा भी सन्नी लियोन के रूप में हमारे सामने आता हैं तथा वही फिर आगे जाकर आदर्श के रूप में स्थापित होता हैं.

दरअसल उदारता सोच व स्तर के तोर पर समाज के भीतरी ढांचे में विचारिक द्वन्द्ध के कारण सदेव विध्यमान रही हैं. परन्तु आज के समय में तो व्यक्ति के समाज से अलगांव के कारण और उदारीक सोच अधिक कमजोर हुवी हैं. व्यक्ति व समाज तथा विभिन्न समुदायों के मध्य सम्बन्धों में विचार, बात, सोच, चिंतन, व्यवहार आदि में उदारता तो कट्टरता में बदल रही हैं. अब हर बात में उदारता कंहा रह गई हैं?  लोकतांत्रिक व्यक्तिगत निरपेक्ष स्वन्त्रता कि सोच व भाव हमें स्वछंदता कि तरफ़ ले जाते हैं जिससे व्यक्ति में निराह भोतिकवाद कि लालसा, लिप्सा पैदा होती हैं.  यह परवर्ती निराह उपभोक्तावाद व भोगवाद के रूप में परिलिक्ष होती हैं जो कि आगे जाकर आत्महन्ता बना देती हैं.

२.वैकल्पिक सोच कि तरफ चिंतन – फिर हमारे सामने ऐसी कोनसी सामाजिक व्यव्यस्था हों सकती हैं जो कि अनुकरण के लिये हम अपनए व कोनसे आधारभूत सामाजिक मूल्य हैं जो तात्कालिक परिस्थितियों में आदर्श हों ?हम इसे लोकिक या सांसारिक रूप में देखें तो एक वैकल्पिक विध्यमान व्यवस्था पर बात कर सकते हैं.  आखिर हम उनकी आवाज क्यों नहीं सुनते जो कहते हैं कि परम्परा में भी विज्ञान व मनोविज्ञान हैं!

व्यवस्था का आधार यही हों सकता हैं : – कोई भी व्यवस्था व्यक्ति से ही शुरू होती हैं. व्यक्ति का स्वरूप मूल रूप से शक्ति की रचना पर अर्धनारीश्वर का हैं. दोनों मिलके परिवार बनाते हैं. फिर कुटुंब व समन्धि व रिश्तेदारों का समुदाय बनता हैं.  वंहा कबीला, जाती, जनजाति आदि के साथ स्थानीय समाज की सामूदायिकता, वातावरण व प्रक्रति का प्रभाव प्रमुख कारक बनकर परिवेशिकी का स्वरूप ग्रहण करते हैं. परिवार के बाद हम इस परिवेशिकी को लौकिक व सही अर्थो मे जन्मभूमि कहते हैं.                 जन्मभूमि के बाद कर्मभूमि करका होती हैं. कर्मभूमि अपने आप मे जन्मभूमि भी हो सकती व तथा दूर भी हो सकती हैं, परन्तु कर्मभूमि को जन्मभूमि से कटना नहीं चाहिए व उसे सींचने से ही स्रजन की सतत प्रक्रिया मे बाधा व टकराव कम होता हैं. जन्मभूमि अपने परिवेशिकी के कारकों कों समाहित रखते हुवे स्रजन का आधार होने के कारण सभ्यता की जड़ कही जा सकती हैं. अतः हम कहते भी हैं की जो जन्मभूमि से कट जाता हैं वह अपनी जड़ों से भी कट जाता हैं. जन्मभूमि संस्क्रति की जननी होकर उसमे गतिशीलता बनाये रखती हैं व इससे ही स्रजन को बल मिलता हैं. जन्मभूमि ही संस्क्रति की पालनहार, रक्षक व सरंक्षक भी होती हैं.

हम उस संस्कृति, विचार, सोच, चिंतन पर निर्भर हैं जो कि परिवार व स्त्री-पुरुष के मध्य के संबंधो से विकसित हुवे हैं. जंहा स्त्री-पुरुष के मध्य अन्तरनिर्भर, सापेक्ष व समन्वित आधारित सामाजिक जीवन मूल्य वास्तविक व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रदान करता हैं. अतः समय कि गति देखते व समझते हुवे हम स्त्री व पुरुष सम्बन्धों को विरोधी व निरपेक्ष नहीं मान सकते हैं. स्त्री-पुरुष दोनों अगर विरोधी हैं तो व्यक्तिगत पहचान अधुरी हैं व साथ साथ हैं तो व्यक्तिगत पहचान पूर्ण. सापेक्षता प्रक्रति का नियम हैं व हमारा स्त्री-पुरुष के संबंध भी उसी नियम से चलते हैं.

 प्रसंगवश :- अति वंहा हैं जंहा वे लोकतांत्रिक व्यवस्था व कानून के द्वरा एक दुसरे के विरुद्ध खड़े किया जा रहें हों और हम भी किसी एक के साथ निरपेक्ष भाव के साथ खड़े होकर उसी “विद्रोह” का अंग बने !

सचे अर्थो में पुरुष व स्त्री को विद्रोह भी साथ ही लड़ना होगा. इसमें दोनों ही एक दुसरे के सहायक हैं. इससे अलग वंहा खतरा हैं. जंहा से सीधे ही आदिम युग में ना चले जाना . सन्नी लियोन का रास्ता हमें उसी कि तरफ़ ले जाने को लालायत करता हैं.

मैने तो एक बात सबके सामने रखी हैं व विचार रखे कि हवा कि बयार व दिशा इस लोकतंत्रिक समाज में यह लगती हैं. मैं यह तो कह रहा हूँ इस समाज व्यवस्था के रहते अधिकांश को उसी हवा व  दिशा कि तरफ़ जाना हैं. जब तक हम इसकी पहचान नहीं कर पाते कि इस हवा कि दिशा कोन तय कर रहें हैं व किन अंतर्विरोधों के चलते हमें उसी तरफ ले जाया जा रहा हैं तब तक हम इसके विकल्प हेतु किया जाने वाला संघर्ष भटकता ही रहेगा !

by भूपट शूट on Tuesday, August 7, 2012 at 7:30pm ·

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