भारतीय मंगलयान बनाम अमेरिकी मार्स मिशन “मैवेन” 

Posted: October 5, 2014 in Uncategorized

राकेश मिश्र

भारतीय मंगल अभियान कई मामलों में खास है. पिछली बार के  इसरो दौरे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि मंगल यान अभियान की कुल लागत हॉलीवुड की फिल्म ग्रेविटी की लागत से भी कम है. यह मंगल अभियान 73 मिलियन डॉलर के बजट में मंगल तक  पहुँच रहा है. हथियार निर्माता कंपनी लोकहीड मार्टीन द्वारा समर्थित अमेरिकी मंगल अभियान  “मैवेन” के लिए कुल 672 मिलियन डॉलर खर्च हुए. ये भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि इस अभियान को भारत के मंगलयान के लगभग सामानांतर शुरू किया गया. 18 नवम्बर 2013 को शुरू हुए इस अभियान के उपग्रह ने 22 सितम्बर को मंगल की कक्षा में प्रवेश किया.

ऐसा कहा जाता है कि इन्टरनेट का जन्म अमेरिकी चन्द्र अभियान के दौरान हुआ क्योंकि वैज्ञानिकों ने  कई कम्प्यूटरों को एक साथ जोड़ कर काम करने की तकनीक विकसित की.

अंतरिक्ष कार्यक्रमों  के चलते न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेसोनंस, लेजर संचार, एल सी डी टीवी, मोबाइल फोन आदि तकनीकों का विकास हुआ. ये सब कार्यक्रमों की पूर्व योजना में तय नहीं थे. आज दुनिया का एक बड़ा भाग उसका फायदा उठा रहा है और उस पर एक बड़ा बाज़ार बनकर खड़ा हुआ है. इसका अर्थ है कि इस प्रकार के कार्यक्रमों के विशेष सामरिक रणनीति की भी जरुरत होती है. अंतरिक्ष अभियानों के उपयोग और आर्थिक फायदों को लेकर भारतीय असमंजस में रहते हैं.

जहाँ तक स्टार वार्स जैसी होड़ लगने के दावे किये जा रहे हैं उस विषय में भारतीय प्रधानमंत्री का तकनीकी साझेदारी से सह अस्तित्व स्थापित करने का सपना बुनना बहुत मायने रखता है.

ये एक बड़ी वजह है जिसके चलते दुनिया भर की मीडिया में भारतीय मंगल अभियान की भारी आलोचनाएँ देखने को मिलीं. विदेशी मीडिया के उठाये इन सवालों पर भारतीय मीडिया बगलें झांकता मिला.

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आलोचना का ये प्रमुख सवाल रहा कि जिस देश में लाखों बच्चे भूखे मर रहे हों वहां मंगल अभियान की क्या जरुरत?

इसी प्रकार के सवाल के चलते चीनी सरकार ने अपने अभियान को राष्ट्रीय चैनल पर सीधा प्रसारित करके जनता के बीच रखा था. ये जानते हुए कि भारतीय मंगल अभियान अमेरिकी अभियान के कुल बजट के दसवें हिस्से में पूरा हो रहा है.  अगर विदेशी मीडिया की बयानबाजी से भारतीय वैज्ञानिकों और भारत सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हों तो इसी प्रकार का सवाल मीडिया की निष्ठा को कठघरे में खड़ा करता है.

भारत में आज़ादी के बाद स्थापित हुए सरकारी व्यवस्था में चलने वाले अनुसन्धान संस्थानों ने कई मील के पत्थर भी स्थापित किये हैं.  मंगलयान के सिलसिले में देखा जाए तो सामरिक तैयारी इस प्रोजेक्ट का एक बहुत महत्वपूर्ण आयाम है. सामरिक तौर पर देखा जाये तो भारत के चन्द्र मिशन चंद्रयान से चन्द्रमा पर पानी की खोज हुई. भारतीय वैज्ञानिकों की ये एक बहुत बड़ी सफलता थी. इस सफलता को अन्तराष्ट्रीय पेटेंट कानूनों और कुछ दूसरे विवादों के चलते अमेरिकी संस्था ने हथिया लिया. इस घटना के सन्दर्भ मंगलयान अभियान को लेकर असमंजस की स्थिति बरक़रार है. इस पर भी भारतीय नेतृत्व को गंभीरता से सोचना होगा.

