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हो सकता है की खुद को  पेशे से अधिवक्ता घोषित करती  इंदु सिंह की खबर पक्की हो या बात सच्ची हो लेकिन सोशल मीडिया पर भी लोग कहने लगे हैं की इस तरह की झूठ औरअफवाहों के बाज़ार बना के इंदु सिंह कौन सा आन्दोलन चला रही हैं….? अब रही बात तेल मालिश करने या करवाने की तो ये दो लोगों का आपसी सरोकार है… और एक व्यापार भी| यदि वो इस उक्त महिला की मालिश करने की मजदूरी के लिए लेबर कोर्ट में मुकदमा करके मदद करती तो संभवतः मै भी यथासंभव सहयोग देता| आप इसका नैतिक मसाले में छौंक क्यों लगा रही हैं? जिसे आप सत्य के साथ आगे बढ़ने का नाम दे रही हैं वो सोशल मीडिया की लफ्फाजी से ज्यादा और कुछ भी नहीं|

इंदु सिंह एक क्रांतिकारी महिला हैं ये बात तो मुझे मंजू मोहन जी के यहाँ हुए पहले साक्षात्कार से ही समझ आ गयी थी| लेकिन उनका भाजपा या गोविन्दाचार्य से कोई परिचय है ये मुझे परसों पता चला| चौबीस की शाम को लगभग छः- सात बजे के बीच जब गोविन्द जी जंतर मंतर पर गौ रक्षा आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के साथ मंत्रणा कर रहे थे तभी इंदु जी का आगमन हुआ| आने के दौरान गोविन्द जी भले ही कोई ध्यान न दिया हो लेकिन इंदु जी ने तुरंत उनके बगल वाले सहायक को हटा के कुर्सी कब्जाई| ऐसा लग रहा था की कुछ खास बात है| खैर जिस विदुषी महिला के सन्दर्भ में उनसे मुलाकात हुई उनके लिए मेरे मन में विशेष सम्मान है| इसलिए इंदु जी के ऊपर उस समय कोई संदेह करना उचित नहीं जान पड़ा| लेकिन देश के महापुरुष अन्ना हजारे के ऊपर की गयी इस बचकानी बयानबाजी से दुखी होकर मै कई तारों को जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ| इसके पीछे शायद मुझे इंदुजी की नासमझी या फिर किसी भगवा षड्तंत्र के तार मिल सकें|
इंदु जी खुद पेशे से वकील हैं और लोकतान्त्रिक व्यवस्था की शिखर संस्था के सम्मान में एक आन्दोलन चलाने का दावा भी करती हैं|
लेकिन उनके दावों में बचकानेपन को व्यवहारिक और सैद्धांतिक तौर पर न तो उचित माना जा सकता है न ही इस प्रकार गंभीरता से लिया जा सकता है|

खुद मंजू मोहन कहती हैं, “इस प्रकार की छीछल बातें हमारी सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ हैं| ऐसे लोगों के लिए तो एक रीड्रेसल सेल बना देना चाहिए| वहां पर इन लोगों की ऐसी शिकायतें सुननी चाहिए फिर मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों को इस गंभीर बीमारी पर विचार करना चाहिए| ताकि ऐसे लोगों का इलाज किया जा सके| सिर्फ सस्ता प्रचार पाने के लिए ऐसे बचकानी बयानबाजी का सिर्फ यही समाधान हो सकता है| उनसे पूछिए की अभी तीन दिन पहले अन्ना हजारे यहीं पर थे उस समय उन्होंने अन्ना से मिल के क्यों नहीं पूछा? अन्ना के पीछे इस तरह की बातें करना निहायत बेमानी है| मंजू जी इसमें आगे जोडती हैं की “अगर इंदु सिंह अपने भाजपाई होने का दायित्व निभा रही हैं तो उन्हें मोदीजी की पत्नी के साथ हुए अन्याय पर भी सवाल उठाना चाहिए”|

तेईस -चौबीस वाले आन्दोलन के लिए इसी प्रकार की छीछालेदर में बहुत से बयान वीर दावे करते रहे की अन्ना हजारे पचौरी के साथ जिंदल के जहाज में बैठ के आये थे| इसका पैसा जिंदल ने दिया आन्दोलन का खर्चा जिंदल उठा रहे हैं| लेकिन जब जनसत्ता के संपादक ओम  थानवीजी ने अन्ना की हवाई यात्रा का टिकट सामने लाकर रखा तो बयानवीरों ने बगलें झाँकनी शुरू कर दी|

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लोकसभा चुनावों के पूर्व अन्ना की जगह बहुत से लोगों ने मोदीजी के चरित्र हनन का प्रयास किया…. मोदीजी की गर्लफ्रेंड होने के भी दावे किये, उसकी चर्चा में लड़की की जासूसी करवाने के मामले को चटखारे लेकर सुनाया| इस सतही मसालेदार छीछालेदर पर देशवासियों ने भले ही कोई खास ध्यान न दिया हो लेकिन इससे प्रेरणा लेकर शायद इंदु सिंह भी शायद अपने स्तर पर वही सब कर रही हों.. लेकिन इसका मकसद क्या है जब तक स्पष्ट नहीं होता तब तक किसी को इंदु सिंह के आन्दोलन से कोई सहानुभूति कैसे हो सकती है?

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राकेश मिश्र

भारत देश का शायद ही कोई बच्चा हो जिसने दूध के बिना दुनिया देखी हो| जब से होश संभाला है देखते ही देखते दूध के दाम पांच रुपये लीटर  से पैंतालिस रुपये लीटर हो गए| पिछले दशक में दूध के दाम जिस प्रकार बढे हैं उससे तो यही लगता है की दूध भी अब अमीरों की लक्जरी की वस्तु बनता जा रहा है|

इस मुद्दे पर जितने लोग इकट्ठे हुए हैं.. और जितने लोग गाँव की मिट्टी से जुड़े हैं उनमे से कौन इस बात से इनकार करेगा की गाँव और गाँव की जमीन का सबसे आसानी से भला हो सकता है तो गाय की परवरिश से| गाय से सीधे जुडी है गाँव की खेती और कुपोषण से|

जिसके आंकड़े कुछ इस तरह के हालात बयां करते हैं

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पिछले एक दशक में भारत की खेती योग्य 12.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन में से 1  करोड़ 8० लाख जमीन खेती से बाहर  हो गयी|

आंकड़े बताते हैं की देश का हर चौथा आदमी भूखा है और हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है|

पिछले एक दशक में देश के किसान की माली हालत कुछ यूँ रही है की लगभग ढाई लाख किसानों ने आत्म हत्या की| काबिले गौर बात ये है की ज्यादातर किसान मदर इण्डिया वाले सुक्खी लालाओं के कर्ज और ब्याज से बुरी तरह प्रताड़ित थे |

Photo Courtesy : Reuters

गोबर की खाद से फसल और मिट्टी का स्वस्थ्य ठीक होता है | लेकिन हरित क्रांति में भारतीय सांस्कृतिक विरासत का ये तथ्य हमेशा के लिए उपेक्षित बना दिया गया| भारत  में हरित क्रांति, फोर्ड के ट्रेक्टर और भोपाल गैस वाले दाऊ केमिकल्स के कीटनाशकों से परवान चढ़ी |   किसान भले ही ज्यों के त्यों रहे हों यूरिया कंपनियों के लाभ दिन दूना रात चौगुना बढ़ते रहे| फोर्ड का ट्रेक्टर लेकर औसत दर्जे के किसानों को  कर्ज चुकाते हुए कई दशक गुजर गए |

गाय और पशुधन की बदहाली से हालत ये हुई की आज भी औसत जोत के किसानों की पैदावार खाने पीने भर को भी पूरी नहीं होती| उस पर महंगाई की मार से गाँव भी अछूते नहीं रहे| जाहिर है की उदारीकरण के बाद से  जमीन पर खेती करना सबसे चुनौती पूर्ण काम बन गया है|

एक नजर जंतर मंतर

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जंतर मंतर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का एक समूह भी था| उनका मुद्दा था गन्ने की फसल के भुगतान न हो पाने का| पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान के लिए मीलों  द्वारा तीन साल से गन्ने का  भुगतान न हो पाने की वजह से खाने तक को मोहताज हैं| उनके नेता हैं वी एन सिंह जिनके साथी हजारों किसान अन्ना के आन्दोलन में शामिल हुए| इस आशा के साथ की अन्ना हजारे और “एनजीओ ब्रिगेड” वाले इस मसले को उठाएंगे| मंच से हजारों बातें हुयीं दर्जनों भाषण और बयानबाजियां हवा में उछाली गईं| लेकिन किसानों से सीधा जुदा मसला भूमि अधिग्रहण आन्दोलन से अछूता ही रहा| इस मसाले पर प्रख्यात गाँधीवादी अन्ना हजारे, जलपुरुष राजेंद्र सिंह, जैसी नामचीन शख्सियतों के इस प्रकार से मुह फेर लेने से असली आन्दोलनकारी किसानों को गहरी निराशा हुई है|

गौरक्षा पर आन्दोलन में शामिल लोग मोदी सरकार के यू टर्न से पहले से ही निराश हैं|

कुछ इसी प्रकार की निराशा हुई है गौरक्षा के सवाल पर तीन महीने से जेल में बंद संत गोपाल दास समर्थकों को भी| संत गोपाल दास ने तिहाड़ जेल में  इक्कीस तारीख से निर्जल अनशन शुरू कर दिया है| फाफी अरसे पहले संत गोपाल दास और तमाम संतों के साथ हुए क्रूरतम सरकारी अत्याचार पर तमाम संगठनों ने आन्दोलन शुरू किया था| जन्तर मंतर पर आन्दोलन का सिलसिला फिलहाल जारी है| समर्थकों पिछले कई दिनों से  भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आन्दोलन के लिए जुटने वालों से संत गोपाल दास की ससम्मान रिहाई और गौरक्षा मामले में समर्थन माँगा| गाय, गाँव और गंगा वाले भारत देश के इस मूलभूत मुद्दे पर एनजीओ ब्रिगेड के प्रदर्शनकारियों की अनिच्छा साबित करती है की जमीनों की सौदेबाजी और दलालों की कारस्तानी के बीच गाय और गाँव की हैसियत कुछ भी नहीं|

