बाज़ार का भगवान : बल्ले से लेकर बीयर के बोतल तक

Posted: November 16, 2013 in Education, Geopolitics, Politics, Youths and Nation

बाबा विजयेन्द्र
बाज़ार में भगवान की ऎसी- तैसी हो रही है। बाज़ार के अभाव में भारत के करोड़ों देवता आज झख मार रहे हैं। इन्हे पूछने वाला कोई नहीं है । कोई इसे भाव नहीं दे रहा है। बाज़ार ने नए भगवान् सचिन  को अवतरित होने का मौका दिया है।  चारो ओर इस ‘ क्रिकेट – भगवान ‘ का जोर है। सारे भगवान सचिन के इस देव-अवतार से हतप्रभ हैं।  कहाँ जाएँ और क्या करें? कैसे अपने भक्तों को गोलियाकर(गोल -बंद ) रख पायेंगें भारत के भगवान ? यह आज देव- जगत की बड़ी पीड़ा है।

आज भारत के भगवान लक्ष्मी और गणेश जी को एक शराब कंपनी ने अपना ब्रांड अम्बेसडर बनाया है। आस्ट्रेलिया की कंपनी ब्रुकबैले यूनियन ब्रेवरी जो न्यू साऊथ वेल्स  में स्थित है ने ‘लक्ष्मी गणेश ब्रांड शराब’ बनाया है। वैसे भारत में आज भी  तुलसी छाप गुटका ,राम छाप बीड़ी और कृष्ण छाप कंडोम बेचने के सब खेल शुरू हो गए । एक कंपनी ने कई देवता का फोटो लड़कियों के अंडरवीयर पर चिपका कर बेच रहे हैं। जिस तिरंगा का नाम लेते ही देशभक्ति का ज्वार  उभरता था वह तो आज देश का नहीं, एक गुटका- उत्पाद का ब्रांड हो गया है . फहराओ तिरंगा प्यारा’ वाले गीत के बदले गुड्डू रंगीला का गीत -”खा लो तिरंगा गोरिया फाड़ के जा झाड़ के ‘गीत ने जगह बना ली है”

बीच में कोला कंपनी ने दुर्गा पर भी  दाव खेला था। बंगाल में कोला ने दुर्गा-पूजा को स्पोंसर किया था।  यह कोला-दुर्गा  बहुत ही प्रचार में रही। इस कोला -दुर्गा  ने कंपनी को कितना मुनाफा दिया होगा पता नहीं। बाज़ार अब भगवान् गढ़ने का औजार हो गया है। साधू इनके संसाधन हैं।महात्मा इनके मार्किट हैं।

Photo by: www.indiatvnews.com
दुनिया में पहले हम  जिन्दा भगवान एक्सपोर्ट करते थे। आज हम वहीं से मुर्दा भगवान को चीन से आयात करने को मजबूर हैं। इस बार की दीवाली चीन से भेजे गए लक्ष्मी – गणेश से ही मन पायी।  हमारे घर – आँगन को चीन ने अपने बाज़ार की रोशनी से भर दिया। कभी  बुद्ध का ‘ज्ञानदीप ‘ चीन के भक्ति- बाजार में छाया हुआ था। संघमित्रा और महेन्द्र भारत से रोशनी लेकर चीन गए थे। दुनिया से अंधकार मिटाने की वह एक बड़ी पहल थी। आज यह समाज नकली हीरो के पीछे भाग रहा है। अब हिंदुत्व को हिंदुओं से ही खतरा उत्पन्न हो गया है . अपनी अस्मिता की बोली जितना हिन्दू लगा रहे हैं उतना दुश्मन भी नहीं कर रहे हैं। किसी को भी भगवान बनाकर उसके पीछे भागना दुर्भाज्ञपूर्ण है। नमो नमो। सचिन सचिन। ।राम कृष्ण और लोहिया गांधी गए अब तेल पेरने। विचित्र संयोग है कि राम की लीला को अब लीला भंसाली के जिम्मे छोड़ दिया गया है।

क्रिकेट का यह भगवान ‘रन’ बनाने की प्रेरणा दे सकता है, पर जीवन का ‘ रण ‘ जीतने की ताकत नहीं दे सकता .. इस भगवान पर बाज़ार मेहरबान है। इस भगवान का खेत- खलिहान से क्या रिश्ता है। इस भगवन के इर्द गिर्द  ललित मोदी,श्रीनिवासन , श्री संत जैसे भक्त हुए। इस क्रिकेट ने हमारे’ कृषि मंत्री’ पवार को ;क्रिकेट-मंत्री’ बना दिया। क्रिकेट के मामले में पवार पावरफुल और कृषि के मामले में दब्बू बनते रहे। लाखों किसान आत्म – हत्या करते रहे पर इस मायाबी क्रिकेट ने  पवार के दिल को पिघलने नहीं दिया। सचिन मानो क्रिकेट नहीं कारपोरेट के लिए खेल रहे हों। सचिन को पेप्सी और कोला, माँ के दूध के  समान लगता रहा।  देश को पेप्सी और कोला पिलाते रहे। देश को कार्पोरेट के हाथों लुटवाते रहे। इसका समाज से क्या लेना देना . किसान के धनिया – टमाटर का प्रचार सचिन थोड़े ही करेंगें। देश को डूबोने वाली कांग्रेस ने इन्हे सांसद भी बना दिया। सचिन को भारत -रत्न मिलना चाहिए चाहे उनका भारत जिन्दा रहे न रहे।

सचिन युवाओं के आयकॉन नहीं हो सकते। भगत सिंह आज भी युवाओं के दिल में है। इस कार्पोरेट के भगवान से कंपनी के माल बिकेंगें।मेक्डोनाल्ड का पीजा और बर्गेर बिकेंगे। सचिन न तो सत्तू पीते हैं न ही यह हमारे सत्तू का प्रचार  करने जा रहे हैं ? शायद सचिन कांग्रेस का प्रचार भी करने जा रहे हैं .? क्या बोलेंगें राहुल और सोनिया के लिए।

देशभक्ति में हीरोवाद बेहद खतरनाक है। सावधान रहने की जरूरत है। और भी खेल हैं हमारे देश में। कबड्डी के खिलाड़ी पैसे के लिए काँव -काँव कर रहे हैं। इन्हे करूआ तेल का भी स्पोंसरशिप नहीं मिल रहा है। सचिन को भगवान बनाना तमाम खेलों की हो रही मौत पर मर्सिया पढने  जैसा ही  है।
बाबा विजयेंद्र ने जेपी के    सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकलकर बिहार के तमाम जमीनी आंदोलनों में पैंतीस वर्षों तक संघर्ष  किया है.     नव उदारवाद के दौर में भारत की आम जनता के लिए नए रास्तों की तलाश में “आज़ादी बचाओ आंदोलन” और “युवा भारत” सरीखे प्रयोगों को लम्बे समय तक जिया है.  इसी राजनैतिक प्रयोगवादिता के चलते नक्सल आंदोलन से लेकर संघ तक का सफ़र भी  तय किया। वर्त्तमान में राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक स्वराज खबर के समूह संपादक हैं.
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