आम आदमी के नाम पर…खास लोगों की कवायद

Posted: November 3, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

एक साथी ने बड़ी शिद्दत से कहा कि बेहतर होगा कि विदेशी चंदे से चुनावी बाजा बजाने  की बजाये आम पार्टी उन बेचारे कार्यकर्ताओं में बाँट दे जो घर बार छोड़ पार्टी की दिहाड़ी में लगे हैं। कहना गलत न होगा कि उसकी गम्भीर  सोच दिल्ली की  बहुत सी  जमीनी हक़ीक़तों को बयां करती है, जहाँ इतने नौजवानो के राजनैतिक दिहाड़ी में जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दिनों को खपा देने के बाद भी आम पार्टी कुछ खास लोगों के दायरे से बाहर नहीं निकल सकी है। इस पर तुर्रा यह है कि दूसरे प्रदेशों से प्रवास पर आए वे  राजनैतिक दिहाड़ी मजदूर अपने आकाओं जैसे जवाबों से ही दिल्ली  का विधान और प्रधान तय करने को तत्पर हैं।  वे नासमझ युवा अवसरवादिता के मारे हैं या छद्म राष्ट्रवादी प्रोपेगंडा के ये बता पाना उनके बस में है भी नहीं। उनके  लिए एन आर आई मतलब उनकी भारत माता का कमाऊ पूत जो विदेशी मुद्रा कमा के देश का खजाना भरता है। ऐसे कमाऊ पूत देश के लिए अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई से भारत के  राजनैतिक यज्ञ की आहुति देने का कर्त्तव्य पूरा कर रहे हैं। हो सकता है कि  लो पोलिटिकल इंटेलिजेंस वाले कार्यकर्ता  इस बात से अनजान हों  कि “विदेशी चंदा (नियंत्रण ) अधिनियम 1976 के वर्ष 2010 के संशोधन की उपधारा 2 की शर्त (e) के मुताबिक राजनैतिक दलों के लिए विदेशी चंदे की मनाही है।”  गुडगाँव की एक ला फर्म ने इसी मामले में पिछले 22 अक्टूबर को एक शिकायत चुनाव आयोग को भेजी है। देखना होगा कि   उनके विधि विशेषज्ञ  डंके की चोट पर इस कानून का मखौल उड़ाने का क्या जवाब देते हैं। जाहिर है कि या तो उनको अपने चुनाव के निरस्त होने का खतरा नहीं है या फिर मामला कहीं और पहुंचना है। वैसे भी इस नयी नवेली पार्टी के नाम चुनाव मर्यादा के सबसे ज्यादा उल्लंघन के ख़िताब लिखे जा चुके हैं।  अपुष्ट सूत्रों की मानें तो अरविन्द केजरीवाल भारतीय ब्यूरोक्रसी का वह चेहरा  है जिस पर पूंजी बरसाना भारतीय ब्यूरोक्रेसी को वैश्विक नव उदारवाद के प्रति  रिझाने का प्रतीक समझा जाये तो ज्यादा बेहतर होगा।  घपलों घोटालों के दौर में  विदेशी निवेश और कार्पोरेट के हस्तक्षेपों के चलते  भारतीय प्रशासनिक सेवा यानि ब्यूरोक्रेसी की सबसे ज्यादा किरकिरी हुई है। भारतीय नेता बहुधा सामाजिक पृष्ठभूमि से होते हैं और उनमें अधिकांश के पास   विशेष वैयक्तिक पेशेवर होते भी नहीं। ऐसे में  भारतीय ब्यूरोक्रेसी ही उनके लिए व्यवस्था की पहली औपचारिक पाठशाला मुहैया कराती है। वैसे भी नेता की उम्र तो पांच-पांच साल की किश्तों में होती है और उससे   ब्यूरोक्रेसी  को अपने ओहदे और अस्तित्व का खतरा अपेक्षाकृत कम होता  है।  लेकिन कार्पोरेट और खासकर विदेशी निवेश वाले कार्पोरेट बिजनेस इंटेलिजेंस और पीआर के बहुत से पेशेवर कारसाजों के साथ बाज़ार में दाखिल होते हैं। इसके चलते ब्यूरोक्रेसी के  लिए खासी चुनौतियाँ खड़ी होती रहती हैं। सूत्रों के दावों को मानें तो  इसी  कार्पोरेट और ब्यूरोक्रेसी का वैचारिक संघर्ष एक बड़ा पहलू  है जिसके चलते लॉबीइंग कंपनियों को भारतीय ब्यूरोक्रेसी के लिए खुशनुमा माहौल बनाने की कवायद का नाम है आम आदमी पार्टी जिसके नेता हैं भारतीय ब्यूरोक्रेसी के प्रतीक पुरुष। आम आदमी पार्टी से भारी संख्या में जुड़ रहे एनआरआई और उस कवायद में जुट रहे विदेशी धन से तो कम से कम इसी धारणा को बल मिलता है। आम आदमी पार्टी के आतंरिक सूत्र इस बात पर फूले नहीं समाते कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के बहुत से अधिकारीयों का नैतिक समर्थन भी आम आदमी पार्टी को हासिल है। अब इसमें कितना सही है ये  या तो समय बतायेगा या  नौकरशाह। लेकिन भारतीय व्यवस्था के सबसे मजबूत कहे जाने वाले घटक के लिए भी बहुत बड़ा सवाल है। यूँ तो शुरुआत से वैश्विक शीत युद्ध के दिनों से भारतीय प्रशासनिक सेवा भी कई प्रकार की वैचारिक चुनैतियों से जूझती रही है । लेकिन सांस्कृतिक आतंकवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद के भावजाल पर अभी बहुत कुछ होना बाकी है। फिर भी  वैचारिक तौर पर इसके दीर्घकालिक नफे नुकसान का हिसाब किताब लगाने में अगर कोई सबसे सक्षम वर्ग भारतीय प्रशासनिक वर्ग ही है।

राजनैतिक प्रयोगधर्मिता  पर हुई पहले की एक गम्भीर  राजनैतिक कवायद जिसे सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन  के तौर पर देखा जा सकता है, आम आदमी पार्टी की अपेक्षा कहीं ज्यादा संगठित और प्रशिक्षित कैडर के साथ खड़ी हुई थी। लोहिया का व्यक्तित्व और कृतित्व उसमे वामपंथी और दक्षिण पंथी ध्रुवों के साथ काम करने में कारगर तो हुआ। उसके प्रतिफल के तौर पर ही देखा जाये कि मैग्सेसे पुरस्कार विजेता  जेपी को इंदिरा ने अमेरिकी एजेंट कहा। उस आंदोलन ने तो राजनैतिक ऊंचाइयां भी लांघी और देश को  नेतृत्व भी दिया। लेकिन आज उस समाजवादी आंदोलन के जितने टुकड़े हुए उसको गिन पाना भी बड़ी बात है। कुछ लोग यूँ भी कहते हैं कि सतत प्रयोगधर्मिता में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य की उपेक्षा  और राजनैतिक विकल्प के दार्शनिक पक्ष के गम्भीर परिणाम भुगतने पड़े। ऐसे में   कुछ खास लोगों की कवायद से चल रही आम आदमी पार्टी का क्या नतीजा निकलेगा यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन विदेशी निवेशकों की चांदी होनी तय बात लगती है। सही या गलत के आरोप प्रत्यारोप तो आगे आने वाला  इतिहास भी लगाएगा।

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