‘अन्ना जी की रैली में आए हैं। हमारे नेताजी लेकर आए हैं। हमें नहीं पता यह धरना-प्रदर्शन किस लिए हो रहा है।’

यह कहना है कटनी, मध्यप्रदेश से जंतर-मंतर पर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में अन्ना हजारे के दो दिवसीय धरने में शामिल होने आए किसान खदामी लाल का। उनके साथ 200 से अधिक लोग आए हैं। किसानों को जिस तरीके से बरगला के लाया गया वो इतने से ही साफ़ हो जाती है|

इसमें महिलाएं भी शामिल हैं। लेकिन अधिकतर को नहीं पता कि अन्ना धरना क्यों दे रहे हैं। कई किसानों ने बात करने से साफ इन्कार कर दिया। उनका कहना था कि नेताजी ने किसी भी बाहरी से बात करने से मना किया है। आपको जो पूछना है नेताजी से पूछें।

इनके नेता हैं प्रख्यात समाजवादी एक्टिविस्ट सुनीलम जिनके नाम नक्सली आन्दोलन में शामिल होने के कई मामले जुड़े हैं|

एकता परिषद के अध्यक्ष पी   वी राजगोपाल गाय और गाँव की बात न करके जल, जंगल और जमीन की बात करते हैं| विदेशी बीवी के साथ जय जगत का नारा लगाने वाले राजगोपाल के ट्रेवलर और आन्दोलन के खर्चे किस कंपनी के चंदे से चलते हैं इस बात का जिक्र करने से ही आप जन विरोधी हो जायेंगे| ठीक उसी तरह जैसे गाय गाँव और गंगा की समग्र बात करने वाले लोग विकास विरोधी ठहरा दिए जाते हैं|

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भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ एकजुट दिखने वाले इन सभी लोगों ने जंतर मंतर पर ही अलग अलग मंच बना लिए और आन्दोलन में शामिल जनता के लिए पूरे दिन ऊहापोह की स्थिति बनी रही| मंच भी बने  तीन जिसमे से अन्ना हजारे के मंच के सञ्चालन में लगे लोग दिन भर घोषणा   करते रहे की अन्ना अभी थोड़ी देर में आने वाले हैं| जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM ) की मेधा पाटेकर और राकेश रफीक अन्ना के साथ अलग मंच पर नज़र आये तो पी वी राजगोपाल और राजेंद्र सिंह अलग दिखाई दिए| पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का अलग धडा राष्ट्रीय अध्यक्ष वी एन सिंह के नेतृत्व में अलग थलग पड़ा रहा तो इस आन्दोलन में गाय के सवाल की भूमिका तलाश  रहे गोविन्दाचार्य मंच पर जगह नहीं पा सके| कुल मिला कर कुछ लोग मंच पर तो कुछ लोग मीडिया की नज़रों में जमीन तलाशते रहे|

अब बात करते हैं भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की तो भूमि अधिग्रहण के मसले पर जंतर मंतर पर जुटे लोगों ने इतने गंभीर मुद्दे पर अपरिपक्वता का

परिचय दिया है| इतनी नामचीन हस्तियों ने जिस प्रकार से एक जुट होने का प्रयत्न किया है वह निशिचित रूप से बनने से पहले ही बिखर चुकी है| जानकार लोग  इस मुद्दे की उच्छाल में  अरविन्द केजरीवाल का शामिल      आम आदमी पार्टी के राजनैतिक विस्तार के तौर पर देख रहे हैं| कहना वाजिब भी लगता है क्योंकि संसद के विधान सभा सत्र में संसद की चौखट पर हो रहे आन्दोलन से मोदी  सरकार के साथ सौदेबाजी के लिए माहौल तो बना ही दिया|

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1. When there is a CIA-organised false flag attack there is usually a drill going on at the same time.

In the attack on the Peshawar School:
One of the wounded students, Abdullah Jamal, said that he was with a group of teenagers who were getting first aid training with a team of Pakistani army medics when the violence began.

attack on army school in Pakistan

Irfan Shah told how he was sitting in his class at 10:30 when he heard the sound of firing outside.

Shah told MailOnline: ‘It was our social studies period.

“Our teacher first told us that some kind of drill was going on and that we do not need to worry.”

Read more: http://www.dailymail.

A plainclothes security officer.

2. When there is a CIA-organised false flag attack, the security services are often late in responding.

“After half an hour of the attack, the army came and sealed the school,” a teacher who escaped told a private television channel.

attack on army school in Pakistan

Blackwater.

3. In a CIA-organised false flag attack, there are the ‘patsies’ and there are ‘the real killers’.
In Peshawar, the ‘patsies’ had instructions not to kill children.
Our suicide bombers have entered the school, they have instructions not to harm the children, but to target the army personnel,” a spokesperson for the Pakistani Taliban told Reuters.
4. In a CIA-organised false flag attack, the CIA usually gets help from elements of the local police and military.
Eyewitnesses said the attackers were dressed in army uniforms.

In 2009, Israeli foreign minister Avigdor Lieberman said Pakistan was a greater threat to his country than Iran.

In Pakistan, there seems to be a Gladio-style operation which aims to promote the interests of certain gangsters.

On 16 December 2014, it was reported that mysterious gunmen had killed 132 children at a ‘heavily guarded’ military-run high school in Peshawar (above) in Pakistan.

Killing spree at Pakistan school, 132 students dead.

Attack on church in Peshawar, Pakistan, Sept. 22, 2013

This attack on the school looks like a false-flag inside job carried out by the security services.

Several children said that the gunmen communicated with each other in a foreign language.
Witnesses said that some of the gunmen were wearing Pakistani military uniforms.

Killing spree at Pakistan school, 132 students dead.


The 2004 attack on a school in Russia’s Beslan, which killed more than 330 people, was blamed on the CIA.

The Pakistani military is said to use Islamist militants to carry out attacks in places such as Kashmir and Afghanistan.

Killing spree at Pakistan school, 132 students dead.


David Headley, drug dealer and ‘CIA asset’.
Peshawar is an area where the drugs and weapons mafias are active, and it is an area known well by ‘CIA asset’ David Headley.
Reportedly, the so called Islamic terrorism is Pakistan is all about gang warfare.
According to Rakesh S. , at gather.com,
1. In the North West Frontier Province of Pakistan we find

(A) The ordinary people who often have no land, no jobs and little to eat. They are often treated like slaves.

(B) the rich elite who are made up of such people as army generals who run businesses, large landowners, warlords who sell drugs and guns, and certain mullahs with links to crime.

2. The ordinary people are often forced to work for the local warlords.

These ordinary people appear to be Islamic Terrorists but are, in fact, unwilling mercenaries for the warlords.

These unwilling mercenaries get slaughtered in the wars between the warlords and wars against the Pakistan government.

Bin laden worked for the Jewish Russian Mafia and the CIA, reportedly.
Rakesh.S writes that according to a Peshawar politician:

‘The Great Jihad of the 1980s was a myth…
‘People like Osama Bin Laden and Gulbuddin Hekmateyar were basically running mercenary operations and protection rackets with money from the Gulf and from Saudi Arabia, with arms provided by the CIA and MI6, and with the protection of Pakistan’s notorious Inter Service Intelligence (ISI) agency.’

Reagan’s friends.
The Taliban is being blamed for the attack on the Peshawar school.

Pakistan President Asif Ali Zardari has said that the CIA and Pakistan’s ISI together created the Taliban.

“The ISI and CIA created them together,” Zardari told the NBC news channel in an interview.

(informationliberation – CIA and ISI together created Taliban, says …)

Baitullah Mehsud

“For years the US mysteriously refused to kill former Pakistan Taliban chief Baitullah Mehsud via remote drone despite being offered his precise location by Pakistani intelligence authorities.”

It is believed that the Taliban is run by elements of the security services of the USA, UK, Israel, India and Pakistan.

Apparently the Pakistan Taliban are armed with US weapons.

(aangirfan: PAKISTAN TALIBAN ARMED WITH WEAPONS FROM USA, GERMANY …)

Dawood Ibrahim, Pakistani gangster and ‘CIA asset’.
Apparently the US owns a lot of top Pakistanis.

US Security Firm Bribes Pakistani Officials, Top Interior Ministry Officer Arrested

US officials have said that the CIA had routinely brought ISI operatives to a secret training facility in North Carolina.

(‘No smoking gun linking command to militants’ )

Some of the ‘bombers’ in Pakistan “have acknowledged that they have been trained by Israeli and Indian intelligences agencies in the camps located in Afghanistan.”

On 5 November 2009, The Nation (Pakistan) referred to Journalists as spies in FATA (part of Pakistan bordering Afghanistan)?.

Matthew Rosenberg, South Asian correspondent of the Wall Street Journal, has been spotted travelling frequently between Washington, Islamabad, Peshawar and New Delhi during the last couple of months….

According to an official of a law enforcement agency, who requested anonymity, Matthew was working as chief operative of the CIA and Blackwater in Peshawar. The law enforcement agencies, he said, had also traced Matthew’s links with Israel’s intelligence agency Mossad as well.

According to the BBC, “on Christmas Day 2007, the Afghan government said it was expelling two high level diplomats, one a British UN political affairs expert, the other, an Irishman and the acting head of the European Union mission.”

(BBC NEWS ‘Great Game’ or just misunderstanding?)

According to the Independent: “Britain planned to build a Taliban training camp for 2,000 fighters in southern Afghanistan.”

(Revealed: British plan to build training camp for Taliban fighters …)

A post at this site Cached tells us of the British government link to the terror in Pakistan.

