पाखंडी लालू यादव: मंदिर मस्जिद मठ और मसखराबाजी से पगला बाबा तक

Posted: July 27, 2013 in Education, Politics, Youths and Nation

पाखंडी लालू को कैसे बचा पाएंगे पगला बाबा

Image Courtesy: Punarnav Bharat

राष्ट्र संधान पर एक युग समर्पित कर चुके विजयेन्द्र सिंह स्वयं में एक संस्थान जैसे  हैं और वर्तमान में स्वराज खबर समूह के प्रधान सम्पादक हैं । जिनको सहयोगियों द्वारा  बाबा विजयेन्द्र या बाबाजी भी के उपनाम से भी पुकारा जाता है। कर्पूरी ठाकुर जैसे युगपुरुषों के स्नेहपात्र रहे बाबाजी  बिहार की बंजर होती राजनैतिक जमीन और बेशर्म ठूँठ जैसे  खड़े पाखंडी राजनीतिज्ञों के कर्मकांडों से बेहद आहत हैं। वो कहते हैं कि  पाखंडी लालू को पगला बाबा के शरण में जाने के बजाय पागलखाना जाना चाहिए. आत्म-विश्वास की कमी ने उनका दिमागी संतुलन बिगाड़ दिया है. इस बिगड़े दिमागी संतुलन के कारण उनका राजनीतिक संतुलन भी बिहार में बिगड़ गया है. नीतीश का भूत लगातार लालू का पीछा कर रहा है. सात वर्षों से लालू लगातार डर के साए में हैं.

अपनी इसी मसखराबाजी के कारण ही केंद्र और राज्य की सत्ता से इन्हें हाथ धोना पड़ा. सत्ता-सुख के लिए लालू हर मंदिर, मस्जिद और मठों का सहारा ले रहे हैं. पर किसी भी मुल्ला और पंडित का टोटका काम नहीं आ रहा है. सोनिया और राहुल पर किसी भी जंतर-मंतर का कोई असर नहीं हुआ. इतने दान-दक्षिणा खर्चने के बाद भी कोई छोटका-मोटका मंत्रालय भी नसीब नहीं हुआ. ताबीज से तख़्त नहीं मिलते? इतनी समझदारी भी नहीं है लालू को. राजनीति में काम करना होता है और पुरुषार्थ दिखाना होता है. लल्लु बनने से काम नहीं चलता. बात बनाकर बिहार को रसातल में भेजा. लूट और अपराध को प्रश्रय देकर इन्होने बिहार में १५ वर्षों तक राज किया. मसखराबाजी ख़त्म हो गयी अब उसकी जगह पाखण्ड और ढोंग ने जगह ले ली है. इसी पाखंड के बल पर लालू अपना पोलिटिक्स चलाना चाहते हैं. अन्धविश्वास फैलाकर बिहार का वोट बटोरना चाहते हैं.

इस हसरत को पूरा करने के लिए लालू ने मिर्जापुर के विन्ध्याचल में तंत्र-साधना की. पगला बाबा ने इस फूहड़ साधना को पूरा कराया। लालू पगला गयॆ और पगला बाबा को शिव का अवतार बताने लगे. खूब नाच हुआ. सारे टोटके अजमाए गए. कांग्रेस तो बेअसर रही अब सुप्रीम कोर्ट बांकी है. इंतज़ार है कि इस तांत्रिक क्रिया से कितने जज का दिमाग फिरता है? कलमाडी, डी राजा, बगल का राजा भैया क्यों पीछे है समझ से परे है. बहन जी और मुलायम भी तो पास के सूबे से ही हैं. सीबीआई से निजात पाने के लिए इन लोगों को भी इस पगला बाबा के शरण आ धमकना चाहिए! लालू भोला बाबा और बाबा के यहाँ से लौट आये हैं? पंडों का भी आशीर्वाद ले आये हैं. लालू भी किसी प्रकार के लोग ही हैं. इन्हे भी आस्था और धार्मिक विश्वास पालने का अधिकार है और पालना भी चाहिए पर डायन, जोगिन, भूत-पिशाच और तंत्र-मन्त्र जैसे अन्धविश्वास को आगे बढ़ाना खतरनाक है. सूर्य ग्रहण के वक्त नीतीश ने विस्कुट खाकर समाज को अज्ञानता से बाहर कर दिया था. उस पर लालू ने उसे अपशकुन कहा.

