या देवी सर्वभूतेषु “पूंजी” रूपेण संस्थिता….

Posted: September 3, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

राकेश मिश्र

फोटो : राजू मिश्र जी की फेसबुक से साभार

मुझे तो जितने लोग मिल के आसाराम के पक्ष या विपक्ष के लिए स्यापा कर रहे हैं वो सबसे बड़े अवसरवादी लगते हैं। आसाराम के लिए स्यापा कर रहे हर व्यक्ति ने अगर अपने घर के एक  किलोमीटर के दायरे में नज़र उठायी होती तो शायद बलात्कार, छेड़छाड़ की घटना, अभद्रता, भय, भूख, गरीबी, लाचारी, रिश्वतखोरी और असंख्य अपराध सब कुछ नज़र आ जाता लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि देश का आम आदमी भी अवसरवादिता का प्रतिनिधि हो गया प्रतीत होता है। आसाराम के नाम पे धर्म को धर-धर के गरिया रहे लोगों की मेधा, लगता है कि ऐसे ही अवसर के तलाश में बेसब्र बैठी थी।

जिस प्रकार बिहार में कोसी नदी में बाढ़ आ के गुजर जाने के बाद स्यापा करने का दस्तूर बन चला है जबकि बजट बाढ़ के पहले की तैयारियों के लिए भी आवंटित होता है । ठीक उसी तरह धर्म के लिए भी फेसबुक की फुटकर से लेकर विभिन्न मंचों की थोक समीक्षा, विवेचन, आरोप-प्रत्यारोप औपचारिक-अनौपचारिक गालियाँ इत्यादि-इत्यादि ऐसी घटनाओं के होने के बाद शुरू होती हैं और एकाध महीने तक टिक जाए तो बड़ी बात है। जबकि विद्वानों के लिए स्पष्ट कर देना अपना धर्म समझता हूँ कि धर्म शाश्वत है और प्रवाहमान है। चाक़ू का धर्म काटना है कोई गृहणी या रसोइया करेगा तो सब्जी काटने में प्रयोग करेगा और हत्यारा करेगा तो हत्या भी कर सकता है। उसके लिए राज्य का कर्त्तव्य है कि उसका चरित्र निर्धारण और पहचान करे। अब आपका राज्य उसको पहले तो प्रश्रय देता है, शक्तिशाली बनाता है फिर उसी हत्यारे के कुकर्म उजागर हो जाएँ तो सजा देता है यह कैसा विधान है। ठीक उसी तरह कर्मकांड और किसी दुसरे तरीके से धर्म को अवरुद्ध करने वालों के विरुद्ध स्यापा करने वालों की दलीलों के लिए शांतिकाल में चर्चा-परिचर्चा, वाद -विवाद और विमर्शों द्वारा सुलझाने की परम्परा को भी धर्म ने यथोचित स्थान दिया हुआ है।

कितने लोग जानते हैं कि धर्म के लिए स्थापित मंचों में काशी की विद्वत परिषद् और वेद वेदांग के विभिन्न मंचों का इतिहास भी हजारों वर्ष पुराना है। उसमे चर्चा परिचर्चा और विमर्शो के लिए पूरा चातुर्मास निर्धारित है आस्तिकों और कर्मकांडियों के दर्शनों के साथ-साथ नास्तिकों के दर्शन को भी विमर्श में शामिल होने का पूरा अधिकार है और अपने जाति धर्म या समूह के प्रतिनिधित्व करने का सामाजिक कर्त्तव्य भी। ऐसे में देश को आर्थिक महाशक्ति मान बैठे महापुरुषों का उत्तेजनापूर्ण स्यापा नासमझी नहीं तो और क्या कहा जाएगा। अर्थशास्त्रियों और संसाधन बेच के देश को आर्थिक महाशक्ति बना देने का सपना पाल बैठे लोगों की असीम अनुकम्पा से देश में “महाजनाः येन गता सो पन्थः” का वास्तविक अर्थ “महाजन यानि सेठ साहूकार जिस रास्ते से जाते हैं वही सही रास्ता बेहतर है” हो गया है । जबकि पहले इसके मायने ऐसे हुआ करते थे कि “जो रास्ता चरित्रवान और सत्कर्मी महापुरुष बताएं वही उचित होता है।”

अब तो पूंजीपति और मीडिया के महाजन ही तय करते हैं कि कौन सा बाबा बेहतर है और बाबा बताते है कि कौन सा गृह, नक्षत्र, राशि रत्न और माणिक्य। अवसरवादिता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहा जाए कि वही लोग इतना स्यापा किस मुंह से किये जा रहे हैं? आधुनिक अर्थशास्त्र के तथाकथित पितामह  एडम स्मिथ ने भिक्षा से जीवन वृत्ति करके शिक्षा देने वाले संतों को तो कब का गैर उत्पादक करार दिया था। लेकिन नए दौर में पूंजी ने बहुत से बाबा बनाये हैं और प्रगतिशील महापुरुषों ने पूंजी की महत्ता को ही ज्यादा बड़ा मान लिया है। तो फिर पूंजी की पूजा ही सफलता की कुंजी है। .क्या पता इसी पूंजी के किसी दूसरे प्रभाव से आसाराम का भी काम तमाम हो गया हो….. यानी ….

या देवी सर्वभूतेषु पूंजी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

 

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Comments
  1. Raju Bhaiya says:

    जब आतंकवाद के नाम पर इस्लाम को गरियाया जाता है जब जातिवाद के नाम पर मुलायम और मायावती को गरियाया जाता है क्या तब राकेश जी आपको नही लगता कि उस पर भी ऐसा ही समीचीन लेख लिखा जा सकता है …..नही तब तो नही लिखा गया फिर आसाराम जैसे हिन्दू धर्म का कोढ़ लोगों के बचाव में ये लेख लिखा जाना और उसके माध्यम से न्याय संगतता के तर्क को स्थापित करना आपको लगता है कि आप न्याय के मार्ग पर हैं ..

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