In 2007 Pakistani Intelligence traced the source of much of terror in Pakistan to a ‘terrorist’ camp in Helmand province in Afghanistan.

The camp was run by Michael Semple and Mervyn Patterson.

Both of these British spooks were ostensibly working with humanitarian organizations.

Following extraordinary intelligence work by ISI, Karzai of Afghanistan and high officials in the Musharraf government exchanged visits which eventually resulted in the arrest and expulsion of Patterson and Semple from Afghanistan.

The real story was that these training camps were to create the Pakistan Taliban or Tehreek-e Taliban-e Pakistan (TMP); but why?

If the Taliban were to take over some areas in Pakistan and a part of the capital, then this would provide a sufficient basis for the US to bomb Pakistani nuclear installations and cease their nuclear weapons.

There were serious war plans and military exercises conducted by US forces for this scenario.

British India (www.zum.de/whkmla/histatlas)

On 19 October 2009, it was treported that the Pakistan Taliban (TTP) leaders were being evacuated by mysterious airlifts

“Mysterious airlifting of some Taliban elements from areas of the Pakistan-Afghanistan border linking Waziristan have been reported by several sources and fears are growing that anti-Pakistan TTP terrorists are also being rescued by their “foreign allies” from across the border.

“The unexplained movements of “un-marked” helicopters and aircraft have been reported since the last few days along the Pak-Afghan border and one source claimed that they were being transported to the Eastern Afghanistan.

“Some experts believe that secret allies of the friendly-Talibans took the action in order to secure the militants from an assault in South Waziristan by Pakistani Armed Forces while others believe the secret evacuation was part of a larger deal between some Western States and “good Taliban.”

“The airlifting and evacuation of TTP leaders from South Waziristan coincided with a report by foreign news media or a similar mysterious evacuation of “militants” from South Afghanistan to North Afghanistan.

“An Iranian news site on October 18 reported that the “British Army has been relocating Taliban insurgents from southern Afghanistan to the north by providing transportation means.”

“Quoting diplomats who spoke on condition of anonymity, the Iranian site claimed that insurgents are being airlifted from the southern province of Helmand to the north amid increasing violence in the northern parts of the country.

“The PressTV.com also claimed that “the aircraft used for the transfer have been identified as British Chinook helicopters.”

“The report suggested that the secret operation was being launched under the supervision of Afghan Interior Minister Mohammad Hanif Atmar, who “was still operating under the British guidance.”

“Afghanistan’s Pajhwok news agency reported that ‘US ambassador scotched speculation that his country was helping terrorists in the north, saying America had nothing to do with the air-dropping of armed men from helicopters in Samangan, Baghlan and Kunduz provinces.’

“At an October 11 news conference in Kabul, President Hamid Karzai had himself claimed that “some unidentified helicopters dropped armed men in the northern provinces at night.”

“According to a Pajhowk news report President Karzai revealed “the government had been receiving evidence of the air-dropping of gunmen from mysterious helicopters in the provinces over the last five months.”

“A comprehensive investigation is underway to determine which country the helicopters belong to; why armed men are being infiltrated into the region; and whether increasing insecurity in the north is linked to it.”

Mehsud, used by the CIA to get US troops into Pakistan?

Baithullah Mehsud, a ‘deceased’ tribal leader in Pakistan, may have links to the CIA.

Source: http://aanirfan.blogspot.in/

1799025_880071302033881_7986616807598658352_oदेश जागरुक नौजवानों में शायद ही कोई हो जो आज़ादी बचाओ आन्दोलन के प्रमुख रहे राजीव दीक्षित के नाम से वाकिफ़ न हो| नव उदारवादी व्यवस्था के विरोध में इलाहबाद में स्वर्गीय प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा द्वारा भरी हुंकार के दौरान देश भर के हजारों युवा प्रोफ़ेसर साहब के साथ आज़ादी बचाने के लिए जुड़े| उनमे से प्रखरतम बौद्धिक चेतना और जनता की आवाज बनकर निकले राजीव दीक्षित| राजीव दीक्षित के सहयोगियों में प्रमुख रहे ध्रुव साहनी बताते हैं कि     2009 मे राजीव भाई बाबा रामदेव के संपर्क मे आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओ और उनके समाधानो से परिचित करवाया और विदेशो मे जमा कालेधन आदि के विषय मे बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढाने का फैसला किया| आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव भाई के इस निर्णय से सहमत नहीं थे|

फिर भी राजीव भाई ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नीव रखी| आन्दोलन का मुख्य उदेश्य लोगो को अपनी विचार धारा से जोडना, उनको देश की मुख्य समस्याओ का कारण और समाधान बताना| योग और आयुर्वेद से लोगो को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड कर 2014 मे देश से अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उदेश्य भारत मे चल रही अँग्रेजी व्यवस्थाओ को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशो मे जमा काला धन, वापिस लाना, गौ ह्त्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य मे कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए शुरू किया गया था|
आन्दोलन की गरिमा और उसमे लोगों की भागीदारी के बारे में बताया जाता है कि राजीव भाई के व्याख्यान सुन कर मात्र ढाई महीने मे 6 लाख कार्यकर्ता पूरे देश मे प्रत्यक्ष रूप मे इस अंदोलन से जुड गए थे राजीव भाई पतंजलि मे भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओ के बीच व्याख्यान दिया करते थे जो पतंजलि योगपीठ के आस्था चैनल पर के माध्यम से भारत के लोगो तक पहुंचा करते थे| समर्थकों का मानना है कि राजीव भाई राजनैतिक एकीकरण में विश्वास रखते थे उनका का कहना था भारत की सभी राजनीतिक पार्टियो के पास कुल सदस्यो की संख्या मात्र 5 करोड़ है यदि हम इससे ज्यादा लोगो को अपने साथ जोड़ लेते है और जरूरत पड़ी तो देश के 79 बड़े संतो से समर्थन मांगेगे जिनके साथ देश के 45 करोड़ लोग है ! तो हम एक नई पार्टी बनाकर उनको 2014 मे जीतकर पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन कर देंगे |
राजीव दीक्षित के कर्मयोगी होने की बात स्वीकार करते हुए ध्रुव सहनी मानते हैं कि इतना सब होने के बावजूद  राजीव भाई भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रतिनिधि बनकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले गाँव-गाँव शहर-शहर जाया करते थे पहले की तरह व्याख्यान देकर लोगो को भारत स्वाभिमान से जुडने के लिए प्रेरित करते थे|


क्या हुआ नवम्बर 2010 में

सोशल मीडिया पर लिखी गयी एक पोस्ट में ध्रुव साहनी ने खुलासा करते हुए लिखा है कि लगभग आधे भारत की यात्रा करने के बाद राजीव भाई 26 नवंबर 2010 को उडीसा से छतीसगढ राज्य के एक शहर रायगढ पहुंचे वहाँ उन्होने 2 जन सभाओ को आयोजित किया| इसके पश्चात अगले दिन 27 नवंबर 2010 को जंजगीर जिले मे दो विशाल जन सभाए की इसी प्रकार 28 नवंबर बिलासपुर जिले मे व्याख्यान देने से पश्चात 29 नवंबर 2010 को छतीसगढ के दुर्ग जिले मे पहुंचे|

उनके साथ छतीसगढ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे | दुर्ग जिले मे उनकी दो विशाल जन सभाए आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा मे सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक थी |राजीव भाई ने विशाल जन सभा को आयोजित किया| इसके बाद का कार्यक्रम साय 4 बजे दुर्ग मे था, जिसके लिए वह दोपहर 2 बजे बेमेतरा तहसील से रवाना हुए |

साथ ही ध्रुव साहनी ने इशारा किया है कि  इस बात की घटना विश्वास योग्य नहीं है इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छतीसगढ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियो द्वारा बताई गई है| उन लोगो का कहना है गाडी मे बैठने के बाद उनका शरीर पसीना पसीना हो गया ! दयासागर ने राजीव जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोडी गैस सीने मे चढ गई है शोचलाय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा|

फिर दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम मे ले गए वहाँ राजीव भाई शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज मे कहा गाडी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ ! जब काफी देर बाद राजीव भाई बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव भाई पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे| उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिडका गया दयासागर ने उनको अस्पताल चलने को कहा ! राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे |

थोडी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाइयाँ दी | फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई से सेक्टर 9 मे इस्पात स्वयं अस्पताल मे भर्ती किया गया| इस अस्पताल मे अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको दूसरी जगह  मे भर्ती करवाया गया| राजीव भाई एलोपेथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे| उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल मे भर्ती नहीं होना चाहते थे ! उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपेथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू ? ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु मे भर्ती होने को कहा|

फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण मे आईसीयु भर्ती करवाएगे| उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हे मृत घोषित किया| सोशल मीडिया पर दिए गए  ध्रुव साहनी के वक्तव्य के मुताबिक   बेमेतरा तहसील से रवाना होने के बाद की ये सारी घटना राज्य प्रभारी दयासागर और अन्य अधिकारियों द्वारा बताई गई है अब ये कितनी सच है या झूठ ये तो उनके नार्को टेस्ट करने ही पता चलेगा |

राजीव जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया| 30 नवंबर को उनके मृत शरीर को पतंजलि लाया गया जहां हजारो की संख्या मे लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे| और 1 दिसंबर राजीव जी का दाह संस्कार कनखल हरिद्वार मे किया गया|

