कानपुर वाले आधुनिक क्रांतिवीरों के लिए सादर समर्पित

Posted: August 31, 2013 in Children and Child Rights, Education, Politics, Youths and Nation

तुलसीदास जी ने निम्नलिखित  दोहों को अलग-अलग सन्दर्भों में  रामचरित मानस में लिखा था
अनुज-वधू, भगिनी, सुत-नारी, सुन सठ ये कन्या सम चारी।
इन्हें कुदृष्टि बिलोके जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई।
और
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।
तो हुआ यूँ कि दोनों चौपाइयों का सन्देश सन्दर्भों से अलग करके देखने वाले बुद्धिजीवियों ने पहले वाले को तो दरकिनार कर दिया और दूसरी वाली  चौपाई  के स्वयंम्भु विवेचन को भारतीय संस्कृति का सर्वकालिक सत्य साबित करने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। वही दृष्टान्त इन दोनों घटनाओं के एकल  विमीय विवेचन में नज़र आता है। एक घटना के सभी नज़रियों का सम्मान किया जाना लोकतंत्र की भी पहली शर्त है जिसकी प्राथमिक इकाई परिवार नाम की संस्था है।
मेरी धृष्टता क्षमा करें। यदि परिवार और समाज आज की युवा पीढ़ी को बेहतर जीवन दर्शन देने में असमर्थ है तो उसका मूल यही है कि युवा पीढ़ी की समझ  और उसके जीवन के नवीन आयामों की तलाश में  सुधारवादियों को विश्वास नहीं है। भारतीय समाज के परम्परावादियों और प्रगतिवादियों को अलग-अलग देखा जाए तो इसी अविश्वास की पराकाष्ठा पारिवारिक हिंसा और फैशन के नाम पर बढती नग्नता तक चली जाती है।  यही  अविश्वास परिवार की मूल परम्परा में विखंडन और सामाजिक सरोकारों से युवाओं की उदासीनता तक पहुँच चुका है। देश काल और परिस्थितियों के अनुसार जब व्यक्ति को दोस्त यार रिश्तेदार या व्यवस्था से सहयोग नहीं मिलता तो निराश होकर अपनी उम्मीदें अपनी अगली पीढ़ी में देखता है उसका पालन पोषण पूरी लगन से करता है और उसमे संस्कार और संभावनाओं के बीज डालता है यहीं से शुरू होती है उस पीढ़ी के सामाजिक सरकारों और जीवन दर्शन के प्रति प्रारम्भिक जागरूकता और जिज्ञासा। इसी तथ्य के अनुरूप सांस्कृतिक और आर्थिक आक्रमणों के दौर में  सदियों से  ब्राह्मण के बेटे ब्राह्मण होकर शिक्षक बनते रहे और क्षत्रियों ने सीमाओं की सुरक्षा में जीवन देना सहर्ष स्वीकार किया  शूद्रों ने सामाजिक सेवा के दायित्वों से राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया  और वैश्यों ने समाज के पालन पोषण की चुनौतियों को स्वीकार किया और उसी तन्मयता से करते रहे।   इन्ही सरोकारों के विकास में अपने मान, मर्यादा और मानक तय किये।
सारे समाज ने उनके कार्यों और योगदान के अनुरूप सम्मान दिया। किसी लिखित संविधान के न होते हुए भी भावनात्मक जुड़ाव के स्तर पर ऐसी समग्रता का उदहारण इस देश की संस्कृति में मौजूद है। सांस्कृतिक समष्टि में संवादहीनता और संवेदना की कमी अविश्वास पैदा करती है और पारस्परिक अविश्वास के बिना मनुष्य का सामाजिक जीवन तो दूर सामूहिक जुड़ाव तक संभव नहीं। जिसका नतीजा जातिवाद, भाई भतीजावाद और यहाँ तक कि चारित्रिक भ्रष्टाचार तक होता है। इस संवादहीनता की कमी को मीडिया या दूसरे सामाजिक उपकरणों से भरने की बजाय पारस्परिक संवाद पर जोर देने को नज़रअंदाज़ करते जाने का नतीजा इस देश की वर्तमान समस्याओं के मूल में स्पष्ट नज़र आता है।
वापस परिवार पर आते हैं तो नज़र आता है कि वर्तमान दौर के डाक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक जैसे वेतनभोगी या व्यापारी तो अपनी अगली पीढ़ी को उसी के अनुरूप बनाने में रूचि रखते हैं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि दार्शनिक और तत्ववेत्ता अपने सामाजिक सरोकारों में अपने बच्चों को शामिल करने से भी भय खाते हैं।  बच्चे भी जीवन मूल्यों के प्रति जब अपने अभिभावकों को अनासक्त देखते हैं तभी उनका परम्परा और उस पर बनी व्यवस्था में अविश्वास उत्पन्न होता है। राष्ट्र और वैश्विक सन्दर्भों में पल रहे अपने सपनों से विलग रखते हुए संवादहीनता को औपचारिक शिक्षा से पाटने की उम्मीद रखना कितना उचित है? यह आर्थिक आक्रमण के आगे समर्पण सरीखी घटना है। अब इस घडी में संवादहीनता और समन्वय की कमी को तर्कों या तथ्यों के सहारे प्रतिपादित कर रहे तर्कवीर समाजवादी कब तक अनदेखी करते रहेंगे इसका तो पता नहीं लेकिन समकालीन चुनौतियों और राष्ट्रीय एकता के विखंडन के इस मूल तत्व की उपेक्षा या मसखरी करके स्वान्तः सुखाय की मनोवृत्ति से समाज सुधार के संकल्प लिए लोगों के लिए स्वसमीक्षा की जरुरत को इनकार नहीं किया जा सकता।
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