विमर्श :क्या बाज़ार की जरुरत है “अतिवादी नारी चिंतन”?

Posted: October 26, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

Photo: http://www.feministezine.com

आज जो  सवाल स्त्री और पुरुष के पारस्परिक संबंधों पर खड़े किये जा रहे हैं।     आधी आबादी को अलग  दुनिया साबित करने के लिए जिस तरह भयभीत करने वाले बयान और नए मानक स्थापित करने की कवायद जारी है वहां पर सरोकारी समाजशास्त्र की समीक्षा की जरुरत बन रही है। उदार वर्ग को इस पर सोचना होगा कि  अगर वे स्वयं सिद्धा हैं  तो महिलाओं को ये खुद  तय करना होगा कि गृहलक्ष्मी, गृहस्वामिनी, मालकिन, बहूरानी, इंदिरा, सोनिया, मायावती, अपाला, घोषा,  दुर्गा, ज्योतिबा,  रज़िया या  झाँसी की रानी में कोई विश्वास रखती हैं या करीना, माधुरी, मर्लिन मुनरो जैसी बाज़ार की वस्तुओं में।   हमारी भूमिका तो सहयोगी  भर की  है वह भी अगर चाहें तो।  समाज के हर तबके की रजामंदी की बजाये उनकी अपने आस पास के देश कल और परिस्थितियों के वातावरण के प्रति नज़दीकी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है क्योंकि विचारों के पहले सिलसिले तो वहीँ से बनने बिगड़ने शुरू होते हैं। श्रृंगार तो नारी का आभूषण है लेकिन बाज़ार का श्रृंगार पर अतिक्रमण चिंतनीय है। एक  अंग्रेजी फिल्म तारिका  के इस बयान पर गंभीरता से सोचना होगा कि बाज़ार के अनुसार अंग प्रदर्शन करवाया जाता है। यानि कि इस प्रकार की महिमामंडित गुलामी के क्या अभिप्राय हैं इस पर तो वे तारिकाएँ  ज्यादा बेहतर बता पाएंगी कि वे अपने अंग प्रदर्शन और  नाच से समाज को  क्या दे रही हैं या देना चाह रही हैं। इस पर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए। जरुरत इस बात की है कि   कला के बाज़ार पक्ष और बाज़ार  के कला पक्ष के संबंधों को परखने के फेर में समाज, परिवार और व्यवस्था के बदलाव की आवश्यकता  को नज़र अंदाज़ न किया जाये। इसको नज़र अंदाज़  करते हुए तात्कालिक  निष्कर्षों के लिए बेक़रार नारीवादी समूह जिस अज्ञात की खोज में हैं कहीं उसका तात्विक पक्ष बाज़ार की सेवा तो नहीं? बाज़ार का उल्लेख करने में  मेरा आशय बाज़ार के  भौतिक पक्ष के साथ साथ ऐन्द्रिक पक्ष से भी है। ऐन्द्रिक पक्ष वह उपेक्षित या अनदेखा पहलू है जिसमे अस्तित्व की प्राथमिक जरूरतों यानि रोटी कपडा मकान   के आगे  जाकर यौनिक स्वक्षन्द्ता वैचारिक स्वक्षन्द्ता आदि की बातें कर रहे हैं। वह पहलू जहाँ वे लोग यौनिक स्वक्षन्द्ता की परिभाषा लिख के उसका बाज़ार बना रहे हैं। उस बाज़ार में अप्राकृतिक वस्तुओं की भरमार है। यह बाज़ार किसी के लिए यौनिक उत्कंठा का विषय है तो किसी के लिए इन्द्रिय सुख बोध का। उसमे कार है, टेडी बीयर है, चोकलेट है, परिधानों के नए मानक है यानि फैशन है, तो दूसरी तरफ वाजीकरण के लिए  वियाग्रा है, पोर्न है, मस्तराम है, प्लेबॉय है,  कंडोम है, गर्भ निवृत्ति के लिए आई-पिल  है। यौनिक उत्कंठा का शिकार बलात्कारी है लेकिन उस यौनिक उत्कंठा के पूंजीगत साझीदार विकास पुरुष।  