दहशत और शोषण की एक स्याह तस्वीर : यथार्थ चित्रण कानपुर -III

Posted: August 17, 2012 in Children and Child Rights, Education, Politics, Youths and Nation

 अदम गोंडवी की कविता  की ये  लाइनें इस कहानी की प्रस्तावना में कही जा सकती हैं….

“पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,

इतना असर है खादी के उजले लिबास में.
खैर साहित्यिक सौंदर्य के इतर जो यथार्थ है वो और  वीभत्स है. और क्रांतिकारियों के इस शहर में अमूमन  यह देखने को मिलता है कि   इसकी  चर्चा  करने  की हिमाकत भी बहुत कम लोग करते हैं.
“क्या हुआ कुछ तो कहो ?” आने के साथ ही  बेचैनी  में मिश्राजी की  यह सवाल पूछा.. बहुत देर तक तक तो वे शांत रहे. फिर   जो बताया वह आज के समाज और विकास पर प्रश्न चिह्न छोड़ जाने के लिए काफी था…
“दिन  भर तेज बुखार  होने की वजह से रात में रोटी खाने की इच्छा नहीं हुई थी. फिर भी माँ का प्यार है जो किसी  कुपूत को भी ममता उड़ेल कर ही संतुष्ट होती है. देर रात जगता हुआ  देख   के इतनी देर तक जागने  का  उलाहना देते हुए खाना पूछ ही लिया.
“इतनी देर रात तक जागने से ही तो तबियत ख़राब होती है तुम्हारी. खानवा खइहौ  ?”
“नहीं माँ, लेकिन दाल हो तो गरम करके दे दो थोडा सा पी लेता हूँ, नींद आ जाएगी.” मैंने कहा.
माँ तो माँ है. खाना और पानी देने के साथ बैठ गयी.
“बुखारवा उतरा ?” ऐसा ममतामयी  सवाल कि अगर तेज बुखार  भी हो तो छूमंतर    हो जाए.
दरवाजे पर दस्तक  के साथ आवाज आई, “खोलो”
“कौन   है?”
“अरे खोलो.”
“अरे इतनी देर रात में, आइये बैठिये, खाना खाइएगा ” औपचारिकतावश पूछ ही लिया.
“तुम्हारे  पिताजी कहाँ हैं?”
“क्यों क्या हुआ?”
“पैसा   लेना   है”
“तो रात के साढ़े  बारह बजे तो उचित समय नहीं हुआ?” मैंने समझाते हुए.. “चलिए मै सुबह आपके ऑफिस में  मिलता हूँ.” यह सोचकर कि माताजी पिताजी और छोटी सबके लिए परेशानी और दहशत बढ़ने से तो बेहतर ही होगा कि सुबह अकेले  इनसे बात कर ली जाएगी,
“मुझे पैसा मेरा चाहिए” लगभग चिल्लाते हुए कहा “पंडित जी”
शायद पिताजी पहली कच्ची नींद में थे. उठकर कमरे में आते हुए पाते  हैं कि तीन बदमाश से दिखने वाले लोगों में से एक कुर्सी  पर बैठ के लगभग चिल्ला रहा है   और बाकी दो ऐसे घूर रहे है जैसे कि पूरा  नशा हमसे कोई बदला लेने के लिए किया हो. वैसे कमरे तक पहुँचते हुए तीनों कि शक्लें स्पष्ट हो चुकी थीं. तीनो वही थे जो अक्सर आधी रात में शराब पीकर इस तरह दहशत फैला कर घर में जो भी हजार- खांड होता है बिना लिए जाते नहीं थे.  एक शरीफ आम आदमी के लिए खोखली इज्जत के सिवा और बहुत कुछ होता नहीं है, माताजी ने इस घटना के बाद बताया कि पिताजी इतनी दहशत में बडबडाया करते थे..
“तुमने  कहा था कि लड़के को कुछ मत कहना हम चूका   देंगे. पंडित जी मुझे मेरा पैसा चाहिए” चेहर पर दहशतगर्दी कि नकाब ओढ़ते हुए वह शख्स बोला. कहने का लहजा कुछ ऐसा था कि डर कर पंडित जी दादा भैया करते हुए अनुनय विनय  करने लगें.
 यह लहजा अपने पिताजी के लिए सुन कर अगर किसी लड़के का खून न खौले तो उसकी जवानी पर लानत है.
“तुम्हे तमीज नहीं है किसी वरिष्ठ नागरिक से इस तरह बात करते हैं?.”
“तमीज तो अभी हम दिखायेंगे” जवाब मिला.
“अब का पंडित जी कै खून चूस कै रूपया लेहौ का ?” माताजी की कांपती आवाज में प्रतिकार  का स्वर ही था. शायद आखिरी आदमी की लाचार पत्नी अराजकता का इससे ज्यादा प्रतिरोध नहीं कर सकती.
