गुरु पूर्णिमा पर चातुर्मास और सेलिब्रिटी सिंगार का समीकरण

Posted: July 22, 2013 in Education, Geopolitics, Politics

baba ramdev & modelEveryone's kissing Shilpa

Image courtesy: swarajkhabar.com                                       Photo: LOLA (afterpackup.com)

सावन में गुरु पुर्णिमा के अवसर पर चातुर्मास की परंपरा पर प्रकाश डाल रहे हैं सच्चिदानंद

चातुर्मास का आरंभ व्यास पुर्णिमा पर ही होता रहा है। वास्तव में यह मानसून के आगाज का उत्सव है। यह पर्व बरसात की शुरुआत के साथ ही सूर्य के उत्तर आरोहण के अंतिम का प्रहर का सूचक भी है। संस्कृत साहित्य में प्रकाश की कमी और अंधकार की वृद्धि के बीच संतुलन की प्रक्रिया पर्व को ही चातुर्मास कहा गया है। पुराने समय में यह चार महीने का समय होता था। गुरु-श्ष्यि का यह सहवास काल ज्ञानार्जन का उत्कृष्ट समय माना जाता था। अब यह उपभोग का उपयुक्त काल हो गया है। आरुणि जैसे महान ऋषि का पुरुषार्थ इसी समय दृष्टिगोचर हुआ था। बाजारवाद के आधुनिक काल में नित्यानंद, रामदेव और निर्मल बाबाओं की लीलापुष्टि के दौर में तो यह सर्वोत्कृष्ट काल बनता जा रहा है? भीमानंद की परंपरा इस गुरुपुर्णिमा पर बढ़कर फर्जी डिग्री वाले बलात्कारी बाबा तक पहुंच गयी है। आजकल वही श्रद्धा के केंद्र में है! सत्ता का ओर-छोर उनकी कृपा का आकांक्षी हो उठा है।

गांधीजी के देश में गुरुपुर्णिमा का पुनीत अवसर कई मायनों में प्रभावी है। आधुनिक युग में गुरुओं ने चातुर्मास पर मेडोना, मल्लिका और पूनम पांडे का प्रभाव भी स्वीकार किया है। बाबा विजयेन्द्र बताते हैं कि सबसे साफ असर तो उनके वस्त्रों का पड़ा है। स्वराज शिविर में व्यास पुर्णिमा पर तत्व चिंतन में लगे मनीषियों ने चार्तुर्मास से जुड़े कई उभरते पक्षों पर प्रकाश डाला। अब देखिये कम से कम में गुजारा करने से वंचितों को लाभ मिल सकता है। यही आध्यात्मिक भाव तो आज-कल फैल रहा है। निस्सहाय और गरीबों को वस्त्र उपलब्ध कराने की आकांक्षा ने कई महान सेलिब्रिटी को गांधीजी की तरह कम से कम कपड़ों में समेट दिया है। इसी अल्प में संतुष्टि के भाव ने चार मास के चातुर्मास को भी एकमासा बना दिया। क्रैश कोर्स का कार्यक्रम अध्यात्म विद्या में प्रवीण करने चला है। अरे भाई यह सर्टिफाइड भी होने लगा। इससे नारदमना गुरुगण भी चार माह की लंबी बोरियत से बच लेते हैं। खैर इतने लंबे समय साथ गुजारने से परहेज का मामला तो बनता ही है। चातुर्मास और सेलिब्रिटी सिंगार का समीकरण गौर करने योग्य है। रुपहले पर्दे की देवियों के वस्त्रों का साईज और चातुर्मास का साइज सोलह आने समानुपाती है।

व्यास को कम वस्त्र पसंद था। वस्त्र छोडि़ये वह तो एक मृमचर्म में ही गुजारा कर लेते थे। इसलिए तो भारतभूमि में ही बांध बनाकर अल्प में गुजारा का प्रावधान किया गया। विडंबना ही है कि पाताल लोक से पधारे जीवधारियों को इस व्यवस्था को तोड़ने में अपार संघर्ष करना पड़ा। परंतु यहां देखने पर उनकी असफलता भी साफ उजागर हो जाती है। अब काल की विडंबना देखिये बेवक्त बदरा महिने भर पहले आकर हिमालय में उत्पात मचा गया। सज्जन पर्यावरण चिंतकों द्वारा इसे मानवनिर्मित आपदा बताने से रुष्ट व्यस्थापकों के दर्द को अनदेखा करना तो कहीं की समझदारी नहीं है। दर्द से कराहते व्यवस्थापकों ने तो झटपट बौद्धमंदिर में ‘सीरियल ब्लास्ट’ कराकर परिभाषा की ओर ध्यानाकर्षित किया। पर कसर फिर भी बाकी ही रहा। नतीजा और भी बुरा होना था। आखिरकार सरकारी खैरात पर पलने वाले बच्चों को भी मौत की सौगात मिल ही गयी। गनीमत है, मानवनिर्मित आपदा पर बहस को लगाम तो लगा। इस व्यास पुर्णिमा पर चातुर्मास का धूम मचा है। बेवक्त पहुंचा मानसून शीला से पहले जवान होकर मुन्नी से ज्यादा बदनाम होने पर तुली है। देवभूमि में प्रवास करने वाले उर्ध्वरेता ऋषियों का त्राणकाल सावन में सराबोर होकर रमणीक होता जा रहा है।

अठारहों पुराणों के रचयिता व्यास की कृत्तियों को उनके जन्मदिन पर याद करने की परंपरा है। सेटेलाइट युग के आधुनिक आचार्य भी गुरुपुर्णिमा मनाते हैं। पर परोपकार में पुण्य का भाव नहीं रहा। परपीड़ा का उपक्रम पाप की समस्त सीमाओं का अतिक्रमण कर बाजार में सबसे तेज बिकने लगा है। रोती-बिलखती गंगा आर्तनाद कर रही है। जवान होने से पहले बूढ़ा हो चुका हिमाहल जर्जर राग अलापने में संलग्न है। चातुर्मास भी चल ही रहा है। और तो बाकी सब ठीक ही है।

(लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं)

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