बाज़ार का गुलाम कोई भी हो जाये… राष्ट्रवादी नहीं हो सकता… शाबाश सुशील!!

Posted: October 12, 2012 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation
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—-राजीव चतुर्वेदी

“देश प्रेम एक दर्शन है पाखण्ड नहीं और इस मानक पर खरा उतरा है यह देश का सपूत जिसने शराब के विज्ञापन के लिए एक मोटी रकम ठुकरा दी वरना सटोरिया संचालित खेल क्रिकेट के कुछ खिलाड़ी तो युवा पीढी को शराब पिलाने को प्रेरित विज्ञापन करते हैं. अपनी झोली भरने के लिए युवाओं को गुमराह करते हैं. इस बीच पूरी की पूरी क्रिकेट टीम देश भक्ति का विज्ञापन करती कभी नहीं दिखी पर सहारा की सेल्समैन बनी दिख रही है. भारत में सुनियोजित तरीके से राष्ट्रवाद को ध्वस्त किया जा रहा है. पहले वामपंथियों ने राष्ट्र को एकीकृत करने वाले तत्व धर्म पर चोट की और धर्म पर चोट करने के बहाने राष्ट्रवाद के मस्तूल हिन्दू धर्म पर चोट की किन्तु इस्लाम और ईसाईयत की कुरीतियों पर कोई विरोध कभी भी दर्ज नहीं किया. वामपंथी कभी आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं रहे …सुभाष चन्द्र बोस को कुत्ता- सूअर और न जाने क्या क्या कहते रहे किन्तु आज़ादी के दो बड़े प्रणेताओं गांधी और भगत सिंह के भक्तों को एक दूसरे से लड़ाने से बाज नहीं आये . युवाओं के जेहन में प्रेरणा प्रतीक सी टंगी गांधी की तश्वीर पर भगत सिंह की तश्वीर दे मारी और इस प्रकार राष्ट्रवाद की दोनों तश्वीर के कोने टूट गयी …प्रतीक दरक गए और इस प्रकार युवाओं के दिल से राष्ट्रवाद की दोनों प्रतीक तश्वीरें क्या टूटीं उन देश के देसी प्रतीकों को बेदखल करके चेग्व्येरा, माओत्से तुंग, मार्क्स, लेनिन जैसे विदेशी प्रतीकों को जगह बन गयी. कुछ ने आंबेडकर की तश्वीर गांधी पर दे मारी और सोनिया जैसे विदेशी चेहरों का भारत में राज्य करने का रास्ता साफ़ हुआ.

राष्ट्रवाद को अकेले इस कथित वामपंथीय सेक्यूलारिस्म ने ही कमजोर नहीं किया है. गांधी –सुभाष- भगत सिंह-आंबेडकर जैसों की जब तश्वीरें एक दुसरे से बजा कर हमने क्षतिग्रस्त कर डालीं तो राष्ट्रवाद का सर्वमान्य प्रतीक ही शेष नहीं बचा. इस बीच जातीय कबीलों की छद्म राजनीति करने वाले अन्य दलों ने राष्ट्रीय प्रतीकों को जातीय प्रतीकों में बदल डाला. गांधी को बनिया, लोहिया को मात्र मारवाड़ी, जय प्रकाश नारायण को कायस्थ बना डाला. अचानक हमको पता चला कई राणा प्रताप केवल ठाकुरों के ही प्रतीक हैं , परशुराम ब्राह्मणों के ही प्रतीक हैं, सरदाल पटेल मात्र कुर्मी थे और शिवाजी केवल गड़रिया थे. जब इस सुनियोजित साजिश से राष्ट्रीय प्रतीक तोड़ दिए गए तब असली उपलब्ध राष्ट्रीय प्रतीकों के अभाव में फर्जी राष्ट्रीय प्रतीक गढ़े और देश पर मढ़े गए. इस प्रकार फर्जी राष्ट्रीय प्रतीकों का उदय हुआ और हमारे देश के उवाओं के प्रतीक बने फ़िल्मी रंडी -भडुए, दुनिया के दस प्रतिशत से भी कम देशों में खेले जाने वाले सटोरिया संचालित खेल क्रिकेट के वह खिलाड़ी जो खेल के मैदान के चार चक्कर लगाने में हांफ कर गिर जाते हैं …जिनके खेल के कम छिनरफंद के अधिक कीर्तिमान हैं…हम भूल जाते हैं चन्दगीराम को …हम भूल जाते हैं ध्यान चंद को …हम भूल जाते हैं रूप सिंह को …हम भूल जाते हैं वाईचुंग भूटिया को…अचानक देश के युवा पर कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं रहता…अचानक शिवा जी,गांधी, भगत सिंह ,सुभाष जैसे प्रेरणादायी व्यक्तित्व सुनियोजित तरीके से हमारे बच्चों के जेहन से ओझल हो जाते हैं और अचानक विश्व और ब्रम्हांड सुन्दरीयाँ भारत में पैदा होने लगती हैं जो दुबई में दाउद की महफ़िलों में नाचती हैं और हमारे यहाँ सांस्कृतिक राजदूत होती हैं. जब गार्गी के देश में वेश्याएं सांस्कृतिक राजदूत होंगी तो हमारी संस्कृति भी रंडी-भड़ुओं की ही हो जायेगी परिणाम सामने है हमारी सांस्कृतिक राजदूत कंडोम प्रचार कर रही हैं. खेल के नाम पर केवल क्रिकेट के खिलाड़ी ही हीरो बनाए जाते हैं और इस प्रकार विश्व बाजार में माल बेचने के लिए अच्छे सेल्समैन -सेल्सगर्ल्स की फ़ौज तैयार हो रही है. दूध या फलों का जूस बेचता कोई क्रिकेट खिलाड़ी या फ़िल्मी रंडी -भडुआ या कलाकार कहीं नज़र नहीं आता –क्यों ? इसलिए हमारे युवा खेल नायक सुशील कुमार को प्रणाम.”—-राजीव चतुर्वेदी

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