अमेरिकी समझौते और मोदी का 3-D

Posted: October 5, 2014 in Uncategorized

PM

मोदी के मुताबिक भारत में बाजार का 3-डी मिलेगा। मोदी के मुताबिक 3-डी मतलब डेमोक्रेसी, डेमोग्राफिक डिविडेंड और डिमांड जिसके चलते दिखाया  जा रहा है कि  भारत सभी निवेशकों के लिए विन-विन है.

मोदी की अमेरिका यात्रा से बहुत से लोगों की उम्मीदें बनी हैं कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका का साझा एजेंडा दोनों देशों को  व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी में अपने सहयोग के विस्तार को बढ़ाने के लिए पारस्परिक रूप से लाभप्रद तरीके खोजने में सक्षम बना सकता  है। वाशिंगटन में शिखर वार्ता के पूर्व दिए संयुक्त सम्पादकीय में दोनों शीर्ष नेताओं का जोर सस्ती अक्षय उर्जा और मैनुफैक्चरिंग में साझीदारी के संकेत दिए ये संकेत औपचारिक समझौते में तब्दील हुए. इसमें अक्षय उर्जा का प्रमुख स्रोत सौर उर्जा को माना गया. स्वच्छ उर्जा के रूप में सौर  उर्जा का तरीका आने वाले वर्षों में विकास का प्रमुख अवयव होगा. भारतीय परिदृश्य में हो सकता है कि सौर उर्जा को नवाचार मान लिया जाये लेकिन सौर उर्जा के व्यावसायिक उपयोग का इतिहास एकदम नया नहीं है. सौर उर्जा के व्यावसायिक उपयोगों का दौर 1920 में शुरू होने के बाद भी ये तकनीक भारत को उदारीकरण के इनाम के तौर पर ही मिल पायी. साथ ही सौर उर्जा के लिए भारत में सरकारी प्रयासों से ही प्रमुख रूप से बढ़ावा मिल पाया. इसमें सरकारी सब्सिडी और कंपनियों को विशेष छुट जैसे उदार पॅकेज भी खासा योगदान रहा. अक्षय उर्जा के लिए अपेक्षाकृत बेहतर और खास तौर पर ग्रामीण भारत के परिप्रेक्ष्य में सामंजस्य स्थापित करने वाले अनेकों दूसरे उपाय मौजूद हैं. इनमे से एक है कमर्शियल बायो गैस जिसमे जैविक कचरे से उर्जा बनाने की तकनीकें बहुत कारगर साबित हुई हैं. भारत गाँवों का देश है और इसीलिए  ‘संघ’ वाले “भारतमाता ग्रामवासिनी” कहते हैं.  गाँवों के पास इसके लिए प्रचुर मात्रा में संसाधन और कच्चा माल भी उपलब्ध है. गौ सेवा और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण इस नवाचार की सफलता का आकलन सिर्फ इस तथ्य से ही किया जा सकता है कि तकनीक के मामले में अग्रणी देश जर्मनी के नेतृत्व में यूरोपीय समुदाय ने 2020 तक का साझा लक्ष्य निर्धारित किया है जिसमे वे अपनी उर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से को जैविक उर्जा से पूरा करेंगे. सौर उर्जा की शुरूआती लागत और उसमे लागत के प्रतिलाभ में लगने वाले समय  की वजह से सरकारी सहायता के बिना आम जनता के लिए हाथी पालने जैसा है. यही वजह है कि लगभग बीस वर्षों के प्रयासों के बावजूद सौर उर्जा रफ़्तार नहीं पकड़ सकी. ऐसे में सौर उर्जा पर विशेष जोर देना किसको कितना फायदा पहुंचाएगा ये सवाल समय के गर्त में हैं.

बात करते हैं  तकनीकी साझीदारी या तकनीकी खरीद फ़रोख्त की. ये जाहिर है कि तकनीक का बाज़ार बौद्धिक कानूनों के अनुरूप बना है. इस पर दबाव की राजनीति स्पष्ट हो गयी थी  जब   दर्जनों कंपनियों ने सामूहिक रूप से भारत पर  बौद्धिक कानूनों की नाफ़रमानी का आरोप लगाते हुए अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए  अमेरिकी राष्ट्रपति से गुहार लगायी थी| कंपनियों के आर्थिक हितों के हवाले से लिए गए फैसले में ज्यादातर कंपनियों का भारत में  बौद्धिक सम्पदा आधारित के सन्दर्भ में था| हालिया समझौतों के आधार आकलन करें तो आगामी वर्षों में अमेरिकी कंपनियों की भूमिका  सेवा क्षेत्र से लेकर युद्ध प्रणाली के अनुसन्धान और विकास तक विस्तृत होना तय है. वैज्ञानिक साझीदारी और बौद्धिक सम्पदा आधारित व्यापार के सन्दर्भ में अमेरिकी पेटेंट कानून बहुत महत्वपूर्ण हैं. इस सन्दर्भ में पेटेंट कानूनों में भारतीय पक्ष के  हित पर क्या चर्चा रही ये स्पष्ट नहीं. लेकिन इन कानूनों को यथावत स्वीकार कर लेने से सरकार पर भारतीय अनुसन्धान और भारतीय बौद्धिक सम्पदा के सामरिक महत्व के नफे नुकसान लम्बे समय में नज़र आयेंगे.

नौवहन एक सामरिक चुनौती है. इस सन्दर्भ में फैसला जितनी अल्पावधि में लिया गया उसमे बहुत से पक्षों से विमर्श की दरकार शेष नज़र आती है. भारत अमेरिका स्वास्थ्य सहयोग बहुत सी  मुश्किल चुनौतियों जैसे इबोला के प्रसार, कैंसर इलाज के अनुसंधान अथवा तपेदिक, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों से निपटने में के सन्दर्भ में लिया गया फैसला है। इबोला के बारे में जितना मीडिया में रिपोर्ट किया गया है उसके अनुसार इस सन्दर्भ में भारतीय संस्थानों की क्या तैयारी रही, ये एक दूसरी बहस का विषय है. ये भी आश्चर्यजनक ही लगता है कि डेंगू, मलेरिया और टीबी जैसी बीमारियों पर  भारतीय पक्ष असमर्थ होते हुए भी मेडिकल टूरिज्म में नए मुकाम बना चुका है. किसी से छिपा नहीं है कि गोरखपुर और पूर्वांचल में 1978 से जारी जापानी एंसिफेलाइटिस बुखार  के लिए इलाज की खास  जरुरत है. सन्दर्भ में सेंटर फॉर वायरोलॉजी की रिपोर्टों के बावजूद  इस पर कोई पहल न करके एबोला के लिए अमेरिकी समझौते को कैसे सराहा  जाये।  हम महिला सशक्तिकरण, क्षमता संवर्धन और अफगानिस्तान तथा अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा के लिए एक साथ काम करने के नतीजे क्या होंगे ये समय बताएगा लेकिन फिलहाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उम्मीदों को जरुर बढाया है.
लेकिन इसके नतीजे दीर्घकाल में नज़र आयेंगे. देखना होगा कि मोदी की टीम ने कितना होमवर्क किया और उसके लिए  अच्छे दिन के क्या मायने हैं?

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Comments
  1. giriraj kishore says:

    we have not learnt about the 17 co’s response as yet. Are they ready to invest in India and on what terms?success of Three d will depend on their willingness.

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