समर्थकों ने जताया हत्या का संदेह 

राजीव भाई के चाहने वालों का कहना है कि अंतिम समय मे राजीव जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड गया था| उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्ट्म नहीं करवाया गया| राजीव भाई की मौत लगभग भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से मिलती जुलती है| ध्रुव साहनी की पोस्ट में ये भी कहा गया है कि ताशकंद से जब शास्त्री जी का मृत शरीर लाया गया था तो उनके भी चेहरे का रंग नीला, काला पड गया था| और अन्य लोगो की तरह राजीव भाई भी ये मानते थे कि शास्त्री जी को विष दिया गया था| राजीव भाई और शास्त्री जी की मृत्यु मे एक जो समानता है कि दोनों का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था|
राजीव भाई दीक्षित की मृत्य  से जुडे कुछ सवाल सबके कान खड़े करने के लिए काफी हैं समर्थक चाहते हैं कि मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो ताकि पता चल सके कि राजीव भाई की मृत्यु दिल का दौरा पडने से हुयी है ये किसके आदेश पर ये प्रचारित किया गया| 29 नवंबर दोपहर 2 बजे बेमेतरा से निकलने के पश्चात जब उनको गैस की समस्या हुए और रात 2 बजे जब उनको मृत घोषित किया गया इसके बीच मे पूरे 12 घंटे का समय था| जांच में इस बिंदु की भी तफ्तीश हो कि  घंटे मे मात्र एक गैस की समस्या का समाधान क्यों  नहीं हो पाया|अंत पोस्टमार्टम ना होने के कारण उनकी मृत्यु आजतक एक रहस्य ही बन कर रह गई असामयिक मृत्यु के पश्चात् आखिर पोस्ट मार्टम करवाने मे क्या तकलीफ थी| राजीव दीक्षित  का फोन जो हमेशा आन रहता था उस 2 बजे बाद बंद क्यों था| राजीव दीक्षित  के पास एक थैला रहता था जिसमे वो हमेशा आयुर्वेदिक, होमियोपैथी दवाएं रखते थे वो थैला खाली क्यों था |
संदेह खड़े करने के सबब और भी हैं मसलन 30 नवंबर को जब उनको पतंजलि योगपीठ मे अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था उनके मुंह और नाक से क्या टपक रहा था उनके सिर को माथे से लेकर पीछे तक काले रंग के पालिथीन से क्यूँ ढका था ?
राजीव भाई की अंतिम विडियो जो आस्था चैनल पर दिखाई गई तो उसको एडिट कर चेहरे का रंग सफेद कर क्यों दिखाया गया समर्थक कहते हैं कि  अगर किसी के मन को चोर नहीं था तो विडियो एडिट करने की क्या जरूरत थी ??
राजीव दीक्षित की मौत का सम्बन्ध विदेशी ताकतों से जुड़े होने का संदेह जाहिर करते हुए ध्रुव साहनी ने दावा किया कि   राजीव भाई की मृत्यु के बाद पतंजलि से जुड़े एक बहुत बड़े सदस्य को इंग्लैंड ने सम्मानित किया था, साथ ही इसको पुख्ता करते हुए विदेशी ताकतों के आर्थिक हित होने का भी हवाला दिया है उन्होंने स्पष्ट किया है कि ये बात  सब जानते है ये विदेशी लोग बिना अपने हित के किसी को आवर्ड नहीं देते|
राजीव भाई के कई समर्थक उनके जाने के बाद बाबा रामदेव से काफी खफा है क्योंकि बाबा रामदेव अपने एक व्याख्यान मे कहा कि राजीव भाई को हार्ट ब्लोकेज था, शुगर की समस्या थी, बी.पी. भी था राजीव भाई पतंजलि योगपीठ की बनी दवा मधुनाशनी खाते थे !

पूर्व में दिए एक व्याख्यान में राजीव दीक्षित ने खुद बताया  था कि  उनका शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल सब नार्मल है| साथ ही दावा किया था कि  वे पिछले 20 साल से डॉक्टर के पास नहीं गए और अगले 15 साल तक जाने की संभावना नहीं है|राजीव दीक्षित  के चाहने वालो का कहना है कि हम कुछ देर के लिए राजीव भाई की मृत्यु पर प्रश्न नहीं उठाते लेकिन हमको एक बात समझ नहीं आती कि पतंजलि योगपीठ वालों ने राजीव भाई की मृत्यु के बाद उनको तिरस्कृत करना क्यों शुरू कर दिया अब योगपीठ के कार्यक्रमों में मंचो के पीछे उनकी फोटो भी  नहीं लगाई जाती| साथ ही साथ आस्था चैनल पर उनके व्याख्यान भी दिखने बंद हो  गए ??
इसके अतिरिक्त उनके कुछ समर्थक कहते हैं कि भारत स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना जिस उदेश्य के लिए हुए थी राजीव भाई की मृत्यु के बाबा रामदेव उस राह हट क्यों गए ? राजीव भाई और बाबा खुद कहते थे कि सब राजनीतिक पार्टियां एक जैसी है हम 2014 मे अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नया राजनीतिक विकल्प देंगे !

बदले हालात तो हर शख्स ने मुंह फेर लिया 

राजीव दीक्षित के समर्थकों के संदेह को ख़ारिज भी कर दिया जाये तो भी बहुत से लोग रहे जिन्होंने बाबा रामदेव को अपनी उम्मीदों का साझीदार बनाया|   पिछले दशक में बाबा रामदेव के उदय और पतंजलि योगपीठ के संचालक बाबा रामदेव के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साथ चलने का वादा करने वाले युवा भारत के लोग कहाँ हैं| युवा भारत से निकले राजीव दीक्षित ने   बाबा रामदेव और पतंजलि योगपीठ का जमीनी आधार बनाने में स्वदेशी और भारत स्वाभिमान आन्दोलन ने बड़ी भूमिका निभाई| 
फिलहाल बाबा रामदेव पर आर्थिक हित साधने का आरोप है| समर्थक कहते हैं कि स्वदेशी और स्वराज के प्रणेता  राजीव दीक्षित  की मृत्यु के बाद बाबा रामदेव ने भारत स्वाभिमान के आंदोलन की दिशा बदल दी और राजीव की सोच के विरुद्ध उन्हे भाजपा सरकार का समर्थन किया| परिणाम सामने है कि भाजपा के सबसे बड़े दावों में से एक  गौ ह्त्या अभी तक तक बंद नहीं हुई| इस पर तुर्रा यह भी है कि  3 हजार 527 करोड़ की सबसिडी दी कत्लखानो को दी है| मोदी सरकार मनमोहन सरकार से 10 कदम आगे जाकर विदेशी कंपनियो को भारत मे बुला रही है जिसके राजीव दीक्षित  कड़े विरोधी थे|

राजीव दीक्षित के विचारों से अभिभूत रहे श्रोताओं के मुताबिक, “राजीव भाई ने  ने अपने पूरे जीवन मे देश भर मे घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये| सन 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे| उन्होने बहुराष्ट्रीय  कंपनियो की नाक मे दम कर रखा था| ये अलग बात है कि इतना विशाल व्यक्तित्व मुख्यधारा की मीडिया के लिए अछूत बना रहा|  क्योकि वह देश से जुडे ऐसे मुद्दो पर बात करते थे की एक बार लोग सुन ले तो देश मे 1857 से बडी क्रांति हो जाती ! वह ऐसे ओजस्वी वक्ता थे जिनकी वाणी पर साक्षात माँ सरस्वती  निवास करती थी। जब वे बोलते थे तो स्रोता घण्टों मन्त्र-मुग्ध होकर उनको सुना करते थे !”
राजीव दीक्षित  के समर्थको में प्रमुख ध्रुव साहनी का कहना है की काश बाबा रामदेव ने जितना प्रचार भाजपा-मोदी का किया उसका 20% भी राजीव भाई का किया होता आज उनके साथ 5 करोड़ लोगो की फोज होती जो ये पूरी व्यवस्था बदल डालती| लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हो पाया और हमारे हाथ फिर से 5 साल के लिए बंध गए|
फिलहाल  राजीव भाई के  बहुत से चाहने वाले भारत स्वाभिमान से हट कर अपने अपने स्तर पर राजीव दीक्षित  का प्रचार करने मे लगे हैं| फिलहाल की मानें तो बाबा रामदेव को जेड प्लस सिक्योरिटी मिल चुकी है और राजसत्ता सत्ता की नजदीकियों से बहुत से बिगड़े काम भी बन पड़े हैं| सुना जा रहा है कि कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बाबा रामदेव के प्रकल्पों में निवेश का भी करार किया है| राजीव दीक्षित के समर्थकों ने बाबा रामदेव से अलग होकर अलग राह पकड़ी है और फिलहाल उनके विरोधी तेवर जरुर बाबा रामदेव के लिए चिंता का सबब बने हैं|सवालों और संदेहों के घेरे में बाबा रामदेव  खड़े तो हैं लेकिन देखना होगा कि सरकारी प्रश्रय से संदेह का लाभ कितने दिन मिल पाता है| 


