रोटी और डिग्री के पीछे भागते शांत और लाचार युवा से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती : स्वामी विवेकानंद

Posted: September 2, 2013 in Children and Child Rights, Education, Geopolitics, Politics, Uncategorized, Youths and Nation

आज देश चौराहे पर आ खड़ा हुआ है। हमारी आजादी ,हमारी संप्रभूता सूली पर टंगी दिख रही है। अंग्रेजों की गुलामी से ज्यादा दर्दनाक है यह बाजारवाद की गुलामी। दुनिया के सबसे युवा देश इस प्रकार की दिशाहीनता का शिकार हो तो दुर्भाग्य ही है
देश में चीखते सवालों का अम्बार लगा है। देश की एकता-अखंडता खंडित हो रही है। देशभक्ति का मतलब पाकिस्तान और साम्राज्यवादी शक्तियों को गाली देना भर रह गया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि युवा किसी राष्ट्र की शक्ति होते हैं। किसी भी राष्ट्र की शक्ति का आंकलन वहां की युवा शक्ति से किया जा सकता है। लेकिन प्रश्न ये है कि आखिर युवा की परिभाषा क्या है? युवा कोई कायिक अभिव्यक्ति नहीं है, युवा किसी उम्रवय का नाम नहीं है, युवा एक गुणवाचक संज्ञा है। युवा वही है जिसके अन्दर युयुत्सा है, जिजीविषा है सवालों के जवाब तलाशने की। जिसके अन्दर जोश है देश के चीखते सवालों से लड़ने का। हहराती नदी के जैसा कैशोर्य ही नहीं होगा, तब फिर वह युवा कैसा? उद्दंडता ही नहीं, तब फिर यौवन कैसा? युवा का तो अर्थ ही उस हिलोर मारती नदी के जैसा है जो पहाड़ों की छाती को चीरकर आगे बढ़ जाती है। ईंट के घेरे में बंधकर बहने वाली नाली से किसी पहाड़ का सीना चीरने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? 
स्वामी विवेकानंद ने ऐसे थके हुए और लाचार युवाओं को ‘वयस्क बालक’ कहकर संबोधित किया था। यदि युवा का अर्थ सिर्फ उम्र से ही है तब फिर चालीस करोड़ युवाओं का देश भारत आज तक भी वैश्विक परिदृश्य में अपनी छाप छोड़ने में क्यों नहीं सफल हो सका है?
कारण स्पष्ट है, यहाँ का युवा निस्तेज हो गया है।
यद्यपि युवाओं ने कई बार अपनी शक्ति का परिचय दिया है। आजादी के समय जब विवेकानंद आदर्श थे, तब भगत सिंह, राजगुरु जैसे युवाओं ने इतिहास लिखा। जब सुभाष और चन्द्रशेखर ‘आजाद’ आदर्श थे, तब युवाओं ने 1974 की क्रांति लिखी थी। अब आदर्श बदल रहे हैं, अब राहुल और वरुण आदर्श हैं। आज चारों ओर युवा नेतृत्व की बात है। लेकिन युवा का अर्थ मात्र सोनिया का पुत्र होना ही तो नहीं होता, या कि सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अखिलेश यादव और जयंत का अर्थ युवा नहीं है।
युवा का अर्थ सलमान खान और आमिर खान भी नहीं होता। इन बिम्बों के पीछे दौड़ रही यह लाचार जमात युवा कहलाने के लायक नहीं रह गयी है।
कॉलेजों के आगे सीटी बजाने वाली इस पीढ़ी से क्रांति की उम्मीद नहीं की जा सकती है। सिगरेट के धुंए के बहाने अपनी जिम्मेदारियों से पलायन करने वाली युवाओं की इस भीड़ से फिर कोई 1942 और 1974 नहीं दुहराया जा सकेगा। रियलिटी शो में अपनी पहचान खोजते इन युवाओं से असल जिन्दगी के सवालों से जूझने की उम्मीद करना बेमानी है।
स्वामी जी ने कहा था, ‘‘सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।’’
इस शांत और लाचार युवा से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। स्वामी जी ने युवाओं को ललकारते हुए कहा था, ‘‘तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कूद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उद्धार करने में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर – गुल मचाओ की उसकी आवाज दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नहीं चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढ़ो। तूफान मचा दो तूफान!’’
रोटी और डिग्री के पीछे भागते युवाओं को पुकारते हुए स्वामी जी ने कहा था,‘‘मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे – धीरे और अन्य लोग भी आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार-बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है?
और तुम लोग क्या कर रहे हो?!! जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालों, तुम लोग क्या हो? जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालों, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूड़ा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो?! किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी-गिरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी-जान से तड़प रहे हो — यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्ड बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तड़पते हुए उन्हें घेरकर ‘रोटी दो, रोटी दो’ चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को जड़-मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोड़ो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ़ रहे हैं। क्या तुम्हें मनुष्य से प्रेम है? यदि ‘हाँ’ तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पीछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हजार युवकों का बलिदान चाहती है — मस्तिष्क – वाले युवकों का, पशुओं का नहीं।’’
आज देश के समक्ष असंख्य चीखते सवाल हैं। बेरोजगारी, भुखमरी, लाचारी, बेगारी, महंगाई।।। और भी ना जाने क्या-क्या? है कोई विकल्प किसी के पास? आज युवा, नरेन्द्र नाथ दत्त तो हैं, लेकिन ना उस नरेन्द्र में विवेकानंद बनने की युयुत्सा है और ना ही किसी परमहंस में आज देश-हित को निज-हित से ऊपर मानकर किसी नरेन्द्र को विवेकानंद बनने की दीक्षा देने का साहस ही शेष है।
लेकिन फिर भी उम्मीद है, ‘‘कोई नरेन्द्र फिर से विवेकानंद बनेगा।’’

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