जल-जंगल-जमीन का हक मांगने आ रहा है जनसमुद्र

Posted: October 5, 2012 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

नई दिल्ली। देश के तमाम शहरों में अगर महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है तो जंगलों में भी चिंगारी सुलग रही हैं। इन दिनों दिल्ली की ओर बढ़ी आ रही आदिवासियों की एक विशाल यात्रा इसी की मुनादी कर रही है। जल-जंगल और जमीन पर आदिवासियों के हक की गारंटी की मांग को लेकर निकली आदिवासियों की ये यात्रा शुक्रवार को मुरैना पहुंच गई।

एकता परिषद के बैनर तले हो रही इस पदयात्रा में करीब 35 हजार भूमिहीन आदिवासी शामिल हैं। परिषद की मांग है कि भूमि सुधार के लिए केंद्र सरकार एक पुख्ता राष्ट्रीय नीति बनाए। आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे पर आठ किलोमीटर तक फैली जनकतार के बीच एक ही नारा गूंज रह है- दिल्ली चलो। ये भूमिहीन आदिवासियों की यात्रा है। ये जानते हैं कि दिल्ली में कोई सरकार है जिस पर देश का दुख दूर करने की जिम्मेदारी है।

जल-जंगल-जमीन का हक मांगने आ रहा है जनसमुद्र

आजादी के 65 बरस बाद भी जब कोई हाथ आंसू पोंछने नहीं पहुंचा तो वे खुद चल पड़े, दिल्ली के निर्मम दुर्ग में जंगल की करुण कथा बांचने। इन सत्याग्रही की चाह केवल इतनी है कि पिता की तरह छांव देने वाले दरख्तों को वे जब चाहे गले लगा सकें, मां जैसी नदियों के आंचल में बेरोक-टोक खेल सकें और पेट भर अनाज उगाने की धरती उनके हिस्से में भी हो।

उन्हें तकलीफ है कि विकास की अंधी कलम से लिखी गई किताबों में उन्हें जंगलों का दुश्मन बताया जा रहा है जबकि पीढ़ियों से उन्होंने खून पसीना बहाकर इन जंगलों को पाला-पोसा। धीरे-धीरे आगे बढ़ती ये यात्रा राजनेताओं के चेहरे का रंग तेजी से उड़ा रही है। जुबानी आश्वासनों का दौर फिर शुरू हो गया है। शुक्रवार को यात्रा मुरैना पहुंची तो बीजेपी महासचिव नरेंद्र सिंह तोमर आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे।

उधर, अमेरिका यात्रा पर गए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यात्रा को मोबाइल से संबोधित करके कहा कि-हम साथ हैं। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि टाइगर के लिये ट्राइबल विस्थापित नहीं होंगे। मध्य प्रदेश सरकार ने फैसला लिया है कि प्रदेश की जमीन पर ऐसा कोई अभ्यारण्य नहीं बनेगा जिसमें आदिवासियों का विस्थापन हो। हमने कानून बना दिया है कि आदिवासी सरकारी या गांव की निजी ज़मीन पर रह रहे हैं या जो रहे हैं वो ज़मीन उनकी ही होगी। उनके रहने का हक कोई नहीं छीन सकता

यात्रा 6 अक्टूवर को चंबल पार कर राजस्थान में दाखिल हो जाएगी। साढे़ तीन सौ किलोमीटर का सफर तय करने में सत्याग्रहियों को एक महीने का वक्त लगेगा। इस दौरान रास्ते भर पड़ने वाले शहर, गांव, कस्बे में जल-जंगल और जमीन को लेकर अलख जगाई जाएगी।

माओवादियों को देश का सबसे बड़ा दुश्मन करार देने वाली सरकार भी परेशान है कि गांधी के विचार और अहिंसा की ताकत को हथियार बनाने वाले आदिवासियों को क्या घुट्टी पिलाई जाए। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने आंदोलनकारियों को 11 अक्टूबर को दिल्ली में चर्चा के लिए बुलाया है लेकिन पहले भी ऐसे फरेब से गुजर चुके लोगों को अब चर्चा नहीं बदलाव की ठोस पहल चाहिए।

एकता परिषद के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल ने कहा कि 2007 में पच्चीस हज़ार सत्याग्रहियों ने दिल्ली तक जनादेश यात्रा निकाली। सरकार और उनके संगठन के बीच जो समझौते हुए वो आज तक लागू नहीं हुए। राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति ने एक साल में तीन सौ सुझाव दिए। जल, जंगल, ज़मीन की समस्या का निदान फिर भी नहीं हुआ। इसलिए जनसत्याग्रह का पैदल मार्च किया जा रहा है।

ये यात्रा दो अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन ग्वालियर से शुरू हुई थी। रोज बारह किलोमीटर का सफर तय करते हुए ये धीरे-धीरे दिल्ली की ओर बढ़ रही है। इसमें देश के तमाम हिस्सों से आए आदिवासी अपने साझा दुखों के साथ शामिल हैं।

Courtesy : IBN7

Source :  http://khabar.ibnlive.in.com/news/83063/1

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