स्वाद का समाजशास्त्र बनाम विखंडित चेतना का चौपाल?

Posted: July 26, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

(बाबा विजयेन्द्र)

banner1 copy

कल स्वराज खबर [ दैनिक हिंदी ] के साधना शिविर में गंगा आन्दोलन और आम आदमी पार्टी के खास कार्यकर्ताओं [ आदर्श वाजपेयी ,राघव तिवारी , सत्येन्द्र तिवारी ] का सम्मेलन नहीं, मिलन कार्यक्रम हुआ. राकेश मिश्र और गंगापुत्र कौशल किशोर झा ` इस कार्यक्रम को लीड कर रहे थे. सभी बौद्धिक अखाड़ा के पहलवान आपस में ताल ठोक रहे थे? कवायद इतनी जबर्दश्त थी कि अगर अन्ना या अरविन्द उसे सुन लें तो एक घंटा में ही पार्टी पोलिटिक्स से सन्यास की घोषणा न कर दें! ओबामा और मनमोहन तो मानो हमारे बगलगीर हों! सब धन बाईस पसेरी…मेरी हिम्मत पस्त हो रही थी कि इस ऊँची बहस में कैसे शामिल होऊं .

क्रांति कब होगी? कब होगी? क्रांति फिल्म के दिलीप कुमार की तरह हम सब ट्रेजडी-किंग लग रहे थे. ‘आप’ के नेता भी स्वीकार कर रहे थे कि कहीं हम नकली नेता और नकली नारे के चक्कर में तो नहीं फंस गए हैं? गंगापुत्रों की पीड़ा अलग थी? इन्हें अरविन्द के भ्रष्टाचार पर भरोसा नहीं हो रहा था? इनकी गंगा मलिन हो या निर्मल, बाज़ार में बिक तो रही है? आनंद पांडे ने तो गंगा की गन्दगी तक को बाज़ार में बेच दिया? अरविन्द भी तो भ्रष्टाचार को ही बेच रहे हैं. ज़ैसे दाती महाराज ने शनि को बेचा! क्या अरविन्द सत्ता की मंडी में टिका रह पायेगा? ‘आप’ के नेताओं की यह स्वाभाविक चिंता उनके ललाट पर थी.

इसी चिंता और चिंतन के बीच उबला हुआ भोजन सामने आ गया था. बौद्धिक उड़ान चाहे लाख ऊँचा हो पर रोटी के लिए जमीन से सम्बन्ध तो बनाना ही पड़ेगा। भूख हमारी क्रांति का लय बिगाड़ रही थी. खाए-पीये अघाए ये क्रांतिकारी उस उबले भोजन पर मस्ती करने लगे. किसी ने उस स्वादहीन, रसहीन खिचड़ी को मिड डे मील से जोड़ा तो किसी ने स्वेक्षिक गरीबी से तो किसी ने उस खिचड़ी को स्वराज साधना शिविर का प्रसाद कहा. के के बाबा ने तो इसे महाप्रसाद तक कह डाला. द्रोपदी की तरह खिचड़ी की भरी सभा में धज्जियाँ उड़ रही थी. कांग्रेस की तरह खिचड़ी की बदनसीबी का मजाक उड़ा रहे थे हमारे उपस्थित मित्रगण! खिचड़ी का नया समाजशास्त्र बनाया जा रहा था. देश किसका है? हम खिचड़ीफरोश लोगों का या किसी कथित सरफ़रोश का? सरफरोशी की तमन्ना मेरे भीतर जाग चुकी थी. बड़ी अजीब है दुनिया जहाँ भूख से भी लड़खड़ाओ तो लोग कहते हैं कि हम पीकर आये हैं। बहस जबरदस्त और दिलचस्प दौर में पहुँच गयी थी.

मंच और माइक से मेरा गहरा लगाव रहा है. इधर काफी दिनों से मंच और माइक सुलभ नहीं हो पाया है. इसका खामियाजा मेरे यहाँ आने वाले अतिथियों को भुगतना पड़ता है. निरीह श्रोता होने के नाते अतिथियों को मेरा भाषण झेलना पड़ता है. ‘अतिथि कब आओगे’ का भाव रखने के बावजूद अथिति अब हमारे पास टिकना नहीं चाहते? यद्यपि अतिथि भगाने का और भी तरीका है कि आप नेटवर्क मार्केटिंग या बीमा कंपनी का बोर्ड लगा लें, अतिथि यूं ही भाग जाते हैं. वैसे मेरा बौद्धिक व्यायाम इतना खतरनाक नहीं की कोई अतिथि आसानी से मेरा पिंड छोड़ दे… युवा क्रांति पार्टी के होनहार नेता कन्हैया भाई भी इस टीम के कथित बौद्धिक आतंक से भयभीत होकर लखनऊ लौट गए हैं.

सरकार हो या सूचना तंत्र या फिर सामाजिक आन्दोलन सभी जगह हमारे संप्रभू और कुलीन भाई का ही कब्ज़ा रहा है। इन प्यारे भाईयों ने अपनी सुविधा और सत्ता के लिए हर चीज का समाजशास्त्र खड़ा कर लिया है. भगवान बाँट लिए, आकाश बंट गया, जमीन बंट गयी, धरम बंट गए, हिन्दू बंट गए. रंग भी बदरंग हुए. नीला मुसलमान का, गेरुआ हिन्दुओं का हो गया. जानबर का भी धर्म हो गया. ग़ाय हिन्दुओं का तो सूअर मुसलमानों का. हिन्दी, हिन्दुओं का तो उर्दू मुसलमानों का! धोती हिन्दुओं की तो पतलून मुसलमानों का? बुरका और साड़ी का समाजशास्त्र तो मोदी से आप पढ़ ही रहे हैं.

सबकुछ बांटते-बांटते अब देश के शहीदों को भी बांटने लगे हैं. भगत सिंह जाट, गांधी बनिया, पटेल कुर्मी, अम्बेडकर महार, बीर कुवर सिंह राजपूत, सुभाष चन्द्र बोस और विवेकानंद कायस्थ हो गए. साहित्य को भी जातीय खटाल में बांधने की कोशिश की है. प्रेमचन्द सामंतों के मुंशी करार दिए जा रहे हैं. निराला खांटी त्रिपाठी ‘घोषित’ हुए हैं. राष्ट्रकवि दिनकर भूमिहार होकर रह गए हैं. नामवर सिंह ठाकुर आनंद मोहन की किताब का लोकार्पण करने बिहार जाने लग गये.

आप नेता ने आरक्षण पर भी बोलना शुरू किया. बड़ी ही इमानदारी से कहा कि माना हमारे पूर्वजों ने खता की. इसका मुझे अफ़सोस भी है पर जिस तरह से आरक्षण पर सियासत हो रही है यह क्या देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है? ‘आप’ नेता की पीड़ा समझ रहा था कि यह जेनरेशन आउटडेटेड ट्रेडिशन से मुक्त होना चाहती है. नया समाज बनाना चाहती है. देश की सबसे बड़ी व्यवस्था जाति-व्यवस्था पर चली बहस शांत ही नहीं हो रही थी. इसका कोई ओर – छोर था. हरि अनंत हरि कथा अनन्ता की तरह देश की समस्या को चुगने में लगा था. समस्या वाले देश में समाज सुधारकों की खेती होती है. हमें भी देश की सेवा के लिए कुछ समस्या चाहिए था. समस्या की तलाश में सभी नेता अलग हुए. अगली चौपाल में कुछ और दोस्त होंगें? कुछ और बातें होंगीं।

sOURCE : http://swarajkhabar.com/

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s