‘अंदाज-ए-बयां कल के बहुत खूब नहीं हैं।
शायद कि तेरे दिल में उतर जाय मेरी बात।
पता नहीं किस शायर की लाइंस हैं। पर इन्हीं खूबसूरत शब्दों से एम.ए.आलमगीर साहेब ने उस दिन अपनी बात शुरु की थी। मुझे बहुत साफ-साफ याद है। कुछ ही देर पहले मैंने उस मंच से टिप्पणी की थी। वह करीब पांच मिनट की संक्षिप्त सी बात थी। हां, उनकी शहादत से ठीक चौदह सप्ताह पहले, वह 2 मार्च 2014 का दिन था। और हम कांग्रेस मुख्यालय के सामने अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे  पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। सचमुच युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन के इतिहास में वह उत्सव का दिन था। कुल छ: मिनट में ही उन्होंने आन्दोलन का रुख स्पष्ट कर दिया था। उन्हें सुनते हुए मुझे इतना अच्छा लगा कि स्पीच खत्म होने से पहले ही मैंने कुछ साथियों को छेड़ना नागवार समझा था। अब स्वतंत्र संवाद की मांग करने वाला वह मसीहा हमारे बीच नहीं है। पर इस बीच उनकी बातें बराबर मेरी स्मृतियों में उभरती रही हैं। शायद आपसे साझा कर इस रुह को कुछ राहत मिले।
अभिव्यक्ति की आजादी के मसले पर इस आन्दोलन की चर्चा के क्रम में कुछ अहम बातों को ध्यान में रखना जरुरी है। इस सन्दर्भ में एक बात जान स्वींटन की है। किसी जमाने में वह ‘द न्यूयार्क टाइम्स के चीफ आफ स्टाफ थे। उन्होंने न्यूयार्क प्रेस क्लब में अपने सम्मान में दिए गए भोज-समारोह को संबोधित करते हुए 1953 में कहा था, ‘विश्व इतिहास में आज की तारीख में अमेरिका में स्वतंत्र प्रेस नाम की कोर्इ चीज नहीं है। यह आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं। आपमें कोर्इ भी ऐसा नहीं है, जो अपनी निष्पक्ष राय रखने की हिम्मत करे और यदि कोर्इ उसे प्रस्तुत करता है तो उसे पहले से ही पता होता है कि वह कभी नहीं छपेगी। मुझे हर सप्ताह इसलिए पैसे मिलते हैं कि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार से अलग रखूँ। सबको इसलिए वेतन दिए जाते हैं और अगर आप में से कोर्इ अपनी निष्पक्ष राय लिखने की मूर्खता करेगा तो वह पटरी पर दूसरी नौकरी तलाश करता मिलेगा। यदि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार के किसी अंक में डाल दूंगा तो चौबीस घंटे के अन्दर मेरी नौकरी चली जाएगी। अब युएनआर्इ की ऊर्दू सेवा से जुड़े रहे इस वरिष्ठ पत्रकार की दर्दनाक मौत को और एक कदम आगे का विकास मानने में हमें कोर्इ आपत्ति भी नहीं रही।
कृष्ण मेनन ने कहा था कि अखबार के प्रेस और जूट के प्रेस को उनके मालिक एक जैसा मानते हैं। यह मालिकों के अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति को इंगित करता है। असली मायनों में भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत समाजसेवा के कार्य की भांति हुआ था। टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व एडिटर गिरिलाल जैन ने कभी इसकी मिसाल पेश किया था। उन्होंने मालिक परिवार के एक हेकड़ीबाज युवक का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया और संपादक पद को अलविदा कह दिया था। क्या देश की आजादी के 67 साल बाद भी ऐसा ही है? यहां पूर्व प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कथन पर गौर करने से पत्रकारिता में आर्इ कमियों की ओर नजर पड़ती है। उन्होंने कहा था कि जिसे कोर्इ काम नहीं मिलता वह इस पेशे में आकर दलाली करता है। इन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखकर ही आज इस मुíे की वास्तविक अहमियत समझा जा सकता है। आलमगीर साहेब की बातों पर नजर डालने से चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। उन्होंने विदेशी शकितयों द्वारा भारत में स्थापित न्यूज एजेंसी की सफलता के सापेक्ष स्वदेशी सूचना तंत्र पर कठोर आघात को कारगर ढंग से उजागर करने का कमाल कर दिखाया। बेशक उन्होंने हमारे युग का सबसे क्रांतिकारी कार्य किया है। उन्हें नहीं जानना इस युग की बड़ी भूल ही मानी जाएगी।
आज से 54 साल पहले युनाइटेड न्यूज आफ इंडिया का Üाृजन हुआ था। यह राष्ट्रहित में देश-दुनिया पर पैंनी नजर रखने के क्रम में निष्पक्षता सुनिशिचत करने का सार्थक प्रयत्न माना जाता रहा है। नाम के अनुरुप ही इसमें देश के मीडिया प्रतिषिठान साझीदार होते हैं। उस दौर में प्रिंट मीडिया का वर्चस्व था। परिणामस्वरुप समाचारपत्र प्रकाशित करने वाले समूहों ने अपने हिस्से के शेयर खरीदे। इस न्यूज एजेंसी को खड़ा काने में सत्तार्इस शेयरधारकों ने 10,189 शेयर खरीद कर कुल 10,18,900 रुपये जमा किये थे। यह अंग्रेजी हुकुमत के दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की जरुरतों को पूरा करने के लिये बनी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया के बरक्स एक विशुद्ध राष्ट्रीय एजेंसी की जरुरत को पूरा करती थी।
नेहरुजी का यह सपना आजादी के एक युग बाद जाकर ही साकार हो सका था। आजादी के बाद स्वतंत्र संवाद की Üाृंखला में इस विकास का अनूठा महत्व भी है। इस तथ्य को किसी भी सूरत में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। सैकड़ों पत्रकारों और कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराने वाला यह संस्थान क्या सचमुच आज बेहद मुशिकल दौर से गुजर रहा है? यदि हां, तो इस ओर अनदेखी करना सदैव अनुचित ही माना जायेगा। यहां ध्यान रखना चाहिए कि भारत के पहले प्रधानमन्त्री ने नक्षत्रों की तरह सत्तार्इस सहयोगियों की पृष्ठभूमि में इसे खड़ा किया था। इन टिमटिमाते तारों पर आज भी कर्इ लोगों की नजरें टिकी हुर्इ है।
इस कार्य में पशिचम बंगाल के पहले मुख्यमन्त्री डा विधानचंद्र राय की विशेष भूमिका रही। गंभीर परामशोर्ं के बाद आखिर में उन्होंने इस योजना का संविधान तैयार किया था। इसके चेयरमेन एक विशेष क्रम में परिवर्तित होते रहें। ऐसा विधान भी किया गया था। फिर उन्हीं के नेतृत्व में इसे लागू भी किया गया। आनन्द बाजार पत्रिका समूह की इसमें एक चौथार्इ से कुछ ज्यादा की हिस्सेदारी रही। मिथिला के प्रतिनिधि राज दरभंगा की कंपनी ने इसमें सात फिसदी की अंशधारिता खरीदी, तो कलिंग के सम्मानित स्वर समाज ने भी करीब एक फिसदी का अंशदान सादर समर्पित किया था। ज्ञातव्य है कि उडि़या दैनिक समाज का स्वामित्व लोक सेवक मण्डल (सर्वेंटस आफ द पिपल सोसाइटी) के हाथों में है। उस कालखंड में इस एजेंसी को देश ने स्वतंत्र संवाद का पर्याय माना था। क्या फिर कभी ऐसा माना जाएगा? यह बेहद मुशिकल सा सवाल है। और यही प्रश्न इस आन्दोलन के मूल में है। आलमगीर साहेब का हुनर इस बात को साफ-साफ उकेरने में ही जाहिर होता है।
नैतिक रुप से इसके अंशधारक ही प्रबंधन के लिए जिम्मेदार भी होते हंै। इनमें आर्यावत्र्त जैसे प्रतिषिठत पत्र का प्रकाशन वर्षों पहले बन्द हो चुका है। फिर भी यह एजेंसी आरंभिक काल से ही बराबर तरक्की की राह पर अग्रसर रहा। वर्ष 2006 में यह सैकड़ों पत्रकारों समेत एक हजार से ज्यादा लोगों को जीविका उपलब्ध कराने में सक्षम साबित हुआ था। नो-प्रोफिट-नो-लास का बिजनस चलता रहा। पर आज यहां कामगारों की संख्या करीब आधी हो चुकी है। एकदिन इसे और उन्नत करने के लिए ≈दर्ू सेवा शुरु किया गया था। आलमगीर साहेब ने बताया था कि किस तरह राजीव गांधी ने दिलचस्पी लेकर यह कार्य किया। उनकी बातों में फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को नेस्तनाबूद करने का व्यौरा मिलता है। उन्होंने संस्थान के अंदर बैठकर इसे नष्ट करने में लगे लोगों के बारे में भी खुलकर कहा था। दुर्भाग्य है कि इस षडयंत्र का सार्वजनिक मंच से खुलासा करने के बाद वह सौ दिन भी जीवित नहीं रहे। क्या यह दाग भी धुलने योग्य है? इसमें मुझे शक है।
इस मुíे की तह में पहुंचने के लिए गंभीर अध्ययन की जरुरत होगी। मीडिया की रंगीन दुनिया के अन्दर की सच्चार्इ जानकर ही युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन से जुड़ी समस्याओं की गंभीरता का खुलासा होता है। पिछले साल दानिश बुक्स ने एक पुस्तक छापी थी, सफेदपोशों का अपराध। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक ब्रजकुमार पांडेय की इस किताब में एक पाठ का शीर्षक है, मीडिया की दुनिया। इसमें एजेंसी के सत्तार्इस अंशधारकों में से कुछ खास नाम उनके उल्लेखनीय कार्यों के साथ वर्णित हैं। इसे पढ़कर भारत के पहले राष्ट्रीय एजेंसी की दुर्दशा के विषय में बेहतर समझने की गुंजाइश बनती है। ऐसी साफगोर्इ से यहां कह पाना मेरे बूते की बात नहीं है।
पिछले सात वर्षों में यह संस्थान सतत मृत्यु की ओर बढ़ती रही है। आज युएनआर्इ प्रबंधन में लंबे अर्से से काबिज रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी और विश्वास त्रिपाठी की युगल-जोड़ी इस दशा के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एजेंसी के तीन हजार करोड़ की सम्पत्ति हड़पने का प्रयास किया है। पहली नजर में यह भूमाफिया का काम प्रतीत होता है। ऐसा करने में कोर्इ कसर बाकी नहीं रखा गया है। अबतक इसे बचाए रखने में सर्वोच्च न्यायालय और इस आन्दोलन के सूत्रधार समरेंद्र पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यहां आज भी चातक स्वाति की बूंदों से वंचित है।
न्यायालय में एबीपी समूह ने उन्हीं बूंदों को उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था। पर यह इस संकट से उबरने का असफल प्रयास साबित हुआ है। इसकी वजह इस प्रकरण में ढ़ेर सारी समस्याओं की मौजूदगी है। आज रायटर का करीब सात करोड़ रुपये का बकाया है। कर्मचारियों के पीएफ का भी करीब इतने ही रकम का घोटाला उजागर हुआ था। इस विषय में प्रबंधन के खिलाफ रिपार्ट भी दर्ज है। यहां यौन उत्पीड़न और दलित उत्पीड़न के भी संगीन मामले हैं। संस्थान के निदेशक विश्वास त्रिपाठी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। उनके खिलाफ लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला प्रकाश में आया है। और इन सब के विरुद्ध खड़ा होने वाले या तो एजेेंसी से गायब हो जाते हैं या फिर इस दुनिया से ही। ऐसा कब तक चलेगा? क्या ऐसी दशा में भी प्रबंधन के अलावा सरकार की मंशा पर प्रश्न नहीं उठेगा? इसका जवाब सेबी की चिट्टी में अब नजर आता है। हालांकि राष्ट्रीय महिला आयोग और दूसरी अन्य सरकारी एजेंसियों ने इन मामलाें का संज्ञान लेकर उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल ही में दिल्ली पुलिस की विजिलेंस सेल द्वारा इन मामलों में जांच भी शुरु किया गया है।
सहारा प्रमुख को जेल भेजने के बाद अब सेबी ने इस मामले में कार्यवाही किया है। यह वही संस्थान है, जिसने शारदा (सारधा) और सहाराश्री की पोल खोलकर आम लोगों (निवेशकों) को राहत पहुंचाया है। सेबी ने ‘सेव युएनआर्इ मुवमेंट को इस मसले में पत्र लिखकर सूचित किया है। पाठक बताते हैं कि एनबी (नव भारत) प्लांटेशन नामक इस चिट-फंड कम्पनी के सैकड़ों करोड़ का घोटाला सामने आया है। युएनआर्इ के विवादित चेयरमेन आज बेहद गंभीर कानूनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब अपने भी उनका साथ छोड़ने लगे हैं। हाल ही में इस विषय में सनसनीखेज खबरें प्रकाश में आर्इ है। कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी इस एजेंसी के लंबे समय से चेयरमेन हैं। बीते दिनों मीडिया रिपोर्ट में उनके इस्तीफे जैसी एक खबर आर्इ। सबलोग आशा कर सकते हैं कि किसी दिन इस त्यागपत्र की पूरी कहानी भी सामने आएगी।
सैंतालिस सालों तक इस एजेंसी ने दुनिया भर के लोगों को ताजा घटनाक्रम से जोड़कर रखने में अहम भूमिका निभार्इ। बाद में सफेदपोशों ने इस एजेंसी को अंदर से खोखला करने का लक्ष्य साधना शुरु किया। जाहिर सी बात है कि एक अर्से से युएनआर्इ प्रबंधन में अपराधियों का गैंग काबिज रहा है। अब इस बात का अंदाजा लगाना खासा मुशिकल भी नहीं रहा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि युएनआर्इ से जुड़ी खबरें इसी एजेंसी के लिए कार्यरत पत्रकारों और कर्मचारियों को वर्ष 2007 से बाहरी श्रोतों से मिली है। डीएनए ने 32 करोड़ 4 लाख में हुए अंशधारिता के खरीद-फरोख्त का वह व्यौरा प्रकाशित किया था, जिसे बाद में एबीपी समूह उच्चतम न्यायालय लेकर चुनौती दी। अब चेयरमेन के त्यागपत्र की यह खबर भी युएनआर्इ श्रोत से नहीं है। गौर करने की बात है कि आजकल एक वेब पोर्टल के लिए कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है।
विभिन्न स्तरों पर इससे जुड़े मसलों को लेकर न्याय की गुहार का असर देखा जा रहा है। इस क्रम में आलमगीर साहेब अंतिम जन साबित हो सकते हैं। आज उनकी सुध लेने वाला कोर्इ नहीं है। क्या ऐसी दशा में लोकतंत्र में आस्था रखने वालों को संतुषिट मिलेगी? सुनील दत्त और देवीलाल जैसे प्रभावी नेताओं के कर्मवीर पुत्रों को जेल भेजने वाली व्यवस्था क्या कभी इस शहीद को न्याय देगी? इस आन्दोलन से जुड़े इन्हीं प्रश्नों ने आज प्राय: सभी शेयरधारकों का मुंह बन्द कर रखा है। पर इतना तो साफ हो गया है कि प्रबन्धन में आए दोषों के कारण ही कर्मचारी संगठन ने युएनआर्इ बचाओ अभियान का सूत्रपात किया। वास्तव में इस संवाद एजेंसी को बचाने की नैतिक जिम्मेदारी इसके अंशधारकों की ही होती है।
क्या एक क्रांतिवीर पत्रकार की शहादत के बाद प्रकाश की नर्इ किरण फूटी रही है? क्या अब यह एहसास गहराने लगा है कि आने वाले समय में इसके प्रबंधन का सबसे जटिल संकट दूर होगा? इस बीच लोक सेवक मण्डल ने इस मसले में गंभीरता दिखार्इ है। आखिरकार यह चर्चा एक्जीक्युटिव काउंसिल की बैठक तक पहुंच चुकी है। बीते 26 नवम्बर को बड़ौदा में हुर्इ बैठक में दीपक मालवीय को इस मामले की जिम्मेदारी सौंपा गया है। सोसाइटी के पहले उपाध्यक्ष उत्कलमणि गोपबन्धु दास ने नौ दशक पूर्व समाज का प्रकाशन शुरु किया था। एक अर्से से भीमसेन यादव और दीपक मालवीय इस प्रतिषिठत पत्र का प्रबंधन देख रहे हैं। देश-दुनिया आज इसके एक दर्जन संस्करणों का बेहतरीन प्रकाशन देखकर उनके कौशल से रु-ब-रु होती है। समाज में ‘मजिठीया वेज लागू कर उन्होंने इसे साबित किया है। लाल-बाल-पाल के शिष्यों से ही पत्रकार भी बेहतर भविष्य का आशा करते हैं। मालवीय ने शारदा चिट-फंड घोटाले में संलिप्त भुवनेश्वर प्रेस क्लब से जुड़े मधु मोहंती के खिलाफ कड़ा रुख अखितयार कर प्रशंसनीय कार्य किया है। परंतु आज की दुरुह परिसिथति में युएनआर्इ का संकट दूर करना चुनौतियों भरा काम ही है।
खबरपालिका को शासन-व्यवस्था का चौथा अंग कहा जाता है। श्रमजीवी पत्रकारों के इस आन्दोलन से स्पष्ट हो चुका है कि आज फिर कहीं अभिव्यकित की आजादी खतरे में है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कोर्इ शुभ संकेत नहीं है। पर यहां इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाविष्य में लोक सेवक मण्डल की तरह ही कोर्इ और प्रभावी अंशधारक भी अभिव्यकित की आजादी के नये शहीद को याद करने का काम करे।
कौशल किशोर

