हिन्दी न्यूज चैनल की पत्रकारिता

Posted: August 14, 2012 in Education, Politics, Youths and Nation

Punya Prasun Bajpai
जंतर-मंतर की आवाज 10 जनपथ या 7 रेसकोर्स तक पहुंचेगी। देखिये इस बार भीड़ है ही नहीं। लोग गायब हैं। पहले वाला समां नहीं है। तो जंतर-मंतर की आवाज या यहां हो रहे अनशन का मतलब ही क्या है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि अन्ना आंदोलन सोलह महीने में ही फेल हो गया। थोड़ा इंतजार करना है। यह अन्ना टीम के अनशन की शुरुआत पर न्यूज चैनल में संवाद का हिस्सा है। और चार दिन बाद जब अन्ना हजारे खुद अनशन पर बैठे तो…जंतर-मंतर पर आज क्या हाल है। देखिये लोग जुट रहे हैं। लेकिन वह समां अब भी नहीं है जो रामलीला मैदान में था। तो क्या इसे फेल माना जाये । देखिये सरकार तो बातचीत करने के दिशा में कुछ भी नहीं कह रही है तो फेल ही मानिये।

मारुति के जीएम को जिन्दा जलाया गया है। इसका असर क्या है। असर तो अच्छा खासा है। पुलिस बंदोबस्त जबरदस्त बढ़ गया है। मारुति पर ताला चढ़ा दिया गया है। पुलिस लगातार पूछताछ कर रही है। तो क्या यहा काम शुरु नहीं होगा। कह नहीं सकते। लेकिन पुलिस बंदोबस्त लगातार बढा हुआ है। कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। यह दिल्ली से सटे मनोसर में मारुति प्लांट में हुई हिंसा के बाद न्यूज चैनल में संवाद का शुरुआती क्षण हैं। और चार दिन बाद जब मारुति के गुजरात जाने की खबर आने लगी । तो क्या मारुति प्लांट अब गुजरात शिफ्ट हो जायेगी। यह तो तुरंत कहना मुश्किल है । लेकिन पुलिस बंदोबस्त बताता है कि सरकार हरकत में आयी है। यहां धारा 144 भी लगा दी गई गई है। अब कोई गडबड़ी होने देना नहीं चाहती सरकार। फिर प्लांट शुरु कब से होगा। यह तो कहा नहीं जा सकता । लेकिन

जबरदस्त पुलिस बंदोबस्त है। कुछ जापानियों को बेहद डरे हुये हमने देखा।

जिस तरह कोकराझार में हिंसा हुई क्या उसे रोकने के कोई उपाय नही किये जा रहे है। यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन हिंसा अब भी जारी है। 19 लोग मर चुके है । 50 हजार से ज्यादा विस्थापित हो चुके है । हालात है कैसे।बहुत बुरे है। लगातार हिंसा जारी है। लोग हरे हुये है । पुलिस के साथ साथ सेना को भी बुलाया गया है। यह असम के कोकराझार में हिंसा की खबरों के बीच पहले दिन न्यूज चैनल का अपने संवाददाता से संवाद है। और चार दिन बाद । अब कोकराझार के हालात कैसे है । बहुत कठिन हालात हैं। पुलिस बंदोबस्त लगातार बढाया गया है। सेना की 18 कंपनियां भी तैनात हैं। लेकिन हिंसा छिटपुट लगातार जारी है। लोग परेशान हैं। मरने वालों की संख्या बढकर 40 पहुंच गई है। तो फिर पुलिस सेना या सरकार क्या कर रही है। वह फ्लैग मार्च कर रही है। लेकिन हिंसा लगातार जारी है । शरणार्थी कैंप में 2 लाख से ज्यादा लोग पनाह लिये हुये हैं। कोई शांति का रास्ता तो दिखायी दे रहा नहीं है।

