बंद कमरे की बैठकें और नौकरशाहों का बहुमत बनाम विकास प्राधिकरण में भारत निर्माण !

Posted: August 28, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

विषय विशेषज्ञ उसको कहते हैं जो अपनी सीधी दो लाइन की बात कहने के लिए पूरी किताब लिख दे ! उसे भी इतना दुरूह कर दे कि सामान्य बुद्धि का आदमी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए ! हमारा सामना रोज ऐसे विषय विशेषज्ञों से होता रहता है !
आज की स्थिति को समझने के लिए मोटे तौर पर कुछ बातें याद रखनी चाहिए –

पंचायत, जनपद या जिला स्तर पर कोई योजना नहीं बनती ! योजनायें प्रदेश -देश की राजधानी में बनती हैं ! उसी के अनुकूल बजट आबंटित होता है !अपनी जरुरत, स्वभाव, परिवेश के अनुकूल नीति कार्यक्रम बनाने में आम आदमी या स्थानीय समुदाय की कोई भूमिका नहीं होती !
केंद्र सरकार एक टारगेट समूह को ध्यान में रखकर नीति बनाती है ! उसे अमल में लाने के लिए एक कार्यक्रम बनता है जिसके क्रियान्वयन के लिए बजट आबंटित होता है ! अभी की सरकार मात्र बजट आबंटन करके अपने कर्तव्य की पूर्ती होना समझ लेती है ! उसे यह मुगालता होता है कि समाज के कमजोर वर्ग के लिए उसने कुछ किया !
इन कल्याणकारी योजनायों की पहुँच बहुत सीमित होती है ! प्रायः वे नीचे पहुँचते- पहुँचते अपना उद्देश्य खो देती हैं ! अंतिम आदमी तक आते आते उसे अनेक स्वार्थी वर्ग के हाथों के नीचे से गुजरना पड़ता है ! सब अपना हिस्सा सोखते चलते हैं, सो अमल के कोई परिणाम दिखाई नहीं पड़ते ! इन योजनायों के लाभ से समाज का बहुत बड़ा तबका वंचित रह जाता है !
मध्य प्रदेश में कई आदिवासी जातियों के विकास के लिए विकास प्राधिकरण हैं ! इन विकास प्राधिकरणों की बैठक बंद कमरे में होती है ! बहुमत नौकरशाहों का होता है ! वे अपनी विकास की समझ के अनुसार बजट खर्च की योजना बनाते हैं ! प्रायः ये आदिवासी समाज की वास्तविक जरूरतों के अनुसार नहीं होतीं !
ऐसी व्यवस्था के चलते यदि विकास के लिए और अधिक धन आबंटित भी हो जाये तो क्या वास्तव में विकास हो पायेगा या जो होगा उसे स्थानीय समुदाय अपना विकास मानेगा ? क्या इसके बाद वह देश की मुख्यधारा में अपने को समझेगा !

चलिए आप खुद से एक प्रश्न कीजिये बस्तर के आदिवासी को मुंबई में एक फ्लैट दे दीजिये ! क्या वह वहां आनंदित रह पायेगा ? उसे किराना दुकान चलाने या फैक्ट्री खोलने के लिए ऋण दे दीजिये क्या वह सफल हो पायेगा ? मैं आम आदिवासी नागरिक की बात कर रहा हूँ ! मैं उनकी क्षमता पर सवाल खड़े नहीं कर रहा, उनके स्वभाव, जीवन शैली की बात कर रहा हूँ !

अपने जीवन के अनुभव से यह कह रहा हूँ ! विकास उनकी जरूरतों, उनकी इच्छायों के अनुसार करना पड़ेगा ! उनके कल्याण के लिए कार्यक्रम उनके गाँव में तय करने पड़ेगें ! जो भी विकास के कार्यक्रम बनेगें या चलेगें उसमें उनकी सहमति आवश्यक होगी ! ऊपर से कोई योजना उन पर थोपी नहीं जायेगी ! उनकी सहमति के बिना उनके कल्याण पर कोई राशि खर्च नहीं हो पायेगी ! उन्हें योजना में फेरबदल का अधिकार होगा ! जो राशि उनके विकास के लिए आबंटित है उसे वे अपने समुदाय पर अपनी प्राथमिकता से खर्च कर सकेगें ! इसके लिए कोई सिस्टम बनाना होगा !

राजीव रंजन उपाध्याय जी के फेसबुक वाल से साभार

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