राकेश मिश्र

वेब मीडिया के प्राथमिक अन्वेषण में सूत्रों से जानकारी मिली है कि  भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागडे के की तलाशी के सन्दर्भ में यू ट्यूब पर जारी किया गया विडियो फ़र्ज़ी है. “अरूप भट्टाचार्य” नाम के यू ट्यूब एकाउंट से जारी किये गए इस विडियो की खबरें मुख्य धारा का भारतीय मीडिया धड़ल्ले से चला रहा है. ब्राजील के किसी छद्म एकाउन्ट “अरूप भट्टाचार्य” के विडियो लिंक

में 23 दिसम्बर 2013 को जारी किये गए इस विडियो में न्यूज़ एक्स और सी एन एन के प्रसारण अंशों के साथ साथ एनबीसी चैनल की एक वेबसाइट (http://www.wkyc.com/) द्वारा 12 फरवरी 2008 को जारी किये गये विडियो से काट के बनाया गया है.

यह भी गौरतलब है कि इस विडियो पर अमेरिकी अधिकारियों की तरफ से भी फ़र्ज़ी होने के बयान की ही पुष्टि हुई है. निश्चित तौर पर केविटी सर्च और स्ट्रिप सर्च कोई मामूली बात नहीं है. जिस प्रकार से बेहद अशोभनीय स्थितियों से भारतीय राजनयिक को गुजरना पड़ा है वह भले ही अमेरिकी लिहाज से सामान्य कार्यवाही प्रक्रिया हो लेकिन भारतीय सम्प्रभुता के लिहाज से बेहद निंदनीय है. इस आपत्तिजनक विडियो के अंशों के वास्तविक मामले में भी स्ट्रिप सर्च की वजह से अमेरिकी सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी.

भारतीय सम्प्रभुता को चुनौती

भले ही सलमान खुर्शीद कहें कि अमेरिकी सहयोग से मामला सुलझा लिया गया है लेकिन जिस प्रकार से इंटरनेट और विभिन्न माध्यमों में यह विडियो वायरस के तौर पर फैला है उसमे भारतीय विदेश नीति और खास तौर से विदेशी राजनयिकों की बेहद फ़ज़ीहत हो रही है. जाहिर है कि ऐसे में अमेरिका से आशा की जाती है कि उनके अपने स्वदेशी सूचना तंत्रों से भारतीय सन्दर्भों में इस प्रकार की अवास्तविक और अमानवीय भ्रामक सूचनाओं पर रोक लगाए। यद्यपि यह अमेरिकी अधिकारियों के लिए बाएं हाथ के खेल जैसा ही है फिर भी इस प्रकार की वाहियात घटनाओं पर कोई ठोस कार्यवाही न करके उस पर कोरी बयानबाजियां करना कहीं न कहीं भारत की सम्प्रभु जनता, भारतीय राजनयिकों और प्रवासियों के मनोबल को कमजोर करने के तौर पर लिया जाना चाहिए। भूराजनैतिक सन्दर्भों में ऐसी घटनाओं के सन्दर्भ में  भारतीय विदेश विभाग की उपेक्षा के चलते जनमानस में बेहद असंतोष व्याप्त है.