“भैया हम तुम्हे एक लाख के बदले उधार-बाढ़ी   और कर्जा   लेकर लगभग साढ़े तीन लाख रुपये दे चुके हैं. उसके बाद भी तुम्हारा सूद कम नहीं होता, मूल वही का वही रहता है. हमे तो जजमानी और  समाज में पांच सौ-हजार रुपये महीने का मिलता है. हम तो कमा के दे नहीं सकते. लड़का कमाएगा तो दे देगा. उसको मोहलत दो.” पंडित जी का यह स्वर था एक आम आदमी का जिसको क़ानून कि उस किताब पर विश्वास नहीं है जो यह कहती है कि ब्याज या मूल चुकाते हुए यदि दो गुने से ज्यादा रकम लौटा दी जाए तो कर्ज चुका हुआ माना जाएगा. उसके सामने लठैत ही सब कुछ हैं. वे चाहें तो इकलौते बेटे को उठा के ले जायेंगे कही कुछ कर न दें. घर के दरवाजे पर गाली गलौज करते शराब के नशे में चूर अराजक तत्वों के सामने भी सर झुकाने को बाध्य है. शायद  आजाद भारत के आखिरी आदमी कि यही नियति ही जिसे आजादी के पैंसठ सालों में “मदर इंडिया” के “सुक्खी लाला” से लेकर मोहल्ले के बनिया या दबंग ब्याज वालों ने नोचा खाया है.
“हम तुम्हारी हालत पे तरस खा   के कहे थे कि तुम्हारा अस्सी हजार रूपया बचा  है. साल भर में चुका दो कोई ब्याज नहीं लगेगा और ग़लतफ़हमी  में तो रहो नहीं  हमारा पैसा हजम कर के शहर में रह नहीं पाओगे.”
“इतनी देर रात में इस तरीके से आप पैसा वसूल  करेंगे?” मेरे मुंह से बरबस निकल गया.
“मेरा पैसा नहीं देगा?” दहशत भरा वह स्वर पुरे घर के माहौल को कंपा देने के लिए ही प्रयोग किया गया था. “चल थाने”. मेरी तरफ मुखातिब होते  हुए बोला.
“कपडे पहनो और थाने चलो. अभी तुम्हे दिखाते हैं कि हम क्या हैं?” फिर से ऐसी  कर्कश आवाज कानों में पिघले शीशे जैसी पड़ी. शायद इसे ही सुनकर घर के बाहर फूटपाथ पे सोने वाले लगभग सभी जाग गए. शायद वे मूकदर्शक से ज्यादा कुछ हैसियत नहीं रखते थे. या शायद दहशत के उस साए को वे भी महसूस कर सकते थे जिसमे एक महँगी स्कोर्पियो गाडी जिसका वी. आई. पी नंबर और उसमे बैठे तीन लोग और हमारे साथ बहस करते तीन दबंग, फ़िल्मी तरीके से माहौल को दहशतजदा बना रहे थे.
भगत सिंह, आजाद, गांधी जेपी, लोहिया,  अन्ना और अदम गोंडवी कि शक्लें जेहन में घूम  गयीं. जेहन में परसों के स्वतंत्रता दिवस कि याद  भी एक फिल्म कि चल गयी जिसमे स्टेशन से बाहर निकलने के साथ सुबह रिक्शा चलाने वालों, कूड़ा बीने वालों, लाटूश रोड के डिवाईडर  पर बैठे दिहाड़ी मजदूरों का एक बड़ा समूह और तिरंगे बेचते हुए छोटे-छोटे बच्चों कि शक्लें भी बरबस नज़र आने लगीं.
“देखो अगर तुम्हे तमीज नहीं है तो यह तुम्हारे घर वालों कि गलती है, शायद तुम्हे इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि जैसे मै तुम्हारे पिताजी का सम्मान करता हूँ तुम्हे भी दूसरों के पिताजी का सम्मान करना चाहिए.”
और अगर ये बचपना नहीं छोड़ोगे तो तुम्हारे लिए बहुत दिक्कत  होगी. चलो थाने मै चलता हूँ.” लगभग अपना आप खोते  हुए मैंने कहा “पिताजी आप बैठिये अम्मा  आप भी. अभी आता हूँ.”
“तुम्ह भी कपडे पहनो और थाने चलो पंडिताइन तुम भी चलो.”
“देखो तुम फिर अपनी हद से बाहर जा रहे हो.” फिर से लगभग ललकारते हुए मै बोला.
उस कर्कश व्यक्ति के दो साथियों ने मुझे पकड़ने कि कोशिश की.
“माँ आप बैठिये मै आता हूँ. यदि कोई दिक्कत होती है तो सुबह मेरी  ज़मानत करवा देना.”
“हम लोगन का भी लै चलो. हमहूँ सभे थाने चलित है.” शायद प्रतिकार, प्रतिरोध और ममता के साथ लगभग आँखों में आंसूं भरकर माँ भी चप्पल खोजती हुई बोली.”
माँ, पिताजी और मै तीनो लोग साहब लोगों के धमकाने के साथ डरते-डरते थाने चले. शायद इतनी दहशत कि मोबाइल फोन भी साथ लेना भूल   गए. घर के भीतर रह गयी छोटी बहन जो शायद रूआंसी सी मूकदर्शक बनी खड़ी तमाशा देख रही थी. थाने पहुँच कर याद आया कि वो बेचारी   रो  न रही हो.
क्रमशः

