“अति तुष्टिकरण” और “खनन माफिया जिंदाबाद” ही अंतिम सत्य नहीं

Posted: July 30, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

कहते है कि सत्ता की शक्ति में नशा होता है। यही नशा निरंकुशता को जन्म देता है। निरंकुशता में कुछ पूर्वाग्रहों को शामिल कर दिया जाए तो नतीजे वही निकलते हैं जो प्रोबेशन पर तैनात आइ.ए.एस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ हुआ।  सत्तालोलुप राजनैतिक पूर्वाग्रह से एक गंभीर बीमारी पैदा हुई जिसको अति तुष्टिकरण कहा जाये तो अतिशयोक्ति न होगी। इस अति तुष्टिकरण की नीति   के चलते समुदाय विशेष के लिए विशेष लगाव प्रदर्शित करना सत्ता प्राप्ति का प्रमुख अनुष्ठान बन रहा हैं।  इसके मूल में उसी समुदाय विशेष की अशिक्षा और उसके कौम के सरमायेदारों की नाकामी गौर करने का विषय है। इस विषय में तुष्टिकरण से राजनैतिक रोटियां सेंक रहे धर्मनिर्पेक्षों की खबर लिए जाने की उतनी ही बड़ी जरुरत है जितनी की दूसरी  कौम से अपना राजनैतिक कर्मकाण्ड सिद्ध कर रहे मठाधीशों की। सवाल खड़े किये जा रहे हैं सही या गलत को लेकर ईमानदारी और सत्ता शक्ति के पूर्वाग्रहों को लेकर जो कि एक सभ्य समाज के विवेक के परिचायक से नज़र आते हैं। नौकरशाही देश की संघीय प्रशासनिक व्यवस्था का  वह ढाँचा है जिस पर अपरोक्ष रूप से  देश के जनमानस की उम्मीदों को पूरा करने की उतनी ही जिम्मेदारी  होती है जितनी आज के राजनैतिक दरबारों की महत्वाकांक्षा पूरी करने की। यह एक पक्ष मात्र है। दुसरे पक्ष में देखे तो संवैधानिक दायित्वों और राजनैतिक समीकरणों के बीच अफसर के  स्वविवेक  का द्वन्द  उसकी कार्यशैली का निर्धारण करे तो मामले  व्यक्तिगत रूप तक ले सकते हैं। और बड़े सन्दर्भों में देखने का दुस्साहस किया जाए तो नज़र आता है कि जिस प्रकार के भ्रष्टाचार के बीच गौतम बुद्ध नगर का विकास हुआ है वह बहुत से चिंतकों की नज़र में भारी चिंता का विषय रहा है। इस भ्रष्टाचार के प्रधान कारकों में नगर नियोजकों, खनन माफियाओ  भू अधिग्रहण माफियाओं  से लेकर वैश्विक पूंजी के रहनुमाओं तक की हिस्सेदारों की दलाली में मुख्य भूमिका सरकारों की ही रही है जिसमे नौकरशाही प्रमुख रूप से शामिल रही है। मामला चाहे हिंडन नदी पर बेहिसाब  कब्जे से बसी कालोनियों और भूमाफिया के राजनीतिकरण का हो या अवैध खनन और बिल्डरों की लॉबी के राजनैतिक प्रश्रय का सच तो यह है कि इतना संगठित भ्रष्टाचार नौकरशाही के साथ गलबहियां किये बगैर परवान चढ़ना संभव नहीं । चाहे वह औद्योगिक भ्रष्टाचार का मामला हो राजनैतिक अर्थशास्त्र का फलित बेहिसाब भूमि अधिग्रहण का  जिसमें  देश की  सर्वाधिक उपजाऊ कृषि भूमि  जिसे विश्व बैंक के आर्थिक आदेश पर किसानों से लेकर जेपी जैसे उद्योगपतियों को सौगात में दे दी गयी। आज जब पूरा देश एक युवा अफसर की ईमानदारी बहुत बड़ी उम्मीद लगा बैठा हो तो यह याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि ये हालात भी नौकरशाही, राजनैतिक पूर्वाग्रहों और पूंजीपति माफियाओं के गठजोड़ के ही परिणाम हैं जिसे जनता जनार्दन को सदियों तक भुगतना होगा। यह कहना भी जरुरी है कि देश की अफसरशाही ने राजनैतिक पूर्वाग्रहों में चल रही विकास की अंधी दौड़  में लिए फैसलों की समीक्षा का साहस कभी नहीं किया। इसी विकास की अंधी दौड़ के परिणाम हैं खनन माफिया और अवैध कब्जे जिनसे जल, जंगल और जमीन का उपयोग जनहित की बजाये कुछ लोगों के हित में होता नज़र आता है। कुल मिला के देखा जाए तो नौकरशाही के पास इन परिस्थितियों में सुधार करने के लिए बहुत सीमित अवसर हैं। ऐसे में उसका डेयर डेविल फैसला जन विमर्शों के सामंजस्य में न हो तो राजनैतिक प्रकोप स्वाभाविक ही है। इस प्रकार की स्थितियों के सन्दर्भ में आइ. ए. एस. संघ ने जो कदम उठा के एकजुटता का परिचय दिया है वह सराहनीय है। लेकिन यह असुरक्षा की भावना के मद्देनज़र न होकर संस्थागत और राजनैतिक  भ्रष्टाचार के खिलाफ है यह फैसला कर देना जल्दबाजी होगी। यहाँ पर अफसरशाही के संगठनों को समीक्षा का मौका है जिससे   जनहित के लिए राजनैतिक पूर्वाग्रहों और सत्तालोलुप महत्वाकांक्षाओं को ईमानदारी से चुनौती दे सकें।   गुंजाइश तो और बहसों की भी बनती है लेकिन मीडिया जो इस मुद्दे को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना के पेश कर रहा है उसे भी अपनी नज़र का दायरा बड़ा करने की जरुरत है। चौथे स्तम्भ के दम्भ में रहने की बजाये समझदार  लोकशिक्षक की भूमिका में न्याय करते हुए यह समझाने की जरुरत है कि    हालात एक दो रोज में नहीं बिगड़े हैं। तभी राजनैतिक पूर्वाग्रहों से पैदा हुए हालातों पर जनता जनार्दन को फैसला लेने की मजबूती दी जा सकती है और ईमानदार अफसरशाही को सम्मान भी।

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