मेरी तेरहवीं में आप आमंत्रित हैं

Posted: September 18, 2012 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Youths and Nation

साभार : आलोक पुराणिक

मसले टेंशनात्मक थे, परिचित के घर पर।
पिता इस दुनिया में नहीं रहे थे, पर शिकागो में कार्यरत बेटे के पास छुट्टी के दिन नहीं रहे थे।
मां डपट रही थीं बेटे को-हाय हाय बाप नहीं रहा, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ा। पांचवे दिन ही चला जायेगा, वापस। कम से कम तेरह दिन तो रुक, तेरहवीं तक।
बेटे ने पलट हड़काया-मां बी प्रेक्टीकल, पापा नहीं रहे, और मैं यहां रह गया, तो नौकरी भी नहीं रहेगी। यूएस में लोग ये सुनकर हंसते हैं कि तेरह तेरह दिन तुम शोक मनाते हो।
मां ने फिर डांटा-शर्म कर, तू यूएस वाला है या इंडिया वाला।
बेटे ने सालिड जवाब दिया-यूएस वाला होना इतना आसान कहां है। ग्रीन कार्ड हो जाये, तब ही कह सकता हूं कि यूएस वाला हूं। पर अब मैं इंडिया वाला तो पक्का नहीं हूं।
बेटा थोड़ा कम बेशरम था, वरना वो ये भी गुजारिश मां से कर सकता था कि मां लगे हाथों अब तुम भी मर ही जाओ। साथ की साथ सब निपट जायेगा, वरना तुम निपटोगी बाद में, तुम्हे निपटाने फिर बाद में आना पड़ेगा। छुट्टी का प्राबलम्स।
मसला रोने का है यह या हंसने का, समझना मुश्किल है।
बेटे यूएस वाले हो गये हैं, पर बाप इंडिया में मर रहे हैं। माएं मौत के बाद की सारी कार्रवाई इंडियन स्टाइल में चाहती हैं। तेरह दिन तो छोड़ो, बेटों का बस चले तो बाप को फूंककर सीधे शमशान से ही वापसी की फ्लाइट पकड़ लें। या कोई नया साफ्टवेयर डेवलप हो आनलाइन क्रिया कर्म का, बंदा लास एंजेल्स में बैठा बैठा ही हाथरस स्थित अपने पिताजी को निपटा रहा है। होगा होगा ये भी होगा। क्रिया कर्म में एफडीआई टाइप कुछ ऐसे स्टेप्स लिये जायेंगे, जिनमें फारेन से डालर आयेंगे। वहीं से बैठे बैठे मुरदे फुंक जायेंगे।
होगा, जी होगा।
इज्जतदार बाप ऐसे दिन देखना नहीं चाहेंगे कि बच्चे शमशान घाट से सीधे यूएस जाने की जिद मचायें।
मैं खुद निवेदन करना चाहूंगा कि विदेशगामी बच्चों को देखते हुए नयी परंपराएं बनें। पिता जीते जागते अपने सामने अपनी खुद की तेरहवीं करके जायें। जैसी चाहें वैसे करके जायें। रिटायर होने के बाद कोई अच्छा सा मुहूरत देखकर, बच्चों की व्यस्तता देखकर बंदा खुद ही तेरहवी के कार्ड छपवाकर वितरित कर दे-फलां दिनांक को मेरी तेरहवीं में आप सादर आमंत्रित हैं। तेरहवीं मृत्यु के तेरहवें दिन होती है। पहले से मौत का दिन पता ना होने पर हर बंदा किसी भी महीने की तेरह तारीख को तेरहवीं मना सकता है। आर्थिक तौर पर कमजोर लोग सामूहिक तेरहवीं मना सकते हैं। मित्र लोग परस्पर सामूहिक तेरहवीं भोज मना सकते हैं-गुप्ताजी, पुराणिकजी, शर्माजी और जैन साहब की सामूहिक तेरहवीं में आप सब आयें, टाइप्स निमंत्रण छप सकते हैं।
यूएसगामी पुत्रों के लिए बाप इतना तो कर ही सकते हैं। तेरह दिन पुत्र रुकें, ये तो दूर अब चार दिन भी रुकना मुश्किल हो रहा है। घंटा भर रुकना भी मुश्किल हो जिनके लिए, ऐसे ऐसे सपूत भी यह भारतभूमि देखेगी ऐसे आसार हैं। तेरहवीं ही क्यों, अपना दाह संस्कार टाइप आयोजन पिता जीते जी करवा लें, ऐसे पैकेज भी कुछ दिनों बाद आ सकते हैं। जीते जी दाह संस्कार आयोजन हो जाये। तेरहवीं हो जाये, मां को तसल्ली हो जाये। फिर वास्तविक मौत हो, तो नगर निगम वालों को इनफोर्म कर दो, ले जायें डैड बाडी, जो चाहें वो करें। या मेडिकल कालेज वाले ले जायें, बालकों को इंसानी बाडी के बारे में पढ़ायें और ये सोशल सचाई भी पढ़ायें कि
सब देखिये जी खुश होकर ये सीन नयी एज का,
जीता बाप हमारा, पर मरा मेडिकल कालेज का।
चलूं, मैं जीते जी अपनी तेरहवीं का इंतजाम करुं।

Courtesy : राष्ट्रीय सहारा 18 सितंबर, 2012 मंगलवार के अखबार के संपादकीय पेज पर छपा व्यंग्य

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