खबरनवीसो का नया दौर …..अपनी- अपनी ढपली अपना -अपना राग

Posted: July 28, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

राघव तिवारी

भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश के अन्दर एक माहौल और जनता के आक्रोश और आम आदमी की परेशानियो के तमाम पहलुओ को धीरे धीरे पीछे धकेलते हुये प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मंदिर मस्जिद के ऊपर बहसों का बाज़ार गर्म है …विगत दो वर्षो से अन्ना जी के जनलोकपाल आंदोलन के बाद से सत्ता के महीन खेल से नावाकिफ हम जैसे अल्पज्ञानी आम लोगों का समाचार चैनलों चिपका रहना और अखबारों को चाटना एक आदत व शगल हो गया है , आन्दोलन के बाद से केवल एक काम रह गया है की जहाँ भी धरना,प्रदर्शन या अनशन हो पहुँच जाओ, दर्द देख के दर्द होता है एक रिश्ता बन रहा है दर्द से दर्द का ..भाई सरीखे साथी आदर्श बाजपेई व सतेन्द्र तिवारी ने जनलोकपाल आन्दोलन के दौरान मेरे ज़मीर को जगाया और न जाने कब मै वकील से आन्दोलनकारी हो गया …इधर देखा और समझा कि ख़बर कैसे आम आदमी के जीवन की दिशा ही बदल डालती है ..सो खबरनवीसो से मिलने और उनके काम के तौर तरीकों को जानने की जिज्ञासा मुझे उन तक ले गई …मैंने समझा टी.आर.पी. का खेल …जहाँ होती है हर दिन और रात खबरों की रेलमपेल …बुद्धू बक्सा कुछ भी कर गुजरने पर उतारू नज़र आता है…लोग क्या देखना और सुनना पसंद करते है ..ये सच के आधार पर नहीं बल्कि टी आर पी और चैनल मालिकों की व्यावसायिक मजबूरियों तले दबी निष्ठा द्वारा तय होता है ….धंधे की मज़बूरी जो है …टी. आर.पी. जो नहीं ..तो चैनल चलाना होगा मुश्किल .. सो लूट,ठगी और बलात्कार जैसी घटनाओ का सनसनीखेज प्रस्तुतीकरण भी अपनी तेज़ी पर है …लगता है कि अब मीडिया खुद ही ठगी,लूट,हत्या,बलात्कार की यूनिवर्सिटी बन गया है ..कैसे होती है ठगी..सब कुछ सिखा देने पर ऊतारू ..हत्या और बलात्कार के तमाम तरीके..लोगो ने इन्ही से सीखे …वाह क्या बात है …कितना आसान है समझना.. बलात्कार का होना तो लोग अब रोजमर्रा की सामान्य घटना समझाने लगे है …और अब आया चुनाव का दौर …तो लगता है की इनकी सहालग आ गई …अब तो चांदी है ..लगे पड़े है जनता को समझाने में …कहीं नमो की गूंज …तो कहीं माया और मुलायम भईया..बात तो सोनिया चची की भी रखनी पड़ेगी ….सारे के सारे केवल नेताओ के दीवाने से लगते है …फलां ने ये कहा…फलां ने वो मारा …रोज़ नए नेताओं और उन के टी आर पी बटोरू बयानों की गुथमगुथा ….उधर खबरनवीसों से होड़ लगाते हुये सोशल मिडिया के शब्दवीर साथियों की फौजें भी टकराती रहती है , कोई गौरवान्वित है मोदी सेना का सैनिक बन वैश्विक पूँजी और साम्प्रादायिकता के खतरनाक गठजोड़ का प्रहरी बन कर , किसी को छद्म सेकुलरवाद का बुखार चढ़ा हुआ है , तो कुछ लोगों को मायावती और सोनिया शक्ति स्वरूपा देवी नज़र आती हैं …एक कॉलेज में नेता का भाषण मीडिया की हैडलाइन और बौद्धिक चर्चा की विषयवस्तु बन जाता है , हज़ार पंद्रह सौ की भीड़ के ये प्रायोजित खास सम्मेल्लन देश की प्रमुख सुर्खियाँ हो जाते हैं ,

यूँ तो ये सब पूँजी का खेल है भईया , महीन खेल जो खुली आँखों को भी नहीं दीखता , पैसा अपनी पूरी ताकत से लोगों की सोच और समझ को विकसित ही नहीं होने देना चाहता इन् सब के बीच आम आदमी के मुद्दे और वो आम आदमी खो जाता है , अब नहीं होगी भूख पर कोई चर्चा, गरीबी और बेरोजगारी मुद्दे नहीं रह जाते , महँगी होती शिक्षा – स्वस्थ्य सेवाएं एवं श्रम सुधार कहीं गर्त में खो गए हैं …आज़ादी के बाद ख़त्म हुये ज़मींदार अब कॉर्पोरेट हो गए हैं , तो लो भईया जय हो आपकी , जाओ मंदिर बनाओ- मस्जिद के लिए लड़ो, नमो नमो जपो , सोनिया माया मुलायम की जिंदाबाद इन्ही में से कोई एक चुनने की मजबूरी यही बताएँगे आज के खबरनवीस … जय हो
चलो जारी रखते हैं – ढपली वाले ढपली बजा मैं नाचूं तू नचा
अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग

लेखक क्रांतिधर्मी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। क्रांति की धरती कानपुर में पेशे से अधिवक्ता हैं और  आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं।

 

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