Source : http://hellocampus.org


अरविन्द पर लगाये सनसनीखेज आरोप 
प्रवासियों की उपेक्षा से नाराज संगठन ने किया विरोध का ऐलान 
आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल के प्रवासी विरोधी रवैये से निराश प्रवासी भलाई संगठन का अनशन दूसरे दिन भी जारी रहा. जंतर मंतर पर जमे आंदोलनकारियों ने कहा कि गांधी टोपी पहन कर यूपी बिहार के प्रवासियों को खुल्लम खुल्ला धमकी देना बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। इस मामले में प्रवासी भलाई संगठन द्वारा जारी विज्ञप्ति के माध्यम से  संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष   अविनाश सिंह ने आम आदमी पार्टी के मुखिया पर सनसनीखेज आरोप लगाया है. संगठन के मुखिया के मुताबिक अविनाश के मोबाइल पर विगत चौबीस जुलाई को अरविन्द द्वारा दिल्ली छोड़ने और जान से मारने की धमकी दी गयी. इस धमकी के विरुद्ध अविनाश ने सत्ताइस जुलाई को महेंद्र नगर थाने में शिकायत भी दर्ज करवायी।  इस शिकायत पर कोई कार्यवाही न होने पर संगठन के दर्जनों कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना पड़ा. आंदोलन के प्रमुख लोगों में राजू सिंह राना, डा. एम दीक्षित, डा. बलराम, शमीम अख्तर, शबीर हुसैन, मुकेश गुप्ता, अजय सिंह, राज बल्लभ सिंह, लड्डू लाल गुप्ता आदि लोग मौके पर मौजूद रहे

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पुलिस सूत्रों से घटना पर अग्रिम कार्यवाही स्पष्ट नहीं हो सकी है. विज्ञप्ति के अनुसार  अविनाश   के नेतृत्व में प्रवासी भलाई संगठन ने आम आदमी पार्टी प्रमुख की प्रवासी विरोधी मंशा और धमकी  के चलते विगत तीस जुलाई को पुलिस मुख्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन करके पुलिस आयुक्त से सुरक्षा की गुहार भी लगाईं थी.
क्या था मामला 
विज्ञप्ति के अनुसार विगत ग्यारह जुलाई को तीर्थंकर महावीर मेडिकल कालेज की छात्रा नीरज भड़ाना की हत्या के मामले की सीबीआई जाँच के लिए हो रहे आंदोलन में अरविन्द केजरीवाल अपने एक दर्जन समर्थकों के साथ पहुंचे। संगठन का आरोप है कि अरविन्द ने आंदोलन को हाइजैक करने का प्रयास किया।  इस विषय में अरविन्द को  पत्र लिख कर संगठन ने अपना असंतोष जाहिर किया और प्रेस कांफ्रेंस भी किया। इसी की प्रतिक्रिया में अरविन्द पर धमकी देने के आरोप लगाये हैं.
आम आदमी पार्टी के मुखिया के प्रवासी विरोधी रवैये से निराश प्रवासी भलाई संगठन ने अरविन्द की तुलना ठाकरे से की है.  संगठन ने अविनाश की भूख हड़ताल के समर्थन में यूपी -बिहार के प्रवासियों से एकजुट होने का आह्वान किया है.
बढ़ेंगी पार्टी की  मुश्किलें      
जानकारों  का मानना है कि अन्ना हजारे के मामले और फण्डिंग के आरोपों से जूझ रही पार्टी के मुखिया पर लगे सनसनीखेज आरोपों से पार्टी की छवि धूमिल हुई है. यूपी-बिहार के लोगों के खिलाफ इन आरोपों के बाद  पार्टी को प्रवासी जनाधार की चुनौती से भी जूझना होगा। इस मामले में पार्टी मुखिया की तरफ से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी है.  विज्ञप्ति में दिए अरविन्द के फोन नंबर पर कोई जवाब नहीं मिला.
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बी एस पाबला

सचिन तेंदुलकर  उस एक भारी-भरकम क्लब के कर्मचारी हैं जो Board of Control for Cricket In India (BCCI) कहलाता है। विशुद्ध व्यवसायिक नज़रिये सरीखे इस प्रतिष्ठान के दो मशहूर प्रोजेक्ट हैं जिन्हें नाम दिया गया है टीम इंडिया और आईपीएल। इन दोनों के अपने अपने ग्रुप मेंबर हैं जिन्हें निश्चित वेतन के अलावा अच्छा प्रदर्शन करने पर आम कारखाने जैसे बोनस भी दिया जाता है।

बात कुछ जमी नहीं! क्योंकि तभी ख्याल आया इन्कम टैक्स वाले उस झंझट का जिसमें इनकम टैक्स अफसर द्वारा सवाल ज़वाब किए जाने पर सचिन (जी) ने कहा था कि he is a non-professional cricketer और playing cricket is not his profession इसलिए फॉर्म में लिखा गया कि Income from playing cricket is reflected as ‘income from other sources’!

यह सब Sachin R. Tendulkar vs. Assistant Commissioner of Income-tax, Range 193/ IT APPEAL NOS. 428 TO 430 AND 6862 (MUM.) OF 2008 के आधिकारिक दस्तावेज़ में दर्ज़ है। तो इन भाई सा’ब को खेल के लिए कोई सम्मान कैसे दे सकती है सरकार? जब वह खुद कह रहे हों कि he is a popular model who acts in various commercials for endorsing products of various companies… A major part of the income derived by him during the year is from the exercise of his profession as an ‘actor’ in these commercials… the income derived by him from ‘acting’ has been reflected as income from “business & profession”!!

मतलब यह हुआ कि मुख्य कमाई तो विज्ञापनों की शूटिंग, मॉडलिंग से है क्रिकेट तो बस यूँ ही कभी कभी खेल लेते हैं ज़नाब!

इन सब बातों के बीच भारत सरकार के इन्कम टैक्स अफ़सर ने इसी दस्तावेज़ के अनुसार कह डाला कि He is engaged in the activity of playing cricket as a paid job rather than as an amateur.

चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है  कि शपथपत्र देकर खुद खिलाड़ी और यह बोर्ड अदालत में कह चुके हैं कि हम भारत देश के लिए नहीं खेलते, अपने बोर्ड को मुनाफा दिलवाने के लिए खेलते हैं और खिलाड़ी ठेके, कॉंट्रेक्ट पर रखे जाते हैं जिनका भुगतान किया जाता है उन्हें, मुनाफा लाने पर। साथ ही यह भी कह डाला कि ना तो हम भारत का तिरंगा फहराते हैं और ना ही किसी राजकीय चिन्ह का प्रयोग कहीं करते हैं!!

ऐसे ही एक मौके पर सुपरिचित हिंदी ब्लॉगर जीतू चौधरी ने अपनी पोस्ट में लिखा था कि जहाँ भी क्रिकेट से कमाई की बात आती है तो ये अपने आप को भारत के प्रतिनिधि कहते, सारा माल कमाते, बटोरते और हजम कर जाते हैं। लेकिन जहाँ भी सरकार इनसे कुछ फ्री में मांगना चाहती तो ये लोग फ़टाक से एक प्राइवेट क्लब मे बदल जाते।

और तो और, न्यायालय मे दिए शपथपत्र (जो अब इनकी नाक की नकेल बन जाएगा) मे ये लोग चीख चीख कर कहते कि हम तो भारत का प्रतिनिधित्व ही नही करते, ना ही हम सरकार से जुड़े है, हम तो सिर्फ़ एक क्लब है जहाँ कुछ खिलाड़ी हमारे कर्मचारी है, और अपने कर्मचारियों को खेलने के लिए हम विदेशों मे भेजते है। ना तो हम भारत मे क्रिकेट के सरोकार से जुड़े है और ना ही हम खेल मंत्रालय के अधीन है। पूरा शपथ पत्र अगर आप पढे तो आप इनकी महानता के गुण गाने लग पड़ो।

………लो जी, यह प्रश्न तो अब भी सामने खड़ा कि तनख्वाह ले कर अपने मालिक को मुनाफ़ा दिलवाने वाल़े कर्मचारी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए क्या?

अब आप ही सहायता करो!1476718_762422523773643_1791095550_n


बाबा विजयेन्द्र

अभी अभी भारत-रत्न बने रसायनशास्त्री नेता को ‘मूर्ख’ कह कर गरियाते आये हैं। इस रसायन शास्त्री का नेताओं के प्रति हुए इस भौतिक-परिवर्तन को समझा जा सकता है . राव को गुस्सा है कि इन नेताओं को अगर भारत-रत्न  देना ही था तो फिर सचिन के बाद दिया होता। सचिन के शोर में राव साहेब को नोटिस ही नहीं लिया।  राव साहेब को फिर से ‘पोलिटिकल-केमेस्ट्री’ पढनी चाहिए

