क्या जनता के भाग्य का फैसला अफसरशाही के हाथ में चला गया है..?

Posted: December 3, 2012 in Education, Politics, Youths and Nation

गंगा एलायंस और एरिया वाटर पार्टनरशिप के तत्वाधान में हरिहरनाथ शास्त्री भवन खलासी लाइन में शहरी बुनियादी समस्याएं निर्मल जल-निर्मल गंगा के लिए शासन एवं प्रशासन के समक्ष चुनौतियाँ विषय पर नगर निगम पार्षदों एवं सामाजिक संगठनों के लोगों के साथ   एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। गोष्टी की अध्यक्षता करते हुए पद्मश्री गिरिराज किशोर ने कहा कि नगर संसद के अधिकारों की बहाली और बुनियादी सुविधाओं में जनभागीदारी के लिए किये जा रहे नागरिक प्रयास सराहनीय हैं। उन्होंने कहा कि नगर निकाय के जनप्रतिनिधियों को गांधीजी ने नगर पिता कहा क्योंकि नगर पिता को नगर और नागरिकों की फिक्र होती थी। ग्राम पंचायतों से लेकर  नगर निकायों  तक की स्वायत्तता लोकतंत्र में समाज की सबसे बड़ी जरुरत है। आज हर कहीं जनतंत्र का अभाव है। विकास की सोच से एकांगी सोच और  ग्लोबल  तरीके से बन रही हैं। इससे निजात पाने के लिए पार्षदों को वार्ड स्तर पर नागरिक समितियां बना के जन समर्थन हासिल करना होगा। कानपुर में गंगा की स्थिति अत्यंत दयनीय है और स्थानीय निकाय उस पर कुछ कर पाने के लिए समर्थ नहीं है। गंगा स्वछता और नगर विकास योजनाएं भी गंगा की तरह दुर्दशा की शिकार जैसी हो गयी हैं।  सामाजिक कार्यकर्ता दीपक मालवीय ने कहा कि विकास योजनाओं में अफसरशाही हावी है जिससे जनता के  चुने हुए जन्प्रनिधि हाशिये पर चले गए हैं। ऐसे में जनता के भाग्य का फैसला अफसरशाही के हाथ में चला गया है। नगर निगम के पार्षदों को संगठित होकर 74वें संविधान संशोधन के लिए सड़क से सदन तक संघर्ष करना होगा तो समाज भी उनके साथ खड़ा होगा। पार्षदों को सुझाव देते हुए इतिहास के मर्मज्ञ वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रामकिशोर बाजपेई ने कहा कि राज और समाज का साथ होना जरुरी है विकास का पैसा और योजना पर नज़र नागरिक समाज और पार्षदों की होनी चाहिए। निर्मल गंगा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जो संसाधन राज्य सरकारों के ज़रिये चयनित शहरों में भेजे जा रहे हैं उन पर सोशल आर्डर का कार्य जोन स्तर पर गंगा पंचायत के ज़रिये चुने हुए पार्षद और नागरिक समितियां करें नहीं तो पिछले अनुभव बताते है की अरबों रुपये खर्च कर सरकार ने गंगा की हालत बाद से बदतर हालत पर पहुंचा दी है यह एकांगी सोच और  ब्यूरोक्रेसी की निरंकुशता के कारण  हुई ।

व्यवस्था और व्यक्तिगत आलोचना की जरुरत को रेखांकित करते हुए युवा  इंजीनियरिंग स्नातक मयंक तिवारी ने कहा
सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल  है,
इलज़ाम आइनों पे लगाना फ़िज़ूल है। 
कार्यक्रम का संचालन कर रहे  राकेश मिश्र ने कहा कि   नगर के दूसरे विभागों और संगठनों के साथ शैक्षिक संस्थानों को भी इस आन्दोलन में जुड़ना चाहिए।
शहर के पार्षदों की  पीड़ा व्यक्त करते हुए पार्षद मनोज यादव ने  कहा कि हमने नगर निगम में जाकर अपनी जनता के विकास के लिए बड़े सपने देखे थे लेकिन अब कोई मोहल्ले का व्यक्ति घर पर चाय के लिए बुलाता है तो नज़रें चुरा के बचना पड़ता है, बहाना बनाना पड़ता है बिना अधिकार के नगर निगम की संसद और पार्षद बेजान और बेगाने से जान पड़ते हैं। वरिष्ठ पार्षद अशोक तिवारी ने बताया कि उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम का अनुच्छेद 115, 116 172 एवं 207।पार्षदों को यह अधिकार देता है कि अफसर जनप्रतिनिधियों के अधीन हैं और उनके काम के सहयोग के लिए हैं। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि नगर आयुक्त आफिस आर्डर के ज़रिये कर्मचारियों पर अंकुश करने की बजाये जन प्रतिनिधियों पर लगाम लगाने की कोशिश कर चुके हैं ऐसे में सभी पार्षद एक जुट होकर बढती हुई अफसरशाही के खिलाफ सडकों पर उतरने को मजबूर हो रहे हैं। पार्षद बाबुराम सोनकर ने कहा कि 74वें संविधान संशोधन की लड़ाई कानपूर नगर से लड़ी जाएगी जो पुरे प्रदेश में नजीर बनेगी। कार्यशाला में 20 पार्षद और नगर के सामाजिक संगठनों के प्रमुख लोग उपस्थित थे जिसमे अशोक दीक्षित, लक्ष्मी कनौजिया, नीलम चौरसिया, योगेन्द्र यादव, राम कुमार पाल , ज़रीना खातून, कै0 सुरेश त्रिपाठी, नौशाद आलम मंसूरी, जावेद मोहम्मद खान ने भी अपने विचार रखे।
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