नासा के वैज्ञानिक स्टीवर्ट नोजेट पर भारतीय  चंद्रयान अभियान से जुडी कुछ गोपनीय जानकारियां मोसाद के एजेंट को पहुँचायीं. रीगन के स्टारवार्स कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिक इसरो के चंद्रयान अभियान से जुड़े रहे. वहां से  अंतरिक्ष और नाभिकीय सूचनाओं को लेकर मोसाद के एजेंट को पहुँचाया. इस पर मचे विवाद में तत्कालीन वैज्ञानिक सचिव ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी वैज्ञानिक ने कम से कम दो बार इसरो की यात्रा की. इस विषय में ये स्पष्ट नहीं कि स्टीवर्ट नोजेट का भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम से क्या सम्बन्ध रहा. लेकिन अमेरिकी वैज्ञानिक ने दस साल तक इजरायली एयरोस्पेस कंपनी के लिए कम किया.

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इसरो से मंगल तक का सफ़र 

पिछले साल नवम्बर में मंगल के लिए छोड़ा गया भारतीय उपग्रह मंगल की में पहुँच गया है.   300 दिनों की यात्रा के बाद मंगलयान के पहुँचने से इसरो और भारतीय वैज्ञानिक समुदाय में हर्ष का माहौल है.

इस अभियान की सफलता के साथ भारत अमेरिका, रूस और यूरोपीय स्पेस एजेंसी के बाद दुनिया का चौथा देश बन कर अग्रणी कतार में शामिल हुआ. उपग्रह के वेग को नियंत्रित करने के लिए कंप्यूटर नियंत्रित संचार प्रणाली के पूर्वाकलन के अनुरूप तयशुदा कार्यक्रमों की एक श्रृंखला के अंतर्गत किये गये, यह बड़ी उपलब्धि रही होमी जहाँगीर भाभा द्वारा स्थापित देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक संगठन इसरो की.

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क्यो क्या खास है मंगलयान

कई दशकों से मंगल पर पहुंचना देश के वैज्ञानिकों का सपना रहा है. वैज्ञानिकों का सपना रहा कि अंतरिक्ष क्षेत्र के विकास में भारत  देश को दुनिया में नया नाम और ऊँचाइयाँ मिलेंगी.   भारतीय रणनीतिकारों और दूरदृष्टि नेतृत्व ने देश के शीर्षस्थ संस्थान के वैज्ञानिकों को भरोसा दिलाया. संसाधन उपलब्ध करवाए और वैज्ञानिकों के जज्बे और जूनून को सराहा और सम्मान किया.   भारतीय उपग्रह अभियानों की परिकल्पना योजनाकारी और  प्रबन्धन सम्बन्धी सिद्धांतों  के लिए शुरू किये गए मंगलयान प्रोजेक्ट के दूसरे विशिष्ट उद्देश्य कुछ इस प्रकार से तय किये गए.

-अंतरिक्ष अभियानों की संचार व्यवस्था, परिचालन और प्लानिंग की तैयारी

-अंतरिक्ष अभियानों की आकस्मिक स्थितियों में स्वचालित प्रणाली का विकास करना

-स्वविकसित वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा  पडोसी गृह  के  वाह्य आवरण, खनिज, सतह और  जलवायु, सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन करना

 मंगलयान  की तकनीकें

इन उद्देश्यों के लिए  इसरो के वैज्ञानिकों ने उपग्रह को  स्वविकसित तकनीकों से लैस किया है.

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390 लीटर की क्षमता वाले प्रोपेलेंट टैंक, 440 न्यूटन के उत्क्षेप वाले द्रव इन्जन का इस्तेमाल मंगल की कक्षा ने प्रविष्ट कराने के लिए किया गया है.  यान के लिए आवश्यक सौर उर्जा के 1800mm X1400mm के आकार के तीन सौर पैनलों के साथ ही यान में लगा है लो गेन, मीडियम गेन और हाई गेन एंटेना. टेलीमेट्री ट्रैकिंग और कमांडिंग के उपकरणों के साथ साथ यान पर तमाम स्वचालित उपकरण लगाये गए हैं. इनमे से प्रमुख हैं

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लाइमन अल्फा फोटोमीटर

इससे मंगल से आने वाले प्रकाश की किरणों का अध्ययन करके उसकी सतह का परिक्षण करेगा.

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उच्च क्षमता कैमरा

इस उच्च क्षमता वाले कैमरे से मंगल की सतह के साथ-साथ दूसरी गतिमान वस्तुओं की फोटो और विडियो लिए जायेंगे. इससे मंगल पर मौजूद दूसरे उपग्रहों फोबोस और डीमोस की गति का भी अध्ययन किया जा सकेगा.

