हमारा बच्चा स्कूल जा रहा है कटोरा लेकर. धिक्कार है हम पर ?

Posted: July 18, 2013 in Uncategorized

bihar

बाबा विजयेन्द्र

मैं आम आदमी हूँ । भूखा हूँ। नंगा हूँ । इसलिए खास नहीं हूँ । मैं भारत का जन गण मन नहीं, वल्कि एक वोटरलिस्ट भर हूँ, उपभोक्ता हूँ, एक खरीदार हूँ । मैंने भी ‘भारत माता की जय’ और ‘मादरे-वतन’ की मुक्ति का जयकारा लगाया था । अर्पण किया था और तर्पण किया था । वलिदानी विरासत को साझा किया । बड़ा सपना था कि हमारा अपना देश होगा, अपनी सरकार होगी । सबको जीने का आधार होगा और अधिकार होगा । भूख और भयमुक्त समाज होगा ।

आजादी का वर्षगांठ निकट हैं। घोषणाएं फिर लहराई जायेंगी । लोक-लुभावन नारे फिर बनाये जायेंगें । इस तंत्र का प्रपंच लगातार ६६ वर्षों से जारी है और शायद आगे भी जारी रहेगा । हम ‘लोक’ अभिशप्त हैं इसे झेलने को ?

हमारी नदियाँ, हमारे पहाड़, हमारे जंगल, हमारे खेत और खलिहान ? अब हमारा नहीं रहा । सच यही है की हम अब कही के नहीं रहे । हम तो बाज़ार के हवाले हो गए हैं ।

हम अपनी मिहनत से न तो तन ढक सकते, न ही पेट भर सकते । ना अपने बच्चों का, न ही अपने कुटुंब को खिला सकते हैं। दरबाजे से साधू को रोज लौटते देखते हैं ।

सरकार भिखारी समझ हम पर बहुत ही मेहरबान है । उधार का अनाज, उधार का कपडा, उधार का घर, सब कुछ खैरात की तरह सरकार हम पर लुटाये जा रही है ? बगल के बाबू बिना काम का हमें मनरेगा का लाभ दे रहे हैं ? कुछ वो भी और कुछ हमें भी लूटने का मौका दे रहे हैं ? हमारे बच्चों को बना बनाया भोजन भी दे रहे हैं ? और कपडा-लत्ता, सायकिल और लेपटाप भी दे रहे हैं ? वाह री यह गरीब हितैषी सरकार ?

धिक्कार है हम पर ? हमारा बच्चा स्कूल जा रहा है और साथ में कटोरा लेकर ? आजादी के बाद हमारी स्थिति ऐसी भी नहीं बनी कि हम अपने बच्चे को भोजन करा सकें ? हुक्मरानों के बच्चे क्यों नहीं कटोरा लेकर स्कूल जा रहे हैं ? क्यों नहीं हमारे कपडे वो पहन सकते जो हमें दिया जाता है ?

हम बेवकूफ नहीं हैं । यह सवाल भीख और भूख से जुड़ा नहीं है। यह मेरा अधिकार है। यह देश हमारा है। हम इस देश के लिए जिन्दगी झोंक रहे हैं। बेहतर और स्वाभिमान की जिन्दगी जीने का हमें भी हक़ है। बस हमारा खेत और खलिहान लौटा दो । नदी और पहाड़ लौटा दो । जल और जमीन लौटा दो। इस पर हक़ सिर्फ हमारा है हमारा ? नहीं चाहिए तुम्हारा यह मध्यान्ह भोजन और मनरेगा। यह आग भी तुम्हारी और फायर ब्रिगेड भी तुम्हारा ? यह विल्कुल नहीं चलेगा ।

हमें गुस्सा है इस तंत्र पर जिसने हमारे मासूमों को कटोरा लेकर स्कूल जाने को अभिशप्त किया है । कल हमने बिहार में जहरीले भोजन से बीस बच्चों को मरते देखा ? सड़े अनाज, सड़ी सब्जियां जैसे अन्य जहर को ढकोसते देखा ? हमारा यह कथित भिखारी कैसे शेष समाज के बच्चों की बराबरी करेगा ? कैसे यह देश का सम्मानित नागरिक बनेगा ?

बिहार में हुई बच्चों की मौत पर सियासत जारी है । हमारा क्या ? हमारे पशुओं का भी चारा निगलने वाले लालू भी विरोध में खड़े हैं ? मिलाबटखोरों की सरगना भाजपा भी साथ हो गयी है ? कांग्रेस तो इस लूट-गेम की देश में कप्तानी ही कर रही है । निठल्ले नीतीश के लिए भी सत्ता ही महत्वपूर्ण है ।

लोहिया के लोग युपी और बिहार में कुछ ज्यादा ही हैं । अपेक्षा थी की लोहिया के सपनों का समाज यहाँ से बनता दिखेगा ? पूरा देश उस रोल मॉडल को स्वीकारता ? राष्ट्रपति और भंगी की संतान, सबको शिक्षा एक समान का मन्त्र नीतीश और मुलायम भी बहुत जपते थे ? क्या हुआ उस जाप का ? मुलायम का पप्पू [अखिलेश ] लेपटाप बाँट रहे हैं और नीतीश सायकिल और अन्य चीजें ? क्या इन खैरातों से नए समाज का निर्माण होगा ? क्या समाज में समता आ पायेगी ?

सरकार की कोई भी योजना सामने आने के पहले ही लूट की योजना बन जाती है ? बिहार हो या देश का अन्य प्रान्त क्यों उताबला है खैरात बांटने में ? पक्ष हो या विपक्ष क्या किसी के पास समाज की आतंरिक संरचना और उसकी तासीर और स्थानीय संसाधन को आधार बनाकर विकास का नया मॉडल खड़ा करने की समझ और तैयारी है ? काश्तकार, स्वर्णकार,चर्मकार, शिल्पकार और कर्मकार के उत्पाद को बाज़ार नहीं मिलेगा तो फिर इनके जिन्दा रहने का विकल्प क्या है ? क्या खैरात से ही इनका जीवनयापन चलेगा ? क्या इनके बच्चे मध्यान्ह -भोजन से मुक्त हो पायेगें ? और आगे भी मध्यान्ह – भोजन से बच्चे मरते नहीं रहेंगें ? क्या मॉल बनाने और बड़े और विदेशी कंपनियों को बुलाने भर से भारतीय समाज का अस्तित्व बच जायेगा ?

बीस बच्चों की मौत पर जो कुछ बिहार में हो रहा है वह सब फर्जी है, नकली है। यह सब सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने का खेल है । वर्तमान का हर निजाम इन नंगों को नारायण बनाते रहेगा पर स्थाई निदान की चाहत किसी भी दल और दलपतियों की नहीं है । वक्त रहते हमें आने वाली पीढी के लिए सजग हो जाना चाहिए अन्यथा विषमता की कोख से उपजी अराजकता में हर व्यवस्था ध्वस्त हो जायेगी …?

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