महिला यौन शोषण विधेयक या मज़ाक ?

Posted: March 14, 2013 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

विगत तीन महीने से महिलाओं की सब तरह की सुरक्षा को लेकर जिस तरह से देश की जनता आवेशित और जागरूक हो रही थी उसे देखकर लगने लगा था कि शासक दल का भी जमीर जग चुका है और वह वास्तव मे देश कि आधी आबादी यानि कि महिलाओ की सुरक्षा के लिए जरूर कोई न कोई कठोर कानून का निर्माण करने के लिए बाध्य हो रही है । पर प्रबुध और संवेदन शील लोगों के विस्मय का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होने सुना कि किसी और बहाने से कोई और बेबुनियाद बातों मे संसद और जनता दोनों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है । वाह , हमारे देश के कर्णधार ।हमे तो लगता है कि हम ऐसे विदेश मे रहते हैं जहां हिन्दी मे बोलने वाले लोग भी हैं ,विभिन्न चैनलों पर विद्वान लोगों की बाते सुनकर तो यह विश्वास और गहरी हो जाती है ।
अठारह साल या सोलह साल ?आखिर यह कैसा मुद्दा है?
अभी भी हमारे समाज मे सोलह साल की लड़कियां बच्ची ही मानी जाती हैं और वास्तव मे होती भी हैं । वे मासूम ,निर्दोष बच्चियाँ जो उत्सुकता भरी निगाहों से अपने इर्द गिर्द के माहौल को ,परिवार को ,समाज को भली भांति समझने के लिए माता पिता और शिक्षकों के बताए रास्ते पर चलने के लिए तत्पर हैं जिसके कपड़े ,जूते किताबें संभालने मे उसके घर वाले लगे रहते हैं ,उसे सेक्स जैसी जटिल समस्याओं मे सहमति देने वाली बात आश्चर्यजनक लगती है ।तब तो कोई भी शातिर उसे बहला फुसला कर उसे अपनी घिनौनी हरकतों का शिकार बना लेगा ।शह र का हर फ्लैट ,हर मकान ,कस्बों ,गाँव का खेत खलिहान फिर एक लोमहर्षक कहानियों का आखाडा बन जाएगा । प्रेम की कोमल और सुरभित भावनाए हवस की लपलपाती आग मे जल कर भस्म हो जाएगी ।
भारत सरकार यह एक कैसा दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण भविष्य की नींव रखने जा रही है यह सोच कर ही मन काप उठता है । कानून निर्माताओं को इस पर रोशनी डालनी चाहिए कि इससे महिलाओं की यौन सुरक्षा कैसे संभव है?क्या इसके बाद महिलाओं का बलात्कार या हत्या रुक जाएंगी ? माननीयों , कोई भी कानून बनाते समय सदियों की पुरानी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जरा ध्यान मे रखते ।
क्लबों मे जाने के लिए अभी भी ड्रेस कोड को गंभीरता से पालन किया जाता है क्योंकि उससे कोई संस्कृति जुड़ी हुई है , फिर अपने देश की गरिमा और परंपरा को ध्यान मे रखकर क्यों नहीं कानून बनना चाहिए ? यहाँ आज भी सत्तर प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदुस्तानी कहलाने पर गर्व महसूस करते हैं और उसी तहजीब एवं परंपरा मे जीते हैं । जो लोग महिलाओं का बचपन भी छीनना चाहते है उनके नेक इरादों पर भरोसा कैसे किया जा सकता है । महज चंद उदाहरणो के खातिर देश का तस्वीर बदलना नितांत दुखद है । किस तरह के प्रजा तंत्र मे हम जी रहे हैं । वर्तमान सरकार देश की ज्वलंत समस्याओं को भूल कर , समलैंगिकता ,आदि यौन विषयों पर ज्यादा गंभीर दिखती है । क्या भारत सरकार ने वात्स्यायन के भूत को अपना सला ह कर बना लिया है ? माताएँ अब क्या कह कर बेटियो को नैतिकता का पाठ पढ़ाएगी ? इस विधेयक का भरपूर विरोध होना चाहिए ,जिससे यह अपने वर्तमान रूप मे संसद मे पारित न हो सके ।।

आलेख : कामिनी कामायनी (ब्लॉग से साभार)

Source : http://www.tahalkaindia.com/more_view.php?nid=251

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