अन्ना, मारुति और कोकराझार की खबरों को लेकर अगर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों को टोटले या फिर इस दौर में जितनी भी महत्वपूर्ण खबरें आपको याद आती हो। चाहे वह गुवाहाटी में लडकी के साथ की गई बदसलूकी हो या फिर पुणे में सिरियल ब्लास्ट। एंकर-रिपोर्टर के बीच का संवाद खबरों को लेकर जिस स्तर का होता है वह आपके सामने एक प्रशनचिन्ह लगा सकता है कि आखिर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों के जरीये कोई भी दर्शक किसी खबर के पीछे की परिस्थियां या खबर के कैनवास को समझना चाहे तो उसे मुश्किल होगी । लगातार जानकारी का दोहराव। जो कैमरे से दिखायी दे रहा है उसे ही शब्दों में ढाल कर बताने का प्रयास। बहुत तेजी से खबरों को बताने की होड़। लगभग खबरों जैसा ही खुद को ढालने की अदाकारी। यानी विस्फोट की खबर है तो हाफंता हुआ रिपोर्टर। कोई हादसा हुआ है तो दर्द से कराहता रिपोर्टर।हिंसा हुई है तो पुलिसिया अंदाज में अपनी मौजूदगी का एहसास कराता रिपोर्टर। यानी किसी घटना के बाद अगर खबर को राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में या फिर घटना क्यों महत्वपूर्ण है इसे देखने-समझने की कुबुलाहट देखने वाले में है तो वह झुझला सकता है कि सीमित जानकारी में कोई रिपोर्टर और एंकर कैसे घंटों निकाल देते हैं। और उन्हे इस सच से कोई मतलब नहीं होता कि खबर के बारे में जानकारी के दायरे को बढ़ाने की जरुरत भी है।

असल सवाल यही से शुरु होता है कि आखिर हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलों का स्तर लगातार गिर क्यों रहा है। अगर भूत-प्रेत या तमाशा से निजात मिलती भी है तो राजनीतिक या सामाजिक खबरें भी किसी तमाशे की तरह क्यों सामने रखी जाती है। खबर बताने की जल्दबाजी या तेजी से बताने की सोच हर खबर को ब्रेकिंग न्यूज तले चलाते हुये क्या खबरों को लेकर न्यूज चैनलों की साख बरकरार रखी जा सकती है। लेकिन अगर कोई संपादक आपसे यह कहे कि साख की परिभाषा है क्या। तो आप क्या कहेंगे। जाहिर है समझ का दायरा खबरों को परोसने के तरीके से लेकर खबर को खबर समझने या खबर को खबर से इतर तमाशे की तरह रखने दिखाने में जब जा सिमटा हो तब पत्रकारिता का मतलब बचेगा कहां। असल में न्यूज चैनलों के भीतर मीडियाकर्मी होने की साख की परिभाषा भी बदल दी गई है क्योंकि पत्रकार की साख उसे खबरों की तह तक तो पहुंचा सकती है लेकिन तह की खबरों को बताने में जितना वक्त चाहिये संयोग से उतना वक्त भी न्यूज चैनल किसी साख वाले रिपोर्टर को देने के लिये तैयार नहीं है।