यानि कि इन्द्रिय सुख बोध के आर्थिक पक्ष से बने बाज़ार की जरुरत है कि काम बोध यानि यौनिक जरूरतों की कहानियां चलती रहें। यह कि जैसे बच्चे के लिए जननांग जिज्ञासा की विषय वस्तु हो सकती है उसी तरह उस क्षणिक जिज्ञासा का भावजाल बाज़ार है की जरुरत। इसी सुख की कामना का दूसरा पक्ष है बौद्धिक विलासिता यानि नारीवादी और पुरुष वादी चर्चाएँ और चिंतकों के गिरोह जो   इज्जत, अस्मत, अधिकार और कर्तव्य बोध, कानून और बाज़ार के  वैध- अवैध सम्बन्ध की  भी परिभाषाएं गढ़ते हुए ख्याल रखते हैं कि बाज़ार के  मुखिया की सेवा में कोई कमी न रहे। आत्म सम्मान, लाज -शर्म, यौनिक स्वक्षन्द्ता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की परिभाषाएं बनाते हुए ध्यान रखते हैं कि भले ही परिवार और प्रकृति का समूल नाश हो जाये बाज़ार के उत्पादों और उपभोग पर कोई आंच न आये। क्या वे उसके  उपभोग के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं ताकि बाज़ार बना रहे? कैसे इनकार करेंगे कि ऐसे में जबकि दुनिया की सीमाओं से ऊपर उठ कर  बाज़ार  एक बहेलिया की तरह घात लगा के सारी इंसानी जमात और कायनात तक पे कब्ज़ा करने की कवायद में लगा है,   बहुजन की लड़ाई बुनियादी जरूरतों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। उन बुनियादी जरूरतों के आभाव में कोई बदन बेच के रोटी कमाने को मजबूर है तो  वहां ऐन्द्रिक आज़ादी के क्या मायने बनेंगे।  उस व्यवस्था में से चाहे क्लियोपेट्रा निकले या विषकन्या, सोनागाछी, कबाड़ी बाज़ार और जीबी रोड की असली लड़ाई तो रोटी और रोजगार की है। ये बात बाज़ार भी जानता  है और उसमे चिकित्सा और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की वकालत करते हुए कहता  हैं कि यहाँ भी आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और लॉस वेगास जैसी  शरीर का इस्तेमाल करने की आज़ादी होनी चाहिए।  और  आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड और लॉस वेगास में यानि पहली दुनिया में नयी बहसें भी खड़ी करवाता है कि महिलाओं को कम से कम ऊपर के कपडे खोल के घूमने की आज़ादी मिले। ऐसे में  अगर रोटी और रोजगार के  अभावों से जूझती आबादी भी बाज़ार के छलावे का शिकार बनती है तो पहचान की लड़ाई में आज नहीं तो कल  उनको स्पष्ट करना होगा कि वे विकास पुरुष साबित होने की कवायद में हैं या बाज़ार के बादशाह के प्यादे?  जिस प्रकार  किसी के मन की टीस होती है या कोई प्रबल भावना  और फिर उसके विचारों का दूसरी घटनाओं और विचारों के घर्षण किसी बड़े से बड़े युद्धों का आधार बनता है और फिर उसका अंत सुन्दर हो यह जरुरी नहीं। उसी प्रकार उन  गिरोहों के चिंतन और  वैचारिक घर्षण के पश्चात् के स्खलन के परिणाम सुखद हों यह भी संशय का विषय है।

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इसीलिए   “अति सर्वत्र वर्जयेत” कबीर के हिसाब से  “अति का भला न बोलना अति की भली न चूप” हमेशा एक नीतिगत तत्व रहा है।  चाहे  विभिन्नताओं में  एकता की जरुरत हो  हो या सर्व धर्म समभाव जैसे आदर्श की अपेक्षा।   साथ रहने के लिए आवश्यक समदर्शिता, आपसी समझ,  पारस्परिक सम्मान और संवाद   बुनियादी  जरूरतें  है । सवाल चाहे धार्मिक विभिन्नताओं का हो चाहे, चाहे जातिगत या  किसी और प्रकार की सांस्कृतिक पहचान का। सवाल चाहे स्त्री पुरुष के बीच की दूरियों का हो चाहे सामाजिक संवादहीनता का।  आज दूरियां बनने और बढ़ने को नज़र अंदाज़ करना एक अंधकारमय कल को निमंत्रित करने जैसा ही होगा।

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