झूठ बोलना खेल है, नदी किनारे जेल है

Posted: June 30, 2013 in Education, Politics, Youths and Nation

-प्रमोद तिवारी

खेत को बाड़ ही खाने को तैयार हो तो फिर किसे दोष दें। कानपुर शहर के लिए यह जुमला भी शायद कम पड़े। नेता, अफसर, व्यवसायी तो पहले से ही एक-एक कोना पकड़ कर इसे चूसने में लगे हैं, अब बाकी बचे पर धर्मात्मा, समाजसेवी, मीडिया वालों की नजर खराब हो गई है।
शहर की चिंता में डूबे कुछ चिंतकों ने सरकार पर और स्थानीय अधिकारियों पर गंगा किनारे की जेल को शहर से बाहर ले जाने की मुहिम चला रखी है। दरअसल यह मुहिम शहर के ‘भू-भक्षियोंÓ की योजना का एक हिस्सा है। गंगा किनारे स्थित जेल अगर किसी बिल्डर या धन्नासेठ को मिल जाये तो वहां पर जो बहुमंजिली इमारतें खड़ी होगी वह शायद शहर की अब तक की सबसे मोहक और सबसे महंगी लोकेशन होगी। जब फ्लैट बिकेंगे तो करोड़ों के नहीं, अरबों के वारे-न्यारे होंगे। पता चला है, जेल को हटाने का प्रस्ताव सरकार तक पहुंच चुका है और सरकार इस तर्क के साथ सरसैयाघाट से सटे जेल को हटाने को राजी भी हो गई है कि इसे शहर से बाहर ले जाया जायेगा ताकि महानगरीय विकास में जेल बाधा न बने।
जरा सोचिये कानपुर जेल किस तरह से महानगरीय विकास में बाधा है ? तर्क है कि जेल बीच शहर से बाहर ले जाई जायेगी। जबकि वर्तमान में जेल शहर के एक ऐसे किनारे पर है जो सदियों से किनारा है और आगे भी सदियों तक किनारा ही रहेगा। कानपुर जेल के पीछे, उसकी दीवार से सटी गंगा बहती हैं। जेल की दृष्टि से सर्वाधिक माकूल स्थान। कभी शहर का विस्तार गंगा की धारा पर तो होगा नहीं, और धारा के पार शहर कानपुर नहीं, उन्नाव है। अब अगर यह जेल शहर के गंगा के उत्तरी किनारे से उठाकर कहीं भी किसी भी दिशा में ले जाई गई तो वह कब तक शहर से बाहर रह पायेगी। पूर्व में रूमा तक शहर बस गया है। दक्षिण में विस्तार का आलम यह है कि पृथक जिला बनाने की मांग चल रही है। पश्चिम में चौबेपुर तक शहर पहुंच चुका है। अब ऐसे में गंगा के किनारे से हटाकर जेल कहीं भी ले जायें, पांच-दस साल में वह फिर शहर के बीच होगी। अगर शहर के बाहर किन्तु शहर के करीब सुरक्षा और अभिरक्षा के लिहाज से कोई भी अच्युत उपयुक्त स्थान संभव हो सकता है तो शायद मौजूदा लोकेशन से उपयुक्त कोई दूसरा स्थान हो ही नहीं सकता।
आज जहां जेल है वहां से कैदियों, बंदियों को कचहरी तक लाने में केवल एक सड$क पार करनी होती है। मीटरों में फासला है जेल और कचहरी, न्यायालय के बीच । कितनी बड़ी सुविधा है। कैदियों को लाने-ले जाने में समय, ईंधन, स्टाफ सभी की बचत है। सबसे बड़ी बात $कि गंगा नदी जो जेल की पिछली दीवार सी है, उसे न कोई भेद सकता है, न कभी सुरंग बन सकती है और न ही कोई उसे फांदकर फुर्र हो सकता है। शहर भी कभी गंगा की धारा पर नहीं बस सकता। यह जेल परिसर किसी भी तरह से शहर के विकास में बाधा नहीं बन सकता और न ही कभी शहर के बीच हो सकता। तो बताओ अब जेल को शहर से बाहर क्योंं ले जाया जा रहा है और ले जाया जा रहा है तो यह क्यों कहा जा रहा है कि जेल शहर के बीच है। अरे नियतखोरो! कुछ तो शर्म करो, लूटने के बहाने तो ठीक बनाओ।

कवि प्रमोद तिवारी कानपुर नगर की आधुनिक पत्रकारिता के प्रमुख आधार स्तम्भ रहे हैं। दैनिक जागरण से हेलो कानपुर तक का  सफ़र उनकी उस वैचारिक प्रतिबद्धता को बयां करता है जिससे  शहर के सैकड़ों पत्रकार सीखे और खड़े हुए।   वर्तमान में लेखन और काव्यपाठ  द्वारा देशव्यापी  काव्यमंचों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

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