लालू के इस धार्मिक स्टंट को समझना जरूरी है. लालू जब सत्ता में थे तो गरीब तोता वाले से भाग्य बताने का तोता-स्टंट में रूचि लेते थे. तोतावाले को बहुत हरकाते और जेल में डाल देने की धमकी भी देते. देश से मनुवाद और ब्राह्मणवाद को ख़त्म करने का ‘भूरा बाल साफ़ करो’ और ‘परबल खाओ’ का बीज-मन्त्र लल्लू ने ही दिया था. इसी मन्त्र को आधार बनाकर डेढ़ दशक तक अपना तंत्र बिहार में स्थापित किये रहे और पिछड़े और दलितों को बेवकूफ बनाने का काम किया.

लालू लोहिया के लोग हैं और जेपी के अनुआयी. पटना के गांधी मैदान में समाज को बदल डालने के लिए कैंची लेकर काटने के लिए जनाऊ खोजते थे, जातिवादी प्रतीकों के खिलाफ जंग का आह्वान किया था, उसमे लालू भी अगुआ थे. पंडित और पुरोहितबाद के खिलाफ वह एक मुकम्मल लडाई थी. लोगों ने अपने उपनाम को भी हटाया. अन्धविश्वास के खिलाफ वह एक जबरदस्त मुहिम थी. पर सत्ता किस प्रकार लोगों का चरित्र बदलती है इसके बहुतेरे उदाहरण हैं.

लालू ही नहीं कांग्रेस भी बाबा-मुक्त नहीं थी. महेश योगी और चंद्रा स्वामी का जलबा हमलोग देख चुके हैं. लालू के भी सेटेलाईट बाबा थे जिसकी चर्चा बहुत हुई है. वर्तमान में लालू वही काम कर रहे हैं जिससे पुरोहितवाद को जिन्दा रहने का आधार मिले. भाजपा को क्या सोचना है? वह तो गणेश को दूध पिलाने वाली पार्टी ही है और इसी अफबाह और अन्धविश्वास पर जिन्दा भी है. लालू भी अपना स्पेस खोज रहे हैं. मरी हुई पुरोहताई को जिन्दा कर वह स्वर्ण-स्वीकृत होना चाहते हैं. भाजपा का स्वाभाविक सगा होने का सारा तिकरम लालू करना चाहते हैं. इससे तो आम गरीब गुरुऑ की मन की मुराद भी पूरी बात हो सकती है.

पर विकास के सवाल पगला बाबा से कैसे उत्तरित होंगें? बिहार की जनता ने पगला बाबा का क्या बिगाड़ा है जो इन्हें आशीर्वाद देने पर तुले हुए हैं. क्या बाबा चाहते हैं कि बिहार फिर विनाश के रस्ते पर चले? क्या बाबा को नहीं पता है कि उनका यह चेला आदमी क्या पशुओं का चारा भी चुरा लेता है? क्या इसी चारा-चोर चेला का बाबा सरदार होना चाहता है? अगर ऐसा है तो बाबा बबाल ही करेंगें. पांच तांत्रिक क्रिया में शक्ताभिशेक, पूर्णाभिषेक, कर्मदीक्षा, सम्राज्यदीक्षा और महासाम्राज्यदीक्षा में लालू ने कौन सी क्रिया की है यह अभी तक पता नहीं चल सका है.

इस तांत्रिक अनुष्ठान से आहत कौशल किशोर कहते हैं कि “साल भर तौल कम, सावन में बोल बम” यह लोहिया का एक सार्थक वक्तव्य है जिसमे शिव के नाम पर होते आडम्बरों पर बड़ा भीषण कटाक्ष किया गया था। इसमें तत्कालीन बनिया समुदायों को आइना दिखाने का प्रयास था जो आज के तुष्टिकारी राजनीति को शर्मसार करने के लिए नाकाफी नज़र आता है। यही देश का दुर्भाग्य है, जिसमे लोहिया के तथाकथित उत्तराधिकारी परिवरवादियों और उनके चाटुकारों के बनिया-बैकालों सरीखे गिरोह बन बैठे है…

इस खबर से लालू की जमा पूंजी भी ख़त्म हो रही है. उनकी सामाजिक विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है कि लालू के जीवन के केंद्र में समाज नहीं, सत्ता है. वही सत्ता जो समाज के शोषण का माकूल हथियार साबित होता आया है.

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