सेकेंड और मिनट को गुथते हुये हर आधे घंटे की प्रोग्रामिंग की सफलता उसी के मत्थे चढ़ती है जो लगातार सनसनाहट भरा स्वाद खबरो के जरीये परोसता रहे । जिसमें मनोरंजन का तड़का हो। जिसमें रिपोर्टर की जोकरई या एंकर की नासमझी भी देखने वालो में अगर उत्सुकता जगा दें तो भी चलेगा। जाहिर है इन परिस्थितयों के लिये दोष न्यूज चैनलों के भीतर की अर्थव्यवस्था को संभालने में लगे संपादक की समझ पर भी मढ़ा जा सकता है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। असल में 2003 से 2008 तक ज्यादातर भर्ती हर न्यूज चैनल में उन छात्रों की हुई, जिन्हें मशीन पर काम करने का ज्ञान था या कहें टीवी तकनालाजी को समझते थे। क्योंकि एचआर यानी ह्यूमन रिसोर्स विभाग की प्राथमिकता ऑफिस टू कोस्ट यानी किसी की भर्ती के साथ ही किस कर्मचारी पर कितना खर्ज न्यूज चैनल को करना पड़ेगा, उसका सरल उपाय यही निकाला गया कि मशीन या कही तकनालाजी को समझने वाला तो तुरंत काम में आ जायेगा। और धीरे धीरे वह खबरों का ज्ञान भी पा लेगा। लेकिन खबरों के ज्ञान वाले की भर्ती हो गई तो उसे तकनालाजी सिखने में लंबा वक्त लगेगा। उसके खर्चे का भार तो न्यूज चैनल पर ही आयेगा। जाहिर है इस प्रक्रिया में स्क्रीन पर क्या दिखाया जा रहा है और वह कैसा लगता है। स्क्रिन का रंग। ग्राफिक्स डिजाइन। खबर के साथ विज्ञापन भी चलाने की होड़। इसी में सारी ताकत न्यूज रुम की लगने लगी । अधिकतर न्यूज चैनलो में संपादको ने इसी समझ को विकसित किया। इसलिये न्यूज गैदरिंग यानी खबरों को लाने पर खर्चा कमोवेश हर न्यूज चैनल में अन्य खर्चो से सबसे कम होता गया है। इसका एक असर अगर तमाशा दिखा कर वाह वाह करने वाले रिपोर्टर या डेस्क की ताकत का बढना हो गया तो दूसरी तरफ राजनीतिक-सामाजिक या आर्थिक विसंगतियों को पकड़ने वाले रिपोर्टर पीछे छूटते चले गये। और जब जब ऐसे मौके आये जब किसी खबर ने देश को हिलाया तो रिपोर्टर स्क्रीन पर खबर का विश्लेषण करते वक्त तमाशा करता हुआ सा ही दिखा । और उसकी बडी वजह चंद रुपये में सबसे ज्यादा टीआरपी पाने वाले कार्यक्रमों का बनना भी है। दाउद की पार्टी में बालीवुड के सितारों का नाचना गाना या फिर खली की पहलवानी की सीडी जब मेरठ या बुलंदशहर के खुले बाजार में 50 रुपये में मिल जाती है और उसे सीधे दिखा कर किसीएंकर-रिपोर्टर को मजा लेते रहना है और इसकी टीआरपी अगर सबसे ज्यादा होगी तो फिर रिपोर्टर की सफलता खबर लाने में होगी या फिर सीडी जुगाड करने में । रिपोर्टर मेरठ के सीडी बाजार के भीतर का सच बताने की जद्दोजहद करे या फिर मेरठ से सीडी ले आये। जाहिर है यहा से नया सवाल टीआरपी का भी जुड़ता है। यानी टैम के जिन मीटरों के आसरे टीआरपी की गणना होती है, अगर वह मीटर आर्थिक तौर पर निम्न या निम्न मध्यम तबको के घरों में ही लगे हो तो फिर उनकी पंसद के कार्यक्रम कौन से होंगे। तो राष्ट्रीय न्यूज चैनल को जहन में रखना होगा कि देश की समस्या या हाशिये पर पड़े समाज से जुड़ी खबरें टीआरपी मीटर लगे घरों के लिये मायने रखेगी या फिर जिस वक्त कोई न्यूज चैनल कोई गंभीर विषय पर काम कर रहा है और उसी वक्त पांच सिर वाले नाग-देवता किसी चैनल के स्क्रीन पर दिखायी देने लगे तो क्या होगा। यह सारे टकराव न्यूज चैनलो के पर्दे पर खूब हुये हैं। एक राष्ट्रीय चैनल ने एक वक्त अल्पसंख्यकों की मुश्किलातों पर कार्यक्रम किया। तो उसी वक्त एक दूसरे राष्ट्रीय न्यूज चैनल के स्क्रीन पर सांप नाचने लगा। लाखो रुपये खर्च कर बना अल्पसंख्यकों का कार्यक्रम सांप के आगे टीआरपी में टिक ना सका। और अलंपसंख्यकों को दिखाने वाले चैनल के संपादक ने भी मुनादी करा दी कि जो तमाशा ला कर देगा वही सबसे बडा रिपोर्टर होगा। तो पर्दे पर रिपोर्टर का हुनर ही बदलने लगा। लेकिन इसके सामानांतर एक तीसरी जमात भी तेजी से पनपी जो टीआरपी को लेकर चैनलो के संपादको पर भारी पड़ने लगी। वह टैम के मीटर में सेंध लगाने वाली है। इस जमात का काम टैम के मीटर वाले घर में जाकर टीआरपी नोट करने वाले घरो को पकड़ना हो गया। और जिस भी घर में मीटर पकड़ाया उससे सौदा कर एक घंटे का स्लाट किसी खास चैनल के किसी कार्यक्रम को चलाने का हो गया। यानी बाकी वक्त मीटर लगे घर वाला अपने कार्यक्रम देखे लेकिन सिर्फ एक घंटा सेंघ लगाने वाले के चलाये। यग सेंध टीआरपी इलाको में लगी। और सेंध लगाने वाले चैनलो की नौकरी छोड़ अपनी कंपनी बनाकर मौजूदा दौर में न्यूज चैनलों के साथ सौदा करने में भिड़े हैं। सेंध से किसी भी चैनल की टीआरपी में 2 से 3 टीआरपी के बढने का असर तुरंत दिखायी देता है। यह बीते चार बरस में जमकर हुआ है और फिरलहाल भी जारी है। यानी कोई संपादक अगर किसी नये न्यूज चैनल में जाता है तो टीआरपी बढाने के अपने हुनर की ही सौदेबाजी करता है और इसके बाद कार्यक्रम की क्लाविटी कैसे गिरती है या फिर न्यूज रुम में पत्रकार होने पर कैसे आउट-पुट यानी डेस्क के लोग कैसे मजाक उड़ाते है यह किसी से छुपा नहीं है।

