कारपोरेटिया सुधारों में अख़बारों और नए दौर की मीडिया के कर्मकांड

Posted: November 4, 2012 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

“छोडो कल की बातें, कल की बात पुरानी” आज़ादी के बाद से नए दौर के मीडिया की शुरुआत कुछ इस तरीके से हुई। ये देश की जनता को घोड़े की माफिक चश्मा पहनाने जैसा काम साबित हुआ। जिसमे स्वदेश और स्व-संस्कृति  की बात करने वालों के लिए  दकियानूसी और रुढ़िवादी जैसे शब्दों से हीन भावना बनाने का भी काम भी अभिन्न रहा।  आज़ादी के बाद से पश्चिमी देशों कि तरफ से  सहायता और कर्जे के रूप में बही बयार आज विदेशी स्वामित्व को स्वीकार करने की  आंधी जैसी हो चली है। सभ्यता और संस्कृति दो ऐसे शब्द हैं जिनसे इतिहास में सामाजिक स्थायित्व और समरसता का ताना बाना बुना गया। लेकिन आज़ादी के तुरंत बाद की भूराजनैतिक घटनाक्रमों और वैश्विक दानदाता संस्थानों के प्रकोप से पले नए दौर की मीडिया ने आजाद भारत के पश्चिम के विरोध में बनी राष्ट्रीयता को शुन्य करके हिंदुस्तान-पाकिस्तान और हिंदुस्तान-चीन के उन्मादों को बढ़ावा दिया।  कालांतर में बहुराष्ट्रीय उपक्रमों के अनुरूप  जनमत निर्माण भारतीय मीडिया का लगभग पूर्णकालिक कार्य बन गया। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने आजाद भारत में आज़ादी और विकास  की जो परिभाषा गढ़ी कुछ समय के बाद उससे “मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की”  जैसे हालत बन के खड़े हो गए। कुछ समाजशास्त्रियों  की मानें तो भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान में विदेशी पैठ समय के साथ बढ़ने का काम नए दौर की मीडिया की देन कहा जाना  चाहिए.

नतीजा कुछ ऐसा नज़र आता है कि हर  एक मुद्दे पर समाधान के लिए जो जनमत बनता है वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आर्थिक हितों के लिए बनता नज़र आता है। त्वरित समाधान और त्वरित प्रतिक्रियावाद को मीडिया में लिखा छपा देख कर जनमानस भी अधीरता का लोकतंत्र जैसा बन रहा है। दुनिया के बहुत से देशों कि तथाकथित  क्रांतियों का उदहारण उठा के देखें तो नज़र आता है कि लोगों का त्वरित प्रतिक्रियावादी होना भी कम खतरनाक नहीं है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती तक साबित हो सकता है।
नयी परिभाषाएं और मानक गढ़ने की होड़ 
एक दौर में अंग्रेजी मीडिया ने लोगों को प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करके उनसे कुछ नए प्रयोग किये जो कि प्रथम दृष्टया  भारत की कई सामाजिक बुराइयों को चुनौती देते दिखे। लेकिन जब उनके स्थायी और सार्थक समाधानों कि बजाये पश्चिमी त्वरित समाधानों कि राह दिखानी शुरू कि तो समाज के कई तबकों ने इनको मीडिया के व्यापारिक कर्मकांड का हिस्सा मान कर किनारा कर लिया।
 हालिया दो सर्वाधिक प्रचारित मीडिया समूहों ने इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मुद्दों पर  जन संवाद और प्रतिक्रिया दिखवाने के जो कर्मकांड तय किये हैं उनको देख कर ऐसा लगता है कि अनुसन्धान और खोजी पत्रकारिता में लगने वाले समय और संसाधनों कि बचत और व्यापारिक हितों के लिए जनमत में ही अपने सरोकार खोज रही है नए दौर की मीडिया। इनमे से प्रमुख हैं हिंदुस्तान हिंदी की महिलाओं पर हो रहे शोषण पर एक कानपुर में एक लम्बी श्रंखला जो कि महिलाओं में आत्मरक्षा के लिए युद्ध कौशल के विकास पर जा के समाप्त हुई। नतीजा  संवादहीनता की स्थिति में  शायद हर महिला पुरुष वर्ग से एक स्तर का भय ही देखती हो।      और दूसरी  विकास के लिए नागरिक सरोकारों का दैनिक जागरण का नया प्रयोग। दोनों का ही उद्देश्य चाहे कुछ भी हो लेकिन उनके सामाजिक प्रभाव का आकलन करने में यदि ईमानदारी बरती जाए तो उनकी असफलता के अर्थ बेहतर और स्पष्ट हो जायेंगे।
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