कानपुर, प्रतिनिधि : बर्रा में एक युवक ने कर्जे की देनदारी बढ़ने पर आत्महत्या कर ली। परिजनों ने इलाके के ही एक युवक पर कर्जे की रकम जल्द अदा न करने को लेकर दबाव बनाने का आरोप लगाया है।

बर्रा दो निवासी रतन शुक्ल के दूसरे नंबर के पुत्र संजीव उर्फ सोनू का शव सोमवार दोपहर घर की दूसरी मंजिल पर फांसी के फंदे से लटकता मिला। घटना की जानकारी इलाके के बऊआ नामक युवक के संजीव के विषय में पूछताछ करने पर हुई। सोनू का शव फंदे पर लटका देख गर्भवती पत्नी अहिल्या की हालत बिगड़ गई जबकि मां निर्मला होश खो बैठी। भाई पप्पू के मुताबिक सोनू की जून 2011 में शादी हुई थी। शादी के कुछ दिनों बाद सोनू दिल्ली की नौकरी छोड़ घर आ गया। बेरोजगारी के चलते इलाके के बऊआ शर्मा का सोनू पर 45 हजार रुपये का कर्ज हो गया। लगातार कर्ज अदा करने के दबाव के चलते ही उसने यह कदम उठा लिया। बर्रा एसओ घनश्याम यादव के मुताबिक आत्महत्या के कारणों का बता लगाया जा रहा है। कर्ज की बात सामने आ रही है। परिजनों की तहरीर पर जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

इन पर हावी सूदखोरों का जाल

कारखानों व मंडियों के साथ सरकारी दफ्तरों में सूदखोरों का संजाल फैला है। इनके शिकार शराबी, जुआरी और वे जरूरतमंद होते हैं जिनकी आमदनी का कोई ठिकाना नहीं। सूदखोर परेशान लोगों को ब्याज पर पैसा देते हैं और धीरे धीरे उनकी पूरी कमाई और जमा पूंजी हड़प लेते हैं।

यहां पर सूदखोरों का संजाल

नगर निगम, रेलवे, गन फैक्ट्री, हैलट, उर्सला, दादानगर और फजलगंज स्थित फैक्ट्री, अर्मापुर बाजार, छपेड़ा पुलिया, बकरमंडी, रावतपुर, नवाबगंज, गोविंद नगर, बर्रा, किदवईनगर समेत दर्जन भर मंडियों व सरकारी कार्यालयों के बाहर सूदखोरों का जमावड़ा रहता है।

क्या है नियम लेकिन करते क्या?

1976 में यूपी सहकारिया अधिनियम में 2006 और 2008 में संशोधन किए गए। इसके अनुसार सूदखोर 14 से 17 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से रकम दे सकते हैं। यहां अधिकतर सूदखोर बिना लाइसेंस के यह धंधा चला रहे हैं और वार्षिक की जगह मासिक ब्याज दर ले रहे हैं।

संवेदनशील सज्जनों के लिए समाधान के नाम पर अदम गोंडवी साहब कहते हैं….
जनता के पास एक ही चारा है बगावत,
ये बात कह रहा हूँ मै होशो-हवास में.”
साभार: दैनिक जागरण इ-पेपर और राष्ट्रीय सहारा के साथ
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