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मीथेन सेंसर

मंगल पर पानी और जीवन की संभावनाओं की तलाश में मीथेन सेंसर से मंगल पर मौजूद कार्बन का पता लगाया जा सकेगा.

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मार्स एक्सोफेरिक न्यूट्रल कम्पोजीशन अनालाइजेर (मेनका )

मास स्पेक्ट्रोमीटर की तकनीक पर आधारित उपकरण जिससे वातावरण में मौजूद गैसों के स्थायित्व का अध्ययन किया जायेगा.

थर्मल इन्फ्रा रेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर

इसका प्रयोग मंगल की सतह पर मौजूद खनिज और धातुओं के अध्ययन और तापमान आधारित गणनाओं में किया जायेगा.

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प्रक्षेपण के बाद

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5 नवम्बर 2013 को   इन सभी उपकरणों को लेकर श्रीहरिकोटा में पीएसएलवी-5 के सी -25 प्रक्षेपण यान से जब मंगलयान रवाना हुआ तो पहले चरण में पृथ्वी की कक्षा में एक महीने तक रहा. प्रक्षेपण के पूर्व और प्रक्षेपण के बाद के तमाम चरण होते हैं.  कदम – कदम पर सावधान रहकर उसे लक्ष्य तक पहुँचाने में वैज्ञानिकों ने बहुत पसीना बहाया है.

मंगलयान के प्रक्षेपण के बाद के  लक्ष्य तीन चरणों में पुरे किये जा रहे हैं. इस दिशा में पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों में कितना पसीना हमारे वैज्ञानिकों ने बहाया ये बहुत महत्वपूर्ण आयाम है. इसको जानना आश्चर्यजनक सपने के पूरा होते देखने जैसा है. इसकी नियमित चरणों का सारांश कुछ इस प्रकार रहा.

  • 7 नवम्बर 2013 : मंगल यान को सफलतापूर्वक मंगल के रास्ते लाने का पहला चरण पूरा हुआ.
  • 8 नवम्बर 2013 : मंगल के रास्ते में पहुँचाने का दूसरा चरण सफल रहा. पृथ्वी से दुरी 28814 किमी से बढ़कर 40186 हुई
  • 9 नवम्बर 2013 : मंगल के रास्ते में पहुँचाने का तीसरा  चरण कामयाब. उपग्रह की पृथ्वी से दुरी 40186 किमी से बढ़कर 71636 किमी हुई
  • 11 नवम्बर 2013 : मंगलयान पृथ्वी से 78623 किमी दूर पहुंचा
  • 12 नवम्बर 2013 : उपग्रह को मंगल के रास्ते पर ले जाने का चौथा चरण पूरा. पृथ्वी से दुरी बढ़कर हुई 118642 किमी
  • 16 नवम्बर 2013 : 243.5 सेकण्ड में मंगल के रास्ते पर पहुँचाने का पांचवां चरण पूरा. उपग्रह पृथ्वी से दूरी 118642 किमी से बढ़कर 192874 किमी हुई.
  • 1 दिसंबर 2013 : मंगल की दिशा में बढ़ते हुए यान संचार के लम्बी दुरी के संचार उपकरणों की जांच पूरी हुई.
  • 2 दिसंबर 2013 : 536000 किमी की यात्रा तय करके यान निकला चन्द्रमा की कक्षा के पार
  • 4 दिसंबर 2013 : 925000 किमी की दुरी तय करके मंगल यान निकला पृथ्वी के प्रभाव क्षेत्र के बाहर
  • 11 दिसंबर 2013 : मंगल यान हुआ पृथ्वी से 2.9 करोड़ किमी दूर. मंगल की कक्षा के लिए पहला चरण पूरा.
  • 11 फरवरी 2014 : मंगल यान के सफ़र के 100 दिन
  • 9 अप्रैल 2014 : मंगल यान ने आधा सफ़र पूरा किया
  • 12 जून 2014 : मंगलयान हुआ पृथ्वी से 10.2 करोड़ किमी दूर. मंगल की कक्षा के लिए दूसरा चरण हुआ  पूरा. यान ने कुल 46.6 करोड़ किमी की कुल दूरी तय की.
  • 15 सितम्बर 2014 : मंगल की कक्षा में प्रवेश के लिए समय आधारित कमांड पूरी, मंगल की कक्षा में प्रवेश का समय 24 सितम्बर निर्धारित
  • 16 सितम्बर 2014 : मंगल की कक्षा में प्रवेश के लिए समय आधारित दूसरी कमांड सफल
  • 17 सितम्बर 2014 : मंगल की कक्षा में प्रवेश के लिए मेन लिक्विड इंजन फायरिंग के लिए समय 22 सितम्बर 2014 निर्धारित
  • 22 सितम्बर 2014 : यान की गति के नियंत्रण के लिए मेन मेन लिक्विड इंजन फायरिंग सफल