अब जरा सोचिये कि हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर अगर किसी विस्फोट, किसी हिंसा या किसी आंदोलन की कवरेज होगी तो कैसी होगी। कोई राजनीतिक घटनाक्रम देश की सियासत को प्रभावित कर रहा होगा तो उसका विशलेषण सिवाय नेताओं का नाम लेकर या उनके मुह में माईक ठूंस कर कुछ भी उगलवाना ही एक्सक्लूसिव खबर के तौर पर ही तो चलेगी। एक्सक्लूसिव खबर के तौर पर नेताओं को पकड़ना ही रिपोर्टर की फितरत बनती चली जा रही है। यानी जिस नेता के साथ जिस न्यूज चैनल के रिपोर्टर के संबंध है और वह उसे अपने मुताबिक किसी घटना विशेष को लेकर इंटरव्यू या बाईट दे देता है तो झटके में वह रिपोर्टर हीरो हो जाता है। यानी राजनीतिक समझ की नहीं राजनेताओं से संबंध की जरुरत ही रिपोर्टर को विशेष संवाददाता और धीरे धीरे संपदक बना दें तो फिर दर्शकों को क्या देखने को मिलेगा यह समझा जा सकता है। इसलिये हिन्दी के राष्ट्रीय न्यूज चैनलो को देखते हुये हर किसी के जहन में यह आ सकता है कि देश को तो वाकई एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल की जरुरत है। जो सही मायने में खबरों की पड़ताल करें। किसी भी खबर पर जनमत तैयार करने की स्थिति को पैदा करें। जो सरकार पर निगरानी का काम भी करें और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रुप में चैक एंड बैलेंस की भूमिका में रहे। जिसमें काम करने वाले पत्रकार को अपनी जिम्मेदारी का भी एहसास हो और गर्व भी करें कि वह राष्ट्रीय न्यूज चैनल में काम कर रहा है। और देखने वाले भी खबरों को विश्वसनीय माने। यानी देश में साख हो। यहां यह सवाल बेमानी है कि हिन्दी पर हमेशा अंग्रेजी पत्रकारिता हावी रही है इसलिये हिन्दी न्यूज चैनल की अपनी ऐसी साख हो सकती है। लेकिन याद कीजिये वीपी सिंह के दौर में क्षेत्रीय पत्रकारिता ही थी खास कर उस वक्त जनसत्ता और नवभारत टाइम्स की रिपोर्टिंग ने सत्ता को डिगाया भी और वीपी को प्रधानमंत्री पद के दरवाजे पर ला खडा किया भी। यह अलग सच है कि मंडल-कंमडल के बाद जिस आर्थिक सुधार की परवान चढी उसने राजनीति और पत्रकारिता को उस अर्थव्यवस्था से अलग कर दिया जो अर्थव्यवस्था धीरे धीरे मीडिया हाउस और राजनीतिक घरानों की जरुरत बना दी गई। शायद इसीलिये बीते बीस बरस में एक चुनाव ऐसा नहीं हुआ जो आर्थिक सुधार के सवाल पर लड़ा गया हो। जबकि अब जो सत्ता और कारपोरेट की लूट भ्रष्टाचार के जरीये सामने आ रही है उसके मर्म में वही आर्थिक सुधार है जिसपर अन्ना आंदोलन भी अभी अंगुली रख नहीं पा रहा है। इसलिये जंतर मंतर से निकले राजनीतिक विकल्प को लेकर कोई चैनल इस दिशा में नहीं जाता कि विकल्प हमेशा जड़ को बदलता है। चेहरे या नकाब बदलने को विकल्प नहीं कहा जा सकता। शायद यह मौजूदा दौर के पत्रकारिता की हार है।

Courtesy : http://www.facebook.com/ppbajpai/posts/293373964103337

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