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राजनेता इन्हे मूर्ख बना गए । आप  राव साहेब नेता को मूर्ख कह रहे है. यह आपकी मूर्खता है। भारत का नेता अगर मूर्ख है तो फिर आपकी विद्वता को आँकी कैसे गयी ? इन मूर्खों द्वारा  दिया गया भारत- रत्न सम्मान वापस क्यों नहीं कर देते ? इस दो कौड़ी के सम्मान की क्या जरूरत है। मल्टीब्रांड सम्मान ले बेहतर होगा। विदेशी सम्मान के भूखे लोग भारत के नेता को गरियाते रहते हैं। मैगसासे ,बूकर  आदि दिए ही जाते हैं कि ये अपने नेता को जमकर नीचा दिखाए।              भ्रष्ट , बलात्कारी, चोर और लूटेरा साबित करने के लिए इन्हे पैसे मिल रहे हैं। राव अरविंद केजरीवाल को तो आप जानते ही हैं वो भी मैग्सैसे प्राप्त करके भारत भर के नेताओं को भ्रष्ट साबित करने में लगे हैं. अरविन्द केजरीवाल को जरुरत है भ्रष्टाचार की जिससे वो सबको दोषी ठहरा के देश के नेतृत्व और नीयत को नीचा दिखा सकें.उसी के सुर में सुर मिला के आप भी वही कहानी दोहरा रहे हैं.  आप जैसे विद्वान और लोग यह कैसे भूलते हैं कि इसी तंत्र ने अरविन्द को मौका दिया है और और जिसे आप मूर्ख कह रहे हैं उसी मूर्ख तबके ने आपको भारत रत्न का तमगा।  इतिहास गवाह है कि गुलामी के दिनों में कितने बुद्धिजीवी और प्रतिभा संपन्न लोग अंग्रेजी  राज और बाज़ार  की चाटुकारिता और दलाली करते रहे  है. भारत की आज़ादी की बात की थी भारत के मूर्खों ने, तमाम नेताओं ने. उन्ही नेताओं की दीवानगी की  देन है आपके देश की आज़ादी। आपके वक्तव्य के विरोध में मै यह कहना चाहूंगा कि देश के नेता मूर्ख और चोर नहीं हैं. भारत के नेताओं में आत्मीयता है, सम्बन्ध बोध है उस नेता के पास किसी तबके के  कोई भी लोग आते हैं तो उसे वे सम्मान से देखते हैं. वहीँ पर देश के बुद्धिजीवी और नौकरशाह अपनी अकर्मण्यता को छिपाने के लिए देश के नेताओं को मूर्ख बता रहे हैं दोषी ठहरा रहे हैं. बहुत से षड़यंत्र चल रहे हैं देश की जनभावना बहलाने और आत्म विश्वास को कमजोर करने के लिए. अगर देश के भारत रत्न यह कहने लगें कि नेता मूर्ख और चोर हैं तो हम कहाँ से लायेंगे देश देश के नेता किसको सौंपेंगे देश की बागडोर, इस प्रकार का वक्तव्य क्या यह साबित करने की कवायद है कि देश की संसद अब हमारे नेताओं  नहीं चल रही, संसद का भी निजीकरण कर दिया जाये।  राव साहब नेता शब्द को  गाली बनाने की कवायद मत कीजिए, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की नज़र में देश की धरती रत्न गर्भा है और देश का बच्चा -बच्चा भारत रत्न है.

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बाबा विजयेंद्र ने जेपी के    सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकलकर बिहार के तमाम जमीनी आंदोलनों में पैंतीस वर्षों तक संघर्ष  किया है.     नव उदारवाद के दौर में भारत की आम जनता के लिए नए रास्तों की तलाश में “आज़ादी बचाओ आंदोलन” और “युवा भारत” सरीखे प्रयोगों को लम्बे समय तक जिया है.  इसी राजनैतिक प्रयोगवादिता के चलते नक्सल आंदोलन से लेकर संघ तक का सफ़र भी  तय किया। वर्त्तमान में राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक स्वराज खबर के समूह संपादक हैं.

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बाबा विजयेन्द्र
बाज़ार में भगवान की ऎसी- तैसी हो रही है। बाज़ार के अभाव में भारत के करोड़ों देवता आज झख मार रहे हैं। इन्हे पूछने वाला कोई नहीं है । कोई इसे भाव नहीं दे रहा है। बाज़ार ने नए भगवान् सचिन  को अवतरित होने का मौका दिया है।  चारो ओर इस ‘ क्रिकेट – भगवान ‘ का जोर है। सारे भगवान सचिन के इस देव-अवतार से हतप्रभ हैं।  कहाँ जाएँ और क्या करें? कैसे अपने भक्तों को गोलियाकर(गोल -बंद ) रख पायेंगें भारत के भगवान ? यह आज देव- जगत की बड़ी पीड़ा है।

आज भारत के भगवान लक्ष्मी और गणेश जी को एक शराब कंपनी ने अपना ब्रांड अम्बेसडर बनाया है। आस्ट्रेलिया की कंपनी ब्रुकबैले यूनियन ब्रेवरी जो न्यू साऊथ वेल्स  में स्थित है ने ‘लक्ष्मी गणेश ब्रांड शराब’ बनाया है। वैसे भारत में आज भी  तुलसी छाप गुटका ,राम छाप बीड़ी और कृष्ण छाप कंडोम बेचने के सब खेल शुरू हो गए । एक कंपनी ने कई देवता का फोटो लड़कियों के अंडरवीयर पर चिपका कर बेच रहे हैं। जिस तिरंगा का नाम लेते ही देशभक्ति का ज्वार  उभरता था वह तो आज देश का नहीं, एक गुटका- उत्पाद का ब्रांड हो गया है . फहराओ तिरंगा प्यारा’ वाले गीत के बदले गुड्डू रंगीला का गीत -”खा लो तिरंगा गोरिया फाड़ के जा झाड़ के ‘गीत ने जगह बना ली है”

बीच में कोला कंपनी ने दुर्गा पर भी  दाव खेला था। बंगाल में कोला ने दुर्गा-पूजा को स्पोंसर किया था।  यह कोला-दुर्गा  बहुत ही प्रचार में रही। इस कोला -दुर्गा  ने कंपनी को कितना मुनाफा दिया होगा पता नहीं। बाज़ार अब भगवान् गढ़ने का औजार हो गया है। साधू इनके संसाधन हैं।महात्मा इनके मार्किट हैं।

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दुनिया में पहले हम  जिन्दा भगवान एक्सपोर्ट करते थे। आज हम वहीं से मुर्दा भगवान को चीन से आयात करने को मजबूर हैं। इस बार की दीवाली चीन से भेजे गए लक्ष्मी – गणेश से ही मन पायी।  हमारे घर – आँगन को चीन ने अपने बाज़ार की रोशनी से भर दिया। कभी  बुद्ध का ‘ज्ञानदीप ‘ चीन के भक्ति- बाजार में छाया हुआ था। संघमित्रा और महेन्द्र भारत से रोशनी लेकर चीन गए थे। दुनिया से अंधकार मिटाने की वह एक बड़ी पहल थी। आज यह समाज नकली हीरो के पीछे भाग रहा है। अब हिंदुत्व को हिंदुओं से ही खतरा उत्पन्न हो गया है . अपनी अस्मिता की बोली जितना हिन्दू लगा रहे हैं उतना दुश्मन भी नहीं कर रहे हैं। किसी को भी भगवान बनाकर उसके पीछे भागना दुर्भाज्ञपूर्ण है। नमो नमो। सचिन सचिन। ।राम कृष्ण और लोहिया गांधी गए अब तेल पेरने। विचित्र संयोग है कि राम की लीला को अब लीला भंसाली के जिम्मे छोड़ दिया गया है।

क्रिकेट का यह भगवान ‘रन’ बनाने की प्रेरणा दे सकता है, पर जीवन का ‘ रण ‘ जीतने की ताकत नहीं दे सकता .. इस भगवान पर बाज़ार मेहरबान है। इस भगवान का खेत- खलिहान से क्या रिश्ता है। इस भगवन के इर्द गिर्द  ललित मोदी,श्रीनिवासन , श्री संत जैसे भक्त हुए। इस क्रिकेट ने हमारे’ कृषि मंत्री’ पवार को ;क्रिकेट-मंत्री’ बना दिया। क्रिकेट के मामले में पवार पावरफुल और कृषि के मामले में दब्बू बनते रहे। लाखों किसान आत्म – हत्या करते रहे पर इस मायाबी क्रिकेट ने  पवार के दिल को पिघलने नहीं दिया। सचिन मानो क्रिकेट नहीं कारपोरेट के लिए खेल रहे हों। सचिन को पेप्सी और कोला, माँ के दूध के  समान लगता रहा।  देश को पेप्सी और कोला पिलाते रहे। देश को कार्पोरेट के हाथों लुटवाते रहे। इसका समाज से क्या लेना देना . किसान के धनिया – टमाटर का प्रचार सचिन थोड़े ही करेंगें। देश को डूबोने वाली कांग्रेस ने इन्हे सांसद भी बना दिया। सचिन को भारत -रत्न मिलना चाहिए चाहे उनका भारत जिन्दा रहे न रहे।

सचिन युवाओं के आयकॉन नहीं हो सकते। भगत सिंह आज भी युवाओं के दिल में है। इस कार्पोरेट के भगवान से कंपनी के माल बिकेंगें।मेक्डोनाल्ड का पीजा और बर्गेर बिकेंगे। सचिन न तो सत्तू पीते हैं न ही यह हमारे सत्तू का प्रचार  करने जा रहे हैं ? शायद सचिन कांग्रेस का प्रचार भी करने जा रहे हैं .? क्या बोलेंगें राहुल और सोनिया के लिए।

देशभक्ति में हीरोवाद बेहद खतरनाक है। सावधान रहने की जरूरत है। और भी खेल हैं हमारे देश में। कबड्डी के खिलाड़ी पैसे के लिए काँव -काँव कर रहे हैं। इन्हे करूआ तेल का भी स्पोंसरशिप नहीं मिल रहा है। सचिन को भगवान बनाना तमाम खेलों की हो रही मौत पर मर्सिया पढने  जैसा ही  है।
बाबा विजयेंद्र ने जेपी के    सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकलकर बिहार के तमाम जमीनी आंदोलनों में पैंतीस वर्षों तक संघर्ष  किया है.     नव उदारवाद के दौर में भारत की आम जनता के लिए नए रास्तों की तलाश में “आज़ादी बचाओ आंदोलन” और “युवा भारत” सरीखे प्रयोगों को लम्बे समय तक जिया है.  इसी राजनैतिक प्रयोगवादिता के चलते नक्सल आंदोलन से लेकर संघ तक का सफ़र भी  तय किया। वर्त्तमान में राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक स्वराज खबर के समूह संपादक हैं.