खतरनाक है भारत में क्रांति कि तलाश !!

Posted: September 3, 2012 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

किसी भी दौर की सामाजिक समरसता के दो पहलू प्रमुख रूप से देखे गए हैं…. सांस्कृतिक और आर्थिक.  विश्व की लगभग  सभी राजनैतिक दर्शन समरसता के इन दो पहलुओ को ही केंद्र मान कर बने हैं. उदहारण के लिए मार्क्सवादी राजनीति का दर्शन आर्थिक समरसता को आधार मान के समाज रचना चाहता है तो गांधी दर्शन का विकेंद्रीकृत ग्राम स्वराज को अंतिम उद्देश्य मानता है. यह गांधी की  विचारधारा की उपलब्धि ही कही जाए तो अतिशयोक्ति न होगी कि आज  गाँधी गीता और ग्राम की संकल्पना के बिना भारतीय राजनीति अधूरी लगती है. गाँधी का चिंतन सांस्कृतिक है तो मार्क्स का दर्शन आर्थिक. दोनों ही अपने इर्द गिर्द के वातावरण के अनुसार  विकास की  परिभाषा रचने का प्रयास करते हैं. विकास का लक्ष्य स्पष्ट करते हैं और सामाजिक विकास के ताने बाने में समरसता के अस्तित्व को फलीभूत मानते हैं.  क्षेत्रीय  संसाधनों और स्थानीय समन्वय को केंद्र मान के बनी  सांस्कृतिक समरसता आधारित व्यवस्थाएं ज्यादा स्थायी पाई गयी हैं. लेकिन वर्तमान की आर्थिक संकल्पनाओं ने  “क्षेत्रीय संकल्पनाओं  और उनके समन्वय का अतिक्रमण” करके वैश्विक महाशक्तियों के हितों के समक्ष व्यक्ति के चरित्र और सांस्कृतिक दर्शन को बौना ही साबित किया है. वर्तमान विश्व की संकल्पनाओं में सांस्कृतिक संकल्पना का स्थान आर्थिक संकल्पनाओं ने लिया है. आम जन को विकास की बात होने के साथ ही अब दिमाग में चौड़ी सड़कें, ऊंचे-ऊंचे महलनुमा भवन और तेज गति से चलने वाले मोटर वाहनों और हवाई जहाजों के सिवा शायद ही कुछ और नज़र आता हो.  अंततः विकास के केंद्र में भौतिकता स्थापित हुई है.  अब विकास के पैमाने में धार्मिक, सांस्कृतिक और मूल्य आधारित जीवन दर्शनों को हाशिये पर धकेल दिए गए हैं. हंसी-ख़ुशी और जिन्दादिली नगण्य हो चले हैं. जिन्दा भी वही दर्शन है को कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भौतिक विकास को अंतिम सत्य बताते हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में “धन से धर्म”  और “धर्म से मोक्ष” में धन के संचय करने कि होड़ लगाने के सिवा और ज्यादा कुछ बेहतर कर सकने में असमर्थ नज़र आते हैं. “धन से काम” ने तो आधी आबादी (महिलाओं ) को बाजारू चीज  बना के महिमंडित किया है. उस पर भी तुर्रा यह है कि   सार्वभौमीकरण या  वैश्वीकरण को पारिभाषित करते हुए  लोग   बहुधा अपने हिस्से के सत्य को ही आधार मान के उसी के इर्द-गिर्द  व्यवस्था और समाज की परिभाषाएं गढ़ने में प्रवीण होने लगें हैं. दार्शनिक पक्ष में दुसरे पक्षों के साथ संवाद करने की बजाये अपनी कोरी कल्पनाओं तक को सार्वकालिक सत्य बना के पेश करने लगे हैं.  बिलुल उसी तर्ज़ पर कुछ समूहों ने देश की नदियों के उद्धार के लिए वैश्विक उदाहरणों को केंद्र बिंदु बनाने के प्रयास शुरू किये हैं. कहते हैं की जब टेम्स नदी को लोग मिल के जिन्दा कर सकते हैं तो यहाँ के लोग क्यों नहीं? वो एक बहुत बड़े पहलू को नज़र अंदाज़ करते हैं जिसमे  टेम्स नदी के पुनर्जीवन का आधार आर्थिक ही है.  जबकि  हमारे यहाँ की नदियों के साथ जनभावनाएं देवी स्वरुप मान के भी जुडी हैं. सदियों से हमारी  समरसता के आधार नदियों के किनारे लगने वाले मेले भी रहे हैं.  राज और समाज के सन्दर्भ में उदहारण के लिए  मिस्र की तथाकथित  क्रांति ( जैसा की मुख्यधारा की मीडिया ने महिमामंडित  किया )   की तर्ज़ पर भारत में भी हिंसक जनविद्रोह या क्रांति की संभावनाएं तलाशते लोग और समूह नज़र  आने लगे हैं.  यह तलाश खतरनाक है इसमें अनुसंधान और सामाजिक समरसता न होकर हिंसात्मक विघटनकारी तत्वों के साम्राज्यवादी सोच कि ही प्रधानता  नज़र आती है. आर्थिक साम्राज्यवाद के रहनुमाओं में से एक जॉन डी. रोक्फेलर के मुताबिक ” प्रतिस्पर्धा पाप है” उसी कि तर्ज़ पर कट्टरता के चरम से  यह तलाश पेट में आर्थिक साम्राज्यवाद का बच्चा छुपा के चल तो निकली है लेकिन इसका अंत अंधकारमय और भयावह ही नज़र आता है.

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