स्टारवार्स और अब तक के मंगल अभियान

1960 से मंगल पर जाने की  होड़ लगी है. अमेरिका रूस और यूरोपियन एजेंसियों ने अब तक बहुत से मंगल अभियानों में सफलता हासिल की है. मंगल अभियानों के यान प्रमुख रूप से दो तरीके से होते हैं पहला है ऑर्बिटर यानि मंगल की कक्षा में रहकर उसके चारों ओर चक्कर लगाने वाले यान. दूसरे लैंडर या रोवर कहे जाते हैं. ये सतह पर उतर कर निर्धारित कार्य करते हैं. अमेरिकी एजेंसी नासा का मार्स ग्लोबल सर्वेयर एक सफल ऑर्बिटर अभियान रहा. उसी प्रकार 1996 का बहुचर्चित मार्स पाथ फाइंडर रोवर मंगल अभियान हुआ.

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अमेरिका का पहला सफल मंगल अभियान रहा मेरिनर-4. 28 नवम्बर 1964 को छोड़ा गया उपग्रह 14 जुलाई 1965 को मंगल की कक्षा में  पहुंचा. वहां से उपग्रह ने कुल 27 तस्वीरें भेजीं.

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रूस का पहला सफल मंगल अभियान रहा मार्स -2. 19 मई 1971 को छोड़े गए उपग्रह ने 27 नवम्बर 1971  को मंगल की कक्षा में प्रवेश किया.

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यूरोपियन स्पेस एजेंसी का पहला सफल मंगल अभियान रहा ‘मार्स एक्सप्रेस’ जिसे 2 जून  2003 को छोड़ा गया. इस उपग्रह ने 25 दिसंबर 2003 को मंगल की कक्षा में प्रवेश किया.

चुनौतियाँ हजार है:

मंगलयान  अमेरिकी मंगल अभियान के खर्च के दसवें हिस्से में मंगल यान तैयार हो गया. ये भी गौरतलब है कि ये एक ऐसा अभियान है जिसमे पहले ही प्रयास में सफलता प्राप्त हुई है. भारतीय वैज्ञानिकों की सफलता की तुलना में विदेशी अभियानों को देखें तो अमेरिकी और यूरोपियन अभियानों में हथियार  निर्माता कंपनियों की बड़ी भूमिका है. ये भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि अनुसन्धान के क्षेत्र में इसरो प्रशासन विदेशी वैज्ञानिकों के मामले में विशेष सतर्कता बरतता है.

भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा से विकसित की जा रही  अंतरिक्ष तकनीकी के हालिया नतीजों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी भारी उत्साह दिखाया है. इसरो के पिछले दौरे में प्रधानमंत्री ने भारतीय अंतरिक्ष  तकनीकी से तीसरी दुनिया और एशियाई देशों के सरोकार को जोड़ने का सपना दिखाया था. इसके लिए तीसरी दुनिया के देशों का सिरमौर बनकर सार्क का एक साझा उपग्रह बनाने की बात भी बहुत महत्वपूर्ण नज़र आती है. इसके लिए बाज़ार की वर्तमान स्थिति और संभावित खतरों के लिए भी तैयार रहना होगा. खतरे सिर्फ अभियानों के असफल होने के नहीं, बल्कि उसमे दुसरे देशों के सरोकार और स्वाभिमान सुरक्षित रख पाने की चुनौती भी है.   उसमे कंपनियों के हितों और पूंजी की हिस्सेदारी भी सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है और शुभ लाभ की परम्परा के भारतीय वैज्ञानिकों का  विश्वास भी कायम रखना होगा.

इतनी उच्च तकनीकी के अनुसन्धान से  जिस प्रकार के नतीजे आने की संभावनाएं नज़र आती हैं उसके चलते हथियार कंपनियों के आर्थिक हितलाभ और भूराजनीति पर बड़े असर पड़ेंगे. फिलहाल तो इसरो का तकनिकी विकास इसरो की आनुषंगिक कम्पनियाँ और भारतीय सहयोगियों पर ही निर्भर रहा है. आगे  देखना महत्वपूर्ण होगा  इस विषय में इसरो की कमान संभाले मोदी इसे कहाँ पहुंचाते हैं.

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