मनमोहन, नरेंद्र मोदी और विकास का मोडल

Posted: July 23, 2013 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

विकास की इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अलमबरदारों-विश्व बेंक-अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष और उनके अंशदाताओ के गठजोड़ ने मनमोहन को भारत में लगभग दो दशकों पहले एक ”विकास मोडल” के साथ अराजनेतिक तथा ईमानदार चेहरे के रूप में आगे करके लोकतंत्र में आशा की किरण के रूप में उभारा . उनकी नीतियों का मुख्य आकर्षण उदारीकरण, वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण को लगभग सभी क्षेत्रों में बिना  रोकटोक और अवरोधों के लाजमी मानते हुवे विकास और तकनीकी  के लिए के अवश्यम्भावी, जरुरी और अपरिहार्य बताना था. मनोवेज्ञानिक सोच, समझ और संस्थागत परिवर्तन से लोकतंत्र के सभी खम्भों को इस मोडल को अमलीजामा पहनाने हेतु प्रेरित और प्रोत्साहित करके और प्रचारित करने को तेयार किया गया .

सरकारें बदलती रही और यह नीति कभी तेज तो कभी धीमी गति से चलती रही . इन नीतियों के लागू होने के कारण बड़े और माध्यम दर्जे के पूंजीपति और व्यापारी तबके को विकास और रोजगार की चालक शक्ति के रूप में उदारतापूर्वक आगे बढाया. मेहनतकश, किसान, मजदुर और आम आदमी को गोण करके इनके भरोसे छोड़ दिया. सरकारी सम्पति, देश के भोतिक संसाधन, किसानो और आदिवासियों की जमीन इन देशी पूंजीपतियों के साथ साथ विदेशी पूंजी के हवाले किया जाता रहा. सरकारी खजाना भरता रहा और अंधी लुट उसके पीछे छिपती गई . पूंजीपतियों, दलालों और सत्ताधीशो के पेट फूलते रहते. विभिन्न राज्यों और केंद्र की ”विकास दर” की बढ़ोतरी के पीछे सत्ता का चरित्र छिपता रहा. पूंजीपतियों के फुले पेट और मध्यम वर्ग की जुगाली, धूर्तता और चालाकी के पीछे मेहनतकश आवाम के खून के पसीने की कमाई, मजदूरी, फसल का कम मूल्य तेजी से पूंजी का आकर ग्रहण कर तीव्रतम गति से जनविरोधी गठजोड़ के हाथों में जाता रहा . विकास दर की आभा को चकाचोंध में आम जनता की सच्चाई का मर्म गुम हो गया. उजड़ते किसान और आदिवासी का दर्द लोकतंत्र के चारो खम्भों को नहीं दिखा.
लोकतान्त्रिक धुरी के इन दोनों विपरीत धुर्वों में एक फलता फूलता रहा और दूसरा लुटता रहा . आर्थिक गेर बारबरी बढती रही बस यह तेजी से जनता के समाने नहीं आई तो उसका मुख्य कारण सामाजिक अंतरविरोधो को जाने और पहचाने बिना अलग अलग क्षेत्र में विखंडित होकर अलग अलग मुधो पर जनता का संघर्ष करना और इसी कमी की वजह से सही नेतृत्व का नहीं उभरना रहा. कुलमिलाकर यह विकल्पहीन स्थति ही कही जा सकती हैं.
सत्ता के चरित्र और मूल सामाजिक अन्तर्विरोध के रहते
इस दोर में लगभग सभी राज्यों के शासक, पूंजीपति. दलाल, चाटुकार कानून के डंडे और भ्रष्ट लोगों ने सभी राज्यों में विकास किया . मोदी का गुजरात भी भारत के अन्य राज्यों में से एक हैं . गुजरात में कुछ अधिक उद्योग धंधे अधिक पनपे तो उसका सबसे महत्वपूरण कारण  भोगोलिक ही रहा हैं.
उदारीकरण के इस दोर में आयात-निर्यात ने सबसे महती भूमिका अर्थव्यवस्था में बनाई जो पिछले सभी दशकों से बहुत अधिक हैं. गुजरात की अपनी भोगिलिक स्थति के चलते वंहा नए उद्योगों को स्थापित करने में उन्हें स्वभाविक प्रोत्साहन और अवसर मिला और जिससे उनका आयात-निर्यात और उत्पादित माल तुलनात्मक रूप से कम लागत का रहा .भोगोलिक कारण से ”कम तुलनात्मक लागत के सिद्धांत ” के चलते कई नए उद्योग धंधे गुजरात में स्थापित हुए  और कई उद्योग धंधो को वंहा स्थानांतरित  करने में फायदा नजर आया. गुजरात में कम मूल्य के माल को स्वभाविक रूप से भारत में सबसे बड़ा बाजार भी भोगिलित स्थति के चलते ही मिला. गुजरात के लिए सबसे बड़ा पश्चिम, मध्य और उतर भारत का बाजार हैं. दुसरे किसी राज्य अथवा वंहा स्थापित बन्दरगाहो की इतना बड़ा बाजार मिलता हैं तो उसमे मोदी सरकार को हम भूल जाएँ . मोदी सरकार के इस नए मोडल विकास में सबसे वह क्रूर चेहरा अभी जनता को दिखा नहीं जो वंहा के मजदुर-किसान-गरीब ने भोगा. यह भारत के अन्य क्षेत्रों से कंही अधिक वीभत्स हैं.

जब भी मेहनतकश और सर्जनशील तबके को कम समय में अधिक पसीज कर उसकी मेहनत को पूंजी में  बदलकर पूंजीपतियों के पेट भरे जाते हैं तब तब मध्यम वर्ग के चाटुकार तबके का पतनशील सोच और विचार का लेखक, बुद्धिजीवी, स्तम्भाकार, विश्लेषक इस पूंजीपति के फुले हुवे पेट(ढोल) पर अपनी तेज आवाज और धुन के साथ नाचता हैं. नाचों और तब तक नाचो जब तक की तुम्हारा यह ”ढोल” नीचे से अपनी खुशबु ना छोड़ दे . हाँ उस खुसबू के नशे में फिर तुमको सोना ही होगा . इस सोने में तुम तब तक आनंदित होते रहोगे जब तक की तुमारे इस फुले हुवे ”ढोल” की हवा मुंह में से नहीं निकल जाए.
यह मत भूलो की आने वाली सर्जनशील जनता की पीढियां इन फुले हुवे पेटो(ढोलों) की अचानक सामूहिक किर्याकर्म करके हवा नहीं निकाल देगी ! उसके बाद ये पीढियां उसे शर्म से ”सभ्य, वैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक मानव” को ग़मों के गीत के साथ दफानाएगी ! क्योंकि वह ढोल भी अपनी ही प्रजाति का हैं !

साभार : भूपट शूट फेसबुक से
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